ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

2.वेदमार्गणा से आहारमार्गणा में काल के निरूपण तक

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वेदमार्गणा से आहारमार्गणा में काल के निरूपण तक

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अथ वेदमार्गणाधिकार:

अधुना वेदमार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा णवुंसयवेदा अवगदवेदा केवचिरं कालादो होंति ?।।२७।।
सव्वद्धा।।२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिविधा: वेदधारिणोऽपगतवेदाश्च सर्वकालमपि विद्यन्ते नानाजीवापेक्षया।
एवं वेदमार्गणायां कालकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम- महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब वेदमार्गणा में काल प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुसार स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और अपगतवेदी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।२७।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।२८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नाना जीव की अपेक्षा तीनों प्रकार के वेदों को धारण करने वाले जीव और अपगतवेदी भगवान सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस प्रकार वेदमार्गणा में काल का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदमार्गणा नाम का पाँचवां अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ कषायमार्गणाधिकार:

अधुना कषायमार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई लोभकसाई अकसाई केवचिरं कालादो होंति ?।।२९।।
सव्वद्धा।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्रोधमानमायालोभसहिता: कषायविरहिताश्च जीवा: सर्वकालं सन्ति।
एवं कषायमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम- महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कषायमार्गणानामषष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ कषायमार्गणा अधिकार

अब कषायमार्गणा में काल का प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कषायमार्गणा के अनुसार क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी, लोभकषायी और कषायरहित जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।२९।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-क्रोध-मान-माया-लोभ इन चारों कषाय सहित और कषायरहित जीव सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस प्रकार से कषायमार्गणा में काल का निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कषायमार्गणा नाम का छठा अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ ज्ञानमार्गणाधिकार:

अधुना ज्ञानमार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

णाणाणुवादेण मदिअण्णाणी सुदअण्णाणी विभंगणाणी आभिणि-बोहियसुद-ओहिणाणी मणपज्जवणाणी केवलवाणी केवचिरं कालादो होंति ?।।३१।।
सव्वद्धा।।३२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-त्रिविधा अज्ञानिनो, मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञानिश्च सर्वकालमपि सन्त्येव।
एवं ज्ञानमार्गणायां कालकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम-महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां ज्ञानमार्गणानाम सप्तमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ ज्ञानमार्गणा अधिकार

अब ज्ञानमार्गणा में काल का प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

ज्ञानमार्गणा के अनुसार मतिअज्ञानी, श्रुतअज्ञानी, विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।३१।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।३२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तीनों प्रकार के अज्ञानी एवं मति-श्रुत-अवधि-मन:पर्यय और केवलज्ञानी जीव सदा काल ही रहते हैं।

इस प्रकार से ज्ञानमार्गणा में काल का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में ज्ञानमार्गणा नाम का सातवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ संयममार्गणाधिकार:

अधुना संयममार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-

संजमाणुवादेण संजदा सामाइयच्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा परिहारसुद्धि-संजदा जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदा संजदासंजदा असंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।३३।।
सव्वद्धा।।३४।।
सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदा केवचिरं कालादो होंति ?।।३५।।
जहण्णेण एगसमयं।।३६।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।३७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। उपशान्तकषायस्य एकादशगुणस्थानवर्तिमुने: अनिवृत्तिबादरसांपरायिकप्रविष्टस्य वा सूक्ष्मसांपरायिकगुणस्थानं प्रतिपन्नद्वितीयसमये कालं कृत्वा देवेषूत्पन्नस्य एकसमयोपलंभात्।
उत्कर्षेण-संख्यातान्तर्मुहूर्तसमाससमुद्भूतोऽन्तर्मुहूर्तकाल: प्ररूपयितव्य:।
एवं संयमसहितानां देशसंयतानां असंयतानां च कालप्ररूपणत्वेन पंचसूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संयममार्गणानाम अष्टमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ संयममार्गणा अधिकार

अब संयममार्गणा में काल का वर्णन करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संयममार्गणा के अनुवाद से संयत, सामायिक, छेदोपस्थापनशुद्धिसंयत, परिहार- शुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत, संयतासंयत और असंयत जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।३३।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।३४।।

सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।३५।।

सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत जीव जघन्य से एक समय तक रहते हैं।।३६।।

सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत जीव उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त तक रहते हैं।।३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रों का अर्थ सुगम है। उपशान्तकषाय नामक ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती मुनि के वा अनिवृत्तिबादरसाम्परायप्रविष्ट मुनियों के सूक्ष्मसाम्परायिक गुणस्थान को प्राप्त होने वाले द्वितीय समय में मरण कर देवों में उत्पन्न होने पर एक समय जघन्य काल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-संख्यात अन्तर्मुहूर्तों के संकलन से उत्पन्न हुए अन्तर्मुहूर्त काल की प्ररूपणा करनी चाहिए।

इस प्रकार से संयम सहित जीवों का, देश संयतों का और संयतों का काल प्ररूपण करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संयममार्गणा नाम का आठवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

दर्शनमार्गणायां कालकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी अचक्खुदंसणी ओहिदंसणी केवलदंसणी केवचिरं कालादो होंति ?।।३८।।

सव्वद्धा।।३९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुर्विधदर्शनवतां सर्वदैवास्तित्वात् ते सन्त्येव।
एवं दर्शनवतां कालनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ दर्शनमार्गणा अधिकार

अब दर्शनमार्गणा में काल का निरूपण करने वाले दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणा के अनुसार चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।३८।।

उक्त जीव सर्वकाल तक रहते हैं।।३९।।'

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चक्षु-अचक्षु-अवधि एवं केवल इन चारों प्रकार के दर्शन वाले जीव सर्वदा ही विद्यमान रहते हैं।

इस प्रकार से दर्शनोपयोग सहित जीवों का कालनिरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

लेश्यामार्गणायां कालकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिय-णीललेस्सिय-काउलेस्सिय-तेउलेस्सिय-पम्मलेस्सिय-सुक्ललेस्सिया केवचिरं कालादो होंति ?।।४०।।

सव्वद्धा।।४१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लेश्या: अन्तरेण केचिदपि जीवा: कदाचिदपि न सन्ति एतेषां सर्वकालमेवास्तित्वं।
एवं लेश्यावतां कालनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ लेश्यामार्गणा अधिकार

अब लेश्यामार्गणा में काल का कथन करने वाले दो सूत्र अवतीर्ण किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणा के अनुसार कृष्णलेश्या वाले, नीललेश्या वाले, कापोतलेश्या वाले, तेजोलेश्या वाले, पद्मलेश्या वाले और शुक्ललेश्या वाले जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।४०।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।४१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-लेश्या के बिना कोई भी जीव कभी भी नहीं होते हैं अत: इन लेश्याधारी जीवों का अस्तित्व सर्वकाल समझना चाहिए।

इस प्रकार से लेश्यावान् जीवों का काल निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ भव्यमार्गणाधिकार:

भव्यमार्गणायां कालनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

भवियाणुवादेण भवसिद्धिया अभवसिद्धिया केवचिरं कालादो होंति ?।।४२।।
सव्वद्धा।।४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संसारिजीवा द्विविधा:-भव्या अभव्याश्च, मुक्तजीवा न भव्या नाभव्या, एतेषां अस्तित्वं सर्वकालमेव।
एवं भव्याभव्यकालकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम-महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकार: समाप्त:।

[सम्पादन]
अथ भव्यमार्गणा अधिकार

अब भव्यमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणा के अनुसार भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।४२।।

भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीव सर्वकाल तक रहते हैं।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संसारी जीव दो प्रकार के होते हैं-भव्य और अभव्य। मुक्त जीव न भव्य हैं न अभव्य हैं। इन भव्य-अभव्य दोनों प्रकार के जीवों का अस्तित्व सर्वकाल पाया जाता है।

इस प्रकार से भव्य-अभव्य जीवों का काल कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

