ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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2. चतुर्गति प्रवेश निर्गमन का कथन

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चतुर्गति प्रवेश निर्गमन का कथन

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अथ चतुर्गतिप्रवेशनिर्गमनकथनं

अथ गत्यागतिनामनवमीचूलिकायां चतुर्भि: स्थलै: द्वात्रिंशत्सूत्रै: चतुर्गतिषु प्रवेशनिर्गमप्रतिपादक: द्वितीयोऽन्तराधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले नरकगतौ गुणस्थानापेक्षया प्रवेशनिर्गमनसूचकत्वेन ‘‘णेरइया मिच्छत्तेण’’ इत्यादिना नवसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ प्रवेशनिर्गमननिरूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खा केइं’’ इत्यादिना अष्टौ सूत्राणि। तत: परं तृतीयस्थले तिरश्चीनां भवनत्रिकदेवदेवीत्यादीनां प्रवेशनिर्गमनसूचकत्वेन ‘‘पंिंचदियतिरिक्खजोणिणीओ’’ इत्यादिना पंचसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले मनुष्यदेवगतिषु गुणस्थानापेक्षया प्रवेशनिर्गमनप्रतिपादनपरत्वेन ‘‘मणुसा मणुसपज्जत्ता सोधम्मीसाण’’-इत्यादिदशसूत्राणि इति समुदायपातनिका।
संप्रति नारका: केन गुणस्थानेन नरकगतिं संप्राप्य केन च निर्यान्ति इति प्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-णेरइया मिच्छत्तेण अधिगदा केइं मिच्छत्तेण णींति।।४४।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।४५।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।४६।।
सम्मत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण चेव णींति।।४७।।
एवं पढमाए पुढवीए णेरइया।।४८।।
विदियाए जाव छट्ठीए पुढवीए णेरइया मिच्छत्तेण अधिगदा केइं मिच्छत्तेण णींति।।४९।।
मिच्छत्तेण अधिगदा केइं सासणसम्मत्तेण णींति।।५०।।
मिच्छत्तेण अधिगदा केइं सम्मत्तेण णींति।।५१।।
सत्तमाए पुढवीए णेरइया मिच्छत्तेण चेव णींति।।५२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अधिगदा-अधिगता: प्रविष्टा: गता: इति एकार्थवाचिन: सन्ति। णींति-निर्यान्ति नि:सरन्ति निर्गच्छंति निष्फिडंति इति पर्यायवाचिन:। केइं-केचिदित्यर्थ:। मिथ्यात्वेन सह नरकगतिं प्रविश्य पुन: तत्र मिथ्यात्वेन वा सम्यक्त्वेन वा स्थित्वा अवसाने मिथ्यात्वेन सह केचित् निर्गच्छन्ति। केचित् मिथ्यात्वेन नरकगतिं प्रविश्य स्वकस्थितिं अनुपाल्य पुनोऽवसाने प्रथमोपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य सासादनगुणस्थानं गत्वा नि:सरन्ति। केचित् मिथ्यात्वसहितां नरकगतिं गत्वा तत्र सम्यक्त्वं प्रतिपद्य सम्यक्त्वेनैव निर्गच्छन्ति।
केचित् सम्यक्त्वेन सह गत्वा सम्यक्त्वेनैव नि:सरन्ति, किंच-तत्रोत्पन्नक्षायिकसम्यग्दृष्टीनां कृतकरणीयवेदकसम्यग्दृष्टीनां वा गुणान्तरसंक्रमणाभावात्। सासादन सम्यग्दृष्टीनां च नरकगतौ प्रवेशो नास्ति, अत्र प्रवेशाप्रतिपादनस्य अन्यथानुपपत्ते:। एवं प्रथमपृथिवीगतनारकाणां व्यवस्था अस्ति।
द्वितीयपृथिव्यादिषष्ठपृथिवीपर्यंतं मिथ्यात्वेन प्रविश्य मिथ्यात्वेन निर्यान्ति, सासादनेन वा सम्यक्त्वेन वा निर्यान्ति। मिथ्यात्वेन नरकगतिं गतानां तत्र सम्यक्त्वं प्रतिपद्य तेन सम्यक्त्वेन सह निर्गमने द्वितीयादिपंचसु पृथिवीषु विरोधाभावात्।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि-सासादनयो: सम्यग्दृष्टीनामिव द्वितीयादिपंचपृथिवीषु प्रवेशो नास्ति, तयोरत्र अधिगमाप्रतिपादनात्।
सम्यक्त्वं सासादनं सम्यग्मिथ्यात्वं वा कतितमं गुणस्थानं गतानां अपि सप्तमपृथिवीगतनारकाणां नियमेन मरणकाले मिथ्यात्वोत्पन्नं भवति। अतस्ते मिथ्यात्वेनैव निर्गच्छन्ति। तत्र तेषां मरणकाले मिथ्यात्वविरहितान्य-गुणस्थानानां अत्यन्ताभावोऽस्ति।
एवं प्रथमस्थले नरकगतौ मिथ्यात्वादिगुणस्थानेन सह गमनागमनव्यवस्थाप्रतिपादकत्वेन सूत्रनवकं गतम्।
संप्रति तिरश्चां मिथ्यात्वादिगुणस्थानै: गमनागमनप्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-तिरिक्खा केइं मिच्छत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।५३।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।५४।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।५५।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।५६।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।५७।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।५८।।
सम्मत्तेण अधिगदा णियमा सम्मत्तेण चेव णींति।।५९।।
(एवं) पंचिंदियतिरिक्खा पंचिदियतिरिक्खपज्जत्ता।।६०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। ये केचित् तिर्यग्गतिं सम्यक्त्वेन प्रविशन्ति, ते मनुष्या: क्षायिकसम्यग्दृष्टय: कृतकरणीयवेदकसम्यग्दृष्टयो वा, तत्र तिर्यग्गतिगतानां गुणस्थानान्तर-संक्रमणाभावात्। मनुष्यगतिं मुक्त्वान्यत्र क्षायिकसम्यक्त्वस्य कृतकृत्यवेदकसम्यक्त्वस्य वा उत्पत्तरेभावात्। केचित् बद्धायुष्का: मनुष्या: क्षायिकसम्यक्त्वमुत्पाद्य यदि कदाचित् तिर्यग्गतौ भोगभूमिषु एव गच्छन्ति ते तत्रत्यात् सम्यक्त्वसहिता: एव निर्गच्छन्ति।
एवं द्वितीयस्थले तिरश्चां प्रवेशनिर्गमनप्रतिपादकत्वेन सूत्राष्टकं गतम्।


