ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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17.ऋषभ स्तोत्र प्रश्नोत्तरी

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ऋषभ स्तोत्र

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प्रश्न ३८०—जिनेन्द्र भगवान की पुष्पों से पूजा करने पर क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो मनुष्य जिनेन्द्र भगवान की फूलों से पूजा करता है वह मनुष्य पर भव में स्वर्ग में देवांगना के नेत्रों से पूजित होता है।

प्रश्न ३८१—जिनेन्द्रदेव की वंदना करने वाले को क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो मनुष्य एक बार भी जिनेन्द्र की वंदना करता है वह मनुष्य रात—दिन तीनों लोक में वंदनीय होता है।

प्रश्न ३८२—जिनेन्द्र भगवान की स्तुति करने वाले को क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो एक बार भी जिनेन्द्र भगवान की स्तुति करता है परलोक में बड़े—बड़े इन्द्र भी उसकी स्तुति करते हैं।

प्रश्न ३८३—जो भव्य जीव जिनेन्द्र भगवान का ध्यान करता है उसे क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जो मनुष्य एक बार भी जिनेन्द्र भगवान का ध्यान करता है वह समस्त कर्मों से रहित हो जाता है तथा बड़े—बड़े योगीश्वर भी उस मनुष्य का ध्यान करते हैं।

प्रश्न ३८४—पृथ्वी का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर—पृथ्वी का दूसरा नाम वसुमती है।

प्रश्न ३८५—वसुमती किसे कहते हैं ?
उत्तर—जो धन को धारण करने वाली होवे उसी को वसुमती कहते हैं।

प्रश्न ३८६—ग्रंथ कर्तानुसार पृथ्वी का वसुमती नाम क्यों पड़ा ?
उत्तर—जब भगवान ऋषभदेव सर्वार्थसिद्धि विमान से पृथ्वीमण्डल पर उतरे थे उस समय लगातार १५ माह तक रत्नों की वृष्टि इस पृथ्वीमण्डल में नाभिराज के घर में हुई थी तभी से पृथ्वी का वसुमती नाम पड़ा।

प्रश्न ३८७—भगवान ऋषभदेव की माता का क्या नाम था ?
उत्तर—भगवान ऋषभदेव की माता का नाम मरुदेवी था।

प्रश्न ३८८—भगवान ऋषभदेव का जन्माभिषेक कहाँ और किनके द्वारा हुआ ?
उत्तर—भगवान ऋषभदेव का जन्माभिषेक सुमेरू पर्वत की पांडुशिला पर इन्द्र के द्वारा हुआ।

प्रश्न ३८९—उस मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा कौन करता है ?
उत्तर—उस मेरु की प्रदक्षिणा सूर्य और चन्द्रमा आदिक सदा किया करते हैं।

प्रश्न ३९०—भगवान के जन्माभिषेक पर इन्द्र ने कौन सा नृत्य प्रस्तुत किया था ?
उत्तर—ताण्डव नृत्य।

प्रश्न ३९१—भगवान ऋषभदेव के जन्म के पूर्व जम्बूद्वीप में क्या व्यवस्था थी ?
उत्तर—भगवान ऋषभदेव के जन्म के पूर्व जम्बूद्वीप में भोगभूमि की रचना थी, युगलिया उत्पन्न होते थे और सभी की आवश्यकताओं की र्पूित कल्पवृक्षों से हो जाती थी।

प्रश्न ३९२—कल्पवृक्ष कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर—कल्पवृक्ष १० प्रकार के होते हैं।

प्रश्न ३९३—भगवान आदिनाथ के जन्म के पश्चात् कैसी व्यवस्था थी ?
उत्तर—भगवान आदिनाथ के जन्म के पश्चात् कर्मभूमि की व्यवस्था हो गई और कल्पवृक्ष भी नष्ट हो गए।

प्रश्न ३९४—तब प्रजा की आजीविका किस प्रकार चली ?
उत्तर—आजीविका हेतु प्रजा ने भगवान ऋषभदेव से प्रार्थना की तब भगवान ने उन्हें षट्कर्मों का उपदेश देकर जीवन जीने की कला सिखाई।

प्रश्न ३९५—षट्क्रियाएँ कौन—कौन सी हैं ?
उत्तर—असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प।

