Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


खुशखबरी ! पू० गणिनी श्रीज्ञानमती माताजी ससंघ कतारगाँव में भगवान आदिनाथ मंदिर में विराजमान हैं|

15.भगवान धर्मनाथ वन्दना

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

श्री धर्मनाथ वन्दना

दोहा- लोकोत्तर फलप्रद तुम्हीं, कल्पवृक्ष जिनदेव।

धर्मनाथ तुमको नमूँ, करूँ भक्ति भर सेव।।१।।

-गीता छंद-

जय जय जिनेश्वर धर्म तीर्थेश्वर जगत विख्यात हो।

जय जय अखिल संपत्ति के, भर्ता भविकजन नाथ हो।।

लोकांत में जा राजते, त्रैलोक्य के चूड़ामणी।

जय जय सकल जग में तुम्हीं, हो ख्यात प्रभु चिंतामणी।।२।।

एकेन्द्रियादिक योनियों में, नाथ! मैं रुलता रहा।

चारों गती में ही अनादी, से प्रभो! भ्रमता रहा।।

मैं द्रव्य क्षेत्र रु काल भव, औ भाव परिवर्तन किये।

इनमें भ्रमण से ही अनंतानंत काल बिता दिये।।३।।

बहुजन्म संचित पुण्य से, दुर्लभ मनुज योनी मिली।

तब बालपन में जड़ सदृश, सज्ज्ञान कलिका ना खिली।।

बहुपुण्य के संयोग से, प्रभु आपका दर्शन मिला।

बहिरातमा औ अंतरात्मा, का स्वयं परिचय मिला।।४।।

तुम सकल परमात्मा बने, जब घातिया आहत हुए।

उत्तम अतीन्द्रिय सौख्य पा, प्रत्यक्ष ज्ञानी तब हुए।।

फिर शेष कर्म विनाश करके, निकल परमात्मा बने।

कल-देहवर्जित निकल अकल, स्वरूप शुद्धात्मा बने।।५।।

हे नाथ! बहिरात्मा दशा को, छोड़ अंतर आतमा।

होकर सतत ध्याऊँ तुम्हें, हो जाऊँ मैं परमात्मा।।

संसार का संसरण तज, त्रिभुवन शिखर पे जा बसूँ।

निज के अनंतानंत गुणमणि, पाय निज में ही बसूँ।।६।।

प्रभु के अरिष्टसेन आदिक, तेतालीस गणीश हैं।

व्रत संयमादिक धरें चौंसठ, सहस श्रेष्ठ मुनीश हैं।।

सुव्रता आदिक आर्यिका, बासठ सहस चउ सौ कहीं।

दो लाख श्रावक श्राविका, चउलाख जिनगुणभक्त ही।।७।।

इक शतक अस्सी हाथ तनु, दश लाख वर्षायू कही।

प्रभु वङ्कादंड सुचिन्ह है, स्वर्णिम तनू दीप्ती मही।।

मैं भक्ति से वंदन करूँ, प्रणमन करूँ शत-शत नमूँ।

निज ‘‘ज्ञानमति’’ कैवल्य हो, इस हेतु ही नितप्रति नमूँ।।८।।

दोहा- तुम प्रसाद से भक्तगण, हो जाते भगवान।

अतिशय जिनगुण पायके, हो जाते धनवान।।९।।