ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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2.ज्ञानमार्गणा से आहारमार्गणा तक बंधक -अबंधकों का निरूपण

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ज्ञानमार्गणा से आहारमार्गणा तक बंधक - अबंधकों का निरूपण

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संप्रति ज्ञानमार्गणायां बंधाबंधप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी विभंगणाणी आभिणि-बोहियणाणी सुदणाणी ओधिणाणी मणपज्जवणाणी बंधा।।२२।।

केवलणाणी बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।२३।।
सिद्धा अबंधा।।२४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-ज्ञानमार्गणायां त्रयोऽज्ञानिनो मिथ्याज्ञानिनः बंधकाः, मिथ्यात्वप्रत्ययसहिताः। मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानिनः चतुर्थगुणस्थानादारभ्य द्वादशगुणस्थानपर्यंताः क्षीणकषायान्ताः बंधका एव। केवलज्ञानिनोऽर्हत्परमेष्ठिनः सयोगिनो बंधकाः सातावेदनीयबंधकर्तृत्वात्, अयोगिनोऽबंधकाः बंधप्रत्यय-रहित्वात्। सिद्धपरमेष्ठिनो अबंधाः एवेति ज्ञातव्यं।
एवं सप्तमस्थले ज्ञानमार्गणायां बंधाबंधकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संयममार्गणायां बंधाबंधप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-संजमाणुवादेण असंजदा बंधा, संजदासंजदा बंधा।।२५।।
संजदा बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।२६।।
णेव संजदा णेव असंजदा णेव संजदासंजदा अबंधा।।२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोद्र्वयोरर्थः सुगमः। षष्ठगुणस्थानादारभ्य सयोगिपर्यन्ताः संयताः बंधकाः, अयोगिनोऽबंधकाः। ये सिद्धपरमेष्ठिनः ते न संयताः न असंयता: न संयतासंयताः अतस्ते अबंधा एव। विषयेषु द्विविधासंयमस्वरूपेण प्रवृत्तेरभावात् सिद्धाः असंयता न भवन्ति। संयताः अपि न भवन्ति प्रवृत्तिपुरःसरं तन्निरोधाभावात्। ततो नोभयसंयोगोऽपि सिद्धानां भगवतां इति।
एवं अष्टमस्थले संयममार्गणायां बंधाबंधव्यवस्थानिरूपणत्वेन सूत्राणि त्रीणि गतानि।
दर्शनमार्गणायां बंधाबंधनियमप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी अचक्खुदंसणी ओधिदंसणी बंधा।।२८।।
केवलदंसणी बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि ।।२९।।
सिद्धा अबंधा।।३०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-दर्शनमार्गणायां चक्षुर्दर्शनिनोऽचक्षुर्दर्शनिनश्च सर्वे संसारिणः प्राणिनः सर्वदा बंधकाः एव, ये केचित् अवधिदर्शनसहिताः तेऽपि क्षीणकषायान्ता एव भवन्ति न चागे्रऽतस्तेऽपि बंधकाः एव। केवलदर्शनिनः सयोगिनो बंधका, अयोगिनोऽबंधका इति पुनः सिद्धपरमेष्ठिनोऽपि केवलदर्शनो-पयोगसहितास्तथापि सर्वथा अबंधा एव बंधप्रत्ययविनाशकत्वात्।
एवं नवमस्थले दर्शनोपयोगिनां बंधाबंधप्रतिपादनत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि ।
लेश्यामार्गणायां बंधाबंधनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिया णीललेस्सिया काउलेस्सिया तेउलेस्सिया पम्मलेस्सिया सुक्कलेस्सिया बंधा।।३१।।
अलेस्सिया अबंधा।।३२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कषायोदयानुरञ्जिता योगप्रवृत्तिर्लेश्या इति वचनात् दशमगुणस्थानपर्यंता या शुक्ललेश्या, तद्सहिता अपि संयता बंधकाः एव उपरितनगुणस्थानवर्तिनः सयोगिपर्यन्ताः बंधकाः, ‘‘शुक्ललेश्यांशकस्पृशेः’’ इति वचनादपि उपचारेण वा, शेषा अयोगिनः सिद्धपरमेष्ठिनश्च अबंधाः।
सिद्धा: अबंधा इति पृथक्सूत्रं किन्न कृतम् ?
नैष दोषः, अलेश्येषु बंधाबंधोभयभंगाभावेन संदेहानुपपत्तेः।
एवं दशमस्थले लेश्यामार्गणायां बंधाबंधनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते।

