ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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20.स्याद्वाद-चन्द्रिका में सिद्धान्त

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स्याद्वाद-चन्द्रिका में सिद्धान्त

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सप्ततत्व, नव पदार्थ :-

स्याद्वाद चन्द्रिका में चतुरनुयोगी जैन सिद्धान्त मान्य सात तत्वों जीव, अजीव , आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष एवं पुण्य पाप को सम्मिलित कर नव पदार्थों का सम्यक् विवेचन किया गया है। नियमसार में उल्लिखित तत्त्वों की निरूपण “ौली प्रत्यक्ष, आगम, युक्ति, तर्क आदि के आधार को लेकर है। माता जी की प्रखर प्रज्ञा लेखनी के माध्यम से यहाँ प्रकाषित हुई है। अपने कथन के स्थान पर यहाँ विभिन्न उद्धरणों के द्धारा उक्त विशय का स्पश्टीकरण करना अभीश्ट होगा।

जैन सिद्धान्त के अनुसार सम्यग्दर्षन, ज्ञान, चारित्र तीनों के समुदाय रूप रत्नत्रय आत्मोपलब्धि रूप मोक्ष का कारण है। वह साध्य - साधन के भाव को लिए हुए अभेद रूप एंव भेद रूप (निष्चय - व्यवहार) है। इसका खुलासा करते हुए पू० माता जी ने गाथा संख्या 2 के अन्तर्गत सम्यक् उल्लिखित किया है,


तात्पर्यमिदम्-स्वात्मोपलब्धिस्वरूपो मोक्षः तत्प्राप्त्यर्थं नित्यनिरंजननिर्विकार- निजशुद्धात्मतत्वसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुश्ठानरूपाभेदरत्नयत्रयं तत्साधनभूतमश्टासम्य- ग्दर्षनमश्टविधसम्यग्ज्ञानं त्रयोदषविधसम्यक्चारित्रमिति समुदायरूपेण भेदरत्नत्रयं तदुभयमपि मार्ग इति ज्ञात्वा शक्त्यनुसारेण तदुपरि गन्तव्यं। कि×च मोक्ष एवउपादेयः साक्षादुपायभूतमभेदरत्नत्रयमुपादेयम् तत्साधनरूपेण भेदरत्नत्रयं अपि उपादेयमेव।

गाथा संख्या 3 की टीका में नियमसार नामकरण की सार्थकता-साधक बिन्दुओं पर प्रकाष डाला गया है कि इस ग्रन्थ के अध्ययन के अधिकारी मुख्य रूप से मुनि हैं। तथा गौणवृति से गृहस्थ भी हैं क्योंकि वे भी मुनिधर्म के अनुरागी हैं।

गाथा क्रमांक 4 की टीका के अन्तर्गत टीकाकत्र्री ने मोक्षमार्ग के अस्तित्व की चर्चा परम्परा आचार्यो के मन्तवय के अनुसार की है कि मोक्षमार्ग पचम गुणस्थान से प्रारम्भ होता है। ज्ञातव्य है कि निचले गुणस्थान में मोक्षमार्ग की श्रद्धा है। जीवादि पदार्थ विशयक श्रद्धान और ज्ञान तो साधु और श्रावक दोनों के समान होते हैं किन्तु चारित्र प्रकट होने पर ही रत्नत्रय होता है। अतः पंचम गुणस्थान वर्ती गृहस्थ के दान पूजा उपवास एवं साधु के पच महाव्रत समिति आदि की विद्यमानता के कारण मोक्षमार्ग होता है। माता जी के शब्द दृश्टव्य हैं।

”एतत्कथनात् शश्ठगुणस्थानादेव मोक्षमार्गो न चाधस्तात्। अथवा देष संयतानामपि विद्यते। यथा च प्रोक्तं श्री जयसेनाचार्येण पत्र्चास्तिकाय टीकायाम् .......................।

इसी गाथा की टीका में यह उल्लिखित किया गया है कि चतुर्थगुणस्थान में मोक्षमार्ग नहीं है। यदि कहीं हो भी तो वह कारण मेंे कार्य के उपचार से ही है। निम्न पंक्ति पर दृश्टिपात करें

असंयतसम्यग्दृश्टीनां मोक्षमार्ग नास्ति, अस्ति चेत् उपचारेणैव।

प्रस्तुत गाथा संख्या 4 का सारांष यह है कि अपनी आत्मा की रूचि रूप श्रद्धान उसी का ज्ञान और उसी में अवस्थान रूप निष्चय रत्नत्रय को उपादेय मानकर उसकी सिद्धि हेतु व्यवहार रत्नत्रय अर्थात तत्व श्रद्धान उन्हीं का ज्ञान एवं शक्त्यनुसार सकल या विकल चारित्र की भावना करनी चाहिये। तथा निर्धार करना चाहिये कि प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान तक व्यवहार मोक्षमार्ग है उससे उपर निष्चय मोक्षमार्ग है तथा निष्चय नय से साक्षात् मोक्ष प्राप्ति का कारण होने से अयेाग केवली गुणस्थान के अन्तिम समय का परिणाम ही मोक्षमार्ग है।

सात तत्वों के अन्तर्गत जीव, अजीव तत्वों के भेदों का उल्लेख नियमसार प्राभृत की गाथा सं० 9 के निरूपण में आ० कुन्दकुन्द स्वामी ने किया है। अजीव तत्व के पुद्गल, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, आकाष एवं काल द्रव्य एंव जीव को सम्मिलित कर छः द्रव्य निरूपित हैं। अनर्थक शब्दों का प्रयोग टीका की परिधि से बाहर ही है। सीमित शब्दों में द्रव्यानुयोग के निम्न निरूपण का हिन्दी अनुवाद दृश्टव्य है।

”जो ज्ञान, दर्षन, सुख, सत्ता आदि लक्षण भावप्राणों से तथा इन्द्रिय, बल, आयु और “वासोच्छ्वास द्रव्य प्राणों से जीते हैं जीते थे और जीवित रहेंगे वे जीव हैं। शुद्ध जीव मुक्त हैं वे भाव प्राणों से जीते हैं। (षुद्ध चैतन्य भाव प्राण से) अषुद्ध जीव संसारी है वे भी शुद्ध निष्चय से शुद्ध चैतन्य प्राणों से अषुद्ध निष्चय नय की अपेक्षा द्रव्यप्राणां से तीनों कालों में जीते हैं।

इसी गाथा के अन्तर्गत ‘ाडद्रव्यों के स्वभाव विभाव गुण पर्यायों का वर्णन करते हुए निरूपित किया है।

”न चैते स्वगुणपर्यायान् मुत्र्चन्ति न च परगुणपर्यायान् गृण्हन्ति।“

इसमें नयचक्र एवं आलाप पद्धति को आधार बनाकर प्ररूपण है। कहीं कहीं आ० अमृतचन्द्र की आध्यात्मिक शैली का अनुगमन भी है। केवलज्ञान स्वभावज्ञान और इन्द्रियज्ञान में अन्तर स्पश्ट करते हुए पू० आर्यिका श्री ने गाथा संख्या 11 की टीका में उल्लेख किया है,


तथा च एतत्स्वभावज्ञानं इन्द्रियरहितमतीन्द्रियमिन्द्रियानिन्द्रियव्यापारानपेक्षम्।
इन्द्रियज्ञानं तावदाकाषाद्यमूर्तपदार्थेशु देषान्तरितमेर्वादिशु कालान्तरितरामरावणादिशु स्वभावान्तरितभूतादिशु तथैवातिसूक्ष्मेशु परचेतोप्रवृत्तिपुद्गलपरमाण्वादिशु च न प्रवत्र्तते।

यह स्वभाव ज्ञान (केवलज्ञान) इन्द्रियों से रहित अतीन्द्रिय है क्योंकि यह इन्द्रिय व्यापार से रहित है। (किन्तु) यह इन्द्रियज्ञान आकाष आदि अमूर्त पदार्थो में, देष से जिसमें व्यवधान है ऐसे अतिदूरवर्ती मेरू पर्वत आदि में, काल से जिसमें अन्तराल पड़ चुका है ऐसे अतीत अनागत कालवर्ती रामरावणादि में स्वभाव से अन्तरित नहीं दिखने वाले ऐसे भूत-पिषाच आदि में औैर उसी प्रकार सूक्ष्म पर के मन की प्रवृत्ति, पुद्गल परमाणु आदि विशयों में प्रवृत्ति नहीं कर सकता है।

स्याद्वाद चन्द्रिका की रचयित्री ने चारों अनुयेागों की सार्थकता को इश्ट जानकर श्रोताओं को इसका महत्व उपदिश्ट किया है। यथा पृश्ठ 62 पर अंकन दृश्टव्य है,

”पुनः इस टीका में चारों अनुयोगों को पढ़कर किस अनुयेाग से क्या लाभ लेना चाहिए यह दिखाया है।“

प्रथमानुयोग से महापुरूशों का आदर्ष सामने रहने से यह जीव राम लक्ष्मण सीता के ही उदाहरण लेना चाहेगा न कि रावण का। करणानुयोग के अध्ययन से चारों गति का विस्तार, तीन लोक का विस्तार, नरक के दुःख आदि जानकर संसार से भय अवष्य करेगा। चरणानुयेाग के अध्ययन से चारित्र को ग्रहण करने की निरतिचार पालन करने की प्रेरणा मिलेगी। तब पुनः द्रव्यानुयोग का अध्ययन सार्थक होगा और आत्मा के स्वरूप का चिंतवन करते हुए उसमेंे तन्मयता लाने का प्रयत्न होगा। वह यदि आज इस भव में शक्य नहीं होगा तो भावना भवनाषिनी के अनुसार आज भावना ही करते रहने से अगले भव में सफलता अवष्य मिलेगी।“ 16-17।।

द्रव्यानुयोग के अनुसार अपने जीव द्रव्य की स्वभाव-विभाव पर्यायों को जानकर स्वभाव गुणपर्यायों को उपादेय बनाकर ही अध्यात्म की गहराइयों मे प्रवेष किया जा सकता है यही समस्त कथनों का सारांष है। इसे ही आत्माराधना कहते हैं। उसी स्थिति मे शुद्धात्म स्वरूप उपलब्ध हो सकता है। यही आषय गाथा क्रमांक 14 तात्पर्य में एतदुक्तं भवति “ाीर्शक से माता जी ने व्यक्त किया है।

वर्तमान मे कतिपय जन गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि आगम सिद्धान्त, अध्यात्म एवं नय विवक्षा को न समझकर अपने चित्त के दुश्ट अभिप्राय एवं निष्चय के एकान्त से पीड़ित होकर अपने को सर्वथा शुद्ध मानते हैं एवं मात्र पर्याय में अषुद्धि मानकर तथा पर्या्रय को द्रव्य से भिन्न मानकर स्वछन्द हो रहे हैं उनके लिए भी आर्यिका ज्ञानमती जी ने यथा योग्य मार्गदर्षन किया है।


”अथवा शक्तिरूपेण तेऽपि (संसारिजीवाः) स्वभावज्ञानयुताः सन्ति न च व्यक्तिरूपेण इति ज्ञात्वा ये संयताः निर्विकल्पसमाधिस्वसंवेदनज्ञाने समस्तविभावपरिणाम- त्यागेन रतिं कुर्वन्ति त एव परमाल्हादैकलक्षणसुखाविनाभूतं स्वभावज्ञानं लभन्त इति।

अर्थ - अथवा संसारी जीव शक्ति रूप से स्वभाव ज्ञानयुक्त है। (कर्मबन्धन के कारण) व्यक्तरूप से नहीं। ऐसा जानकर जो संयतमुनि (अव्रती नहीं) निर्विकल्प समाधि रूप स्वसंवेदन ज्ञान में समस्त विभाव परिणामों का त्याग करके रति करते हैं। वे ही परमाल्हाद रूप एक लक्षण वाले सुख से अविनाभूत स्वभाव ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं।

माता जी ने निर्विकल्प स्वसंवेदन को स्याद्वाद चन्द्रिका में कारण स्वभावज्ञान उल्लिखित किया है। जो कारण परमात्मा या कारण समयसार का पर्यायवाची भी है। बारहवें गुणस्थान तक क्षायोपषमिक होने के कारण विभावज्ञान ही है उसेी से स्वभावज्ञान, क्षायिक केवल ज्ञान प्रकट होता है।

अजीवाधिकार के अन्तर्गत टीका में पुद्गल द्रव्य के भेदों अतिस्थूल, स्थूल स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म का स्कन्धों व अणु के स्वरूप उनकी विभाव-स्वभाव व्य×जन पर्यायों का विस्तृत वर्णन किया है। साथ ही द्रव्यों के परस्पर निमित्तता (उपकार) का स्पश्ट रीत्या वर्णन किया है। जो लोग एकांगी दृश्टिकोण से मात्र उपादन को ही कार्य का जनक, कारण मानते हैं तथा निमित्त को सर्वथा अकिंचित्कर निर्धारित करते हैं, उनके लिए विस्तृत मार्गदर्षन किया है। निमित्त न तो सर्वथा अपने आप उपादान की “ााक्ति से खिंचकर चला आता है न मात्र उपस्थित रहता है प्रत्युत उपादान को सहायता प्रदान करता है, प्रभाव डालता है तभी वह ‘निमित्त’ संज्ञा को प्राप्त है। गाथा 29-30 की टीका दृश्टव्य है। एक वाक्यांष उद्धृत करता हूँ,