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चतुर्गति प्रवेश-निर्गमन का कथन

अब गत्यागती नामक नवमी चूलिका में चार स्थलों द्वारा बत्तीस सूत्रों से चारों गतियों में प्रवेश और निर्गमन का प्रतिपादन करने वाला दूसरा अन्तराधिकार प्रारंभ होता है। उसमें प्रथम स्थल में नरकगति में गुणस्थान की अपेक्षा से प्रवेश-निर्गमन को सूचित करने वाले ‘णेरइया मिच्छत्तेण’ इत्यादि नव सूत्र हैं। इसके बाद दूसरे स्थल में तिर्यंचगति में प्रवेश-निर्गमन को सूचित करते हुए ‘तिरिक्खा केइं’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। पुन: तृतीय स्थल में तिर्यंचिनी और भवनत्रिक देव-देवियों में प्रवेश-निर्गमन को कहने वाले ‘पंचिंदिय तिरिक्खजोणिणीओ’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। अनंतर चतुर्थ स्थल में मनुष्य और देवगति में गुणस्थान की अपेक्षा प्रवेश और निर्गमन को प्रतिपादित करने वाले ‘मणुसा मणुसपज्जत्ता सोधम्मीसाण-’ इत्यादि दस सूत्र कहेंगे, इस प्रकार यहाँ यह समुदायपातनिका हुई।