सम्यक्त्वमार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-

सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी मिच्छाइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।४४।।
सव्वद्धा।।४५।।
उवसमसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।४६।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।४७।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।४८।।
सासणसम्माइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।४९।।
जहण्णेण एगसमयं।।५०।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।५१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-केचिद् दृष्टमार्गा: सम्यग्मिथ्यात्वं उपशमसम्यक्त्वं वा प्रतिपद्य सर्वजघन्येन कालेन तत्र स्थित्वा गुणस्थानान्तरं गतास्तयो: सुष्ठु जघन्यान्तर्मुहूर्तकाल उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-एतस्मिन् काले आनीयमाने अर्पितगुणस्थानकालमात्रे एकप्रवेशनकालशलाकां कृत्वा एतादृशासु पल्योपमस्यासंख्यातभागमात्रशलाकासूत्पन्नासु ततो नियमादन्तरं भवति। अत्र सर्वकालशलाकाभि-र्गुणस्थानकालस्य गुणिते उत्कृष्टकालो भवति।
उपशमसम्यक्त्वकाले एकसमयावशेषे सासादनं गत्वा एकसमयं स्थित्वा द्वितीयसमये मिथ्यात्वं गतस्य एकसमयदर्शनात् सासादनानां। उत्कर्षेण-सम्यग्मिथ्यात्वकालसमासविधानेन एतस्य कालस्य समुत्पत्ते:।
एवं सम्यक्त्वमार्गणाकालकथनत्वेन अष्टौ सूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्बादशोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अब सम्यक्त्वमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु आठ सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणा के अनुसार सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।४४।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।४५।।

उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।४६।।

उपमशसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक रहते हैं।।४७।।

उक्त जीव उत्कृष्ट से पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहते हैं।।४८।।

सासादनसम्यग्दृष्टि जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।४९।।

सासादनसम्यग्दृष्टि जीव जघन्य से एक समय तक रहते हैं।।५०।।

सासादनसम्यग्दृष्टि जीव उत्कृष्ट से पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहते हैं।।५१।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'कोई दृष्टमार्गी जीव सम्यग्मिथ्यात्व अथवा उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त कर तथा सर्व जघन्य काल तक इन गुणस्थानों में रहकर अन्य गुणस्थान को प्राप्त हुआ। वहाँ उनके अतिशय जघन्य अन्तर्मुहूर्तमात्र काल पाया जाता है। उत्कृष्ट से-इस काल के लाते समय विवक्षित गुणस्थानों के कालप्रमाण एक प्रवेशनकाल की शलाका को करके पुन: ऐसी पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण शलाकाओं के उत्पन्न होने पर तत्पश्चात् नियम से अन्तर होता है। यहाँ सब काल शलाकाओं से गुणस्थान काल को गुणित करने पर उत्कृष्ट काल होता है।

उपशमसम्यक्त्व के काल में एक समय शेष रहने पर सासादनगुणस्थान को प्राप्त होकर और एक समय रहकर द्वितीय समय में मिथ्यात्व को प्राप्त होने पर एक समय जघन्य काल देखा जाता है। उत्कृष्ट से-सम्यग्मिथ्यात्व काल के संकलन का जो विधान कहा जा चुका है, उसके अनुसार इस काल की उत्पत्ति होती है।

इस प्रकार से सम्यक्त्वमार्गणा में काल का कथन करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में सम्यक्त्वमार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

[सम्पादन]
अथ संज्ञिमार्गणाधिकार:

संज्ञिमार्गणायां जीवानां कालकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

सण्णियाणुवादेण सण्णी असण्णी केवचिरं कालादो होंति ?।।५२।।
सव्वद्धा।।५३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यक्षु संज्ञि-असंज्ञिभेदा: सन्ति, शेषासु तिसृषु गतिषु सर्वे संज्ञिन एव। इमे जीवा: सर्वकालं सन्ति।
एवं संज्ञि-असंज्ञिजीवानां कालनिरूपणत्वेन द्वे सूत्रे गते।

इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम- महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संज्ञिमार्गणानाम त्रयोदशोऽधिकार: समाप्त:।