”अतो निश्क्रियत्वेप्येशां गति - आदि -
क्रियानिर्वृत्तिं प्रति बलाधानमात्रमसाधारणमवगन्तव्यम्।“

अर्थ - इसलिए इनके (धर्म-अधर्म द्रव्य के) निश्क्रिय होने पर भी गति आदि क्रिया के करने के प्रति इनमें बलाधानमात्र असाधारण धर्म माना गया है। गाथा 30 के तात्पर्यार्थ में लिखा है, “किन्तु सिद्धजीवपुद्गलयोरपि निमित्ते स्तः। यतः धर्मास्तिकायाभावे सिद्धा लोकाकाषाद् ऊध्र्वं न गच्छन्ति, न च पुद्गलपरमाणवोऽपि। तथैव निश्क्रियमपि आकाषं सर्वेशां स्थानं ददात्येव।“

यहाँ स्पश्ट किया गया है कि शुद्ध जीव पुद्गलों को भी धर्म, अधर्म द्रव्य गतिस्थिति प्रदान करने में निमित्त हैं। धर्मास्तिकाय के बिना सहकार के सिद्ध जीव सर्वषक्ति सम्पन्न होने पर भी लोकाकाष के बाहर नहीं जाते। (पृ० 100)

निमित्त (वाह्य कारण) की सार्थकता की पुश्टि हेतु माता जी के निम्न शुब्दों पर ध्यान देना योग्य है,


”अतः बहिरंगकारणाभावे अन्तर›कारणमसंभवम्। ततष्च नाकिंचित्करं वाह्यनिमित्तम्।“

“अतः बहिरंग कारण के अभाव में अन्तरंग कारण असम्भव है। अतः वाह्य निमित्त अकिंचित्कर नहीं है।

इस प्रकरण में आ० समन्तभद्र का निम्न “लोक माता जी के कथन के समर्थन में प्रस्तुत करना असंगत न होगा।


वाह्येतरोपाधिसमग्रतेयं

कार्येशु ते द्रव्यगतस्वभावः।
नैवान्यथा मोक्षविधिष्च पुंसां

तेनाभिवन्द्यस्त्वमृशिर्बुधानाम्।। स्वयंभू स्तोत्र-60।।

अर्थ - हे भगवान् आपके मत में वाह्य और इतर (अंतरंग) कारणों की समग्रता ही कार्य की उत्पादक है अर्थात् निमित्त और उपादान कारण दोनों ही कार्य को उत्पन्न करते हैं। यह वस्तुस्वभाव है। इस विधि के बिना मोक्षमार्ग की विधि नहीं बनती। इस समीचीन कथन के कारण हे महर्शि, आप ज्ञानियों के अभिवन्द्य हैं।


पूर्व में हम स्याद्वाद चन्द्रिका की तुलना आ० पद्मप्रभ मलधारीदेव की तात्पर्य वृत्ति से करते समय क्रम संख्या 22 के अन्तर्गत बता आये हैं कि नियमसार की गाथा क्रमांक 36 एवं 53 में दोनों मान्य टीकाकारों के द्वारा किये गये अर्थ में अन्तर पाया जाता है। यहाँ सिद्धान्त निरूपण में दोनों का दृश्टि कोण प्रस्तुत करना अभीश्ट होगा।


समयावलिभेदेण दु दुवियप्पं अहव होइ तिवियप्पं।
तीदो संखेज्जावलिहदासिद्धाणप्पमाणं तु ।।31।।

आचार्य पप्रभ की द्वितीय पंक्ति की टीका, जिसके विशय में ऊहापोह है -


”अतीतकालप्रपंचोऽयमुच्यते-अतीतसिद्धानां सिद्धपर्यायप्रादुर्भावसमयात् पुरागतो ह्यावल्यादिव्यवहारकालः स कालस्यैशां संसारावस्थायां यानि संस्थानानि गतानि तैः सदृषत्वादनन्तः। अनागतकालोऽप्यनागतसिद्धानागतषरीराणि यानि तैः सदृष इत्यामुक्तेः सकाषादित्यर्थः।“

अर्थ - अब अतीत काल का विस्तार करते हैं। अतीत कालीन सिद्धों के सिद्ध पर्याय के उत्पन्न होने के समय से पूर्व जो आवलि आदि व्यवहार काल है, वह इन सिद्धों के संसार अवस्था में जितने संस्थान-आकार-शरीर व्यतीत हो चुके हंै उनके सदृष होने से ‘अनन्त’ प्रमाण है। अनागत सिद्धों के जितने अनागत शरीर होवेंगे उनके सदृष होने से उन अनागत सिद्धों को मुक्त होने पर्यन्त जितना अर्थात् अनन्त है।“

प्रस्तुत टीका ग्रन्थ का पू० ज्ञानमती माता जी ने हिन्दी अनुवाद सहित भावार्थ एवं गाथाओं का पद्यानुवाद किया था।1 उसमें उपरोक्त गाथा संख्या 31 का विषेशार्थ ध्यान देने योग्य हैं,

”यहाँ आ० देव ने दो गाथाओं द्वारा व्यवहार के भूत, भविश्यत् और वर्तमान ऐसे तीन भेद बतलाकर उनमें कितने समय होते हैं, इसका वर्णन किया है जो कि अस्पश्ट है। इसी सम्बन्ध में नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती ने भी कहा है।


ववहारो पुण तिविहो तीदो वद्दंतगो भविस्सो दु।
तीदो संखेज्जावलि हद सिद्धाणं पमाणं तु।। 578।।

अर्थ - व्यवहार काल के तीन भेद हैं-भूत, वर्तमान, भविश्यत्। इनमें से सिद्धराषि का प्रमाण से गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतना ही अतीत अर्थात् भूतकाल का प्रमाण है।

“भावार्थ - छः महीना आठ समय में छः सौ आठ जीव मुक्ति प्राप्त करते हैं और सिद्धराषि जीवराषि के अनन्तवें भाग हैं। यह सिद्धराषि कितने काल में हुयी इसके लिये त्रैराषिक फलराषि छह महीना 8 समय, और इच्छाराषि सिद्धों के प्रमाण, सिद्धों के प्रमाण से गुणा करके प्रमाण राषि छः सौ आठ का भाग देने पर अतीत काल का प्रमाण संख्यातावलि गुणित सिद्ध राषि लब्ध आता हैं। वर्तमान और भविश्यत् काल का प्रमाण बताते हैं................।”

स्याद्वाद चन्द्रिका में माता जी ने इस गाथा में पाठभेद की चर्चा करते हुये विषेश टीका की है जिसके बारे में आ0 पद्मप्रभ टीका के हिन्दी अनुवाद में उन्होंने संकेत दिया है कि अर्थ स्पश्ट प्रतिभासित नहीं होता है। यहाँ हम स्याद्वाद चन्द्रिका की पंक्तियाँ उद्धृत कर रहे हैं। प्रथम पाठान्तर सहित गाथा लिखते हैं।


समयावलिभेदेण दु दुवियप्पं अहव होइ तिवियप्पं।
तीदो संखेज्जावलि हदसंठाण (सिद्धाणं) प्पमाणं तु ।।31।।

विचारणीय द्वितीय पंक्तिगत की टीका-“संख्यातावलिगुणित सिद्धराषि प्रमाणं भूतकालः।”-संख्यात आवलि से गुणित सिद्ध राषि प्रमाण भूतकाल है। माताजी ने विषेश लिखा है। यहाँ पर श्री कुन्दकुन्द देव की गाथा में “तीदोसंखेज्जावलि हदसंठाणप्पमाणं तु” यह पाठ मिल रहा है। इसकी टीका में श्री पद्मप्रभ मलधारी देव ने कहा है, (पूर्व में उद्धृत उनकी टीका देखेंं)

“इन पंक्तियों का अर्थ स्पश्ट रूप से प्रतिभासित नहीं हो पाता है। बल्कि यदि ‘संठाण’ पाठ के स्थान में सिद्धाणं पाठ होवे तो आचार्य के अनुसार अर्थ स्पश्ट हो जाता है। किन्तु इस समय किसी भी प्रति में ऐसा पाठ भेद नहीं मिल रहा है। इसलिये यह प्रकरण चर्चा का विशय बना हुआ है।”

“इसी प्रकार अगली गाथा में किसी पुस्तक में “चावि” पाठ मिल रहा है और किसी में “भावि” पाठ मिल रहा है। ‘भावि’ पाठ मिलने से भविश्यत् काल का लक्षण निकल आता है उसी प्रकार “संपदी समया” पाठ से वर्तमान काल का लक्षण का निर्दिश्ट हो जाता है। टीकाकार श्री पद्मप्रभ मलधारिदेव ने इन दोनां का भी लक्षण स्पश्ट नहीं किया है। यहाँ टीका में मात्र मुख्य काल के स्वरूप का कथन है। जीव राषि और पुद्गल राषि से अनन्तगुणे समय और कालाणु लोकाकाष के प्रत्येक प्रदेषों पर पृथक् ठहरे हुये हैं वह काल परमार्थ काल है।”

माता जी की कुषाग्र बुद्धि और अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग द्रव्यानुयोग की सूक्ष्मातिसूक्ष्म चर्चाओं में सम्यक् रूप से प्रषंसनीय है। उदाहरणों के माध्यम से उनका स्पश्टीकरण, स्वरूप प्रकाषन अनेक स्थलों पर किया जाता है। इससे टीका ही खिले हुये चम्पक पुश्प के समान सुगन्धित एवं मनोहर ज्ञात होती है,गौर करें,


“यथा कलिकावस्थायां चम्पकपुश्पे सूक्ष्मप्रचयपरिणामात् संकुचिताष्चम्पकपुश्प गन्धावयवा तत्रैवावतिश्ठमाना वर्तन्ते, पुनः पुश्पे विकसिते जाते स्थूलप्रचयपरिणामात् विनिर्गताष्चम्पकगन्धावयवाः सर्वदिग्व्यापिनो दृष्यन्ते। तथैवाल्पेऽपि लोकाकाषे अनन्तानन्ताः पुद्गलाः अवकाषमुवाप्नयन्ति।”

अर्थ - जैसे कि कलिका अवस्था वाले चम्पा के फूल में जो संकुचित हैं वे ही गन्ध अवयव फूल के खिलने पर स्थूल प्रचय रूप परिणमन कर सारी दिषाओं में फैल जाते हैं उसी प्रकार थोड़े से भी लोकाकाष के प्रदेषों में अनन्तानन्त पुद्गल अवकाष प्राप्त कर लेते हैं।

स्याद्वाद चन्द्रिका में गाथा के मूल अर्थ के अतिरिक्त तत्सम्बन्धी आवष्यक विशय विवेचन सर्वत्र दृश्टिगत होता है जो कि टीका का प्रमुख लक्ष्य है। गाथा संख्या 37 की टीका में अनिवार्य समझकर यह स्पश्ट किया गया है कि सांसारिक जीव अनादि कर्म बन्धन के कारण मूत्र्तिक हैं क्योंकि सर्वथा अमूत्र्त के साथ मूत्र्त कर्मों का बन्ध सम्भव नहीं है और बन्ध के असद्भाव के कारण संसार का ही अभाव प्राप्त होता है, जो कि इश्ट नहीं है अतः शुद्ध सिद्ध जीव ही सर्वथा अमूत्र्त हैं। जीव में स्वभाव के साथ ही मूत्र्त स्वभाव भी है। इस विशय में आलाप पद्धति एवं समयसार कलष दृश्टव्य हैं। जिनागम में सम्पूर्ण कथन नयों की अपेक्षा से होता है।

गाथा नं० 39 की टीका में अपेक्षित रूप में जीव के कर्मोदय सहित स्वभावों की नास्ति का कथन कितना समीचीन है, पूरा प्रकरण दृश्टव्य है यहाँ केवल एक वाक्य प्रस्तुत है,


”अतः कर्मोदयेन सहितस्य जीवस्य ये केचित् भावाः परिणामास्तेऽपि स्वभावषब्देन कथयितंु “ाक्यन्ते ते स्वभावाः जीवस्य न सन्ति।“

आ० कुन्दकुन्द ने नियमसार की गाथा संख्या 39 व 41 दोनों में ”णो खलु सहावठाणा“ तथा ”णो उवसमणे सहावठाणा वा“ कहकर पुनरावृत्ति की है। पू० माता जी प्रथम ”सहावठाणा“ का अर्थ औदयिक स्वभाव करके अपनी बौद्धिक प्रतिभा का परिचय दिया है। (द्वितीय ”सहावठाणा“ का अर्थ तो कुन्दकुन्द देव के अनुसार औपषमिक स्वभाव स्थान है ही)