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अब नारकी किन गुणस्थान से नरकगति को प्राप्त करके किन गुणस्थानों से निकलते हैं ? इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकी जीव मिथ्यात्व सहित नरक में जाते हैं और उनमें से कितने मिथ्यात्व सहित ही नरक से निकलते हैं।।४४।।

कितने ही नारकी जीव मिथ्यात्व सहित नरक में जाकर सासादनसम्यक्त्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।४५।।

कितने ही नारकी जीव मिथ्यात्व सहित नरक में जाकर सम्यक्त्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।४६।।

सम्यक्त्व सहित नरक में जाने वाले जीव सम्यक्त्व सहित ही वहाँ से निकलते हैं।।४७।।

इस प्रकार प्रथम पृथिवी में नारकी जीव प्रवेश करते और वहाँ से निकलते हैं।।४८।।

दूसरी पृथिवी से लगाकर छठवीं पृथिवी तक के नारकी जीव मिथ्यात्व सहित जाकर कितने ही मिथ्यात्व सहित ही निकलते हैं।।४९।।

मिथ्यात्व सहित द्वितीयादि नरक में जाकर कितने ही नारकी जीव सासादन सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५०।।

मिथ्यात्व सहित द्वितीयादि नरक में जाकर कितने ही नारकी जीव सम्यक्त्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।५१।।

सातवीं पृथिवी से नारकी जीव मिथ्यात्व सहित ही निकलते हैं।।५२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अधिगद-अधिगत, प्रविष्ट और गत, ये शब्द एकार्थक ही हैं। णींति अर्थात् निस्सरण करते हैं, निर्गमन करते हैं, निकलते हैं, इन सबका एक ही अर्थ है। ‘केइं’ का अर्थ है केचित् अर्थात् कितने ही। मिथ्यात्व के साथ नरकगति में प्रवेश करके पुन: वहाँ मिथ्यात्व सहित अथवा सम्यक्त्व सहित रहकर अन्त में मिथ्यात्व सहित कितने ही जीव वहाँ से निकलते हैं, इस प्रकार का अर्थ यहाँ कहा गया है।

मिथ्यात्व के सहित नरकगति में प्रवेश करके और वहाँ अपनी स्थिति पूरी करके पुन: अन्त में प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त कर तथा सासादन गुणस्थान में जाकर नरक से निकलने वाले जीव पाये जाते हैं।

मिथ्यात्वसहित नरकगति में जाकर और वहाँ सम्यक्त्व प्राप्त करके उसी सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलने वाले जीव पाये जाते हैं।

कोई सम्यक्त्व के साथ नरक में जाकर सम्यक्त्व के साथ ही वहाँ से निकलते हैं, क्योंकि नरक में उत्पन्न हुए क्षायिक सम्यग्दृष्टियों के अथवा कृतकृत्य वेदकसम्यग्दृष्टियों के अन्य गुणस्थान में संक्रमण नहीं होता और सासादनसम्यग्दृष्टियों का नरकगति में प्रवेश ही नहीं है, क्योंकि यहाँ प्रवेश के प्रतिपादन न करने की अन्यथा उपपत्ति नहीं बनती।

इस प्रकार प्रथम पृथ्वी के नारकियों की व्यवस्था है। द्वितीय आदि से छठे नरक पर्यंत जीव मिथ्यात्व के साथ प्रवेश करके मिथ्यात्व के साथ ही निकलते हैं, अथवा सासादन सम्यक्त्व के साथ भी निकलते हैं।

क्योंकि मिथ्यात्व के साथ द्वितीयादि पाँच पृथिवियों में जाकर अन्त में प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त कर और फिर आसादन अर्थात् सासादन गुणस्थान में जाकर नरक से निकलने में कोई विरोध नहीं आता। मिथ्यात्व के साथ नरकगति में जाने वाले जीवों का वहाँ सम्यक्त्व प्राप्त करके उसी सम्यक्त्व सहित निकलने में द्वितीयादि पाँच पृथिवियों में कोई विरोध नहीं आता। सम्यग्मिथ्यादृष्टि और सासादनगुणस्थानवर्ती जीवों का सम्यग्दृष्टि जीवों के समान द्वितीयादि पाँच पृथिवियों में प्रवेश नहीं होता, क्योंकि यहाँ उनके प्रवेश का प्रतिपादन नहीं किया गया है।