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अब ज्ञानमार्गणा में बंध और अबंध का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणानुसार मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानी बंधक हैं।।२२।।

केवलज्ञानी बंधक हैं और अबंधक भी हैं।।२३।।

सिद्ध अबंधक हैं।।२४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ज्ञानमार्गणा में तीनों अज्ञानी-मिथ्याज्ञानी जीव बंधक हैं, क्योंकि वे मिथ्यात्व प्रत्यय से सहित होते हैं। मति, श्रुत, अवधि और मन:पर्ययज्ञानी चतुर्थ गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक के सभी जीव बंधक ही होते हैं। केवलज्ञानी अरिहंत परमेष्ठी भगवान सयोगकेवली बंधक हैं, क्योंकि वे साता वेदनीय कर्म का बंध करते हैं। अयोगकेवली भगवान अबंधक होते हैं, क्योंकि वे बंध प्रत्यय से रहित होते हैं। सिद्ध परमेष्ठी अबंधक ही होते हैं ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार सातवें स्थल में ज्ञानमार्गणा में बंधक और अबंधकों का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब संयममार्गणा में बंध और अबंध का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयममार्गणानुसार असंयत बंधक हैं और संयतासंयत बंधक हैं।।२५।।

संयत बंधक भी हैं, अबंधक भी हैं।।२६।।

जो न संयत हैं, न असंयत हैं, न संयतासंयत हैं, ऐसे सिद्ध जीव अबंधक हैं।।२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दो सूत्रों का अर्थ सुगम है। छठे गुणस्थान से लेकर सयोगकेवली पर्यन्त सभी संयत बंधक होते हैं, अयोगकेवली अबंधक होते हैं। जो सिद्ध परमेष्ठी भगवान हैं वे न संयत हैं, न असंयत हैं और न संयतासंयत हैं अत: वे अबंधक ही होते हैं। विषयों में दो प्रकार के असंयम अर्थात् इन्द्रियासंयम और प्राणिअसंयम रूप से प्रवृत्ति न होने के कारण सिद्ध असंयत नहीं हैं। सिद्ध संयत भी नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिपूर्वक उनमें संयम का अभाव है। इस कारण संयम और असंयम इन दोनों के संयोग से उत्पन्न संयमासंयम का भी सिद्धों के अभाव है।

इस प्रकार आठवें स्थल में संयममार्गणा में बंध और अबंध व्यवस्था का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब दर्शनमार्गणा में बंध और अबंध के नियमों का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार चक्षुदर्शनी अचक्षुदर्शनी और अवधिदर्शनी बंधक हैं।।२८।।

केवलदर्शनी बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं।।२९।।

सिद्ध अबंधक हैं।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनमार्गणा में चक्षुदर्शनी और अचक्षुदर्शनी सभी संसारी प्राणी सर्वदा बंधक ही रहते हैं, जो अवधिदर्शन वाले कुछ प्राणी हैं वे भी क्षीणकषाय गुणस्थान तक ही होते हैं, आगे नहीं होते हैं, वे भी बंधक ही रहते हैं। केवलदर्शन सहित सयोगकेवली भगवान बंधक होते हैं, अयोगकेवली अबंधक होते हैं, पुन: सिद्ध परमेष्ठी भी केवलदर्शनोपयोग से सहित होते हैं, फिर भी वे सर्वथा अबंधक ही हैं, क्योंकि बंध के समस्त प्रत्ययों का उन्होंने नाश कर दिया है।

इस प्रकार नवमें स्थल में दर्शनोपयोगी जीवों के बंध-अबंध का प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब लेश्यामार्गणा में बंध-अबंध का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणानुसार कृष्णलेश्या वाले, नीललेश्या वाले, कापोतलेश्या वाले, तेजोलेश्या वाले, पद्मलेश्या वाले और शुक्ललेश्या वाले बंधक हैं।।३१।।