गाथा क्रमांक 52 के अन्तर्गत आ० कुन्दकुन्द ने सम्यक्त्व का लक्षण चलमलिन-अगाढ़ दोश रहित किया है, गद्यांष है ”चलमलिणमगाढत्त विवज्जिय सद्दहणमेव सम्मत्तं“। इसकी टीका में टीकाकत्र्री ने स्पश्ट किया कि 51 वीं गाथा में कथित सम्यक्त्व का लक्षण तीनों उपषम, क्षयोपषम, क्षायिक सम्यक्त्वों में घटित होता है, किन्तु प्रस्तुत लक्षण क्षायोपषमिक सम्यक्त्व के विशय में घटित होता है, इसमें ये उपरोक्त दोश सम्भव भी होते हैं। अपने कथन के समर्थन में गोम्मटसार जीव काण्ड की गाथा उद्धृत की है जिसका आषय यह है कि क्षयोपषम (वेदक) सम्यक्त्व देषघाति ”सम्यक्त्व“ प्रकृति के उदय सहित होता है तथा चलमलिन एवं अगाढ़ दोशों से युक्त है। यह सम्यक्त्व नित्य कर्मक्षपण का कारण है। माता जी की सिद्धान्त विशयक सूक्ष्म दृश्टि अत्यन्त व्यापक एवं सूक्ष्म होते हुए भी समन्वित है। कोई अस्पश्ट विशय उनकी दृश्टि से बच नहीं पाता, अवष्य ही स्पश्ट होकर रहता है। वे अपेक्षित विशय को चार आँखों से देखने की अभ्यासी हैं उनमें वण्र्य विशय को घुमा फिरा कर अथवा अपनी दृश्टि को चारों ओर व्यापक करके देखने का सहज स्वभाव है। उपरोक्त विशय में मैं इतना जोड़ना चाहूँगा कि प्रस्तुत गाथा 52 में मेरी दृश्टि में यह भी आ रहा है कि आ० कुन्कुन्द सम्भवतः श्रेणी के काल में वीतराग चारित्र के अविनाभावी वीतराग सम्यक्त्व (जो आठवें गुणस्थान से प्रारम्भ होता है) पर लक्ष्य रखकर सम्यक्त्व का एक लक्षण कर रहे हैं वहाँ मात्र औपषमिक और क्षायिक सम्यक्त्वों का अस्तित्व संभावित है क्षायोपषमिक नहीं। अतः चल-मलिन- अगाढ़त्व रहितता को उन्होंने सम्यक्त्व का लक्षण लिखा है। नियमसार के शुद्धनय निरूपण का लक्ष्य निष्चय मोक्षमार्ग विषेश रूप से है।

गाथा क्रमांक 53 के अन्तर्गत सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य अभ्यन्तर कारणों (निमित्त कारणों) की चर्चा बहुत महत्वपूर्ण है । स्याद्वाद चन्द्रिका एवं पप्रभदेव की तात्पर्य वृत्ति की तुलना “शीर्शक में इस शोधालेख में इसका उल्लेख मैंने किया है इस प्रसंग को खुलासा करते हैं। दोनों की टीकांष प्रस्तुत करने योग्य हैं ।


गाथा- सम्मत्तस्स णिमित्तं जिणसुत्तं तस्य जाणया पुरिसा।
अन्तरहेऊ भणिदा, दंसणमोहस्स खयपहुदी ।।53।।

अर्थ - जिनसूत्र और उसके जानने वाले पुरुश सम्यक्त्व के लिए बाहरी निमित्त्स हैं दर्षन मोह का क्षय, क्षयोपषम आदि अन्तरंग हेतु हैं। तात्पर्य वृत्ति का ज्ञानमती माता जी कृत सान्वय हिन्दी अनुवाद है)

तात्पर्यवृत्ति टीका के विवक्षित अंष का अनुवाद :-

”इस सम्क्त्व परिणाम के लिए वाह्य सरकारी कारण, वीतराग सर्वज्ञ के मुख्य कमल से विनिर्गत समस्त वस्तुओं के प्रतिपादन में समर्थ द्रव्यश्रुत रूप तत्व ज्ञान ही हैं और जो मुमुक्षु (मुनि) हैं वे भी उपचार से पदार्थों के निर्णय में हेतु होने से अन्तर› हेतु कहे गये हैं क्योंकि ये भी दर्षन मोहनीय के क्षय, उपषम और क्षयोपषम आदि में हेतु होते हैं।“

स्याद्वाद चन्द्रिका में इस विशय में जो कुछ अर्थ भेद हैं वह गाथा के पद ”खयपहुदी“ की संस्कृतच्छाया को लेकर ज्ञात होता है। तात्पर्य वृत्ति में खयपहुदी की छाया ”क्षयप्रभृतेः” तथा स्याद्वाद चन्द्रिका में ”क्षयप्रभृतयः“ की गई है स्याद्वाद चन्द्रिका में निम्न टीकार्थ है ”सम्यक्त्व का निमित्त-बहिरंग कारण जिनसूत्र है और उसके ज्ञाता पुरूश भी हैं। पुनः अन्तरंग कारण क्या है ? दर्षनमोहनीय का क्षय आदि होना अन्तर› कारण हैं।

”दोनों के आषयों में अन्तर यह स्पश्ट है कि आ० पप्रभ ने मुमुक्षु मुनियों को उपचार से (कारण में कार्य के उपचार से) “खपहुदी“ की संस्कृतच्छाया ”क्षयप्रभृतेः” की दृश्टि से अन्तरंग कारण माना है। यह आचार्य पद्मप्रभ के स्वयं के मन्तव्य को सूचित करता है। माता जी ने ”क्षयप्रभृतयः“ छाया कर गोम्मटसार एवं धवला के आधार पर दर्षनमोह के क्षय, उपषम और क्षयोपषम मात्र को अन्तर› कारण उल्लिखित किया है। इस सम्पूर्ण प्रकरण को टीकाओं से अलग जानना चाहिए। माता जी की आगम-सिद्धान्त दृश्टि की विषालता इस प्रकार के प्रकरणों से ज्ञात होती है।

184 के अन्तर्गत एतद्विशयक वर्णन भी दृश्टव्य है। गाथा में प्रकरण है कि धर्मास्तिकाय का अभाव होने से वे जीव और पुद्गल लोकाकाष के बाहरनहीं जाते हैं। यहाँ “शंका उठाकर आवष्यक समाधान किया गया है।

हिन्दी अनुवाद -

”शंका - शुद्ध सिद्ध जीव स्वाधीन ही है। पुनः वे धर्मद्रव्य के आश्रित कैसे है।

समाधान - आपका कहना ठीक है, यद्यपि सिद्ध भगवान् सर्वषक्तिमान हैं, स्वाधीन है तथापि उपचरित असद्भूत व्यवहार नय से और इसी श्री कुन्दकुन्द देव के कथनानुसार वे कथंचित् पर के आश्रय भी कहे जाते हैं।

शंका - सिद्ध जीवों के ऊपर अलोकाकाष में गमन करने की योग्यता नहीं है, ऐसा मानने में क्या दोश है ?

समाधान - महान दोश है, क्योंकि उध्र्वगमन स्वभाव होने से उनके गमन होने की योग्यता तो है। यदि कदाचित् त्रैलोक्य के समान अनन्तानन्त भी लोक हो जावे, तो इन सिद्धों का वहाँ पर्यान्त भी गमन हो जावे।

शंका - यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान - इस गाथा 184 से ही जाना जाता है क्योंकि यह हेतु वाक्य है। ”धर्मास्तिकाय का अभाव होने से सूत्रकार भी उमास्वामी ने भी अपने इस सूत्र1 में पंचमी विभक्ति से हेतु वाक्य सूचित किया है। यदि ऐसा न होता तो आचार्य स्वयं कह देते कि, ”उन सिद्धो के ऊपर गमन की योग्यता का अभाव है।“ किन्तु ऐसा वाक्य किसी भी आगम में नहीं पाया जाता।“

ज्ञातव्य है कि वत्र्तमान में निष्चयनयाभासियों द्वारा निमित्त कारण के कार्य निश्पादन में अनिवार्य हेतुता को नकार कर सर्वत्र योग्यता के अभाव को घोशित किया जाता है जो कि आगम विरूद्ध है। जैन सिद्धान्त का निश्पक्ष रूप से अध्ययन करने वालों को इसकी असत्यता शघ्र ही भासित होगी। योग्यता की उत्पत्ति भी तो उभयकारणों से होती है। इस विशय में माता जी का प्रकृत समाधान पर्याप्त है।

आ० समन्तभद्र ने द्रव्यानुयोग श्रुत विद्या को सप्ततत्त्वमय जगत्प्रकाषी दीपक की संज्ञा दी है। एवंविध ही पू० माता जी कृत स्याद्वाद चन्द्रिका में भी समस्त तत्त्वमय विष्व दृष्यमान परिलक्षित होता है। कोई भी विशय नहीं है। संवर निर्जरा तत्त्व के प्रकरणभूत परिग्रह त्याग विशयक चर्चा गाथा संख्या 10 के अन्तर्गत माता जी ने सुश्ठु स्पश्टीकरण किया है। प्रस्तुत टीकांष यहाँ उद्धृत है,


”बाह्यवस्तुपरित्यागे सति मूच्र्छाभावाभावो भवेत्, किन्तु बाह्यवस्तुसद्भावे मूर्छाभावो। यथा तन्दुलस्य तुशसद्भावे अभ्यन्तररक्तिमा नष्यति किन्तु तुशापसरणे नष्यति न वापि च। अतः बाह्य सर्वपरिग्रहं त्यक्त्वा स्वस्वयोग्यगुणस्थानानुसारेण अन्तर›परिग्रहोऽपि त्यक्तव्यः।

यहाँ स्पश्ट है कि बिना वाह्य परिग्रह को छोड़े अन्तर परिग्रत्याग संभव नहीं है पहले बाह्य परिग्रह का त्याग होता है तत्पष्चात् उसके निमित्त से ही अन्तर› परिग्रहों का त्याग संभव है। माता जी ने वाह्य परिग्रह की तन्दुल के छिलके की तथा अन्तर परिग्रह की उपमा भीतरी रक्तिम अंष से दी है। बिना बाहरी छिलके के हटाये चावल पर लगी लालिमा नहीं हटती। उसी प्रकार पहले वाह्य परिग्रह की मुक्ति आवष्यक है। वाह्य के त्याग होने पर अन्तर का त्याग हो या न भी हो किन्तु बिना वाह्य परिग्रह त्याग के अन्तरंगपरिग्रह रागद्वेश का परिहार संभव नही है। जो लोग वाह्य परिग्रह को लपेटे हुए उसको परिग्रह न मानकर उसको सर्वथा पर एवं अपने से भिन्न मानकर तथा उससे हानि न मानकर अपने को भ्रम से अन्तर› निश्यरिग्रही मानते हैं वे स्वयं अज्ञान में हैं। आ० अमृतचन्द्र जी ने भी कहा है कि पूर्व में वाह्य परित्याग कर मुनि अन्तरंग परिग्रहों के त्याग हेतु उद्यमी होता है। आगम सिद्धान्त विशयक अपेक्षित अनेक प्रकरणों में माता जी ने कशाय पाहुड, खण्डागम, धवला, जयधवला, गोम्मटसार, लब्धिसार, क्षपणासार, समयसार, मूलाचार आदि ग्रन्थों का माध्यम लेकर विशय को स्पश्ट व पुश्ट किया है। सैद्धान्तिक प्रस्तुति वत्र्तमान में अद्वितीय है। इस विशयक चर्चा हम आगे उद्वरण वैभव शर्शक के अन्तर्गत करेंगे वहाँ दृश्टव्य है। माता जी कर्म सिद्धान्त की विषद ज्ञाता हैं। टीका के करणानुयोग विशयक वक्तव्यों से उनका ज्ञानगाम्भीर्य परिलक्षित होता है। पंच लब्धियों, कर्मों की अवस्थाओं, बद्ध-अबद्ध अवस्थाओं, बन्ध-मोक्ष के कारणों, गणित, भूगोल, खगोल, लोकास्थिति में द्वीपसमुद्रादि तथा चैत्यालयों आदि का कथन इस कृति में यथास्थान किया गया है। इसका वर्णन गुणस्थान परिपाटी से प्रकरण पुश्टि तथा अन्य “शर्शकों के अन्तर्गत हम स्फुट रूप में करेंगे।

पू० माता जी भव्य जीवों को हित दृश्टि से मोक्षमार्ग में प्रेरित करना अपना आवष्यक कत्र्तव्य समझती हैं। व्यवहार के उपदेष के साथ ही वे साध्य रूप में निष्चय मोक्षमार्ग जो शुद्ध ध्यान रूप है, का व्याख्यान करती हैं। निम्न टीकांष अपेक्षणीय है।


”तात्पर्य मेतत् - नारकतिर्यड्मनुश्यदेवपर्यायचतुर्दषमार्गणागुणस्थानजीवसमास- संस्थान रहितो, बालवृद्धतरुणावस्थारहितः रागद्वेशमोहक्रोधमानमायालोभद्रव्यकर्मभावक- र्मनोकर्मरहितविभावभावकत्र्तृत्व“न्यः, चिन्मयचिन्तामणिचैतन्यकल्पवृक्षस्वरूपोऽखण्ड- ज्ञानज्योतिस्वरूप“चाहम् - इत्यादि भावनाभिः परमानन्दमालिनि निजषुद्धात्मनि स्थिरत्वं विधातव्यमस्माभिर्भव्यजनैष्चेति।“