सातवीं पृथिवी के नारकी सम्यग्दर्शन, सासादन या सम्यग्मिथ्यात्व इन तीनों में किसी भी गुणस्थान को प्राप्त हुए भी नियम से मरण के समय मिथ्यात्व को प्राप्त हो जाते हैं, इसलिए वे मिथ्यात्व से ही सातवें नरक से निकलते हैं क्योंकि वहाँ उनके मरणकाल में मिथ्यात्व से रहित अन्य गुणस्थान का अत्यन्त अभाव है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नरकगति में मिथ्यात्व आदि गुणस्थान के साथ गमनागमन का प्रतिपादन करते हुए नव सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तिर्यंचों में मिथ्यात्व आदि गुणस्थानों से गमनागमन का प्रतिपादन करने के लिए आठ सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच जीव कितने ही मिथ्यात्व सहित तिर्यंचगति में जाकर मिथ्यात्व सहित ही उस गति से निकलते हैं।।५३।।

कितने ही जीव मिथ्यात्व सहित तिर्यंचगति में जाकर सासादनसम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५४।।

कितने ही जीव मिथ्यात्व सहित तिर्यंचगति में जाकर सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५५।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित तिर्यंचगति में जाकर मिथ्यात्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५६।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित तिर्यंचगति में जाकर सासादनसम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५७।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित तिर्यंचगति में जाकर सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।५८।।

सम्यक्त्व सहित तिर्यंचगति में जाकर नियम से सम्यक्त्व के साथ ही वहाँ से निकलते हैं।।५९।।

इस प्रकार पंचेन्द्रिय तिर्यंच और पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त जीव तिर्यंचगति में प्रवेश और निष्क्रमण करते हैं।।६०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। जो कोई तिर्यंचगति में सम्यक्त्व के साथ प्रवेश करते हैं, वे मनुष्य क्षायिकसम्यग्दृष्टि अथवा कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टी ही प्रवेश करते हैं पुन: वहाँ तिर्यंचगति को प्राप्त करने पर गुणस्थान का संक्रमण नहीं होता है। मनुष्यगति को छोड़कर अन्यत्र-अन्य गतियों में क्षायिक सम्यक्त्व या कृतकृत्यवेदक सम्यक्त्व की उत्पत्ति का अभाव है।

जिन्होंने पहले तिर्यंच आयु बांध ली है, ऐसे कोई बद्धायुष्क मनुष्य यदि कदाचित् क्षायिक सम्यक्त्व को उत्पन्न करके तिर्यंचगति में जाते हैं, तो भोगभूमि में ही जाते हैं पुन: वे वहाँ से सम्यक्त्व सहित ही निकलते हैं।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचों के प्रवेश-निर्गमन के प्रतिपादक आठ सूत्र पूर्ण हुए।


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अधुना योनिमतीतिरश्च्यादीनां गमनागमनप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-

पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीयो मणुसिणीयो भवणवासिय-वाणविंतर-जोदिसियदेवा देवीओ सोधम्मीसाणकप्पवासियदेवीओ च मिच्छत्तेण अधिगदा केइं मिच्छत्तेण णींति।।६१।।

केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।६२।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।६३।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।६४।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।६४।। (अ)
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।६५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमत्य: मानुष्य: भवनत्रिकदेवा: देव्यश्च सौधर्मैशानकल्पवासि-देव्यश्च इमा: स्त्रीवेदिन्य: भवनत्रिकदेवाश्च स्वस्वयोनौ मिथ्यात्वेन प्रविशन्ति, काश्चित् केचिच्च मिथ्यात्वेन एव तत्रत्यात् नि:सरन्ति। शेषसूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। अत्र सर्वत्र सम्यग्मिथ्यात्वेन सह प्रवेशो निर्गमो वा नास्ति, तस्य सम्यग्मिथ्यादृष्टे: मरणोत्पत्त्योरसंभवात्।
पूर्वोक्तकथितपर्यायेषु सम्यक्त्वेन प्रवेशो नास्तीति ज्ञातव्यं, सम्यक्त्वावस्थायां आसां गतीनां प्राप्तेरत्यन्ताभावात्।
एवं तृतीयस्थले योनिमतीतिरश्चीमानुषीसर्वदेवी-भवनत्रिकदेवानां गमननिर्गमनकथनत्वेन गुणस्थानापेक्षया सूत्रपंचकं गतम्।
धुना मनुष्यानां सौधर्मादिनवग्रैवेयकवासिदेवानां च गुणस्थानापेक्षया गमननिर्गमनप्रतिपादनाय सूत्रनवकमवतार्यते-मणुसा मणुसपज्जत्ता सोधम्मीसाणप्पहुडि जाव णवगेवज्जविमाण-वासियदेवेसु केइं मिच्छत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।६६।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।६७।।
केइं मिच्छत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।६८।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।६९।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।७०।।
केइं सासणसम्मत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।७१।।
केइं सम्मत्तेण अधिगदा मिच्छत्तेण णींति।।७२।।
केइं सम्मत्तेण अधिगदा सासणसम्मत्तेण णींति।।७३।।
केइं सम्मत्तेण अधिगदा सम्मत्तेण णींति।।७४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते।
कश्चिदाशंकते-संख्यातवर्षायुष्केषु मनुष्येषु पर्याप्तमनुष्येषु वा सासादनसम्यक्त्वेन सह प्रविष्टानां देवनारकाणां सासादनसम्यक्त्वेन सह निर्गम: कथं भवति ?
आचार्य: प्राह-देवानां नारकाणां वा सम्यग्दृष्टीनां मनुष्येषु उत्पद्य उपशमश्रेणिमारुह्य पुनोऽध: अवतीर्य सासादनं गत्वा मृतानां सासादनगुणस्थानेन निर्गमो भवति।
एवं सासादनसम्यक्त्वगुणस्थानेन मनुष्येषु प्रविश्य सासादनगुणस्थानेन निर्गमो वक्तव्य:। इदं कषायप्राभृतसूत्राभिप्रायेण भणितं।
जीवस्थान-षट्खण्डागमसूत्राभिप्रायेण पुन: संख्यातवर्षायुष्केषु न संभवति, उपशमश्रेण्या: अवतीर्यमाणस्य सासादनगुणस्थाने गमनाभावात्। अत्र पुन: संख्यातासंख्यातवर्षायुष्कान् मुक्त्वा येन भणितं तेनेदं घटते।
उक्तं च- उवसमसेढीदो पुण ओदिण्णो सासणं ण पाउणदि।
भूदबलिणाहणिम्मलसुत्तस्स फुडोवदेसेण।।
अनुदिशादिदेवानां गुणस्थानापेक्षया गमननिर्गमनप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-अणुदिस जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु सम्मत्तेण अधिगदा णियमा सम्मत्तेण चेव णींति।।७५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नवानुदिशविमानवासिदेवा: पंचानुत्तरविमानवासिदेवा: च सम्यक्त्वेन नियमात् सम्यग्दृष्टय: एव। ये केचित् भावलिंगिनो महामुनयस्त एव सम्यक्त्वेन सह एषु विमानेषु उत्पद्यन्ते, अहमिन्द्रा: भवन्ति ते सर्वेऽपि सम्यक्त्वसहिता: एव ततश्च्युत्वा नियमेन मोक्षमवाप्नुवन्ति, तस्मिन् भवेऽन्यस्मिन् भवे वा। सर्वार्थसिद्धिवासिन: एकभवावतारिण एव ‘‘विजयादिषु द्विचरमा:’’।। इति सूत्रात् विजयवैजयन्त-जयन्तापराजितविमानवासिनो द्विचरमा:। नियमेन मनुष्यस्य द्वौ भवौ गृहीत्वा निर्वान्ति।
पंचेन्द्रियतिर्यग्लब्ध्यपर्याप्तानां मनुष्यलब्ध्यपर्याप्तानां च प्रवेशनिर्गमौ कथं नात्रोक्तौ ?
न, मिथ्यादृष्टिजीवान् मुक्त्वा अन्येषां तत्र निर्गम-प्रवेशाभावात्।
अत: तेषामपि उक्तमन्तरेण अवगमात्।
एवं चतुर्थस्थले मनुष्यदेवानां गमननिर्गमननिरूपणत्वेन गुणस्थानापेक्षया दश सूत्राणि गतानि।
इति चतुर्गतिषु प्रवेशनिर्गमनप्ररूपको द्वितीयोऽन्तराधिकार:।