लेश्या रहित जीव अबंधक हैं।।३२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कषाय के उदय से अनुरंजित योग की प्रवृत्ति लेश्या है, इस वचन से दशवें गुणस्थान तक जो शुक्ललेश्या है उससे सहित भी संयत बंधक ही होते हैं। उससे ऊपर के गुणस्थानवर्ती सयोगकेवली गुणस्थान पर्यन्त बंधक हैं अथवा ‘‘शुक्ललेश्या के अंश का स्पर्श करने से’’ इत्यादि कथन के कारण भी उपचार से वे बंधक हैं, शेष अयोगकेवली और सिद्धपरमेष्ठी अबंधक हैं।

शंका-‘‘सिद्ध अबंधक हैं’’ ऐसा पृथक् से कथन क्यों नहीं किया गया?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि लेश्यारहित जीवों में बंध और अबंध ये दो विकल्प न होने से कोई संदेह नहीं उत्पन्न होता है।

इस प्रकार दशवें स्थल में लेश्यामार्गणा में बंध और अबंध का निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

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भव्यमार्गणायां बंधाबंधप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतरति-

भवियाणुवादेण अभवसिद्धिया बंधा, भवसिद्धिया बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।३३।।

णेव भवसिद्धिया णेव अभवसिद्धिया अबंधा।।३४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-भव्यमार्गणायां अभव्याः सर्वथा मिथ्यादृष्टिनः एवातो बंधकर्तारः संसारिणः सन्ति। भव्यास्तेऽपि ये केचित् दूरानुदूराः ते बंधकाः एव, ये केचित् भव्यत्वं प्रकटयन्ति ते अबंधाः भवितुमर्हन्ति, अर्हत्परमेष्ठिनः भव्याभव्यावस्थाविरहिताः ।
उक्तं च- ‘‘नमो भव्येतराऽवस्था-व्यतीताय विमोक्षिणे।।’’
ये न भव्या नाभव्यास्ते सिद्धाः अबंधा एव पुनरागमनरहितत्वात्।
एवं एकादशस्थले भव्यमार्गणायां बंधाबंधकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते ।
सम्यक्त्वमार्गणायां बंधाबंधनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-सम्मत्ताणुवादेण मिच्छादिट्ठी बंधा, सासणसम्माइट्ठी बंधा, सम्मामिच्छाइट्ठी बंधा।।३५।।
सम्मादिट्ठी बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।३६।।
सिद्धा अबंधा।।३७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्ट्यादित्रयगुणस्थानवर्तिनो बंधकाः एव, सकलास्रवसंयुक्तत्वात्। सम्यग्दृष्टयो बंधकाः अबंधकाश्च, सास्रवानास्रवेषु सम्यग्दर्शनोपलंभत्वात्। सिद्धाः क्षायिकसम्यक्त्वसहिताः सर्वथा अबंधका एव।
एवं द्वादशमस्थले दर्शनमार्गणायां बंधाबंधनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति संज्ञिमार्गणायां बंधाबंधप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-सण्णियाणुवादेण सण्णी बंधा, असण्णी बंधा।।३८।।
णेव सण्णी णेव असण्णी बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।३९।।
सिद्धा अबंधा।।४०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। विनष्टनोइन्द्रियक्षयोपशमात् केवलज्ञानिनो न संज्ञिनः, तत्र इन्द्रियावष्टंभबलेन अनुत्पन्नबोधोपलंभात् नोऽसंज्ञिनः। ततस्ते बंधका अपि अबंधका अपि, बंधाबंधकारणयोगायोगयोरुपलंभात्।
श्रीभगवज्जिनसेनाचार्येणापि प्रोक्तं-
‘‘संज्ञ्यसंज्ञिद्वयावस्था-व्यतिरिक्तामलात्मने ।
नमस्ते वीतसंज्ञाय, नमः क्षायिकदृष्टये।।’’
एवं त्रयोदशस्थले संज्ञिमार्गणायां बंधाबंधनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति आहारमार्गणायां बंधाबंधप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-आहाराणुवादेण आहारा बंधा।।४१।।