[सम्पादन]
अथ संज्ञीमार्गणा अधिकार

अब संज्ञीमार्गणा में जीवों का काल कथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संज्ञीमार्गणा के अनुसार संज्ञी और असंज्ञी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।५२।।

संज्ञी और असंज्ञी जीव सर्वकाल तक रहते हैं ।।५३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचों में संज्ञी और असंज्ञी दो भेद हैं, शेष तीन गतियों में सभी संज्ञी ही होते हैं। ये सभी जीव सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस प्रकार से संज्ञी और असंज्ञी जीवों का काल निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संज्ञीमार्गणा नाम का तेरहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

[सम्पादन]
अथ आहारमार्गणाधिकार:

आहारमार्गणायां कालनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

आहारा अणाहारा केवचिरं कालादो होंति ?।।५४।।
सव्वद्धा।।५५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारका: अनाहारका: अपि सर्वकालमस्तित्वं लभन्ते।
तात्पर्यमेतत्-ये केचित् कवलाहारभोजिनो मनुष्यास्त एव मोक्षप्राप्तये सक्षमा: अत आहारस्य एषणासमिते: गुणदोषान् ज्ञात्वा पिंडशुद्धि: पालयितव्या वर्तमानकाले साधुभि: साध्वीभिश्च तत एव मोक्षप्राप्ति: सुलभा भविष्यति इति ज्ञात्वा महासाधवो दिगम्बरमुद्राधारिण: आर्यिका मातरश्च वंद्या भवन्ति।
उक्तं च- गिरिकंदरदुर्गेषु ये वसन्ति दिगम्बरा:।
पाणिपात्रपुटाहारास्ते यान्ति परमां गतिम्।।
एवं आहारमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-
ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम चतुर्दशोऽधिकार: समाप्त:।
वर्तमानकाले विंशतितमे शताब्दौ येनागमानुसारो मोक्षमार्गो दर्शित: स्वयं देवेन्द्रकीर्तिदिगम्बरगुरो: प्रसादात् जैनेश्वरीं दीक्षां गृहीत्वाचारग्रन्थान् पठित्वा मुनिचर्या निर्दोषतया प्रकटीकृता, तस्मै गुरूणां गुरवे चारित्रचक्रवर्तिने श्रीशांतिसागराय त्रिसंध्यं अस्माकं नमोऽस्तु कोटिवारानिति।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य श्रीमद्भूतबल्याचार्यविरचिते क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागर: तस्य शिष्य: प्रथमपट्टाधीश: चारित्रचूडामणि: श्रीवीरसागस्तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणि-टीकायां पंचपञ्चाशत्सूत्रै: नानाजीवापेक्षया कालानुगमो नामाष्टमो महाधिकार: समाप्त:।

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अथ आहारमार्गणा अधिकार

अब आहारमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारक व अनाहारक जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।५४।।

आहारक व अनाहारक जीव सर्वकाल तक रहते हैं।।५५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-आहारक और अनाहारक दोनों प्रकार के जीवों का अस्तित्व सर्वकाल पाया जाता है।

तात्पर्य यह है कि-जो कवलाहार ग्रहण करने वाले मनुष्य हैं, वे ही मोक्ष प्राप्त करने में सक्षम हैं, अत: आहार की एषणासमिति के गुण-दोषों को जानकर वर्तमानकाल के साधु-साध्वियों को पिण्डशुद्धि का पालन करना चाहिए। इस पिण्डशुद्धि से ही मोक्ष की प्राप्ति सुलभ होगी, ऐसा जानकर दिगम्बर मुद्राधारी महासाधु और आर्यिका माताएँ वंदनीय होती हैं, ऐसी श्रद्धा रखनी चाहिए।

कहा भी है-

श्लोकार्थ-पर्वत की कंदराओं में, दुर्गों में जो दिगम्बर मुनिराज निवास करते हैं। करपात्र में जो आहार ग्रहण करते हैं, वे मुनिगण परम गति-सिद्धगति को प्राप्त करते हैं।।

इस तरह से आहारमार्गणा में काल का निरूपण करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।