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अब तिर्यंचिनी आदि के गमन-आगमन का प्रतिपादन करने के लिए छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

पंचेन्द्रिय तिर्यंचयोनिनी, मनुष्यिनी, भवनवासी, वानव्यन्तर और ज्योतिषी देव तथा देवियाँ एवं सौधर्म-ईशानकल्पवासिनी देवियाँ मिथ्यात्व सहित इन गतियों में प्रवेश करके कितने ही मिथ्यात्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।६१।।

कितने ही मिथ्यात्व सहित प्रवेश करके सासादन सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।६२।।

कितने ही मिथ्यात्व सहित प्रवेश करके सम्यक्त्व के साथ उस गति से निकलते हैं।।६३।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व के साथ पूर्वोक्त गतियों में प्रवेश करके मिथ्यात्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।६४।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व के साथ पूर्वोक्त गतियों में प्रवेश करके सासादनसम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।६४ (अ)।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व के साथ पूर्वोक्त गतियों में प्रवेश करके सम्यक्त्व सहित वहाँ से निकलते हैं।।६५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती-तिर्यंचिनी, मनुष्यिनी, भवनत्रिक देव और देवियाँ तथा सौधर्म-ईशान कल्पवासिनी देवियाँ, ये स्त्रीवेदी तथा भवनत्रिक देव ये अपनी-अपनी योनि में मिथ्यात्व से ही प्रवेश करते हैं पुन: कोई-कोई देवियाँ और कोई-कोई देव मिथ्यात्व से ही वहाँ से निकलते हैं। शेष सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है।

यहाँ सर्वत्र सम्यग्मिथ्यात्व के साथ प्रवेश अथवा निर्गमन नहीं है, क्योंकि सम्यग्मिथ्यादृष्टी तृतीयगुणस्थानवर्ती जीव के मरण और उत्पत्ति असंभव है। पूर्वोक्त कथित पर्यायों में सम्यक्त्व के साथ प्रवेश नहीं है ऐसा जानना चाहिए, क्योंकि सम्यक्त्व की अवस्था में-सम्यक्त्व उत्पन्न होने के बाद इन उपर्युक्त योनिमती तिर्यंचिनी आदि गतियों की प्राप्ति का अत्यन्ताभाव है-इन गतियों में सम्यग्दृष्टी का जाना असंभव है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में योनिमती तिरश्ची-मानुषी और सर्वदेवी तथा भवनत्रिक देवों में गमन-आगमन का कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए। यहाँ ६४ नम्बर के दो सूत्र होने से पाँच सूत्र ही माने गये हैं।

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अब मनुष्यों और सौधर्म से लेकर नवग्रैवेयकवासी देवों में गुणस्थानापेक्षा से गमन-निर्गमन का प्रतिपादन करने के लिए नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मनुष्य, मनुष्य पर्र्याप्त तथा सौधर्म-ईशान से लगाकर नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों में कितने ही जीव मिथ्यात्व सहित जाकर मिथ्यात्व के साथ ही वहाँ से निकलते हैं।।६६।।

कितने ही जीव मिथ्यात्व सहित पूर्वोक्त गतियों में जाकर सासादनसम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।६७।।

कितने ही जीव मिथ्यात्व सहित पूर्वोक्त गतियों में जाकर सम्यक्त्व के साथ वहाँ से निकलते हैं।।६८।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित जाकर मिथ्यात्व सहित निकलते हैं।।६९।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित जाकर सासादनसम्यक्त्व के साथ ही निकलते हैं।।७०।।

