ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

17.भगवान कुंथुनाथ वंदना

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श्री कुंथुनाथ वन्दना

-दोहा-

हस्तिनागपुर में हुए, गर्भ जन्म तप ज्ञान।

सम्मेदाचल मोक्षथल, नमूँ कुंथु भगवान।।१।।

-त्रिभंगी छंद-

पैंतिस गणधर मुनि साठ सहस, भाविता आर्यिका गणिनी थीं।

सब साठ सहस त्रय शतपचास, संयतिकायें अघ हरणी थीं।।

श्रावक दो लाख श्राविकाएँ, त्रय लाख चिन्ह बकरा शोभे।

आयू पंचानवे सहस वर्ष, पैंतिस धनु तनु स्वर्णिम दीपे।।२।।

-शिखरिणी छंद-

जयो कुंथुदेवा, नमन करता हूँ चरण में।

करें भक्ती सेवा, सुरपति सभी भक्तिवश तें।।

तुम्हीं हो हे स्वामिन्! सकल जग के त्राणकर्ता।

तुम्हीं हो हे स्वामिन्! सकल जग के एक भर्ता।।३।।

घुमाता मोहारी, चतुर्गति में सर्व जन को।

रुलाता ये बैरी, भुवनत्रय में एक सबको।।

तुम्हारे बिन स्वामिन्! शरण नहिं कोई जगत में।

अत: कीजै रक्षा, सकल दुख से नाथ! क्षण में।।४।।

प्रभो! मैं एकाकी, स्वजन नहिं कोई भुवन में।

स्वयं हूँ शुद्धात्मा, अमल अविकारी अकल मैं।।

सदा निश्चयनय से, करमरज से शून्य रहता।

नहीं पाके निज को, स्वयं भव के दु:ख सहता।।५।।

प्रभो! ऐसी शक्ती, मिले मुझको भक्ति वश से।

निजात्मा को कर लूँ, प्रगट जिनकी युक्तिवश से।।

मिले निजकी संपत, रत्नत्रयमय नाथ मुझको।

यही है अभिलाषा, कृपा करके पूर्ण कर दो।।६।।

-दोहा-

कामदेव चक्रीश प्रभु, सत्रहवें तीर्थेश।

केवल ‘‘ज्ञानमती’’ मुझे, दो त्रिभुवन परमेश।।७।।

सूरसेन नृप के तनय, श्रीकांता के लाल।

नमें तुम्हें जो वे स्वयं, होते मालामाल।।८।।