ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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15.निश्चय पञ्चाशत प्रश्नोत्तरी

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निश्चय पञ्चाशत

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प्रश्न ३१९—संसार में कौन सी वस्तु सुलभ है और कौन सी वस्तु दुर्लभ ?
उत्तर—संसार में विषयादिक सुख तो सुलभ हैं किन्तु मोक्ष दु:साध्य है।

प्रश्न ३२०—क्या आत्मा का अनुभव सहजता से हो सकता है ?
उत्तर—जिस आत्मा का ज्ञान अत्यन्त दुर्लभ है, जिसका वर्णन भी वाणी के अगोचर है उस आत्मा का अनुभव अत्यन्त दुर्लक्ष्य है।

प्रश्न ३२१—व्यवहारनय और निश्चयनय का कार्य क्या है ?
उत्तर—दोनों नयों में व्यवहारनय तो अज्ञानी जीवों को समझाने के लिए है और निश्चयनय अर्थात् शुद्धनय कर्मों के नाश के लिए है।

प्रश्न ३२२—निश्चयनय के अनुगामी को कौन सी गति मिलती है ?
उत्तर—निश्चयनय के अनुगामी जीव को पंचमगति अर्थात् मोक्ष सुख मिलता है।

प्रश्न ३२३—व्यवहारनय और निश्चयनय से तत्व का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—व्यवहारनय से तत्त्व वाच्य है अर्थात् वचन से उसको कह सकते हैं, पीछे वह तत्त्व गुणपर्याय आदि के विवरण से सैकड़ों शाखा स्वरूप में परिणत हो जाता है और निश्चयनय से तत्त्व वाणी के अगोचर है अर्थात् वचन से उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न ३२४—क्या व्यवहारनय हेय है ?
उत्तर—व्यवहारनय हेय नहीं है किन्तु उपादेय और पूज्य है।

प्रश्न ३२५—व्यवहार नय किस दृष्टि से पूज्य है ?
उत्तर—जन्म लेते ही जीव इतने बुद्धिमान नहीं होते जो कि बिना प्रयास के ही असली तत्त्व को समझ लेवें, उपदेश आदि के बल से ही उनको असली तत्त्व समझाया जाता है और असली तत्त्व का स्वरूप व्यवहारनय का अवलम्बन करके समझाया जाता है इसलिए असली तत्त्व के आश्रय करने में व्यवहारनय कारण होने से पूज्य है।

प्रश्न ३२६—संसारनाशक कौन है ?
उत्तरआत्मा में जो निश्चय बोधि स्थिति रूप रत्नत्रय है अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप रत्नत्रय हैं वह संसार के नाश के लिए होता है।

प्रश्न ३२७—आत्मा का अखण्ड रूप क्या है ?
उत्तर—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ये तीनों ही आत्मा के अखण्ड रूप हैं।

प्रश्न ३२८—सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र का स्वरूप क्या है ?
उत्तर—आत्मा में निश्चय रीति से जो श्रद्धान है उसको सम्यग्दर्शन कहते हैं, उसी आत्मा का ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और आत्मा में जो स्थिति है उसको सम्यग्चारित्र कहते हैं।

प्रश्न ३२९—सम्यग्दर्शन कब सफल हो जाता है ?
उत्तर—जिस समय सम्यग्दर्शन के द्वारा समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं उस समय सम्यग्दर्शन आदिक सफल माने जाते हैं।

प्रश्न ३३०—सम्यग्ज्ञान की क्या विशेषता है ?
उत्तर—जब तक सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती है तब तक जीव कदापि सिद्ध नहीं हो सकता है।

प्रश्न ३३१—कौन पुरुष शुद्धनय में स्थित हो सकता है ?
उत्तर—जो मनुष्य भ्रमरहित होकर आत्मा को अस्पृष्ट, अबद्ध, अनन्य, अयुत, अविशेष मानता है वही पुरुष शुद्धनय में स्थित है।

प्रश्न ३३२—आत्मा का संसार में परिभ्रमण कब रुकता है ?
उत्तर—सूर्यास्त होने पर अन्धकार की भांति जब तक आत्मा में अखण्ड सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यग्चारित्र की प्राप्ति नहीं होती तभी तक संसार रहता है अर्थात् संसार में भटकना पड़ता है किन्तु जिस समय निर्मल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्चारित्र की प्राप्ति हो जाती है उस समय आत्मा को संसार में परिभ्रमण नहीं करना पड़ता है।