कितने ही जीव सासादनसम्यक्त्व सहित जाकर सम्यक्त्व सहित निकलते हैं।।७१।।

कितने ही जीव सम्यक्त्व सहित जाकर मिथ्यात्व के साथ निकलते हैं।।७२।।

कितने ही जीव सम्यक्त्व सहित जाकर सासादनसम्यक्त्व के साथ निकलते हैं।।७३।।

कितने ही मनुष्य और मनुष्यपर्याप्तक एवं उक्त सौधर्मादिक स्वर्गों के जीव सम्यक्त्व सहित जाकर सम्यक्त्व के साथ ही वहाँ से निकलते हैं।।७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है।

शंका-संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्य व मनुष्य पर्याप्तकों में सासादन सम्यक्त्व सहित प्रवेश करने वाले देव और नारकी जीवों का वहाँ से सासादनसम्यक्त्व के साथ किस प्रकार निर्गमन होता है ?

समाधान-आचार्यदेव द्वारा इस शंका का समाधान किया जाता है। वह इस प्रकार है-देव और नारकी सम्यग्दृष्टि जीवों का मनुष्यों में उत्पन्न होकर, उपशमश्रेणी का आरोहण करके और फिर नीचे उतरकर सासादन गुणस्थान में जाकर मरने पर सासादन गुणस्थान सहित निर्गमन होता है।

इसी प्रकार सासादन गुणस्थान सहित मनुष्यों में प्रवेश कर सासादन गुणस्थान के साथ ही निर्गमन भी कहना चाहिए। अन्यथा पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण काल के बिना सासादन गुणस्थान की उपपत्ति बन नहीं सकती। यह बात कषायप्राभृत सूत्र के अभिप्रायानुसार कही गई है। परन्तु जीवस्थान षट्खण्डागम सूत्र के अभिप्राय से संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में सासादन गुणस्थान सहित निर्गमन संभव नहीं होता, क्योंकि उपशमश्रेणी से उतरे हुए मनुष्य का सासादन गुणस्थान में गमन नहीं माना गया। किन्तु यहाँ पर अर्थात् सूत्र में चूँकि संख्यात व असंख्यात वर्ष की आयु का उल्लेख न करके यह सूत्र रचा है इससे वह कथन घटित हो जाता है।

लब्धिसार ग्रंथ में कहा भी है- उपशम श्रेणी से उतरकर सासादन गुणस्थान को नहीं प्राप्त करते हैं, ऐसा श्री भूतबलि आचार्यदेव के द्वारा कथित निर्मलसूत्र का स्पष्ट उपदेश है।।