अणाहारा बंधा वि अत्थि, अबंधा वि अत्थि।।४२।।
सिद्धा अबंधा।।४३।।
'सिद्धांतचिंतामणिटीका-'सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। औदारिकशरीरादिवर्गणाग्रहणकरणात् आहारा आहारकाः। संसारिप्राणिनः कर्मणां बंधकाः एव। अनाहाराः विग्रहगतौ अपि बंधका एव, अयोगिनश्चैवानाहाराः अबंधकाः सिद्धपरमेष्ठिनः सर्वे निराकाराः निराहारा अबंधका एव।
एषः बंधकसत्त्वाधिकारः पूर्वमेव किमर्थं प्ररूपितः ?
‘सति धर्मिणि धर्माः चिन्त्यन्ते’ इति न्यायात् बंधकानामस्तित्वे सिद्धे सति पश्चात् तेषां विशेषप्ररूपणा युज्यते। तस्मात् सत्त्वप्ररूपणं पूर्वमेव कर्तव्यमिति। एवमस्तित्वेन सिद्धानां—प्रसिद्धानां बंधकानामेकादशा-नियोगद्वारैः विशेषप्ररूपणार्थं उत्तरग्रंथः अवतीर्यते।
एवं चतुर्दशस्थले आहारमार्गणायां बंधकाबंधकजीवास्तित्वनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इतो विशेष: कथ्यते-अत्र ऋषभदेवजन्मजयंतीमहामहोत्सवप्रारम्भकाले श्रीऋषभदेवो मया स्तूयते।
यथा त्रिषु लोकेषु सिद्धिं प्राप्तुकामानामुद्भवस्थानापेक्षया मध्यलोको महान् अस्ति। मध्यलोके वा सर्वेषु द्वीपेषु आद्योऽयं जंबूद्वीपः प्राधान्यमाप्नोति। अस्मिन् द्वीपे मध्ये स्थितः सुमेरुः पर्वत: सर्वेषु पर्वतेषु ज्येष्ठः श्रेष्ठः सर्वोत्तुंगो महानस्ति यस्तु जम्बूद्वीपमध्यस्थितो जिनप्रतिमासमन्वितो हस्तिनापुरतीर्थक्षेत्रे निर्मितः सुमेरुशैलराजः कृत्रिमरूपं धारयन्नपि वर्तमानकाले विश्वेषु अद्वितीयरचनाभवनात् सर्वजैनाजैनजनतानामा-कर्षणकेन्द्रो भवन्नास्ते।
तथैव चतुर्विंशतितीर्थकरेषु सर्वेषु भगवान् ऋषभदेवः ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रधानोऽस्ति किं च—युगादौ कर्मभूमेः प्रारम्भकाले अनेन भगवता असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य-शिल्पाख्य षट्क्रियाभिः प्रजाभ्यो जीवनकलाः शिक्षिताः, पुनश्च गृहस्थमार्गस्य मोक्षमार्गस्य च प्रणेता बभूव।
एतादृशः श्रीऋषभदेवस्य भगवतो गुणानां कीर्तनात् तस्याहिंसामयसिद्धान्तप्रचारात् भगवतो नामस्मरणाच्च विश्वस्मिन् शान्ते: स्थापना भविष्यति, सर्वत्र क्षेमः सुभिक्षमारोग्यं च वत्स्र्यते, अनेके आकस्मिक संकट-भूकंप-दुर्भिक्ष-नदीपूर-वायुयानपतन-वाष्पयानसंघट्टनदुर्घटनादयः क्षीणा: भविष्यन्ति, आधिव्याधिशोकापदः विनक्ष्यंति। भगवद्भिः प्रतिपादितकृषिव्याख्यावगमात् क्रूरजनानामपि भावनाः परिवर्तिता भविष्यंति, पर्यावरणस्य शुद्धिश्च स्यादित्यादि-अनेकलाभान् मनसि संप्रधार्य-
‘‘श्रीमद्भगवत्ऋषभदेवजन्मजयंतीमहामहोत्सवं’’ आवर्षं लोके सर्वजैनसमाजैः क्रियेत इति भावनयाद्य वीराब्दे त्रयोविंशत्यधिकपंचविंशतितमे चैत्रकृष्णानवम्यां तिथौ ‘श्रीऋषभदेवजन्मजयंती दिवसे’ भारतदेशस्य राजधानीं दिल्लीनाममहानगरे दिगम्बरजैनाग्रवालसमाजप्रमुखकार्यकर्तृभिः दिगम्बरजैनत्रिलोकशोधसंस्थानस्य च कार्यकर्तृभिरद्य भगवतः श्रीऋषभदेवतीर्थकरस्य रथयात्रामहामहोत्सवः संपन्नोऽभवत्। ऐतिहासिकदिगंबर- जैनलालमंदिरे श्रीपुरुदेवजिनप्रतिमायाः अष्टोत्तरशतरजतकलशैरभिषेकविधिश्च बभूव।
अस्मिन वर्षे भगवतः श्रीआदिब्रह्मणः ऋषभदेवस्य नामप्रचारप्रसारार्थमनेकविधानि प्रभावनाकार्याणि भूयासुः इति कामयामहे।
श्रीमत्ऋषभदेवोऽस्य सार्वो धर्मो जयत्वपि।
यस्य प्रसादमात्रेण लोके शांतिर्भविष्यति।।१।।

इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य श्रीमद्भूतबलि-सूरिविरचितक्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीका- प्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यः चारित्रचक्रवर्ती-श्रीशांतिसागरस्तस्य प्रथमः पट्टााधिपः श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या-जम्बूद्वीपरचनाप्रेरिका-गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायांत्रिंचत्वािंरशत् सूत्रैरियं बन्धकसत्त्व-प्ररूपणाख्या पीठिका समाप्ता।

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अब भव्यमार्गणा में बंध और अबंध का प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणानुसार अभव्यसिद्धिक जीव बंधक हैं, भव्यसिद्धिक जीवबंधक भी हैं अबंधक भी हैं।।३३।।

जो न भव्यसिद्धिक हैं, न अभव्यसिद्धिक हैं, ऐसे सिद्ध जीव अबंधक हैं।।३४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्यमार्गणा में अभव्य जीव सर्वथा मिथ्यादृष्टि ही होते हैं अत: वे बंधकर्ता संसारी हैं। जो भव्य जीव हैं, उनमें भी कुछ दूरानुदूर भव्य हैं वे बंधक है, जो भव्यत्व को प्रगट करते हैं, वे अबंधक हो सकते हैं। अरिहंत परमेष्ठी भव्य और अभव्य दोनों अवस्थाओं से रहित होते हैं।

सहस्रनामस्तोत्र में कहा भी है-‘‘भव्य और अभव्य अवस्था से रहित मोक्ष को प्राप्त जिनेश्वर आदिनाथ भगवान के लिए मेरा नमस्कार हो।’’

जो न भव्य हैं, न अभव्य हैं वे सिद्ध भगवान अबंधक ही होते हैं, क्योंकि संसार में उनका पुनरागमन-पुन: जन्म नहीं होता है।

इस प्रकार ग्यारहवें स्थल में भव्यमार्गणा में बंध-अबंध का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सम्यक्त्वमार्गणा में बंध-अबंध का निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणानुसार मिथ्यादृष्टि बंधक हैं, सासादनसम्यग्दृष्टि बंधक हैं और सम्यग्मिथ्यादृष्टि बंधक हैं।।३५।।

सम्यग्दृष्टि बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं।।३६।।

सिद्ध अबंधक हैं।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानवर्ती बंधक ही हैं, क्योंकि वे सम्पूर्ण कर्मों के आश्रव से संयुक्त होते हैं। सम्यग्दृष्टि बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं, क्योंकि उनके आश्रव और अनाश्रव-संवर इन दोनों अवस्थाओं में सम्यग्दर्शन का अस्तित्व रहता है। क्षायिकसम्यक्त्व सहित सिद्ध भगवान सर्वथा अबंधक ही रहते हैं।

इस प्रकार बारहवें स्थल में दर्शनमार्गणा में बंध और अबंध का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब संज्ञीमार्गणा में बंध और अबंध का प्रतिपादन करने वाले तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संज्ञीमार्गणानुसार संज्ञी बंधक हैं, असंज्ञी बंधक हैं।।३८।।