प्रश्न ३३३—कौन सी वस्तु प्राण द्वारा नष्ट करने योग्य है ?
उत्तर —आत्मारूपी भूमि में कर्मरूपी बीज से उत्पन्न हुआ मनरूपी वृक्ष संसार रूपी फल को फलता है इसलिए जन्म से मुक्त होने की इच्छा करने वाले को मन का नाश कर देना चाहिए।

प्रश्न ३३४—स्वपर भेद विज्ञानी आत्मा के विषय में क्या विचार करता है ?
उत्तर—यद्यपि कर्मरूपी कीचड़ अत्यन्त निर्मल आत्मा रूपी जल को गंदा करती है तो भी मुझे कोई भय नहीं है क्योंकि निश्चय से स्व-पर के भेद को करने वाली ज्ञानरूपी फिटकरी मेरे पास मौजूद है।

प्रश्न ३३५—क्षुधा आदिक दुख शरीर में होते हैं अथवा आत्मा में ?
उत्तर—क्षुधा आदिक दुख शरीर में ही होते हैं आत्मा में नहीं।

प्रश्न ३३६—क्या क्रोध, मान आदिक आत्मा के धर्म हैं ?
उत्तर—नहीं, क्रोध, मान आदिक भी आत्मा के धर्म नहीं हैं, जिस प्रकार लाल फूल के आश्रय से स्फटिक मणि लाल हो जाती है उसी प्रकार आत्मा में कर्म के सम्बन्ध से क्रोध आदि विकार पैदा हो जाते हैं किन्तु वे क्रोधादि विकार आत्मा के नहीं हैं।

प्रश्न ३३७—क्या कर्मों से उत्पन्न हुए विकल्प शुद्ध आत्मा में रहते हैं ?
उत्तर—जिस प्रकार मलिन मुख के सम्बन्ध से दर्पण मलिन नहीं होता है वह स्वच्छ ही बना रहता है उसी प्रकार कर्मों से पैदा हुए नाना प्रकार के विकल्पों से भी आत्मा विकल्पी नहीं बन सकता है।

प्रश्न ३३८—किंचित् सुखी कौन है ?
उत्तर—मोक्ष अभिलाषी पुरुष किंचित सुखी है।

प्रश्न ३३९—मोही जीव बाह्य विकारों को कैसा मानता है ?
उत्तर—जिस प्रकार धतूरा खाने वाले को पत्थर भी सोना मालूम पड़ता है उसी प्रकार जो मनुष्य मोही है अर्थात् जिसे हिताहित का ज्ञान नहीं है वह मनुष्य बाह्य स्त्री, पुत्र आदि विकृति को आत्मा ही मानता है।

प्रश्न ३४०—मोक्ष की इच्छा करने वाला मनुष्य क्या विचार करता है ?
उत्तर—मोक्षाभिलाषी इस बात का विचार करता है कि निश्चय से मैं अकेला हूँ और समस्त प्रकार की चिंताओं से भी रहित हूँ।

प्रश्न ३४१—चिन्ता कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर—चिन्ता दो प्रकार की होती है—१. शुभ चिता, २. अशुभ चिंता।

प्रश्न ३४२—शुभ चिन्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर—जो शुभ पदार्थों की चिन्ता की जाय वह शुभ चिन्ता है, जैसे—तीर्थंकर के आसन, आकार आदिक की।

प्रश्न ३४३—अशुभ चिन्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर—स्त्री, पुत्रादिक की चिंता अशुभ चिन्ता है।

प्रश्न ३४४—शुभ और अशुभ चिन्ता से कौन—कौन से कर्म बंधते हैं ?
उत्तर—शुभ चिन्ता के करने से शुभ कर्मों का बन्ध होता है और अशुभ चिन्ता के करने से अशुभ कर्मों का बन्ध होता है।