प्रस्तुत का आषय यह है कि स्वयं को शुद्ध नय से शुद्ध मानकर आत्मध्यान करना योग्य है। नियमसार की गाथा सं 77 से 81 इन पाँच गाथाओं को आचार्य पùप्रभ मलधारिदेव ने पंचरत्न संज्ञा दी है। माता जी ने भी ऐसा ही मानकर उनका तात्पर्य उक्त वाक्यों में अति सुन्दर रूप में प्रस्तुत किया है। इन पाँच गाथाओं का पृथक ‘भेद भावना प्रतिपादक’ अन्तराधिकार रूप में ही समाहित किया है। उनकी यह अध्यात्म रसिकता शुद्ध ध्यान लीनता हेतु आतुर ज्ञात होती है। वे आगामी मुनि पर्याय प्राप्त कर शुद्ध ध्यान की पात्र बनकर परमानन्दमालिनी स्वात्मा की एकाग्र अनुभूति द्वारा मुनि प्राप्ति की आकांक्षी हैं। यही भावना आत्म विष्वास की अनिवार्य सोपान है। स्याद्वाद चन्द्रिका में गाथा क्रमांक 83 की टीका में टीकाकत्र्री ने नियमसार के विशयानुरूप ही प्रतिक्रमण की चर्चा की है। स्वदोश निवारण हेतु वचनात्मक प्रतिक्रमण है। रागादि भाव के परित्याग सहित स्वषुद्धात्मध्यान निष्चय प्रतिक्रमण का पात्र संयत मुनि ही निर्दिश्ट किया है। यहाँ हिन्दी अनुवाद में गवेशणीय है|

”यह प्रतिक्रमण प्रमत्त संयत मुनियों के ही होता है, आगे अप्रमत्त संयत गुणस्थान से प्रारम्भ कर क्षीण कशाय गुणस्थान (तक) पर्यन्त मुनियों के निष्चय प्रतिक्रमण तरतम भाव से रहता है। केवली भगवान के इसका फल ही है। असंयत सम्यग्दृश्टि और देषसंयत श्रावकों में इन दोनों (व्यवहार-निष्चय) प्रकार के प्रतिक्रमणों की बात भी नहीं है क्योंकि वहाँ मुनियों की छः आवष्यक क्रियाओं का अभाव है।“

किन्तु प्रष्न उपस्थित होता है कि यदि माता जी के कथनानुसार मुनि ही दोनों प्रकार के प्रतिक्रमण का पात्र है तथा श्रावक व्यवहार प्रतिक्रमण मात्र का भी पात्र नहीं है तो माता जी ने श्रावक प्रतिक्रमण सम्बन्धी ग्रन्थ की रचना ही क्यों की। यह ग्रन्थ भी दि० जैन त्रिलोक “शोध संस्थान से ही प्रकाषित हुआ है इसका समाधान माता जी से ही हो सकता है। इस प्रसंग में यह भी ध्यान देने योग्य है कि श्रावक की सामायिक के अन्तर्गत भेदों में प्रतिक्रमण भी सम्मिलित है।

गाथा सं० 84 में दर्षनाराधना, ज्ञानाराधना, चारित्राराधना और तप अराधना का वर्णन करते हुए विराधना का स्वरूप उल्लिखित है। क्रिया कलाप और आ० वीरनन्दिकृत आचारसार में विहित प्रतिक्रमण विधि का उल्लेख समाविश्ट किया गया है। टीका का विस्तार करते हुए माता जी ने कहा है कि पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँच इन्द्रिय निरोध व्रतों में, छह आवष्यक क्रियाओं में और केषलोंच आदि सात शोश व्रतों में कुछ भी अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतीचार और अनाचार होता है वह विराधना शब्द का वाच्य है। इसके अतिरिक्त छह आवष्यक क्रियाओं में समय का उल्लंघन करना या क्रिया न करना या कृति कर्म विधि से न करना भी विराधना है जैसे कि दैवसिक और रात्रिक प्रतिक्रमण में सिद्धभक्ति, प्रतिक्रमण भक्ति वीरभक्ति और चतुर्विषति तीर्थंकर-भक्ति इन चार भक्तियों का पाठ दण्डक पाठ के साथ उच्चारण करना चाहिए। इनमें से केवल भक्तियों का या मात्र दण्डक पाठ का उच्चारण करना प्रतिक्रमण नहीं है।

यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि संघों में कृति कर्म विधि तथा छः आवष्यक क्रियाओं में किन्हीं भी कारणों से समय का उल्लंघन भी होता है उनके लिए माता जी का यह उल्लेख प्रेरणादायक है। अन्य भी विशयों में साधुवर्ग को दोश से बचना चाहिए। निर्दोश एवं आगमोक्त परिचर्या ही कल्याणकारी है। आचारांग के अन्तर्गत वर्णित विधि ही अनगार को अपनाने योग्य है कि पिछली रात्रि के स्वाध्याय का निश्ठापन करके दिक्षुद्धि करें पष्चात् सूर्यादय से पहले ही रात्रिक प्रतिक्रमण करना चाहिए। अनन्तर पौर्वान्हिक देववन्दना की विधि से समायिक क्रिया करनी चाहिए। माता जी का अभिप्राय है ‘मूलाचार’ और ‘आराधना’ नामक ग्रन्थों में विहित विधि का पालन करना योग्य है।

माता जी का मत है कि वत्र्तमान में उपलब्ध दैवासिक और बृहत् प्रतिक्रमण पाठ श्रीमत् गौतम गणधर द्वारा रचित है। गाथा 83 की टीकान्तर्गत माता जी ने लिखा है कि उक्त विधि पाठ की टीका आ० प्रभाचन्द्र ने लिखी है उनके निम्न वाक्य से यह बात प्रकट होती है।


”श्री गौतमस्वामी मुनीनां दुश्शमकाले दुश्परिणामादिभिः प्रतिदिनमुपार्जितस्य कर्मणोविषुद्ध्यर्थं प्रतिक्रमणलक्षणमुपायं विदधानस्तदादौ मंगलार्थमिश्टदेवता विषेशं नमस्करोति।“

आगे टीकाकत्र्री ने लिखा है कि गौतम स्वामी ने बृहत्प्रतिक्रमण में स्वयं ही कहा है


“एसो पडिक्कमणविहि पण्णत्तो जिणवरेहिं सव्वेहिं
संजमतवाहियाणं णिग्गंथाणं ।। पाक्षिक प्रतिक्रमण।।“

”संयम और तप में स्थित निग्र्रन्थ महर्शियों के लिए इस प्रतिक्रमण विधि को सब जिनवरों ने कहा है।”

अतः यतिवर्ग को जिनवर आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। गाथा संख्याक 109 की व्याख्या करते हुए माता जी ने गोम्मटसार जीवकाण्ड की निम्न गाथा उद्धृत की है,

तीसं वासो जम्मे वासपुधत्तं रवु तित्थयरमूले।
पच्चक्रवाणं पढिदो संझूण दु गाउयविहारा।।

इस गाथा का खुलासा करते हुए माता जी ने संस्कृत व हिन्दी दोनों में श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती के वर्शपृथक्त्व के आषय में अश्टवर्श व आठवर्श लिखा है जबकि वर्श पृथक्त्व का अर्थ तीन से लेकर नौ वर्श तक अन्य ग्रन्थों से प्राप्त होता है। अतः यह गवेशणीय है।

परमसमाधि अधिकार की गाथा सं० 122 की टीका में जिनकल्पी एवं स्थविर कल्पी, मुनियों का स्वरूप वर्णित किया गया है। समाधि शतक, पनन्दिपंचविंषतिका एवं भाव संग्रह के अनुसार कथन है। अंत में तात्पर्य में माता जी ने उद्घोशित किया है, ”इस भरत क्षेत्र में अथवा विदेह क्षेत्र में स्थित शष्वत कर्मभूमियों में जिनकल्पी मुनियों के यह परम समाधि होती है ऐसा जानकर इस परम समाधिध्यान को ध्येय बनाकर स्थविरकल्पी की चर्या सावधानी पूर्वक पालन करना चाहिए और उसी प्रकार जो कोई भी महाव्रती मुनि है उनकी वन्दना भक्ति और पूजा करते रहना चाहिए।“

यहाँ स्पश्ट है कि जब वत्र्तमान के मुनि को वीतराग भाव या परम समाधि संभव नहीं है तो अव्रती किस खेत की मूली है। आगे गाथा क्रमांक 123 के अन्तर्गत माता जी ने आ० कुन्दकुन्द के मोक्षपाहुड की गाथा उद्धृत की है जिसका अर्थ यह है।

”भरत क्षेत्र में इस दुश्शम काल में साधुओं को आत्मस्वभाव में स्थित होने पर धर्मध्यान होता है किन्तु जो ऐसा नहीं मानते वे अज्ञानी हैं।“ ।।76।।


तात्पर्य में माता जी ने स्पश्ट किया है कि,
”अधुना अव्रतिनां ध्यानं स्वरूपाचरणाश्रितमसंभवमेव।“

इस समय आव्रती श्रावकों के स्वरूपाचरण के आश्रित ध्यान असम्भव ही है। उपरोक्त वर्णन से वर्तमान में प्रचलित अनेकों भ्रान्तियों का निवारण होता है। माता जी कर्म सिद्धान्त व करणानुयोग की विषेश ज्ञाता हैं, यह बात उनके द्वारा रचित ‘सिद्धान्त चिन्तामणि’ जो कि शट्खण्डागम की टीका है, से ज्ञात होती है। उन्होंने स्याद्वाद चन्द्रिका में सर्वत्र कर्म सिद्धान्त का अपेक्षित विवेचन यथास्थान किया है। कर्मों के दष करणों, बन्ध, उदय, सत्ता, उदीरणा, उपषम, उत्कर्शण अपकर्शण, संक्रमण, निधत्ति और निकाचित के स्वरूप के दर्षन भी चन्द्रिका में होते हैं।

गाथा क्रमांक 18 की टीका में जीव के कर्म कत्र्तृत्व और भोक्तृत्व प्रकरण में पू० आर्यिका श्री ने कर्म प्रकृतियों का गुणस्थान क्रम से बन्ध और उदय वर्णन किया है, पृश्ठ सं० 63 पर दृश्टव्य हैं -


”इतो विस्तरः - अयमात्माऽनादिकर्मबन्धनबद्धः सन् पुद्गलकर्मणां कत्र्ता भवति।“

उक्तं च - सत्तर सेकग्गसयं चउसत्तत्तरि सगट्ठि तेवट्टो।

बन्धा णवट्ठवण्णा दुवीसत्तार सेकोघे।।103।। गोम्मटसार कर्म०।।


आगे हम विस्तार भय से पाठकों के ज्ञानार्थ मात्र हिन्दी अनुवाद निम्न स्थल पर लिख रहे हैं -

”इसी का विस्तार कहते हैं - यह आत्मा अनादि काल से कर्मों से बँधा हुआ होने से पुद्गल कर्मों का कत्र्ता होता है। श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती देव ने कहा है -

गाथार्थ - ये जीव गुणस्थानों में पहले से लेकर क्रम से 117, 101, 74, 77, 67, 63, 59, 58, 22, 17, 1, 1, 1, और शुन्य 0 इस तरह कर्म प्रकृतियों को बाँधता है। खुलासा इस प्रकार है-‘मिथ्यात्व’ गुणस्थान में 117 का बन्ध है, ‘सासादन’ में 101 का, ‘मिश्र’ में 74 का, ‘असंयत सम्यक्दृश्टि, में 77 का, ‘देषविरत’ में 67 का, ‘प्रमत्तविरत’ में 63 का, ‘अप्रमत्त, में 59 का, ‘अपूर्वकरण’ में 58 का, ‘अनिवृत्तिकरण’ में 22 का, ‘सूक्ष्मसाम्पराय में 17 का, ‘उपषान्तमोह’ ‘क्षीणमोह’ और ‘सयोग केवली’ - इन तीन गुणस्थानों में एकमात्र ‘सातावेदनीय’ का ही बन्ध करता है। (‘अयोग केवली’ के बन्ध का अभाव है।) और तो क्या आठवें गुणस्थान वत्र्ती महामुनि श्रेणी में चढ़कर भी 58 कर्म प्रकृतियों का बन्ध कर रहे हैं।

शंका - वे कौन सी प्रकृतियाँ हैं ?

