ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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17. कु-गुरु और सु-गुरू

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कु-गुरु और सु-गुरू

(काव्य बीस से सम्बन्धित कथा)
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सेठ अड़ोलदत्त जैन-धर्म के दृढ़ श्रद्धानी पुरुष थे। चौपाल में बैठे हुए सभी व्यक्ति कह रहे थे-‘‘वाह! वैâसे धर्म विश्वासी है।’’ पर किसे मालूम था कि चिराग तले अंधेरा ही बना रहता है? उनके पुत्र विष्णुदास पिता का सान्निध्य और सहयोग पाकर भी मिथ्यात्व के घने अन्धकार में छटपटा रहे थे। नगर में एक दिन एक साधु महाराज का आगमन हुआ। साधु महाराज की वेष-भूषा तो आकर्षक थी ही पर साथ ही आकर्षक था उनका मलिन चरित्र; जो उस समय ढ़ोंग की काली चादर से आच्छादित थी बड़ी-बड़ी लम्बी जटायें जो उनके मुख-मण्डल की शोभा बढ़ा रही थीं-वास्तविक नहीं थी-अपितु पशुओं की केशराशि पर काली स्याही की पेन्ट चढ़ाकर उपयोग किये जा रहे थे। साधु ने विष्णुदास को निकट आता देखकर सोचा-सोने की चिड़िया पिंजड़े में फसने वाली है, और योगासन से श्वांस रोककर इस प्रकार बैठ गये, जैसा बगुला अपने पेट-पूजा के लिये अष्टद्रव्य-मत्स्यराज को देखकर ध्यानस्थ हो जाता है। ‘‘साधु महाराज!कुछ उपाय बतलाइये ताकि संसार-समुद्र से पार होकर स्वर्ग-लाभ कर सवू’’ ‘‘वत्स! तुम्हारा कथन ठीक है, पर तुम सेवक लोग हम सत्संगी साधुओं के भोजन-वस्त्र की फिकर न करके, उपदेश की रट लगाया करते हो! अरे भाई। किसी कवि ने ठीक ही तो कहा है- ‘भूखे भजन न होय गोपाला’

वत्स! यदि देश और धर्म की यही दशा रही तो हम साधु लोग हिमालय की चोटी पर निवास स्थली बनाकर ‘कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे’—का आह्वान भूखे पेट रहकर ही करते रहेंगे, पर इस म्लेच्छपुरी में पैर न रखेंगे। साधु महाराज का उपदेश विष्णुदास के माथे पर चढ़ चुका था फिर एक ही दिन नहीं हफ्तों विष्णुदास ने साधु की सेवा सुश्रुषा से अपने को धन्य माना। विष्णुदास के साधु प्रेम की चर्चा नगर मे थी।... वही विष्णुदास जो पिताजी के लाख कहने पर उधारी के पैसे दुकानों पर जाकर न मांगते थे आज साधु महाराज के लिये चंदा एकत्रित कर रहे थे। हुक्के में गांजा तम्बाखू भरना हरि-कीर्तन की मजलिस लगाना इत्यादि सभी कार्यों का भार विष्णुदास ने अपने ऊपर उठा रखा था। इन सब कार्यों का उत्तरदायित्व का उद्देश्य सन्त सेवा तो था ही पर साथ ही वे सोचते थे कि यदि साधुजी आराधना में ऋटि हुई तो उनकी मंडली आगे से साधु-पूजा के महान पुण्य को हाथ में खो बैठेगी। इधर साधुजी थे जो प्रतिदिन भक्तों की कृपा और अपने बनावटी आशीर्वाद से मिष्ठ भोजनों पर हाथ साफ कर रहे थे। नगर में पाठशाला के अभाव की पूर्ति के लिये जो उन्होंने अल्प धन राशि दो सहस्र रुपयों की जोड़ रखी थी-अब वे उसी को भस्मसात करने के घोर प्रयत्न में थे। आखिर एक दिन उन्होंने उपदेश किया-

‘‘धर्मानुरागी भाईयों! आप लोगों के बीच धर्म-साधन पूर्ण रूपेण जारी रह सका, मेरा मन तो चाहता है कि यहीं एक घास फूस की छोटी-सी कुटिया में पड़ा रहूँ। पर नहीं,भक्तों! साधु लोग अपना घर नहीं बनाते।यह पृथ्वी और आकाश ही भगवान की माया द्वारा उन्हें महागृह के रूप में निर्मित हुए है।साधु के कत्र्तव्य से तो आप लोग भली-भाँति परिचित हैं। एक जगह स्थिर रहने का अर्थ है- उसे उस भूमि से-स्थान विशेष से मोह हो गया है और मोह ही उसे इस पूज्य पदवी से पदच्युत करा सकता है। अत: भक्तजनो! आज्ञा दो कि मैं अऩ्यत्र गमन कर सवूँ।

