ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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16.वीरसेनाचार्य एवं ब्रह्मदेवसूरि से तुलना

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वीरसेनाचार्य एवं ब्रह्मदेवसूरि से तुलना

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ये दोनों आचार्य टीका क्षेत्र के सिद्धहस्त आचार्य हैं। आर्यिका श्री ज्ञानमती जी की टीका में दोनों की शैली के दर्षन होते हैं। धवला जयधवला में जो नाना प्रष्न उठाकर समाधान प्रस्तुत किया गया है वह अति प्रषंसनीय है। अन्य भी समानतायें है। शंका समाधान विशय को हम पृथक से लिखेंगे। ब्रह्मदेवसूरि कृत बृहद्द्रव्यसंग्रह टीका तथा परमात्म प्रकाष टीका से अर्थ पद्धति एवं आगम परंपरा निर्वाह में स्याद्वाद चन्द्रिका समान रूप से प्रकाषित झलकती है। नय विभाग एवं नयों के संयोजन तथा नयों से निरूपण की दृश्टि से भी इनकी पर्याप्त समानता है। माता जी ने उद्धरणों को विषेश प्रस्तुत कर इन दोनों आचार्यों से इस क्षेत्र में अधिक कार्य किया है। जहाँ तक विस्तार की बात है धवलाकार को ‘ाट्खण्डागम सूत्र का विशय आगमिक होने से अधिक विस्तार का अवसर प्राप्त हुआ है साथ ही उनको करणानुयोग और द्रव्यानुयोग, गुणस्थान, मार्गणास्थान के अर्जित ज्ञान के लुप्त हो जाने का भय भी इस अपेक्षित विस्तार का कारण रहा हो। यदि वीरसेन स्वामी ने यह कार्य न किया होता तो अधुना काल में प्रायः अज्ञान ही छाया हुआ होता।

आचार्य वीरसेन स्वामी की टीकाओं की सबसे बड़ी विषेशता है शंका समाधान शैली, स्वयं प्रष्न उठाकर जिस कौषल से समाधान किया है और वह भी भरपूर वह वस्तुतः श्रद्धा का विशय है उसके सामने माथा बिना झुके नहीं रहता। ठीक इसी शैली से स्याद्वाद चन्द्रिका में शंकायोग्य एवं चर्चित विशयों का स्पश्टीकरण माता जी को रुचिकर प्रतीत हुआ और उन्होंने आ० वीरसेन स्वामी का सम्यक् अनुसरण किया है। विद्वानों के लिए तो यह प्रषंसनीय रहा है साथ ही सुगमता के कारण सामान्य पाठक के लिए भी हृदयंगम करने योग्य है। धवला, जयधवला में समाधान संक्षिप्त रूप में है किन्तु माता जी इस कृति में तो विस्तार शैली के दर्षन होते हैं। धवला में मन्तव्य को पुश्ट करने हेतु आगम प्रमाण अपेक्षाकृत कम प्रस्तुत किये गये हैं किन्तु स्याद्वाद चन्द्रिका में आगमोद्धरणों की झड़ी लगी है। आगे आगे काल में बुद्धि की मन्दता होती जाने के कारण संभवतः धवला इत्यादि और स्याद्वाद चन्द्रिका में एतद्विशयक अन्तर पाया जाता है। आज संक्षेप रूचि या सामथ्र्य वालषिश्यों या पाठकों का अभाव सा हो रहा है। मध्यम रुचि वाले और विस्तार से समझने योग्य सामथ्र्य वाले व्यक्ति भी प्रायः कम ही हैं। अतः माता जी की इस विस्तार से शंका समाधान शैली की महती उपयोगिता है। हम आगे पृथक से इस पर लिखेंगे ताकि शंका समाधान के विविध स्थलों का आनन्द जिज्ञासु पाठक ले सकें।

यहाँ मात्र एक स्थल तुलना हेतु उपयोगी जानकर प्रस्तुत करते है,

”ननु स्त्रीणां यदि मायाचारः स्वभावेन जायते, तर्हि कथं पूज्यास्ता आर्यिका- पदव्यां।

यदि स्त्रियों में स्वभाव से मायाचार है तो आर्यिका पदवी में कैसे पूज्य है ? ऐसा नहीं कहना चाहिए यहाँ बहुलता की अपेक्षा कथन है सर्वथा नहीं तथा सर्व स्त्रियों की अपेक्षा नहीं। इसका विस्तृत वर्णन, समाधान ग्रन्थ में दृश्टव्य है।

आर्यिका ज्ञानमती की रोचक समाधान शैली आ० कुन्दकुन्द के मन्तव्य पर विस्तार से प्रकाष डालती है। इससेउनकी कुषाग्र बृद्धि एवं अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग प्रकट होते हैं।

माता जी के लेखन की एक अन्य विषेशता यह है कि वे किसी की व्यक्तिगत आलोचना, प्रत्यालोचना नहीं करती तथा आरोप प्रत्यारोप लगाना भी उनका स्वभाव नहीं है। स्याद्वाद चन्द्रिका के किसी भी स्थल पर यह दृश्टिगोचर नहीं होता। इसी से कहा जा सकता है कि उनकी शैली मृदु एवं मधुर स्वरूप को लिए हुए है तथा यह सबको प्रिय लगकर यथेश्ट अर्थ पर पहुँचाती है। इससे पाठक को अपेक्षित दिषा बोध होता है।