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पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी में विराजमान है ।

प्रतिदिन पारस चैनल के सीधे प्रसारण पर प्रातः 6 से 7 बजे तक प.पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

16 सितम्बर 2017 प्रवचन

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[[प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम प्रमुख शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की ६०वीं पुण्यतिथि मनाएँ]]

प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम प्रमुख शिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की ६०वीं पुण्यतिथि मनाएँ

पूज्य चंदनामती माताजी ने सर्वप्रथम प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज एवं उनके प्रमुख प्रथम पट्टाचार्य श्री वीरसागर जी महाराज के पावन चरणों में विनम्र भक्तिभाव समर्पित करते हुए एवं ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में वीरसागर महाराज की ६०वीं पुण्यतिथि (आश्विन कृ. अमावस्या)-२० सितम्बर को मुम्बई-भाण्डुप के जैनम हॉल के अंदर सभी देशवासियों को मनाने की प्रेरणा प्रदान करते हुए उनके चारित्र पर प्रकाश डाला|

-आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज का जन्म औरंगाबाद जिले के अन्तर्गत वीरग्राम नामक गांव में है। वहां के श्रेष्ठी रामसुख जी गंगवाल उनकी पत्नी भरगुबाई, इनके पुत्र हीरालाल नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका जन्म आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा, ईसवी सन् १८७६ में हुआ। जिस आषाढ़ शुक्ला पूर्णिमा को लोग गुरुपूर्णिमा भी कहते हैं।

पूज्य चंदनामती माताजी की एवं सभी की गुरुमाता पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी, जिन्होंने वीरसागर जी महाराज से आर्यिका दीक्षा ग्रहण करी थी। वे ज्ञानमती माताजी आचार्य वीरसागर जी के गुणों के बारे में बतलाया करती हैं, कि आचार्यश्री में अगणित गुण थे, धीर-वीर परम गंभीर थे। वे कहा करते थे कि जिसने मनुष्य भव पाकर के सम्मेदशिखर की वंदना नहीं की, श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की मनोज मूर्ति के दर्शन नहीं किये और गुरुओं में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के दर्शन नहीं किए, उसने अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ ही गंवा दिया। अपने दीक्षा दिवस को कभी मत भूलो, अर्थात् दीक्षा के समय परिणामों को की उज्ज्वलता विशेष रहती है, उस दिवस के उज्ज्वल भावों को हमेशा याद रखने वाला साधु कभी भी अपने पद से च्युत नहीं हो सकता है। चंदनामती माताजी का कहा करती है कि हमें उनके साक्षात् दर्शन करने का सुअवसर भी नहीं प्राप्त हो सकता। लेकिन ज्ञानमती माताजी के मुखारविंद से उनम हामना आचार्यश्री का गुणानुवाद सुनने का सौभाग्य प्राप्त होता रहता है। उन गुरु श्री की पावन स्मृति में हमारे जीवन की प्रेरणास्रोत बनकर मेरे मुक्तिमार्ग में सहायक बने। ऐसी प्रशान्त मूर्ति को मेरा शत-शत वंदन।

स्वामी रवीन्द्रकीर्ति जी ने अपने उद्बोधन में कहा|

-आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज ने आचार्य श्री शांतिसागर जी की आज्ञाओं को इतनी दृढ़ता के साथ तथा भक्ति और निष्ठा के साथ पालन किया था, जिस प्रकार एक आज्ञानुवर्ति कुल सपूत पुत्र अपने माता-पिता की आज्ञा पालन करके अपने कुल को समुज्जवल बनाता है। इसी का समधुर परिणाम यह था कि आचार्य शांतिसागर जी के स्वर्गारोहण के पश्चात् आचार्य वीरसागर महाराज को अपना आचार्य पट्ट प्रदान कर अपनी वंश परम्परा का रक्षा भर उनके सुकोमल कंधों पर डाला था, उस आचार्य पद को वीरसागर जी ने बड़ी कुशलता के साथ संभाला था। हम सब उनकी ६०वीं पुण्यतिथि मनाने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं।

पूज्य ज्ञानमती माताजी की गुरु भक्ति भी अद्वितीय है, वे सदा आचार्यश्री वीरसागर जी का स्मरण किया करती है और लगभग अपने हर प्रवचन में अपने गुरु का स्मरण सुनाती है। पूज्य माताजी ने आचार्यश्री के कई बार उपदेश सुने, जो कि बड़े अनुभव पूर्ण होते थे। उनकी २ सूक्तियाँ आज भी प्रभावित करती रहती हैं- सुई का काम करो, केैची का नहीं।

आचार्यश्री के मन में प्राणिमात्र के हित की भावना रही। वे सभी को परस्पर संगठित एवं सुखमय देखना चाहते थे। केेैची कपड़े को काटकर टुकड़े-टुकड़े कर देती है, परन्तु सुई उनको जोड़कर सर्वोपयोगी बनाती है। ऐसी अनेक उदाहरण माताजी के के मुख से सुनने को मिलते हैं।

पूज्य ज्ञानमती माताजी अपने दीक्षित गुरु श्री वीरसागर महाराज के बारे में सभी भक्तों एवं देशवासियों को पारस चैनल के माध्यम से उनके कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहती है-

चारित्रशिरोमणि अध्यात्म योगी महाश्रमण आचार्यप्रवर श्री शांतिसागर जी महाराज वर्तमान युग की एक महानतम विभूति थे। जिन्होंने सैकड़ों वर्षों से विलुप्त श्रमण संस्कृति को नव जीवन प्रदान किया। उन्हीं के प्रथम सुयोग्य शिष्या आचार्य श्री वीरसागर जी थे, जिन्होंने अपने गुरु की तरह ही विशाल संघ के नायक बनकर देश भर में विहार करके जैनधर्म की ध्वजा को फहराया। वास्तव में पूर्वोचार्यों ने मनुष्य भव का सार दैगम्बरी दीक्षा बताया है। इसके बिना न कभी मोक्ष की प्राप्ति हुई है न होगी। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने कहा कि मैंने ऐसे महामना आचार्य देव के शिष्यत्व को पाकर मैंने अपना जीवन धन्य किया। आचार्यश्री के वे शब्द आज भी मेरे कानों में मानों गूंज रहे हैं।

ज्ञानमती मैंने तुम्हारा नाम जो रखा है, उसका सदा ध्यान रखना|

इन चार अक्षरों को कभी नहीं भूलना। यह गुरुदेव की प्रेरणा और उनका आशीर्वाद ही है, कि जो मुझे आज दो शब्दों का ज्ञान है। प्रत्येक ग्रंथ की रचना में मुझे गुरुदेव के ये सबल प्रदान करते हैं। ये गुरुदेव आज मेरे सामने नहीं है, फिर भी हृदय में विराजमान हैं। पूज्य माताजी ने कहा-मैं अपने रत्नत्रय की विशुद्धि के लिए उनके श्रीचरणों में कोटि-कोटि वंदन करते हुए उनके चरणों में श्रद्धांजलि समर्पित करती हूँ।