समाधान - देखिए-1. निद्रा, 2. प्रचला, 3. तीर्थंकर, 4. निर्माण, 5. प्रषस्तविहायोगति, 6. तैजस, 7. कार्माण, 8. आहारक “ारीर, 9. आहारक अंगोपांग, 10. समचतुरस्रसंस्थान, 11. देवगति, 12. देवगत्यानुपूर्वी, 13. वैक्रियक अंगोपांग, 14. वैक्रियक “ारीर, 15. स्पर्ष, 16. रस, 17. गन्ध 18. वर्ण, 19. अगुरूलघु, 20. उपघात, 21. परघात, 22. उच्छ्वास, 23. त्रस, 24. बादर, 25. पर्याप्त, 26. प्रत्येक “ारीर, 27. स्थिर, 28. “ाुभ, 29. सुभग, 30. सुस्वर, 31. आदेय, 32. हास्य, 33. रति, 34. भय, 35. जुगुप्सा, 36. पुरुशवेद, 37. संज्वलन क्रोध, 38. संज्वलन मान, 39. संज्वलन माया, 40. संज्वलन लोभ, 41. मतिज्ञानावरण, 42. श्रुतज्ञानावरण, 43. अवधिज्ञानावरण, 44. मनःपर्ययज्ञानावरण, 45. केवलज्ञानावरण, 46. चुक्षुर्दर्षनावारण, 47. अचक्षुर्दर्षनावरण, 48. अवधिदर्षनावरण, 49.केवलदर्षनावरण, 50. दानान्तराय, 51. लाभान्तराय, 52. भोगान्तराय, 53. उपभोगान्तराय, 54. वीर्यान्तराय, 55. यषस्कीर्ति, 56. उच्चगोत्र, 57. पच्चेन्द्रिय जाति और 58. साता वेदनीय - ये 58. प्रकृतियाँ बँधती रहती है। यह नाना जीवों की अपेक्षा कथन है। इसी प्रकार वीतराग छद्मस्थ महामुनि, जो कि यथाख्यात चारित्र को प्राप्त कर चुके हैं, ऐसे वे उपषान्त कशाय और क्षीण कशाय गुणस्थान वत्र्ती तथा सयोग केवली भगवान, इनके भी एक सातावेदनीय का बन्ध होता रहता है। इसलिए ये जीव अपने गुणस्थान के योग्य पुद्गल कर्म प्रकृतियों के कत्र्ता होते हैं।

उसी प्रकार से पुद्गल कर्मों के भोक्ता भी हैं -

उसी का स्पश्टीकरण करते है -

‘मिथ्यादृश्टि’ गुणस्थान से लेकर ‘अयोग केवली’ पर्यन्त जीव उन उन गुणस्थानों में क्रम से 117, 111, 100, 104, 87, 81, 76, 72, 66, 60, 59, 58, 42, 12 प्रकृतियों के उद्य का अनुभव करते हैं। इसलिए ये सभी जीव अपने अपने गुणस्थानों के योग्य उदय में आये हुए कर्मों के भोक्ता कहलाते हैं।

ये सब कथन व्यवहार नय की अपेक्षा से ही हैं।“

कर्म सिद्धान्त जैन धर्म का विषेश सिद्धान्त है जो कि अन्य धर्र्मों में प्राप्त नहीं होता है। स्याद्वाद चन्द्रिका में भी अपेक्षानुसार इसका उल्लेख किया गया है ऊपर माता जी के कथन को कर्मबन्ध और उदय के प्रकाष में उद्धृत किया है स्याद्वाद चन्द्रिका का मूल ग्रन्थानुसार अध्यात्म कर्म सिद्धान्त का आपेक्षी है। गाथा 130 की टीका में मुनियों, जो कि अध्यात्म के मुख्य पात्र हैं, के भी कुछ बंध को प्राप्त होने वाली शुभ-प्रषस्त प्रकृतियों, एवं अषुभ अप्रषस्त प्रकृतियों का आवष्यकतानुसार उल्लेख करते हुए कहा गया है कि छठे गुणस्थानवर्ती मुनियों के असाता, अरति, शोक आदि अषुभ प्रकृतियों का बन्ध होता है। इसके ऊपर आठवें गुणस्थान के छठे भाग पर्यन्त भी आहारक शरीर, आहारक अंगोपांग और तीर्थंकर रूप पुण्य प्रकृतियों का बन्ध होता है। चतुर्थ गुणस्थान से लेकर आठवें गुणस्थान तक शुभ प्रकृतियाँ बँधती हैं, कोई महामुनि उपषम श्रेणी में चढ़कर निर्विकल्प शुक्लध्यान को ध्याते हुए भी वहाँ पर आठवें गुणस्थान में तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध करके आगे पर वहाँ से उतरकर छठे गुणस्थान पर्यन्त वापस आ जाते हैं। वे मुनि उसी भव में या आगे भव में तीर्थंकर प्रकृति का अनुभव करके धर्मतीर्थ का प्रवत्र्तन करके सिद्धिकान्ता के पति हो जाते हैं।

तात्पर्य यह हुआ कि सराग संयमी मुनि पापों से विरक्त होकर अपनी चर्या से सातिषय पुण्यास्रव करते ही हैं। पुनः वीतराग संयमी होकर निष्चय रत्नत्रय से अविनाभावी ऐसी परम समाधि को प्राप्त हुए पुण्यास्रव को भी छोड़कर पुण्य-पाप से भी रहित हो जाते हैं। इससे यह जाना जाता है कि पाप तो बुद्धिपूर्वक छोड़ा जाता है और पुण्यास्रव तो ध्यान में एकलीनता होने पर स्वयं ही नहीं है। (उसके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता) ऐसा जानकर प्रारम्भ अवस्था में पापास्रव से डरते हुए तुम्हें आवष्यक क्रिया आदि में (व्रत पुण्य रूप) प्रीति रखना चाहिए।

पू० माता जी ने अषुभ, शुभ एवं शुद्ध का क्रम यहाँ आगमानुकूल जैन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में ही किया है। हम इस सम्बन्ध में आ० पूज्यपाद स्वामी के द्वारा समाधिषतक के कथन को उपरोक्त के समर्थन में उद्धृत करते हैं -

अपुण्यमव्रतैर्पुण्यं व्रतैर्मोक्षस्तयोव्र्ययः।

अव्रतानीव मोक्षार्थी व्रतान्यपि परित्यजेत्।। 83।।
अव्रतानि परित्यज्य व्रतेशु परिनिश्ठितः।

त्यजेत्तान्यपि संप्राप्य परमपदमात्मनः।। 84।।

अर्थ - पाप (अव्रत) से पाप कर्म का बन्ध होता है तथा व्रतों (पुण्य) से पुण्यकर्म का बन्ध होता है। पाप-पुण्य दोनों के नाष से मोक्ष होता है। अतः मोक्षार्थी अव्रतों के समान व्रतों को भी छोड़ देवें। क्रम उल्लिखित कर आचार्य कहते हैं कि अव्रतों का छोड़कर व्रतों में निश्ठावान होकर रहे तथा आत्मा का परम पद प्राप्त करने कर व्रतों को भी छोड़ देवे। यहाँ व्रतों में निश्ठा अर्थात् अत्यन्त प्रायोगिक श्रद्धा की उपयोगिता वर्णित की गई है। यहाँ यह भी स्पश्ट है कि पाप - पुण्य एक साथ नहीं छोड़े जा सकते। न पाप, पुण्य की इस अवस्था में समानता ही है भले ही परमपद में न हो। यह भी यहाँ स्मरणीय है पाप निवारण हेतु प्रतिक्रमण, आलोचना तथा प्रायष्चित्त का विधान आगम में है कहीं भी पुण्य के मिथ्या होने हेतु या उसके निवारणार्थ किसी विधि का उल्लेख नही मिलता। अतः पुण्य की हेयता तो अप्रयत्न साध्य है वह पूर्व में उपादेय ही है। पुण्य तो स्वयमेव छूटता है। उसके लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता।

आ० उमास्वामी ने भी तत्वार्थसूत्र में सल्लेखना व्रत के प्रीतिपूर्वक सेवन के उपलक्षण से सभी व्रतों को उपादेय मानकर उनके पालन में प्रसन्नता अपेक्षित निरूपित की है

‘मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोशिता 8।

मरण के समय प्रीति पूर्वक सल्लेखना व्रत का पालन करना चाहिए। अन्य व्रतों के साथ सल्लेखना व्रत के अतिचारों के वर्णन से व्रतों की उपादेयता सिद्ध होती है।

जिनागम में अपेक्षित विशय में मन की एकाग्रता को ध्यान कहा गया है। विशय वासना, आरम्भ - परिग्रह तथा गृहकार्यों के करते हुए गृहस्थ का मन स्थिर नहीं रह सकता है अतः ध्यान सिद्धि गृहस्थाश्रम में वर्जित है। पू० आर्यिका श्री ने गाथा क्रमांक 131 के अन्तर्गत आ० शुभचन्द्र जी कृत ‘ज्ञानार्णव’ नामक महाध्यान शस्त्र के उदाहरण देते हुए स्पश्ट विवेचन किया है -

”ये केचित् आरम्भपरिग्रहासक्ता गृहस्था असिमसिकृश्यादि क्रियासु प्रवत्र्तन्ते तेशां”
आदि। जो कोई आरंभ और परिग्रह में आसक्त हुए गृहस्थ असि, मशि, कृशि क्रियाओं में रत रहते हैं उनके निष्चय सामायिक नामक ध्यानसिद्धि संभव नहीं है।

उक्त कथन के समर्थन में यहाँ (समयसार कलष पर लिखित) में पं० बनारसीदास जी की कुछ पंक्तियों को उद्धृत करने का लोभ1 संवरण नहीं कर पा रहा हूँ, वे निम्न हैं -

जहाँ पवन नहिं संचरे तहाँ न जल कल्लोल।

तैसे परिग्रह छोड़ि के मनसर होय अडोल।।
दो पथ पन्थी चलै न पन्था। दो मुख सुई सिए न कन्था।।

दोउ काम नहिं होहिं सयाने। विशय योग अरु मोक्षहु जाने।।

जैन धर्म में बहिरंग में भी परिग्रह त्यागी श्रमणों की क्षमा और अहिंसा का महत्प्रभाव है। स्याद्वाद चन्द्रिका लेखिका श्रमणी जी ने परमसमाधि अधिकार में गाथा 132 की टीका में ऋद्धिधारी साधुओं के साम्यभाव (परम समाधि) की प्रषंसा करते हुए उनके दया, क्षमा, अहिंसा के प्रभाव का वर्णन करते हुए निम्न उद्गार व्यक्त किये हैं -

अनुवाद “जो मुनि सर्व पापों से भयभीत हुए सतत निर्भय निःषंकमना होकर सात प्रकार के भयों को भी छोड़कर निर्विकार निरजन चिच्चैतन्य आत्मा में चर्या को करते हुए मैथुन संज्ञा से होने वाले रागभाव से दूर रहते हुए सहज परमस्वभावनिज परमात्मा का ही अनुभव करते हैं, उनकी वीतराग भावना के बल से जगत में रहने वाले जो कोई जन्मजात विरोधी प्राणी हैं वे भी शन्ति को प्राप्त हो जाते हैं, अन्य जीवों की तो बात ही क्या है।“ आगम सिद्धान्त ग्रन्थों में साधुओं के पाँच भेद उल्लिखित है यथा -

”पुलाकबकुषकुषीलनिग्र्रन्थस्नातकाः निग्र्रन्थाः।“

इन पुलाक, बकुष, कुषील, निर्ग्रन्थ, स्नातक निग्र्रन्थों के लक्षण करते हुए नियमसार की गाथा क्रमांक 143 की टीका में निरूपित किया गया है कि -

”इमे सर्वे भावलिनो मुनयः पूज्या सन्ति।“ अर्थात् सभी सन्त भावलिंगी हैं और पूज्य हैं आगे पाष्र्वस्थ, कुषील (जो इन पाँच से अन्य हैं) आदि श्रमणाभासों की अपूज्यता प्ररूपित की है। उपरोक्त पाँचों ही वंदनीय हैं भक्ति योग्य हैं। जो लोग मिथ्या भावना से दूशित हैं उनको अपना दृश्टिकोण जैनागम के अनुसार बनाना चाहिए। साधुजन की विनय निश्कपट भाव से करना योग्य है। पुलाक, बकुष, कुषील में कुछ दोश भी है अषुभ भावना भी पाई जाती है फिर भी उनका श्रमणत्व भंग नहीं होता है। और फिर भोजनदान मात्र के लिए मुनि की भावलिंग पात्रता - अपात्रता की परीक्षा जो अषक्य ही है करना तो असंगत ही है, पाप बन्ध का कारण है कहा भी है,

भुक्तिमात्रप्रदानेन का परीक्षा तपस्विनाम्।
ते सन्तोऽसन्तो वा गृही दानेन शुद्ध्यति।।

भोजन मात्र प्रदान द्वारा तपस्वियों की क्या परीक्षा, कुछ नहीं। वे सन्त हों या असन्त (भावलिंगी या द्रव्य लिंगी) गृहस्थ तो दान से शुद्ध होता ही है।

मोक्ष पाहुड मे आचार्य कुन्कुन्द ने बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा ये तीन भेदों का वर्णन किया है। गाथा 149 की टीका के अन्तर्गत स्याद्वाद चन्द्रिका में उन आत्माओं का गुणस्थानानुसार रयणसार और मार्गप्रकाष ग्रन्थों के आधार से वर्णन करके विषेश स्पश्टीकरण किया है। वैसे तो सम्पूर्ण टीकाग्रन्थ में ही विशय को पूर्ण स्पश्ट करने की पद्धति माता जी ने अपनाई है कही भी अधूरापन नहीं है पुनष्च सिद्धान्त और धर्म के विशय में तो माता जी विषेश रूचिवान प्रकट हुई हैं। व्यवहार चारित्राधिकार, परमार्थ प्रतिक्रमण अधिकार, परमभक्ति अधिकार, निष्चय परमावष्यक अधिकार एवं शुद्धोपयोगाधिकार में तो विषद एवं विस्तृत विवेचन है यह वर्णन चतुरनुयोगी जैन सिद्धान्त के परिप्रेक्ष्य में किया गया है। इसका आनंद तो पूरी टीका के पारायण, मनन करने से ही प्राप्त हो सकता है।

उपरोक्त गाथा क्रमांक 149 में साधुवर्ग को निम्न वाक्य से सावधान किया गया है उनको मार्ग में स्थिर करने का प्रयास किया गया है।