न संज्ञी न असंज्ञी ऐसे केवलज्ञानी जिन बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं।।३९।।

सिद्ध अबंधक हैं।।४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। उनका नोइंद्रियज्ञानावरण कर्म का क्षयोपशम नष्ट हो गया है, इसलिए केवलज्ञानी जीव संज्ञी नहीं है तथा उनके मात्र इन्द्रियों के अवलम्बन से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती इसलिए वे केवलज्ञानी जीव असंज्ञी नहीं है। अत: वे न संज्ञी न असंज्ञी होकर बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं, क्योंकि उनके सयोगी अवस्था में बंध का कारण योग पाया जाता है और अयोगी अवस्था में अबंध का कारण योग का अभाव रहता है।

श्रीमद्भगवज्जिनसेनाचार्य ने भी सहस्रनाम स्तोत्र में कहा है-

श्लोकार्थ-जो संज्ञी-असंज्ञी दोनों अवस्थाओं से रहित हैं, पवित्रात्मा हैं, उन वीतसंज्ञक क्षायिक सम्यग्दृष्टि सिद्ध भगवान को मेरा नमस्कार होवे।। इस प्रकार तेरहवें स्थल में संज्ञीमार्गणा में बंध और अबंध का निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब आहारमार्गणा में बंध-अबंध का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणानुसार आहारक जीव बंधक हैं।।४१।।

अनाहारक जीव बंधक भी हैं और अबंधक भी हैं।।४२।।

सिद्ध अबंधक हैं।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त तीनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। औदारिक शरीरादि के योग्य पुद्गल वर्गणाओं को ग्रहण करने का नाम आहार है, ऐसे आहार को प्राप्त आहारक संसारी प्राणी कर्मों के बंधक ही होते हैं। विग्रहगति में भी अनाहारक जीव बंधक ही रहते हैं तथा अयोगकेवली अनाहारक होते हुए अबंधक होते हैं। सिद्ध परमेष्ठी सभी निराकार-अमूर्तिक और निराहार-आहार रहित अनाहार होने के कारण अबंधक ही होते हैं।

शंका-यह बंधकसत्वाधिकार पहले ही क्यों प्ररूपित किया गया है?

समाधान-‘धर्मी के सद्भाव में ही धर्मों का चिंतन किया जाता है’ इस न्याय के अनुसार बंधकों का अस्तित्व सिद्ध हो जाने पर पश्चात् उनकी विशेष प्ररूपणा करना योग्य है। इसलिए बंधकों की सत्प्ररूपणा पहले ही करना चाहिए। इस प्रकार अस्तित्व से सिद्ध हुए-प्रसिद्ध हुए बंधकों के ग्यारह अनुयोगों द्वारा विशेष प्ररूपण करने के लिए आगे की ग्रंथ रचना हुई है।

इस प्रकार चौदहवें स्थल में आहारमार्गणा में बंधक और अबंधक जीवों का अस्तित्व बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

यहाँ विशेष कथन किया जा रहा है-

यहाँ श्री ऋषभदेव जन्मजयंती महामहोत्सव के प्रारंभ काल में मेरे द्वारा प्रसंगोपात्त भगवान ऋषभदेव की स्तुति की जा रही है-

जैसे तीनों लोकों में सिद्धि-मुक्ति को प्राप्त करने वाले मनुष्यों के जन्मस्थान की अपेक्षा मध्यलोक महान है अर्थात् मध्यलोक में ही मोक्षगामी मनुष्य उत्पन्न होते हैं। अथवा मध्यलोक में सभी-असंख्यात द्वीप-समुद्रों में सर्वप्रथम द्वीप-जम्बूद्वीप की प्रधानता देखी जाती है। इस जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित सुमेरुपर्वत सभी पर्वतों में ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और सबसे ऊँचा महान पर्वत है, जो कि हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र की पावन वसुंधरा पर निर्मित जम्बूद्वीप रचना के मध्य में सोलह जिनप्रतिमाओं से समन्वित होकर स्थित है, वह सुरशैलराज-दिव्यपर्वतराज वहाँ कृत्रिमरूप को धारण करते हुए भी वर्तमान में विश्व की अद्वितीय रचना होने के कारण समस्त जैन-अजैन जनता के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