विष्णुदास बीच ही में बोल उठे- ‘‘महात्मन्!हम भक्तों की धर्म जिज्ञासा को ठुकराकर आप यह क्यों कह रहे हैं।‘‘साधु ने तीर को बे-निशान समझ कर अवरुद्ध वंâठ से कहा- ‘‘भक्तों! मेरी आँखों में आँसू बह रहे हैं, मेरी आत्मा रो रही है, दिल बर्प होकर पिद्यल रहा है, कि साधु पुरुष का किसी गांव विशेष में मोह उचित नहीं है।’’ भक्त मण्डली भी तब साधु जी को न रोक सकी। यह अवश्य हुआ कि विष्णुदास को वे अपना पट्ट शिष्य बनाकर साथ में ले गए। गुरु-शिष्य का आसन दूसरे गांव में जम चुका था। अब विष्णुदास अपने गुरु की वास्तविक वृत्ति को समझ गया था। विषाद की काली रेखाएँ उसके अन्तस्तल पर खिंच चुकी थीं। और एक दिन साधु जी भी अपने अनन्य सेवक से पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से एकत्रित रकम बटोर कर रातों रात वहाँ से नौ दौ ग्याहर हो गए।

पुत्र की विषाद युक्त अवस्था देखकर पिता अड़ोलदत्त अत्यन्त दुखी थे। वे उसे मृतवत् समझ चुके थे किन्तु उस दिन उनके आश्चर्य की सीमा अतिक्रमण कर चुकी जब उनके पैरों पर पुत्र सिर टेक कर क्षमा याचना कर रहा था। अब भी विष्णुदास एक अन्य साधु के चक्कर में था किन्तु वह ढोंगी साधुओं को एक बार पतित समझ चुका था और यही कारण था कि वीतरागी दिगम्बर जैन साधु के समक्ष उसका माथा झुक न सका।अग्नि का तेज सभी को आकर्षित करता है और जैन मुनि के मुख-मंडल पर दैदीप्यमान तेज दावानल से कई गुना प्रतापयुक्त होता है। फिर कौन न झुककर आत्मसमर्पण कर देगा उसे? उसने मुनिराज की आन्तरिक गुत्थियों को सुलझा-सुलझा कर देखा! विष्णुदास ने सोचा-कहीं इनके मन में स्वार्थ की चिनगारी तो नहीं जल रही है। और तब उनके परीक्षण की ओर वह बढ़ा। मुनिश्री से भी वह पहिले साधु से पूंछे गये प्रश्न को दुहरा उठा। ‘‘संसार से छूटने का उपाय बतलाइये महाराज!’’ दयासागर मुनिराज ने कहा-‘‘वत्स! प्रत्येक सीढ़ी पर पाँव रखकर महल में चढ़ना युक्ति संगत है; पर एकदम कई सीढ़ियाँ लांघने से मनुष्य मुँह के बल गिरता है। तुम्हारे अन्दर की आत्मा अभी सत्य के प्रकाश की ओर नहीं बढ़ी और तुम अन्तिम उपदेश की ओर बढ़ रहे हो। गृहस्थ का सब से बड़ा पुण्य कार्य वही है, जिसमें उसकी स्वयं की आत्मा धिक्कारे नहीं वरन सहमति दे।’’

भूला-भटका पथिक सुराह पर आ चुका था, किन्तु उसके सोये हुए भाव कहते थे, कि साधुओं पर विश्वास करना ठीक नहीं; जब तक उनमें कोई विशेषता न हो। उसने कहा-‘‘महाराज! कोई चमत्कार दिखलाइये, जिससे मेरा धर्म और साधुओं पर विश्वास हो?’’ मुनी श्री ने महाप्रभावक भक्तामर जी का २०वाँ श्लोक मय ऋद्धि मंत्र के सिखलाकर कहा-‘‘वत्स!तुम सभी व्यक्तियों के समक्ष अपना मनोरथ सिद्ध करो, जिससे सभी व्यक्तियों का धर्म में विश्वास हो सके!’’

राजा की सम्पूर्ण प्रजा दरबार में उपस्थित थी। विष्णुदास ने सुरीले कंठ से पढ़ना शुरू किया-‘‘ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं’’ और तत्काल जैन शासन की अधिष्ठात्री ‘भृकुटी’ नाम की देवी वहाँ उपस्थित हो चुकी थी। देवी ने विष्णुदास को अष्ट सिद्धियाँ प्रदान की, तब विष्णुदास जंगल में पहुँचकर मुनिश्री के चरणों में गिर कर बोले-‘‘वास्तव में पाखंड़ी साधु पेट पूजा के उद्देश्य से आज भारत वर्ष में धूनी लगाकर पंचाग्नि तपकर देशाटन कर रहे हैं और इन महात्माओं के पुण्यतम कार्यों पर भी अपनी काली करतूतों की स्याही पोत रहे हैं।