”पुनः पुनष्च ये द्रव्यलिंगधारिणो मुनयः आवष्यकानुपे -
क्षन्ते ते जिनाज्ञालोपनाद् बहिरात्मनेा भवन्ति।“'

पुनः ये द्रव्यलिंगधारी मुनि आवष्यकों की उपेक्षा करते हैं वे जिनेन्द्र देव की आज्ञा का उल्लंघन करने से बहिरात्मा हो जाते हैं। गाथा 150 के अन्तर्गत कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है कि जो अन्तर्वाह्य वचनों में प्रवृति करते हैं वे बहिरात्मा हैं इसकी टीका में टीकाकत्र्री ने प्रवनसार के अनुसार शुभोपयोगी मुनि की चर्या का उल्लेख करते हुए यह स्पश्ट किया है कि सराग चर्या के अन्तर्गत वचन प्रक्रिया में नय विवक्षा से वे बहिरात्मा नहीं हैं अपितु मध्यम अन्तरात्मा है। गाथा में तो शुद्धनयाश्रित उत्कृश्ट अन्तरात्मा का स्वरूप वर्णित किया गया है, इसकी अपेक्षा से सराग, सजल्प एवं देव वंदनादि आवष्यक क्रियाओं में भी रत साधुओं को भी अन्तरात्मा कोटि से बाहर रखा है। प्रस्तुत गाथा का हिन्दी अनुवाद रूप भावार्थ स्थिति को स्पश्ट करने में सार्थक होने से दृश्टव्य है। -

भावार्थ - यहाँ पर जो अन्तर› में भी वचनोच्चारण करते हैं या बाहर में वचन बोलते हैं उन सभी वचन बोलने वालों को बहिरात्मा कहा है। प्रषस्त अप्रषस्त वचनों का विभाजन नहीं किया है यह उत्तम अन्तरआत्मा की अपेक्षा ही कथन है अन्यथा कुन्दकुन्द देव स्वंय बहिरात्मा की कोटि में आजावेंगे। वे भी तो ग्रन्थ लिखत थे, षिश्यों को उपदेष देते थे स्वयं अन्तर वाह्य रूप जल्परूप आवष्यक क्रियायें करते थे। इसलिए एकान्त नहीं ग्रहण करना चाहिए।

गाथा नं० 151 की टीका में उत्कृश्ट अन्तरात्मा के स्वरूप एवं गुणस्थान की चर्चा के प्रसंग में बारहवंे गुणस्थान में उसकी स्थिति बताई है। गाथा क्रमांक 153 अन्तर्गत आवष्यक और स्वाध्याय की स्थिति स्पश्ट करने हेतु माता जी ने लिखा है कि वचनोच्चारण पूर्वक जो प्रतिक्रमण आदि क्रियायें की जाती हैं वे निष्चय नय के आश्रित आवष्यक क्रियाओं की अपेक्षा से स्वाध्याय कहलाती हैं, किन्तु वह आवष्यक (अवष का कर्म) नहीं है। यहाँ परम निष्चय आवष्यक के प्रकरण मे निर्विकल्प ध्यानमय स्थिति को ही आवष्यक कहते हैं। साधुओं के लिए ध्यान, स्वाध्याय (अध्ययन) ये ही दो क्रियायें प्रधान है।

नियमसार प्राभृत साधुओं के आचार का प्रतिपादक आध्यात्मिक ग्रन्थ है। उनके मोक्षमार्ग (नियम) के प्रत्येक पहलू पर दृश्टिपात करता है। स्याद्वाद चन्द्रिका में इसी दृश्टिकोण को विहंगम रूप से विस्तारित किया गया है। जैसे टॉर्च में सैल कुछ धीमे होते हैं तो सैलों को ऊर्जायित कर (बैटरी चार्ज कर) प्रकाष वृद्धिंगत होता है, जैसे बीज में शक्ति होती है किन्तु अंकुरित कर, पल्लवित कर वृक्ष का आकार दिया जाता है, जैसे जल स्रोत अपने रूप में अल्प मात्रा में होता है पुनः उसे एकत्रित कर विषाल कूप का आकार दिया जाता है उसी प्रकार अध्यात्म शक्ति स्रोत नियमसार का पल्लवित रूप स्याद्वाद चन्द्रिका है। मुनिवर्ग हेतु कुन्दकुन्द के मार्गदर्षन को अग्रसित करते हुए माता जी गाथा 154 की टीका में कहती है ।

”एतद् द्वयमपि ध्यानमधुना पत्र्चमकाले हीनसंहनने नास्ति। हे साधो, यावत् त्वं शक्तिविहीनोऽसि तावत् शुभोपयोगे एव निजशुद्धपरमानन्दस्वरूपपरमात्मतत्वस्य श्रद्धानं विदध्याः।

अर्थ - यह दोनों ही निष्चय धर्मध्यान, निष्चल शुक्लध्यान इस समय पंचम काल में हीनसंहनन होने से नहीं हैं। हे साधो, जब तक तुम शक्ति से हीन हो तब तक शुभोपयोग में स्थित होकर निजषुद्ध परमानन्द स्वरूप परमात्मतत्व का श्रद्धान करेा।

गुरु का स्वरूप ही कृपालु होता है माता जी ने कुन्दकुन्द के गुरु हृदय को कोमल और वाणी को यथा आवष्यकता कठोर रूप में प्रस्तुत हुए भी षिश्य पर अनुग्रह एवं संरक्षण भाव रूप में ही प्रकट किया है ठीक भी है -

गुरु कुम्हार सिख कुंभ है गढ़ि-गढ़ि काढे़ खोट।

अंतर हाथ सहार दे बाहर मारै चोट।। कबीर
विकाषयन्ति भव्यस्य मनोमुकुलमंषवः।

रवेरिवारविन्दस्य कठोराष्च गुरूक्तयः।।1

गुरुओं की कठोर वाणी उसी प्रकार भव्य षिश्यों के हृदय को प्रसन्न करती है जैसे सूर्य की उश्ण किरणें कमलों को विकसित करती हैं। व्यवहार धर्म का पालन करने वाले श्रमण को भी मोक्षसुख का अपात्र कहकर कठोरता का परिचय आ० कुन्दकुन्द व आर्यिका माता जी ने उनके अभिप्रायानुसार दिया है। (फिर भी माता जी ने अपेक्षित स्थलों पर स्पश्ट कर स्थितिकरण भी किया है।) इस सन्दर्भ में गाथा क्रमांक 124 की टीका अपेक्षणीय है।

”ये पुनः सम्यक्त्वषून्याः क्षणिकवैराग्ययुक्ताः सन्तो वने निवसन्त इमां चर्यां पालयन्तोऽपि समभाव रहिताः भवन्ति, ते स्वर्गादिविभूतिं सम्प्राप्यापि मोक्षसुखं न प्राप्स्यन्ति।“

जो सम्यक्त्व से रहित है, क्षणिक वैराग्य से युक्त होकर भी वन में निवास करते हुए और अनषन आदि चर्या का पालन करते हुए भी समभाव से रहित होते है, वे स्वर्ग आदि विभूति को प्राप्त करके भी मोक्ष सुख को प्राप्त नही कर सकेंगे। जिनागम के अभ्यासी, जैन सिद्धान्त के अभिज्ञ जन इस तथ्य से परिचित ही है कि करणानुयोग, द्रव्यानुयोग का प्रवेष द्वार है जिन्होंने गुणस्थान, मार्गणास्थान, कर्मप्रकृति समुदाय का बोध प्राप्त नहीं किया है, नयों के स्वरूप से जो अपिरिचित है वे यदि अध्यात्म की गहराइयों में उतरते हैं तेा उनका अकल्याण ही है। इसी भाव को अनुभव कर स्याद्वाद चन्द्रिका में यथास्थान आवष्यक समझ कर करणानुयोग का विशय भी समाविश्ट किया गया है। यहाँ विस्तार के भय से संक्षिप्त ही कतिपय अंष प्रस्तुत है -

”त्रिचत्वारिंषदधिकत्रिंषतरज्जुप्रमाणघनलोकोऽस्मिन् साद्र्धद्वयद्वीपेश्वेव कर्मभूमिजनराः कर्म नाषयितुं क्षमा नान्यत्र द्वीप समुद्रेशु।................... तथैव नानाविधाः कर्मप्रकृतयः।” “त पुण अट्ठविह। व अडदालसयं असंखलोग वा इति वचनात् असंख्य लोकप्रमाण कर्माणि। एवमेव सम्यक्त्वोत्पत्तये लब्धयः प×च विधाः (क्षयोपषम-विषुद्धी- देषना-प्रायोग्य-करण)।”

उपरोक्त तो उपलक्षण मात्र है पूज्य माता जी का अभिप्राय है कि करणानुयोग चरणानुयोग सापेक्ष द्रव्यानुयोग ही कार्यकारी है, अकेला नहीं। चारों अनुयोगों की सार्थकता है तथा चारों की ही सापेक्षता है, कहा भी है।

द्रव्यानुसारि चरणं चरणानुसारि

द्रव्यं मिथो द्वयमिंदं ननु सव्यपेक्षः।
तस्मान्मुमुक्षुरधिरोहतु मोक्षमार्गं

द्रव्यं प्रतीत्य यदि वा चरणं प्रतीत्य।।

चरणानुयोग द्रव्यानुयोग का अनुसारी है, सापेक्ष है ओैर द्रव्यानुयोग चरणानुयोग का, यदि ये परस्पर निरपेक्ष हैं तो मिथ्या हैं अतः मुमुक्षु को चाहिए कि मोक्षमार्ग पर किसी भी एक को प्रमुख करके अग्रसर हों |

द्रव्यस्य सिद्धौ चरणस्य सिद्धिः

चरणस्य सिद्धौ द्रव्यस्य सिद्धिः।
बुदध्वेति कर्माविरता परेऽपि

द्रव्यानुसारं चरणं चरन्तु ।।

द्रव्यानुयोग की सिद्धि में चरणनुयोग की सिद्धि है एवं चरणानुयोग की सिद्धि में द्रव्यानुयोग की, ऐसा जानकर कर्म से अविरत भी अर्थात जो मन-वचन काय की प्रवृति में रत हैं उन्हें द्रव्यानुयोग के अनुसार आचरण करना चाहिए। अर्थात तत्वाभ्यास पूर्वक द्रव्यानुयोग के सापेक्ष आचरण करना चाहिए। दोनों ही एक दूसरे के अविरुद्ध हों।

इसी प्रकार आगम में चारों अनुयोगों की उपयोगिता निरूपित है। उपरोक्त भाव को दृश्टिगत कर माता जी कृत स्याद्वाद चन्द्रिका टीका चतुरनुयोग की माता की भाँति रचित है। यहाँ प्रबन्ध के प्रकरण में करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग के परिक्ष्रे्रय में टीका में प्रकटित जैन सिद्धान्त अहिंसा, अनेकान्त अपरिग्रह का विवेचन चल रहा है। प्रथमानुयोग की समश्टि का अभिप्राय ग्रन्थ विस्तार के भय से यहाँ नहीं रखा जा रहा है। अनेकान्त का पृथक् से शर्शक अनेकान्त एवं स्याद्वाद नय निरूपण में दृश्ट ही है। यह तो इस ग्रन्थ का मूल रूप से विवेचनीय है। निष्चय परमावष्यक प्रकरण में टीकाकत्र्री का मुमुक्षु साधु को तात्पर्य रूप में निम्न आध्यात्मिक सन्देष अति प्रभावक ज्ञात होता है।

”यहाँ तात्पर्य यह हुआ कि परम आसन्न भव्यवर और श्रेश्ठ जीव पचेन्द्रियों के अप्रषस्त-प्रषस्त व्यापार, ख्याति, लाभ, पूजा, निदान आदि विभाव भावों को और अन्य जनों के सम्पर्क को छोड़कर शुद्ध बुद्ध नित्य निर×जन ज्ञानघन निज परमात्मा में तिश्ठते हैं, स्वयं अपने द्वारा अपने लिए, अपने से आप में स्थित होकर अपना ध्यान करते हैं अनुभव करते हैं वे ही गुरु षिश्य आदि के साथ वचनालाप में (परतृप्ति में) भी अनादर करके अन्तरं और बहिरंग रूप से मौन का अवलंबन लेकर स्वस्थ चित्त हो जाते हैं। ऐसा जानकर अपनी प्रारम्भिक अवस्था में भी यथाषक्ति मौन का आश्रय लेकर आवष्यक क्रियाओं में प्रवत्र्तन करना चाहिए।”

करण परिणामों को भी कहते हैं। आगम में करणानुयोग के अन्तर्गत यह विवेचन है कि घातिया कर्मों की सैंतालिस तथा अघातियों की सोलह कुल त्रेसठ प्रकृतियो के क्षय से केवल ज्ञान उत्पन्न होता है अरिहन्त अवस्था प्रकट होती है। इन त्रेसठ प्रकृतियों के नाष क्रम को स्याद्वाद चन्द्रिका की मान्य लेखिका ने आकर्शक ढंग से विवेचन किया है, दृश्टि बरबस उस ललित पद पर आकर्शित हो जाती हैं अपेक्षणीय है शुद्धोपयोग अधिकार वे अन्तर्गत गाथा क्रमांक

