ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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18. भूमिशोधन

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भूमिशोधन

(मंडप शुद्धि)

—दोहा—
घंटां ताल मृदंग ध्वनि, दुंदुभि वाद्य बजंत।
जय जय मंगल ध्वनि करूँ, पुष्पांजलि विकिरंत।।१।।
ॐ घंटादिवाद्यं उद्घोषयामि स्वाहा।
(बाजों पर पुष्पांजलि क्षेपण कर घंटा, मंजीरा, ढोलक आदि बाजे बजाकर जय जय ध्वनि करें।)
ॐ ह्रीं परमब्रह्मणे नमो नम:। स्वस्ति स्वस्ति जीव जीव नंद नंद वर्धस्व-वर्धस्व विजयस्व विजयस्व अनुशाधि अनुशाधि पुनीहि पुनीहि पुण्याहं पुण्याहं मांगल्यं मांगल्यं पुष्पांजलि:। सोदकानि पुष्पाणि क्षिपेत्। (मंडल पर पुष्प क्षेपण करें।)
क्षेत्रपाल पूजा
—शेर छंद—
जिनयज्ञ में इस क्षेत्र की रक्षा सुकीजिये।
संपूर्ण विघ्न दूर करके शांति दीजिये।।
हे क्षेत्रपाल आइये निज भाग लीजिये।
आग्नेय दिश में थापूँ यहाँ पर ही तिष्ठिये।।२।।

ॐ ह्रीं क्षेत्रपाल! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं क्षेत्रपाल! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं क्षेत्रपाल! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं अत्रस्थ क्षेत्रपालाय इंद जलं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
(आग्नेय दिशा में अर्घ चढ़ायें।)
संपूर्ण गेह में सदा निवास जो करें।
श्रीवास्तुदेव सर्व का उपकार वो करें।।
उन वास्तुदेव का यहाँ आह्वान मैं करूँ।
ईशान कोण में यहाँ वसु अर्घ मैं धरूँ।।३।।

ॐ ह्रीं वास्तुदेव! अत्र आगच्छ आगच्छ संवौषट्।
ॐ ह्रीं वास्तुदेव! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ:।
ॐ ह्रीं वास्तुदेव! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
ॐ ह्रीं वास्तुदेवाय इंद अर्घं पाद्यं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।

(ईशान दिशा में अर्घ चढ़ायें।)

जिनदेव के विहार में तुम भक्ति से आते।
देवेन्द्र की आज्ञा से सुखद पवन चलाते।।
वायुकुमार देव! यज्ञ भूमि सोधिये।
निज यज्ञभाग लीजिये संतुष्ट होइये।।४।।

ॐ ह्रीं वायुकुमार देव महीं पूतां कुरु-कुरु हूँ फट् स्वाहा।
(दर्भ के पूले से भूमि का संमार्जन करें।)
ॐ ह्रीं वायुकुमाराय सर्वविघ्नविनाशनाय इंद अर्घं पाद्यं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
(पूर्व और ईशान दिशा के बीच में अर्घ चढ़ायें।)

जिनदेव के विहार में तुम भक्ति से आते।
सुरभित उदक की वृष्टि से अति हर्ष बढ़ाते।।
हे मेघकुमार देव! यज्ञभूमि सोधिये।
निज यज्ञ भाग लीजिये संतुष्ट होइये।।४।।

ॐ ह्रीं मेघकुमारदेव! धरां प्रक्षालय-प्रक्षालय अं हं सं वं झं ठं क्ष: फट् स्वाहा। (दर्भ पूले से जल लेकर भूमि पर छिड़के।)
ॐ ह्रीं मेघकुमाराय सर्वविघ्नविनाशनाय इंद अर्घं पाद्यं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
(पूर्व और ईशान दिशा के बीच में अर्घ चढ़ायें।)

संपूर्ण होम अग्नि में तुम पूज्य हुये हो।
निर्वाण की पूजा में अग्रगण्य हुये हो।।
अग्निकुमारदेव! यज्ञभाग लीजिये।
अग्निशिखा से यज्ञभूमि शुद्ध कीजिये।।६।।

ॐ ह्रीं अग्निकुमारदेव! भूमिं ज्वालय ज्वालय अं हं सं वं झं ठं क्ष: फट् स्वाहा। (जलते हुये दर्भ के पूले से भूमि शुद्ध करें।)
ॐ ह्रीं अग्निकुमारदेवाय सर्वविघ्नविनाशनाय इंद अर्घं पाद्यं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
(पूर्व और ईशान दिशा के बीच में दर्भपूला या कपूर जलायें।)

ये साठ सहस नागकुमार देव विचरते।
जिनयज्ञ में भक्तों के सर्व विघ्न को हरते।।
ईशान दिशा में यहाँ जलांजली करूँ।
हे नागदेव आपको संतुष्ट मैं करूँ।।७।।