प्रश्न ३९६—भगवान ऋषभदेव के वैराग्य में क्या हेतु बना ?
उत्तर—नीलांजना का नृत्य देखकर भगवान को वैराग्य हुआ।

प्रश्न ३९७—आत्मा में अखण्ड ज्ञान की प्राप्ति होने पर क्या होता है ?
उत्तर—जिस समय आत्मा में अखण्ड ज्ञान अर्थात् केवलज्ञान की प्रकटता होती है उस समय यह लोकालोक के पदार्थों को जानने लगता है।

प्रश्न ३९८—उस केवलज्ञान की प्रकटता कौन से गुणस्थान में होती है ?
उत्तर—उस केवलज्ञान की प्रकटता तेरहवें गुणस्थान में होती है जबकि प्रकृष्ट ध्यान से चार घातिया कर्मों का नाश हो जाता है।

प्रश्न ३९९—चार घातिया कर्म कौन से हैं ?
उत्तर—ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय ये चार घातिया कर्म हैं।

प्रश्न ४००—चार अघातिया कर्म कौन से हैं ?
उत्तर—वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र ये चार अघातिया कर्म हैं।

प्रश्न ४०१—जिनेन्द्र भगवान की वाणी कैसी है ?
उत्तर—जिनेन्द्र भगवान की वाणी अनेकांत मार्ग को सिद्ध करने वाली है।

प्रश्न ४०२—संसार में पदार्थों का वर्णन करने में उत्तम कवि कौन है ?
उत्तर—संसार में वृहस्पति के बराबर पदार्थों के वर्णन करने में दूसरा कोई उत्तम कवि नहीं है।

प्रश्न ४०३—मोक्षमार्ग में गमन करने वाले प्राणियों को रोकने वाला कौन है ?
उत्तर—मोक्षमार्ग में गमन करने वाले प्राणियों को रोकने वाला मोहरूपी चोर है।

प्रश्न ४०४—संसार रूपी समुद्र में गिरते हुए जीवों को कौन बचाता है ?
उत्तर—संसार रूपी समुद्र में गिरते हुए जीवों को जिनेन्द्र भगवान का धर्म ही धारण करता है अर्थात् बचाता है।

प्रश्न ४०५—भगवान ऋषभदेव के शरीर का वर्ण कैसा है?
उत्तर—भगवान ऋषभदेव के शरीर का वर्ण स्वर्ण सदृश है।

प्रश्न ४०६—केवलज्ञान के पश्चात् भगवान का श्रीविहार कैसे होता है ?
उत्तर—केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् भगवान आकाश में अधर चलते हैं फिर भी देव भक्ति के वश होकर उनके चलने के लिए सुवर्ण कमलों से र्नििमत मार्ग की रचना करते हैं।

प्रश्न ४०७—संसार में जीवों को मरने से कौन बचा सकता है ?
उत्तर—संसार में जीवों को मरण से बचाने वाली जिनेन्द्र भगवान की स्तुति है।

प्रश्न ४०८—जिनेन्द्र भगवान को किसकी उपमा दी गई है ?
उत्तर—जिनेन्द्र भगवान को मोक्ष के मार्ग, समस्त प्राणियों के शरण और जन्म—जरा—मरण आदि रोगों का नाश करने वाले बिना कारण के वैद्य की उपमा दी गई है।

प्रश्न ४०९—भगवान जिनेन्द्र सूक्ष्म और गुरु किस प्रकार से हैं ?
उत्तर—भागवान सूक्ष्म इतने हैं कि परमाणु पर्यंत पदार्थों को प्रत्यक्ष करने वाले आपको देख नहीं सकते तथा गुरु इतने हैं कि सम्यग्ज्ञानस्वरूप भगवान में यह समस्त पदार्थ समूह समाया हुआ है।

प्रश्न ४१०—जैन सिद्धान्त में आकाश को कैसा माना गया है ?
उत्तर—जैन सिद्धान्त के अनुसार आकाश अनन्त प्रदेशी है।

प्रश्न ४११—आकाश के कितने भेद हैं ?
उत्तर—आकाश द्रव्य के दो भेद हैं—

१. लोकाकाश,

२. अलोकाकाश।