”इतो विस्तरः - ये केचिद् महानुयोगिनो भेदाभेदरत्नयबलेन वीतराग- निर्विकल्पपरमसमाधे पुनः पुनः अभ्यासं कुर्वन्ति, ते एव क्षपकश्रेण्यारोहणे सक्षमाः सन्तः त्रिशश्ठिप्रकृतीः समुन्मूल्य (निर्मूल्य) केवलिनो भवन्ति। इमां प्रकृतीः नाषयितुं क्रमः प्रदष्र्यते। असंयतसमयग्दृश्टिदेषसंयतप्रमत्ताप्रमत्तानाम् चतुर्थगुणस्थानेश्वन्यतमे अनन्तानुबन्धिचतुश्कं दर्षनमोहत्रिकं च क्षयं नीत्वा क्षायिकसम्यग्दृश्टिर्जायते। स यदि चरमदेह स्तर्हि तस्यायत्नसाध्यो नरकतिर्यग्देवायुशामभावोऽस्ति। य एव परमानन्दपीयूश- पिपासुः महामनिः क्षपकश्रेणिमारुह्यापूर्वकरणेऽपूर्वपरिणामबलेनापूर्वषक्तिं संचिन्वन अनिवृत्तिकरणे स्थित्वा नरकद्विकतिर्यगद्विकविकलत्रिकस्त्यानगृद्धिप्रचलाप्रचलानिद्रा- निद्रोद्योतातपैकेन्द्रियसाधारणसूक्ष्मस्थावराप्रत्याख्यानवरणचतुश्कनपंसकस्त्रीवेदहास्य- रत्यरति“शोकभयजुगुप्सापुरुशवेदसंज्वलनक्रोधमानमायानामधेयाः शट्त्रिंषत् प्रकृतीः क्षपयति। पुनः स एव सूक्ष्मसाम्पराये गत्वा संज्वलनलोभं निपात्य मोहनीयं सर्वथा निर्मूल्य तत् उपांत्यक्षीणमोहे स्थित्वा निद्राप्रचलाज्ञानावरणप×चकदर्षनावरणचतुश्कान्त- रायपचकं शडषप्रकृतीः प्रलयं नीत्वा सर्वपदार्थसार्थसाक्षात्करणक्षमो विघटितजल- धरपटलप्रकटितगभास्तिमाली इव ज्वलितज्ञानमूर्तिः केवली भवति।“

अर्थ - जो कोई महायोगी भेद-अभेद इन दोनों रत्नत्रय के बल से वीतराग निर्विकल्प समाधि का पुनः पुनः अभ्यास करते हैं, वे क्षपक श्रेणी आरोहण करने में समर्थ होने से त्रेसठ प्रकृतियोंका निर्मूल नाष कर केवली हो जाते हैं। इन प्रकृतियों के नाष करने का क्रम दिखलाते हैं।

अंसयत सम्यग्दृश्टि, देषसंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रत्तसंयत इन चार गुणस्थानों में से किसी एक में अनन्तानुबन्धी की चार और दर्षनमोहनीय की तीन ऐसी सात प्रकृतियों का नाष कर क्षायिक सम्यग्दृश्टि होते हैं। यदि ये चरम शरीरी हैं तो इनके नरकायु, तिर्यच और देवआयु का अभाव बिना प्रयत्न के ही हो जाता है। वे ही परमानन्द अमृतपान के इच्छुक महामुनि क्षपक श्रेणी में चढ़कर अपूर्वकरण गुणस्थान में अपूर्व परिणाम के बल से अपूर्व शक्ति का सचय करते हुए अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में स्थिर होकर 36 प्रकृतियों का नाष कर देते हैं। उनके नाम बताते हैं नरकगति, नरकगत्यानुपूवी, तिर्यचगति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, स्त्यानगृद्धि, प्रचलाप्रचला, निद्रानिद्रा, उद्योत, आतप, एकेन्द्रिय, साधारण, सूक्ष्म, स्थावर, अप्रत्याख्यानावरणक्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यानावरणक्रोध, मान, माया लोभ, नपुसंकवेद, स्त्रीवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जगुप्सा, पुरुशवेद, संज्वलन, क्रोध, मान और माया ये 36 प्रकृतियाँ है।

पुनः वे ही महामुनि सूक्ष्म साम्पराय गुणस्थान में पहुँचकर बचे हुए एक संज्वलन लोभ को नश्ट कर देते हैं। इस प्रकार वे मोहनीय कर्म का सदा निर्मूलन करके आगे क्षीण कशाय नाम के बारहवें गुणस्थान में पहुँचकर वहाँ पर निद्रा, प्रचला, ज्ञानावरण की पाँच दर्षनावरण की चार और अन्तराय की पाँच ऐसी सोलह प्रकृतियों को समाप्त कर सम्पूर्ण पदार्थों के समूह को साक्षात् करने में समर्थ मेघपटल के हटने पर प्रकट हुए सूर्य समान जाज्वल्यमान ज्ञान की मूत्र्तिस्वरूप केवली हो जाते हैं।“

आचार्य कुन्दकुन्द ने शुद्धोपयोगाधिकार में ज्ञान और दर्षन के विशय में विभिन्न तर्कों के आधार पर गवेशणात्मक व्याख्यान किया है तथा सिद्धान्त व न्याय ग्रन्थों से मान्य लक्षणों का खंडन भी किया है।1 सिद्धान्त सूत्रों में ज्ञान को पर प्रकाषक एवं दर्षन को स्वप्रकाषक निरूपित किया है। न्याय ग्रन्थों में सत्ता मात्र अवलोकन को दर्षन और विषेश धर्म के ग्रहण को ज्ञान कहा गया है।2 अध्यात्म में भेद-अभेद व्यवहार निष्चयों की अपेक्षा से कुन्दकुन्द ने लक्षण निरूपित किये हैं।

उपर्युक्त समस्त विशय को पू० माता जी ने गाथा क्रमांक 159 से 172 तक की टीकाओं में अत्यधिक स्पश्ट किया है। यहाँ हम एतद् विशयक सारांष रूप में हिन्दी अनुवाद की कतिपय पंक्तियाँ प्रस्तुत करते हैं ताकि ग्रन्थ विस्तार भी अधिक न हो और सामान्य पाठक या श्रोता भाव हृदयंगम कर सकें। गाथा 170 के अन्तर्गत दृश्टव्य है।

”यहाँ पर कोई प्रारम्भिक षिश्य सिद्धान्त सूत्र में प्रतिपादित ज्ञान को पर प्रकाषक तथा अध्यात्म भाशा में कथित व्यवहार नय के अभिप्राय को पढ़कर परस्पर सापेक्ष नयों को न समझ कर एकान्त से मानता है कि केवली भगवान भी अपनी आत्मा को नहीं जानते हैं बस लोकालोक को ही प्रकाषित करते हैं उसी को सम्बोधित करने के लिए ग्रन्थकार ने कहा हेै कि ज्ञान आत्मा से अभिन्न है और दर्षन भी आत्मा से अभिन्न है इसलिए अभेद नय से इन दोनों से अभिन्न आत्मा भी सभी स्वपर वस्तु समूह को जानता है। टीकाकत्र्री द्वारा कृत समाधानात्मक वर्णन द्वारा अवधारणीय है।

पृश्ठ 489 - तात्पर्य यह है सिद्धान्त-न्याय और अध्यात्म ग्रन्थों के अनुसार ज्ञानदर्षन में लक्षण भेद होने पर भी अभिप्राय को समझ लेने से परस्पर में विरोध नहीं आता है बल्कि पृथक् विवक्षा से विचार करने पर गुण ही है। अधिक कहने से क्या केवलियों के ज्ञान दर्षन सुख आदि अनन्त है और अचिन्त्य है।

एतद् विशयक पूर्ण जानकारी स्याद्वाद चन्द्रिका का अध्ययन करने पर ही हो सकेगी। माता जी ने इस रूक्ष न्याय-विशयक चर्चा को अत्यन्त विस्तार से रोचक “ौली में “ाास्त्रीय उद्धरणों सहित प्रस्तुत किया है। यह ग्रन्थ में अवष्यमेव पठनीय है।

गाथा क्रमांक 172 में कुन्दकुन्द स्वामी ने कहा है कि केवली के जानना और देखना इचछापूर्वक नहीं है अतः वे अबन्धक हैं। ठीक भी है मोह कर्मोदय से उत्पन्न इच्छा स्नेह या तेल के समान है तेल से चिकने हुए घड़े पर जैसे धूल चिपक जाती है उसी प्रकार इच्छावान रागी आत्मा के कर्म का उपष्लेश रूप बन्ध हो जाता है।

ज्ञातव्य है कि बन्ध या संबन्ध चार प्रकार का माना जा सकता है। 1. संयोग 2. समवाय 3. “लेश 4. तादात्म्य । “लेश सम्बन्ध देा प्रकार का है। 1. संष्लेश 2. उपष्लेश। दो पृथक भिन्न वस्तुओं का मात्र सम्पर्क होना संयोग है जैसे राम से “याम की भेंट। दो भिन्न वस्तुओं का जुड़ना वह भी पृथक् रहते हुए। एक यदि क्रिया करता है तो दूसरे को भी क्रिया में साथ सक्रिय होना पड़ता है। वाह्य समवाय कहलाता है उतहरणार्थ - किसी व्यक्ति द्वारा पहने हुए कुत्र्ते का सम्बन्ध, अन्तरंग समवाय जैसे इन्जैक्षन शरीर में प्रविश्ट होने वाली औशधि का व्यक्ति से सम्बन्ध अन्तरंग समवाय कहा जा सकता है। ग्र्रन्थों में आत्मा और शरीर के सम्बन्ध को भी समवाय संबंध कहा गया है। वह अपेक्षा भेद से स्वीकार्य है। “लेश के दो भेदों में यहाँ स्थूल शरीर और आत्मा के सम्बन्ध को भी समवाय संबन्ध कहा गया है। वह भी अपेक्षा भेद से स्वीकार्य है। “लेश के दो भेदों में यहाँ स्थूल शरीर और आत्मा के सम्बन्ध को संष्लेश और सूक्ष्म कर्माण शरीर या अश्टकर्म परिणत (द्रव्य कर्म) से आत्मा के सम्बन्ध को उपष्लेश सम्बन्ध कह सकते हैं। “लेश सम्बन्ध को दूध और पानी के सम्बन्ध की तरह जानना चाहिए। इनका एकक्षेत्रावगाह सम्बन्ध है। वे तुरन्त पृथक् नहीं किये जा सकते। तादात्म्य सम्बन्ध द्रव्य और उनके परिणाम या पर्याय का होता है जिसमें प्रदेष भिन्नता का अभाव होता है। यह भी दो प्रकार का सम्भावित है। 1. क्षणिक तादात्म्य, 2. त्रेकालिक तादात्म्य। क्षणिक तादात्म्य जैसे जीव और रागद्वेश आदि पर निमिक्तक (औपाधिक) भाव अथवा जल का उश्णता से तादात्म्य। त्रैकालिक तादात्म्य जैसे जल की शतलता। (यहाँ जल और उसके पर निरपेक्ष स्वभाव “ाीतलता का सम्बन्ध अपेक्षित है।)

पू० माता जी ने इच्छा के अभाव में केवली भगवान के कर्म बन्ध रूप सम्बन्ध (उपष्लेश) के अभाव का निम्न पक्तियों में सोदाहरण वर्णन किया है। वह दृश्टव्य है - (गाथा 172 के अन्तर्गत हिन्दी अनुवाद)

”उसे ही कहते हैं चाहता है या चाहना मात्र ईहा है उसे ही इच्छा कहते हैं वह मोहनीय कर्म के निमित्त से होती है, केवली भगवान के मोहनीय कर्म का अभाव होने से वे सर्वथा इच्छा के बिना ही सब कुछ जानते और देखते हैं। जैसे दर्पण में स्वच्छता गुण का सद्भाव होने से उनके सम्मुख आये हुए पदार्थ स्वयं ही प्रतिविम्बित हो जाते हैं, उसी तरह केवली भगवान के स्वच्छ ज्ञान गुण में सारा जगत झलकता रहता है। इसी कारण उनके कर्म बन्ध नहीं होता है।“

उपरोक्त वर्णन कितना स्पश्ट और सटीक है। टीकाकत्र्री ने सिद्धान्त एवं अध्यात्म विशय की प्रायः प्रत्येक बात को स्वरूपावबोधन की पराकाश्ठा तक पहुँचाने का प्रयत्न किया है। साता प्रकृति के एक समय स्थिति वाले बन्ध की स्वीकृति होने से भी केवली के अबन्धकपने को करणानुयोग के परिप्रेक्ष्य में माता जी ने विशय खुलासा किया है उन्हीं के शब्दों में प्रकट करने का लोभ सम्वरण न कर पाने के कारण यहाँ उद्धृत करता हूँ -

”दूसरी बात यह है कि वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति भी बारह मुहूत्र्त है।1 इसलिए स्थिति और अनुभाग बन्ध के अभाव में प्रकृति और प्रदेष बन्ध कुछ हानि नहीं कर पाते हैं इसी हेतु से केवली के कर्म बन्ध नहीं है। समयसार को पढ़कर जो कोई ऐसा कहते हैं कि हम लोग सम्यक् दृश्टि हैं हमको बन्ध नहीं हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं है क्योंकि वीतराग यथाख्यात चारित्र से सहित वीतराग सम्यग्दृश्टि महापुरुशों के ही अबन्ध की व्यवस्था घटित होती है।“