ॐ ह्रीं क्रों षष्टिसहस्रसंख्येभ्यो नागेभ्य: स्वाहा। इंद अर्घं पाद्यं गंधं अक्षतं पुष्पं चरुं दीपं धूपं फलं बलिं स्वस्तिकं यज्ञभागं च यजामहे प्रतिगृह्यतां प्रतिगृह्यतां स्वाहा।
 (नागसंतपर्ण के लिये ईशान दिशा में जलांजलि देवें।)
(यहाँ पर पुण्याहवाचन करने का भी विधान है। मंदिर से अतिरिक्त स्थान पर यदि विधान के लिए मंडप बनाया है तो अवश्य ही पुण्याहवाचन करें। लघु पुण्याहवाचन आगे है वहाँ से लेवें।)
दिक्पाल अर्घ
(यह अर्घ मंडल पर ही चढ़ावें)
—दोहा—
पहले ब्रह्म प्रदेश में, पुन: पूर्वदिश आदि।
दर्भ स्थापन विधि करूँ, मंत्र सहित रुचिरादि।।२।।

प्रकृतक्रमविधि अवधानाय पुष्पांजलि:।
श्री जिनेन्द्र के यज्ञ में, ब्रह्म स्थान महान्।
विघ्नशांतिहित दर्भ अरु, अघ्र्य करूँ सुख खान।।२।।

ॐ ह्रीं दर्पमथनाय नम: स्वाहा। ब्रह्मदर्भ:।
(मंडल पर मध्य में दर्भ स्थापन कर पुष्पांजलि क्षेपण करें पुन: अर्घ चढ़ावे।)
ॐ ह्रीं अंनतज्ञानाय अनंतदर्शनाय अनंतवीर्याय अनंतसुखाय पूर्वदिङ्मुखे दर्भमवस्थापयामि नम: स्वाहा।
(पूर्व दिशा में दर्भ स्थापन पुष्पांजलि: अर्घ चढ़ावें।)
ॐ ह्रीं ब्रह्मणे स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, जिनाय स्वाहा, जिनोत्तमाय स्वाहा, धवाय स्वाहा, धवोत्तमाय स्वाहा, शुचिष्ठाशुचिष्ठेषु कोणाकोणेषु आग्नेयां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।
(आग्नेय दिशा में दर्भ स्थापना आदि करें)
ॐ ह्रीं अनंतवीर्याय जितेंद्रियाय नम: दक्षिणस्यां दिशि दर्भं अवस्था- पयामि स्वाहा।(दक्षिण दिशा में दर्भ स्थापना आदि करें)
ॐ ह्रीं परमब्रह्मणे नैऋत्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।
(नैऋत्य दिशा में दर्भ स्थापित करें)
ॐ ह्रीं परममंगलाय परमपवित्राय परमनिर्वाणकारणाय अपरस्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।(पश्चिम दिशा में दर्भ स्थापना करें)
ॐ ह्रीं पंचमहाकल्याणसंपूर्णाय वायव्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा। (वायव्यदिशा में दर्भ स्थापना करें)
ॐ ह्रीं त्रैलोक्यनाथाय त्रिलोकमहिताय शुचिरत्नत्रयदर्शनकराय उत्तरस्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।(उत्तर दिशा में दर्भ स्थापना करें)
ॐ ह्रीं नवकेवललब्धिसमन्विताय देवाधिदेवाय ऐशान्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।(ईशान दिशा में दर्भ स्थापना करें)
ॐ ह्रीं क्रों फणालंकृत धरणेन्द्राय कूर्मवाहनसमन्विताय ईशानेंद्रमध्ये अधरस्यां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।
(ईशान और पूर्व दिशा के बीच में दर्भ स्थापना करें)
ॐ ह्रीं क्रों हरिणलांछन समन्विताय सोमाय नैऋतवरुणमध्ये ऊध्र्वायां दिशि दर्भं अवस्थापयामि स्वाहा।
(नैऋत्य और पश्चिम दिशा के बीच में दर्भ स्थापित करें)

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भूमि देवता पूजा

ॐ ह्रीं नीरजसे नम: जलं। ॐ ह्रीं शीलगंधाय नम: चंदनं।

ॐ ह्रीं अक्षताय नम: अक्षतं। ॐ ह्रीं विमलाय नम: पुष्पं।
ॐ ह्रीं दर्पमथनाय नम: नैवेद्यं। ॐ ह्रीं ज्ञानोद्योताय नम: दीपं।
ॐ ह्रीं श्रुतधूपाय नम: धूपं। ॐ ह्रीं परमसिद्धाय नम: फलं।
ॐ ह्रीं भूर्भूमिदेवतायै भूम्यर्चनं करोमि स्वाहा अघ्र्यं।