ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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19.सरस्वती स्तोत्र प्रश्नोत्तरी

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सरस्वती स्तोत्र प्रश्नोत्तरी

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प्रश्न ४२१—सरस्वती अर्थात् जिनवाणी का तेज कैसा है ?
उत्तर—सरस्वती का तेज भीतर, बाहर, दिन, रात की अपेक्षा नहीं करता है, न ही जीवों को संताप देता है और न ही जड़ता का करने वाला है अपितु समस्त प्रकार के पदार्थों का प्रकाश करने वाला है।

प्रश्न ४२२—श्रुतदेवी की शोभा का वर्णन कौन कर सकता है ?
उत्तरश्रुतदेवी की शोभा का वर्णन समस्त शास्त्र के पारंगत श्रुतकेवली भी नहीं कर सकते हैं।

प्रश्न ४२३—श्रुतदेवी का मार्ग कैसा है ?
उत्तर—श्रुतदेवी का मार्ग आकाश के समान निर्मल है, अत्यन्त विस्तीर्ण है और अत्यन्त गहन है।

प्रश्न ४२४—सरस्वती माता की कृपा का पात्र क्या प्राप्त कर लेता है ?
उत्तर—सरस्वती माता का कृपापात्र मनुष्य बिना प्रयत्न के ही समस्त गुणों का भण्डार हो जाता है।

प्रश्न ४२५—जो श्रुतदेवी का कृपापात्र नहीं है वह कैसा है ?
उत्तर—जो मनुष्य सरस्वती की कृपा का पात्र नहीं है वह चिरकाल तक पढ़ता हुआ भी शास्त्र को नहीं जानता है।

प्रश्न ४२६—केवली भगवान के ज्ञान और दर्शन में कारण क्या है ?
उत्तर—केवली भगवान के समस्त पदार्थों के ज्ञान—जानने में तथा दर्शन—देखने में श्रुतदेवी ही असाधारण कारण हैं।

प्रश्न ४२७—समस्त पुरुषार्थों का साधन क्या है ?
उत्तर—मनुष्य भव ही समस्त पुरुषार्थों का साधन है।

प्रश्न ४२८—चार गतियों में सबसे उत्तम गति कौन सी है ?
उत्तर—चार गतियों में मनुष्य गति सबसे उत्तम है।

प्रश्न ४२९—मनुष्यगति ही सर्वश्रेष्ठ क्यों है ?
उत्तर—इस मनुष्य भव में ही जीव कर्मों से छूटने का उपाय कर सकते हैं तथा सबसे उत्तम जो मोक्षस्थान है उसको भी जीव इसी मनुष्यभव से प्राप्त करते हैं।

प्रश्न ४३०—क्या सरस्वती के अनुग्रह के बिना वास्तविक तत्त्व का निश्चय हो सकता है ?
उत्तर—नहीं, सरस्वती के अनुग्रह के बिना शास्त्र के भली प्रकार अध्ययन करने पर भी वास्तविक तत्त्व का निश्चय नहीं होता है।

प्रश्न ४३१—क्या श्रुतदेवी की कृपा के बिना मोक्ष सम्भव है ?
उत्तर—यदि बड़े—बड़े मुनि इस बात को चाहें कि बिना सरस्वती की कृपा के सीधे मोक्षपद को चले जावें तो वे कदापि नहीं जा सकते किन्तु श्रुतदेवी की सहायता से ही वे मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

प्रश्न ४३२—श्रुतदेवी का शरीर कैसा है ?
उत्तरश्रुतदेवी सुवर्ण के समान शरीर को धारण करने वाली और शुक्ल (उज्ज्वल) है।

प्रश्न ४३३—दिव्य वाणी कब प्रगट होती है ?
उत्तरजिस समय ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्म नष्ट हो जाते हैं उस समय केवलज्ञान की प्राप्ति होती है और उन केवली भगवान के बिना इच्छा के ही समुद्र के समान गंभीर दिव्यवाणी प्रगट होती है।

प्रश्न ४३४—मनुष्य जीवन किस प्रकार सफल माना जाता है ?
उत्तर—मनुष्य जीवन में यदि वाणी की प्राप्ति न होवे तो वह दु:खों से पाया हुआ भी मनुष्य जन्म निस्सार ही समझा जाता है इसलिए मनुष्य की सफलता वाणी से है।

प्रश्न ४३५—वाणी की सफलता किसमें है ?
उत्तर—वाणी की सफलता कविपने तथा वक्तापने से होती है क्योंकि सुन्दर वाणी की भी प्राप्ति हुई किन्तु सुन्दर कविता करना तथा अच्छी तरह बोलना नहीं आया तो उस वाणी का मिलना न मिलना एक सा ही है।

प्रश्न ४३६—कान की शोभा किसमें है ? कौन से कान हितकारी हैं ?
उत्तर—जिस कान का सरस्वती के समीप में संस्कार किया गया है अर्थात् जो कान आपके सहवास से शुद्ध एवं पवित्र किए गए हैं वही कान हित के करने वाले तथा अविनाशी हैं।

प्रश्न ४३७—श्रुतज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है ?
उत्तर—सरस्वती की कृपा से जीवों को श्रुतज्ञान की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ४३८—परोक्ष ज्ञान किसे कहते हैं ?
उत्तर—श्रुतज्ञान पदार्थों को परोक्ष रूप से जानता है।

प्रश्न ४३९—परोक्ष ज्ञान किसकी सहायता से होता है ?
उत्तर—परोक्ष ज्ञान मन की सहायता से होता है।

प्रश्न ४४०—तीर्थ किसे कहते हैं ?
उत्तर—जिससे भव्य जीव तिरें उसी का नाम तीर्थ है।

प्रश्न ४४१—क्या सरस्वती भी संसार के नाश में कारण है ?
उत्तर—हाँ, संसार के नाश करने में सरस्वती भी कारण हैं अर्थात् जो मनुष्य तेरे भक्त तथा आराधक हैं वे मनुष्य यथार्थ तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर र्नििवघ्न रीति से सीधे मोक्ष को चले जाते हैं।

प्रश्न ४४२—जिनवाणी माता की सेवा करने वाले को क्या फल प्राप्त होता है ?
उत्तर—जो मनुष्य शास्त्रानुसार जिनवाणी की सेवा करने वाला है उस मनुष्य को अंतरंग केवलज्ञानादि तथा बहिरंग समवसरणादि समस्त प्रकार की लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।