उसी प्रकार चौबीसों वर्तमानकालीन तीर्थंकरों में प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और प्रधान हैं, क्योंकि इस कर्मभूमि के प्रारंभ में इन्हीं भगवान ऋषभदेव ने प्रजा को असि-मसि-कृषि-विद्या-वाणिज्य और शिल्प नाम की छह क्रियाओं के द्वारा जीवन जीने की कला सिखाई, उसके पश्चात् वे गृहस्थमार्ग एवं मोक्षमार्ग के प्रणेता कहलाए।

उन भगवान् ऋषभदेव के गुणकीर्तन से उनके अहिंसामयी सिद्धान्तों के प्रचार से और भगवान के नाम स्मरण से सारे विश्व में शांति की स्थापना होगी, सर्वत्र क्षेम-सुभिक्ष और आरोग्यता का संचार होगा, अनेक आकस्मिक संकट, भूकंप, दुर्भिक्ष, नदियों में बाढ़, हवाई जहाज गिरने की दुर्घटना, रेल दुर्घटना आदि समाप्त होंगी, आधि-व्याधि-शोकादि आपत्तियाँ नष्ट होंगी। भगवान् के द्वारा प्रतिपादित कृषि की व्याख्या-परिभाषा को जानने से व्रूर-हिंसक मनुष्यों की भावनाएँ भी परिवर्तित होंगी और पर्यावरण की शुद्धि होवे इत्यादि अनेक लाभों के विषय में मन में सोचकर- ‘‘श्रीमान् भगवान् ऋषभदेव का जन्मजयंती महामहोत्सव’’ पूरे १ वर्ष तक लोक में सम्पूर्ण जैन समाज के द्वारा मनाया जावे, इस भावना से आज वीर निर्वाण संवत् २५२३ के चैत्र कृष्णा नवमी तिथि के दिन ‘श्री ऋषभदेव जन्मजयंती के अवसर पर’ भारतदेश की राजधानी दिल्ली नामक महानगर में दिगम्बर जैन अग्रवाल समाज के प्रमुख कार्यकर्ताओं के द्वारा एवं दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के कार्यकर्ताओं के द्वारा (दोनों संस्थाओं के संयुक्त तत्वावधान में) आज भगवान ऋषभदेव तीर्थंकर का रथयात्रा महामहोत्सव सम्पन्न हुआ और ऐतिहासिक दिगम्बर जैन लाल मंदिर में श्री पुरुदेव की जिनप्रतिमा का १०८ रजत कलशों से महाभिषेक भी हुआ।

इस वर्ष में आदिब्रह्मा भगवान श्री ऋषभदेव के नाम का प्रचार-प्रसार करने हेतु अनेक प्रकार के प्रभावनात्मक कार्य सम्पन्न होवें, यही मेरी मनोकामना है।

श्लोकार्थ-तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान का सार्वभौम धर्म-सर्वहितकारी धर्म जयशील होवे, जिस धर्म के प्रभाव से लोक में शांति की स्थापना होती है।।१।।

विशेषार्थ-षट्खण्डागम में द्वितीय खण्ड के इस क्षुद्रकबंध प्रकरण में टीकाकत्र्री पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का स्मरण विशेषरूप से किया है। उसका प्रमुख रहस्य यह है कि उन्होंने जैनधर्म की प्राचीनता, अनादिनिधनता और सार्वभौमिकता का प्रचार-प्रसार करने हेतु ‘‘ऋषभदेवजन्मजयंती’’ महोत्सव मनाने की प्रेरणा सम्पूर्ण जैन समाज को प्रदान की थी, जिसका ‘‘ऋषभदेवजन्मजयंती महोत्सव वर्ष’’ के रूप में उद्घाटन दिनाँक ३० मार्च १९९७ को दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री साहबसिंह वर्मा ने किया था। उस समय तक ऋषभदेव भगवान की जन्मजयंती मनाने की परम्परा जैन समाज में प्राय: बहुत कम थी, माताजी की इस प्रेरणा के अनन्तर पूरे वर्ष तक दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर द्वारा व्यापक प्रचार करने पर जैनसमाज में पर्याप्त जागृति उत्पन्न हुई और सैकड़ों स्थानों पर ऋषभदेव जन्मजयंती एवं निर्वाणोत्सव मनाना अब प्रारंभ हो गया है।

