ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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17 - सम्यक्त्व मार्गणासार

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सम्यक्त्व मार्गणासार

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सम्यक्त्व का लक्षण—छह द्रव्य, पाँच अस्तिकाय, नव पदार्थ इनका जिनेन्द्रदेव के कहे अनुसार श्रद्धान करना सम्यक्त्व है। इसके दो भेद हैं-आज्ञासम्यक्त्व एवं अधिगम सम्यक्त्व। सूक्ष्मादि तत्त्वों में जिनेन्द्रदेव ने जो कहा सो ठीक है, वे अन्यथावादी नहीं हैं ऐसा श्रद्धान करना आज्ञासम्यक्त्व है और प्रमाण नयादि से समझकर या परोपदेशपूर्वक श्रद्धान करना अधिगम सम्यक्त्व है।

सम्यक्त्व मार्गणा के छह भेद हैं—क्षायिक, वेदक, उपशमसम्यक्त्व, सासादन, मिश्र और मिथ्यात्व।

क्षायिकसम्यक्त्व—अनंतानुबंधी कषाय की चार और दर्शन मोहनीय की तीन ऐसे सात प्रकृतियों के अत्यंत क्षय से जो निर्मल श्रद्धान होता है उसे क्षायिक सम्यक्त्व कहते हैं। यह सम्यक्त्व नित्य है और असंख्यात गुण श्रेणीरूप से कर्मों के क्षय में कारण है। क्षायिक सम्यक्त्व होने पर यह जीव उसी भव से मुक्त हो जाता है अथवा देवायु का बंध हो गया है तो तीसरे भव से मुक्त होता है। यदि सम्यक्त्व के पहले मिथ्यात्व अवस्था में मनुष्य या तिर्यंचायु का बंध कर लिया है तो उत्तम भोगभूमि में मनुष्य या तिर्यंच होकर स्वर्ग जाकर पुन: मनुष्य होकर मुक्त होता है। अत: चौथे भव में नियम से सिद्ध हो जाता है उसका उल्लंघन नहीं करता है। सम्यक्त्व के पहले कदाचित् नरकायु का बंध कर ले तो भी श्रेणिक के समान तृतीय भव से ही मोक्ष जायेगा अत: यह सम्यक्त्व सादि अनंत है। कर्मभूमि का मनुष्य केवली के पादमूल में ही दर्शनमोहनीय का क्षय प्रारंभ करता है अन्यत्र नहीं। अत: आजकल वह सम्यक्त्व नहीं है।

वेदकसम्यक्त्व—सम्यक्त्व मोहनीय प्रकृति के उदय से पदार्थों का जो चल-मलिन-अगाढ़ रूप श्रद्धान होता है वह वेदकसम्यक्त्व है यद्यपि सभी तीर्थंकर समान हैं, पाश्र्वनाथ संकट हरने वाले हैं, ऐसा जो भाव है वह चलदोष है। कदाचित् अतिचार के लग जाने से मलिन दोष आता है। अपने बनाये हुए मंदिर में ‘‘यह मंदिर मेरा है’’ इत्यादि भावों से अगाढ़ दोष होता है। सम्यक्त्व प्रकृति के निमित्त से दोष हो जाया करते हैं। इसकी जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त और उत्कृष्ट स्थिति छ्यासठ सागर प्रमाण है।

उपशमसम्यक्त्व—पाँच अथवा सात प्रकृतियों के उपशम से जो सम्यक्त्व होता है वह उपशम सम्यक्त्व है। कीचड़ के नीचे बैठ जाने से निर्मल जल के सदृश यह सम्यक्त्व भी निर्मल होता है। इसकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अंतर्मुहूर्त है। यह सम्यक्त्व अनादि मिथ्यादृष्टि के पाँच प्रकृतियों के उपशम से (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व प्रकृति को छोड़कर) और सादि मिथ्यादृष्टि के सात प्रकृतियों के उपशम से होता है।

सम्यक्त्व उत्पत्ति में सामग्री—कोई भी जीव चारों गति में से किसी एक गति में हो, भव्य, संज्ञी, पर्याप्त, मंदकषाय से युक्त, जाग्रत, ज्ञानोपयोग युक्त शुभ लेश्या का धारक होकर करणलब्धि रूप परिणाम को प्राप्त करता है तब सम्यक्त्व को प्राप्त करता है अर्थात् सम्यक्त्व प्राप्ति के लिए पांच लब्धि हैं-क्षायोपशमिक, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य और करण। इनमें पहली चार तो सामान्य हैं, भव्य-अभव्य दोनों के सम्भव है किन्तु करणलब्धि होेने पर नियम से सम्यक्त्व प्रकट हो जाता है। सबसे प्रथम अनादि मिथ्यादृष्टि को उपशम सम्यक्त्व ही होता है। अनंतर वेदक और क्षायिक होते हैं।

सम्यग्दृष्टि जीव की विशेषता—चारों गति सम्बधी आयु के बंध हो जाने पर भी सम्यक्त्व हो सकता है किन्तु देवायु को छोड़कर शेष आयु का बंध होने पर अणुव्रत और महाव्रत नहीं हो सकते हैं।

सासादन सम्यक्त्व—जो जीव सम्यक्त्व से च्युत हो गया है किन्तु मिथ्यात्व को प्राप्त नहीं हुआ है वह सासादन गुणस्थान वाला है।

मिश्र—विरताविरत की तरह जिसके तत्त्वों का श्रद्धान और अश्रद्धान दोनों है, वह मिश्रगुणस्थान वाला है।

मिथ्यात्व—जो जिनेन्द्र कथित आप्तादि का श्रद्धान नहीं करता है और कुदेव, कुतत्त्व आदि का श्रद्धान करता है वह मिथ्यादृष्टि है।

पुण्य-पाप जीव—मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थान वाले जीव पाप जीव है। मिश्रगुण स्थान वाले पुण्य पाप के मिश्ररूप हैंं तथा चौथे गुणस्थान के असंयत से लेकर सभी पुण्य जीव हैं।

एक बार जिस जीव को सम्यग्दर्शन हो जाता है वह जीव नियम से मोक्ष को प्राप्त करता है। कम से कम अंतर्मुहूर्त में और अधिक से अधिक अर्धपुद्गल परिवर्तन काल तक वह संसार में रह सकता है। इसलिये करोड़ों उपाय करके सम्यक्त्व रूपी रत्न को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।