प्रश्न ३४५—मोक्षाभिलाषी कौन सी चिंता करता है ?
उत्तर—मोक्षाभिलाषी दोनों प्रकार की चिंता नहीं करता है, वह सोचता है कि मैं मुमुक्षु हूँ इसलिए मुझे चिंता से क्या प्रयोजन है और मैं सदा अकेला हूँ इसलिए मुझे स्त्री, पुत्र, मित्रादिक पदार्थ से क्या प्रयोजन है।

प्रश्न ३४६—आचार्यों ने मन को वश में रखने के लिए क्यों कहा है ?
उत्तर—आचार्य कहते हैं कि मनुष्य का सबसे अधिक वैरी मन है क्योंकि जब तक मन वश में नहीं रहता तब तक इसकी कृपा से नाना प्रकार के कर्म आते हैं और तुझे बाँधते हैं। यदि मन को वश में कर लिया जाए तो कर्मबन्ध नहीं हो सकता है।

प्रश्न ३४७—मुनियों का चित्त कौन से मार्ग का अवलम्बन करता है ?
उत्तर—मुनियों का चित्त निरालम्ब मार्ग का ही अवलम्बन करता है।

प्रश्न ३४८—कौन सा योगी सिद्ध होता है ?
उत्तर—अपने चैतन्य स्वरूप को देखने वाला योगी सिद्ध होता है।

प्रश्न ३४९—आत्मा किस प्रकार शुद्ध होता है ?
उत्तर—जिस समय आत्मा में स्व—पर के विभाग का ज्ञान हो जाता है और त्यागने योग्य वस्तु का त्याग हो जाता है उस समय स्वाभाविक निर्मल ज्ञानस्वरूप जो अपना रूप है उसमें आत्मा ठहरता है और पीछे स्वयं शुद्ध हो जाता है।

प्रश्न ३५०—आत्मा किससे रहित होता है ?
उत्तर—आत्मा निश्चय से हेय और उपादेय के विभाग से रहित है।

प्रश्न ३५१—कौन सी भावना मोक्ष को प्राप्त कराती है ?
उत्तर—अद्वैत भावना ही मोक्ष को प्राप्त कराती है।

प्रश्न ३५२—मोक्ष क्या है ?
उत्तरद्वैत तथा अद्वैत भाव से रहितपना ही मोक्ष है।

प्रश्न ३५३—परमानन्द की प्राप्ति किससे होती है ?
उत्तर—र्निवकल्प चित्त से परमानन्द की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ३५४—आत्मस्वरूप की प्राप्ति किसको किस प्रकार होती है ?
उत्तर—जिस प्रकार जो मनुष्य जिस नगर के मार्ग से गमन करता है वह उसी नगर में पहुँचता है उसी प्रकार जो मनुष्य जिस प्रकार के आत्मा का आराधन करता है वह उसी प्रकार के आत्मस्वरूप को प्राप्त करता है अर्थात् यदि वह आत्मा की भावना करने वाला कर्मों से बद्ध आत्मा का ध्यान करेगा तो उसकी आत्मा कर्मों से बद्ध ही रहेगी और यदि वह कर्मों से मुक्त आत्मा का ध्यान करेगा तो उसकी आत्मा मुक्त ही होवेगी।

प्रश्न ३५५—आत्मा किन—किन विकल्पों से रहित है ?
उत्तर—आत्मा नय, प्रमाण, निक्षेप आदि विकल्पों से रहित है।

प्रश्न ३५६—चैतन्य स्वरूप के जानने और देखने से क्या होता है ?
उत्तर—चैतन्य स्वरूप के जानने पर सब जाना जाता है तथा चैतन्यस्वरूप के देखने पर सब देखा जाता है।

प्रश्न ३५७—बुद्धिमान पुरुषों के लिए कर्मों का संबंध कैसा है ?
उत्तर—यद्यपि कर्मों का सम्बन्ध सब प्राणियों के समान है तो भी बुद्धिमान पुरुष के वह विद्यमान भी नहीं विद्यमान के समान ही है जिस प्रकार तैरने में चतुर रास्तागीरों को बढ़ा हुआ नदी का प्रवाह।

प्रश्न ३५८—तत्त्वज्ञानियों को किस प्रकार का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर—तत्त्वज्ञानियों को हेय और उपादेय का ज्ञान अवश्य रखना चाहिए।