इस प्रेरणा का उद्देश्य मात्र यही रहा है कि इस कृतयुग के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर के साथ-साथ प्रथम तीर्थंकर तथा चौबीसों तीर्थंकर का अस्तित्व संसार के समक्ष प्रस्तुत हो सके, ताकि भगवान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक मानने वाले नवीन इतिहासज्ञों का ध्यान जैनधर्म के वास्तविक तथ्यों पर भी केन्द्रित हो सके। इन्हीं प्रयासों के अन्तर्गत पूज्य माताजी ने इस वर्ष के समापन पर चैत्र कृष्णा नवमी (ऋषभजयंती), सन् १९९८ में २२ मार्च को ‘‘भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार’’ नाम के रथ का उद्घाटन श्री धनंजय जैन (सांसद) की अध्यक्षता में लालकिला मैदान-दिल्ली से कराया गया तथा महावीर जयंती-९ अप्रैल १९९८ को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पूज्य माताजी का शुभाशीर्वाद लेकर भारत भ्रमण हेतु उस रथ का प्रवर्तन किया। पुन: लगभग ३ वर्ष तक उस श्रीविहार रथ ने देशभर के कोने-कोने में भगवान ऋषभदेव के सर्वोदयी सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार करके कीर्तिमान स्थापित किया, उसके पश्चात् सन् २००२ में शरदपूर्णिमा के दिन पूज्य माताजी के संघ सानिध्य में उस समवसरण की धातुनिर्मित प्रतिकृति को ऋषभदेव की दीक्षा एवं केवलज्ञानकल्याणकभूमि प्रयाग (उ.प्र.) में तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ पर उत्तरप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री श्यामल कुमार सेन के करकमलों द्वारा स्थापित किया गया, जो अद्यावधि जिनधर्म की यशोगाथा को प्रचारित कर रहा है।

इसी प्रचार शृँखला में ४ फरवरी सन् २००० में माघ कृष्णा चतुर्दशी को भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाणमहोत्सव का उद्घाटन भी दिल्ली से पूज्य माताजी की प्रेरणा से उनके संघ सानिध्य में प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी जी ने कैलाशपर्वत की प्रतिकृति के समक्ष निर्वाणलाडू चढ़ाकर किया, वह उत्सव भी १ वर्ष तक सम्पूर्ण भारत देश में एवं विदेशों में भी प्रभावनापूर्वक मनाया गया पुन: उस वर्ष के समापन पर ४ फरवरी २००१ को जैनतीर्थ प्रयाग-इलाहाबाद में बनारस-हाइवे रोड पर ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली’’ तीर्थ का लोकार्पण अद्वितीय प्रभावना के साथ हुआ। वहाँ उनके पावन सानिध्य में भगवान ऋषभदेव के पंचकल्याणक प्रतिष्ठापूर्वक अतिप्राचीन तीर्थ को नूतन निर्माणों के साथ पुनसर्थापित किया गया।

इसी प्रकार भगवान ऋषभदेव का प्रचार शिक्षाजगत तक भी करने हेतु उन्होंने ‘भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन, इतिहासकारों का सम्मेलन आदि करके एन.सी.ई. आर.टी. तक भी अनेक पुरुषार्थ करवाये, समय-समय पर जिनके प्रतिफल समाज के समक्ष प्रस्तुत हुए हैं। वे आदिब्रह्मा, प्रजापति भगवान ऋषभदेव जगत् का कल्याण करें, यही मंगलभावना है।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदन्त-भूतबली आचार्य प्रणीत षट्खण्डागम में श्री भूतबली आचार्य द्वारा रचित क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में श्री वीरसेनाचार्य कृत धवला- टीका को प्रमुख करके अन्य अनेक ग्रंथों के आधार से रचित बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज के प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागरजी महाराज की शिष्या, जम्बूद्वीप रचना की सम्प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में तेंतालिस सूत्रों के द्वारा यह बंधक सत्त्वप्ररूपणा नाम की पीठिका समाप्त हुई।