विशेष-अन्तरप्ररूपणा के सूत्र ७ में बतलाया जा चुका है कि सासादन सम्यग्दृष्टि का जघन्य अन्तरकाल पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण होता है। इसका कारण धवलाकार ने यह बतलाया है कि सासादन से मिथ्यात्व में आये हुए जीव के जब तक सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियों की उद्वेलनघात द्वारा सागरोपम या सागरोपमपृथक्त्वमात्र स्थिति नहीं रह जाती तब तक वह जीव पुन: उपशम सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर सकता, जहाँ से कि सासादन भाव की पुन: उत्पत्ति हो सके और उद्वेलनघात द्वारा उक्त क्रिया के होने में कम से कम पल्योपम के असंख्यातवें भागप्रमाण काल लगता ही है। अतएव यही कालप्रमाण सासादनसम्यक्त्व का जघन्य अन्तर होता है। प्रस्तुत प्रकरण में प्रश्न यह है कि जो जीव देव या नरकगति से मनुष्य भव में सासादन गुणस्थान सहित आया है वह सासादन गुणस्थान सहित ही मनुष्यगति से किस प्रकार निर्गमन कर सकता है। धवलाकार ने वह इस प्रकार बतलाया है कि देवगति से सासादन गुणस्थान सहित मनुष्यगति में आकर व पल्योपम के असंख्यातवें भाग का अन्तरकाल समाप्त कर उपशमसम्यक्त्वी हो सासादन गुणस्थान में आकर मरण करने वाले जीव के उक्त बात घटित हो जाती है। पर यह बनेगा केवल असंख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में, क्योंकि सासादन गुणस्थान के साथ आकर संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुए जीव के उक्त उद्वेलनघात के लिए आवश्यक पल्योपम का असंख्यातवाँ भाग काल प्राप्त ही नहीं हो सकेगा। यह व्यवस्था भूतबलि आचार्य के अभिप्रायानुसार है किन्तु कषायप्राभृत के चूर्णिसूत्रों के कर्ता यतिवृषभाचार्य के अभिप्रायानुसार सासादनसम्यक्त्व सहित मनुष्यगति में आया हुआ जीव मिथ्यादृष्टि होकर पुन: द्वितीयोपशमसम्यक्त्वी हो उपशमश्रेणी चढ़ पुन: सासादन होकर मर सकता है और इसलिए यह बात संख्यात वर्ष की आयु वाले मनुष्यों में भी घटित हो सकती है किन्तु उपशमश्रेणी से उतरकर सासादन गुणस्थान में जाना भूतबलि आचार्य नहीं मानते और इसलिए उनके अभिप्राय से सम्यक्त्व सहित आकर सासादन सहित व सासादन सहित आकर सासादन सहित मनुष्यगति से निर्गमन करना संख्यात वर्षायुष्कों में संभव नहीं। फिर भी यहाँ जो ८३वाँ सूत्र रचा है उसमें संख्यात और असंख्यात वर्ष की आयु वाले के इस विशेषता के बिना यहाँ सूत्र रचा है, इसलिए कोई बाधा नहीं आती।

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अब अनुदिश आदि देवों के गुणस्थान की अपेक्षा गमन-निर्गमन का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

अनुदिश विमानों से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों तक में सम्यक्त्व के साथ प्रवेश करने वाले जीव नियम से सम्यक्त्व सहित ही निकलते हैं।।७५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नव अनुदिश विमानवासी देव-अहमिन्द्र और पाँच अनुत्तर विमानवासी देव-अहमिन्द्र सम्यक्त्व के साथ नियम से सम्यग्दृष्टी ही हैं। जो कोई भावलिंगी महामुनी हैं वे ही सम्यक्त्व के साथ इन विमानों में उत्पन्न होते हैं, वे अहमिन्द्र कहलाते हैं। वे सभी सम्यक्त्व सहित ही वहाँ से च्युत होकर नियम से मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं, कोई उसी भव से मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं और कोई अन्य भव से-दूसरे भव से मोक्ष प्राप्त करते हैं।

सर्वार्थसिद्धि विमान में जन्म लेने वाले अहमिन्द्र नियम से एक भवावतारी होते हैं तथा ‘विजयादिषु द्विचरमा:’ इस तत्त्वार्थसूत्र के सूत्र के अनुसार विजय, वैजयंत, जयंत और अपराजित विमानों में उत्पन्न होने वाले अहमिन्द्र नियम से मनुष्य के दो भवों को लेकर निर्वाण प्राप्त करते हैं।

शंका-लब्ध्यपर्याप्तक पंचेन्द्रिय तिर्यंच और लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का प्रवेश और निर्गमन यहाँ क्यों नहीं कहा ?

समाधान-नहीं कहा, क्योंकि इन लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यंचों और मनुष्यों में मिथ्यादृष्टि जीवों को छोड़कर अन्य किन्हीं का वहाँ निर्गमन और प्रवेश ही नहीं है इसलिए उन जीवों का भी यहाँ बिना कहे भी ज्ञान हो जाता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में मनुष्य और देवों के गमन-निर्गमन का निरूपण गुणस्थान की अपेक्षा से करते हुए दश सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथ में यह चारों गतियों में प्रवेश और निर्गमन को कहने वाला दूसरा अन्तराधिकार पूर्ण हुआ।