यही आषय आ० अमृतचन्द्र जी लिखित समयसार कलष में निम्न प्रकार पाया जाता है -

सम्यग्दृश्टिः स्वयमयमहं जातु बन्धो न मे स्यात्।

इत्युत्तानोत्पुलकवदना रागिणोप्याचरन्तु।।
आलम्बन्तां समिति परतां ते यतोऽद्यापि पापाः।

आत्मानात्मावगमविरहात् सन्ति सम्यक्त्वरिक्ताः।।

जो स्वंय, मैं सम्यग्दृश्टि हूँ मुझे बन्घ नहीं है ऐसा कहकर ऊँचा सिर कर तथा गर्व से मुँह फुलाये हैं और साक्षात् रागी हैं वे पाँच समितियों का पालन करते हुए भी पापी हैं। आत्मा अनात्मा के ज्ञान (भेद विज्ञान) से रहित होने कारण सम्यक्त्व से शुन्य अर्थात मिथ्या दृश्टि हैं। जब मुनि भी उक्त स्थिति में सम्यक्त्व शुन्य है तो गृहस्थ किस खेत की मूली है।

पू० माता जी के अनुसार उक्त सम्पूर्ण कथन का तात्पर्य यह है कि सराग सम्यग्दृश्टि और सराग संयत शुद्धनय से तो अबन्धक हैं किन्तु व्यवहार नय से अपने अपने गुणस्थान से पूर्व विच्छिन्न (पृथक्) हुई अनन्तानुबन्धी मिथ्यात्व आदि प्रकृतियों के अबन्धक, प्रकृतियों के बन्धक ही होते हैं न कि सर्वथा अबन्धक। यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि संसारी अवस्था में शुद्धनय का विशय शक्ति रूप है तथा व्यवहार नय का विशय व्यक्त रूप है। ऐसा जानकर नय विवक्षा से सिद्धान्त के अर्थ को निर्णीत करके आपको वैसी ही प्रवृति करनी चाहिए कि जिस प्रकार तुम्हारे भी अल्प स्थिति व अनुभाग वाले ही कर्म बँध सकें।

गाथा सं० 175 की टीका में अरिहन्त भगवान के चैतीस अतिषयों का उल्लेख किया गया है। प्रायः सभी ग्रन्थों में जन्म के 10, केवल ज्ञान के 10 देवकृत 14 अतिषय वर्णित है माता जी ने तिलोयपण्ण्ति1 आधार पर केवल ज्ञान के 11 एवं देवकृत 13 अतिषयों को पृथक् पृथक् नामोल्लेख सहित निरूपित किया है। सर्वभाशागर्भितपने को देवकृत के स्थान पर केवलज्ञान के अतिषयों में समाविश्ट किया है। माता जी ने कहा है -

”ते जिनाः इच्छामन्तरेणैव तिश्ठन्त्युपविषन्ति, निशीदन्ति, श्रीविहारं कुर्वन्ति।“
अर्थात् वे भगवान इच्छा के बिना ही ठहरते हैं, बैठते हैं तथा खडे़ होते हैं और श्री विहार करते हैं। उस समय माता जी ने श्री विहार शब्द का प्रयोग किया। विदित होता है कि उनके मन में सम्पूर्ण भारत में जिनेन्द्र प्रभु के विषेश तौर से प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋशभदेव के श्री विहार (समोसरण बिहार) की मंगलमयी कामना पूर्व से ही विद्यमान थी। एतदर्थ ही वर्तमान में उनकी परिपक्व धारणा से इस वर्श प्रधानमंत्री माननीय श्री अटल बिहारी बाजपेयी के द्वारा समवसरण ‘श्री विहार’ दिल्ली से प्रारम्भ हो सका। धर्म प्रभावना का यह उत्कृश्ट रूप प्राचीनतम जैन परम्परा के पोशण हेतु स्तुत्य प्रयास कहा जावेगा। माता जी की सूझ बूझ जैन धर्म हेतु प्रषंसनीय है।

प्रस्तुत नियमसार टीका क्रमांक 176 के अन्तर्गत अयेाग केवली भगवान के मनुश्यायु कर्म के नाष होने से 84 एवं कुल 85 प्रकृतियों के नाम सहित उनके क्षय का क्रम लेखिका ने उपयोगी अनुभव कर आगमानुसार वर्णित किया है। द्धिचरम समय में 72 एवं चरम समय में 13 प्रकृतियों का नाष कर अयोगी जिन मुक्त होकर ऊध्र्वगमन करके लोकाग्रषिखर पर विराजमान हो जाते हैं। इस स्थल पर माता जी ने श्री महावीर भगवान के निर्वाणोत्सव का प्र्रसंग वष विस्तृत वर्णन भी किया है। प्रस्तुत गाथा के हिन्दी भावार्थ में उनके शब्द अवलोकनीय है।

भावार्थ - इस गाथा की टीका लिखते समय मुक्ति गमन का वर्णन चल रहा था। उसी दिन भ० महावीर के निर्वाण कल्याण की पूजा हुई थी अतः उन भगवान का और निर्वाण गमन एवं दीपावली मनाने का प्रकरण सामने होने से इस टीका में समयोचित वर्णन ले लिया है उनके शब्दों में हम सभी को यह भावना करनी चहिए, समस्त धर्म का सार यही है। वे शब्द निम्नलिखित हैं।

”भगवान्महावीरस्वामिपादपùप्रसादान्ममापि एतादृषी सिद्धिपदप्राप्तिकरणक्षमा शक्तिर्भूयात्।“

भ० महावीर के पदमकमल प्रसाद से मुझे भी ऐसी सिद्ध पद प्राप्त कराने में समर्थ शक्ति प्राप्त होवे।

यहाँ कर्म सिद्धान्त के प्रकरण का यह समयानुसार निर्वाणोत्सव वर्णन एक उदाहरण स्वरूप परिगणित किया जायेग।

सिद्ध भगवान के स्वरूप निरूपण में आ० कुन्दकुन्द स्वामी ने अन्य विषेशताओं के साथ उनका लोकाग्रपर्यन्त गमन निरूपित किया है। प्रकृत लोक का वर्णन माता जी ने इसी गाथा 183 के अन्तर्गत करणानुयोग प्ररूपक त्रिलोकसार के आधार से प्रस्तुत किया है। वह अवष्य ही पठनीय है। इस स्थल में लोकाकाष के तीन भेदों ऊध्र्व, अधः, मध्य का परिमाण (आयाम, विस्तार आदि) का वर्णन जैन भूगोल के अनुसार किया गया है। पृश्ठ 524 का अवलोकन करना इस विशय में अभीश्ट है। इसी प्रकार ईशत् प्राग्भार नामक आठवीं पृथ्वी का विस्तार आकृति तथा सिद्ध षिला का परिमाण व आकृति आदि का प्ररूपण त्रिलोकसार के अनुसार किया गया है।

आचार्य कुन्कुन्द देव ने प्रस्तुत गाथा 183 में उल्लेख किया है कि निर्वाण ही सिद्ध है और जो सिद्ध है वही निर्वाण है। इसकी टीका करते हुए आचार्य पùप्रभ- मलधारिदेव ने अपनी तात्पर्यवृति नामक महनीय कृति में निम्न उल्लेख किया है -

”सिद्धाः सिद्धक्षेत्रे तिश्ठन्तीति व्यवहारः, निष्चयतो भगवन्तः स्वस्वरूपे तिश्ठन्ति“
अर्थात् सिद्ध भगवान् व्यवहार से सिद्ध क्षेत्र में निवास करते हैं और निष्चय से स्वस्वरूप में ठहरते हैं। इस विशय को माता जी ने और स्पश्ट करते हुए कथन किया है। उन्होंने यहाँ व्यवहार को भेदग्राही व्यवहार नय के रूप में प्रकट किया है क्योंकि यहाँ भेद कथन की विवक्षा है। निर्वाण क्षेत्र और मुक्त जीव के भेद का वर्णन करके निरूपण करना भी इश्ट प्रतीत होता है। परम्पराचार्यों ने भी किसी विवक्षित नय निरूपण में अन्य विरोधी नय का दृश्टिकोण प्रस्तुत करने का मार्ग अपनाया है। अस्ति और नास्ति, उभय कोटि का दिग्दर्षन करने से वस्तुस्वरूप का निर्णय करना अधिक ज्ञान वर्धक है। इस उपरोक्त विशय का माता जी के “ाब्दों में अनुषीलन करणीय है -
”अथवा सिद्धा क्व तिश्ठन्ति इति प्रष्ने निर्वाण स्थाने सिद्धक्षेत्रे वा तिश्ठन्ति इति भेद कथनं पुनष्चाभेदकथनेन सिद्धाः स्वेशु तिश्ठन्ति, अत्र सिद्धनिर्वाणयोर्भेदो नास्ति।“'

इसके अतिरिक्त स्याद्वाद चन्द्रिका में प्रस्तुत भेद कथन रूप व्यवहार को भी दो रूपों में प्रस्तुत किया गया है अर्थात् व्यवहार से सिद्ध षिला निर्वाण क्षेत्र है, उसी तरह व्यवहार से ही जिस क्षेत्र से शरीर का परित्याग करके मुक्त हुए वह भी निर्वाण क्षेत्र है। पू० माता जी की सूक्ष्म वर्णन शैली सिद्धान्त के हार्द को प्रकट करने वाली है।

जैन धर्म में तीन लिंग (वेश) पूज्य माने गये हैं1। 1. यथा जात मुनि रूप 2. आर्यिका (श्रमणी) का रूप 3. उत्कृश्ट श्रावक क्षुल्लक, क्षुल्लिका, ऐलक का वेश। इनका वाह्य चिन्ह पीछी कमण्डलु होता है जिससे उपासक निर्वाह करता है। यहाँ आर्यिका पद को श्रावक पद से पृथक् निरूपित किया गया है। उत्कृश्ट श्रावक से निम्न कोई दर्षनीय लिंग सम्भव नहीं है एवं आर्यिका को उपचार से महाव्रती स्वीकार कर मुनि की क्रियाओं से समानता निर्दिश्ट की गई है। वस्त्र धारण, मुख्य अन्तर करने वाले चिन्ह को छोड़कर अन्य क्रियाओं का अन्तर मुनि और आर्यिका के मध्य अल्प ही है। अतः यह स्पश्ट निर्णीत है कि आर्यिका का लिंग क्षुल्लक ऐलक से अवष्य ही उच्च है। साधु को श्रमण एवं आर्यिका को श्रमणी कहा जाता है। संघ परम्पराओं में क्षुल्लक ”आदि श्रावक आर्यिका माता को वन्दामि कहकर पूज्य मानते हैं इतना अवष्य है कि आर्यिकाओं का गुणस्थान आगम में पंचम ही माना गया है अतः वे उपचार से महाव्रती हैं। उनके कुछ आतापन योग आदि को छोड़कर अधिकांष गुण और क्रियायें मुनि के समान ही हैं। एतद् विशयक प्रष्न जन मानस में उत्पन्न होते हैं। पूज्य माता जी जिन आज्ञा लोप करने में अत्यन्त भयभीत हैं। उन्होंने स्याद्वाद चन्द्रिका के अन्तर्गत इस प्रकरण पर विहंगम दृश्टिपात आगम के आलोक में प्राचीन आचार्यों के मूलाचार आदि ग्रन्थों के उद्धरण प्रस्तुत करते हुए यथास्थान किया है। नियमसार की अन्तिम गाथा में आर्यिका-स्वरूप, अधिकार, अनधिकार आदि के विशय में पृश्ठ 540-545 पर यह अवष्य दृश्टव्य है। ग्रन्थ विस्तार के भय से यहाँ प्रस्तुत नहीं कर रहा हँू। यह प्रकरण ‘षंका समाधान’ “शीर्शक के अन्तर्गत निरूपित करेंगे।

हमने उपरोक्त प्रकार संक्षेप में यहाँ स्याद्वाद चन्द्रिका में वर्णित अध्यात्म, सिद्धान्त, धर्म और दर्षन का विवेचन द्रव्यानुयोग, करणानुयोग के परिप्रेक्ष्य में किया है। वस्तुतः पूज्य माता जी की प्रस्तुत कृति का गुण वर्णन, स्तुति हम करने में असमर्थ हैं। गुणों को बढ़ा चढ़ाकर कथन करने को स्तुति कहते है। टीका अगणित गुण हैं। जितने अक्षर हैं उनसे भी अधिक भाव एवं अन्य गुणसमुदाय उनमें भरा हुआ है। उनका वर्णन इस सीमित शोध प्रबन्ध में समाहित नहीं हो सकता है। अतः इस वर्णन को हम नाम मात्र का उल्लेख-स्मरण ही मानते हैं।

स्याद्वाद चन्द्रिका में वर्णित सिद्धान्त माता जी के प्रवचन-वात्सल्य का ही परिणाम है। इसमें उनके जैन तत्त्वज्ञान के दान की उत्कृश्ट भावना स्पश्ट दिखाई पड़ती है वस्तुतः जिन सैद्धांतिक विशयों की चर्चा इस टीका में उन्होंने की है वे सभी विशय अति उपयोगी हैं। अहिंसा, अनेकान्त और अपरिग्रह जैन धर्म की नींव है इनका विस्तृत रूप से पल्लवन प्रस्तुत कृति में हुआ है। अपरिग्रह के धनी ऋशियों का ही अभिप्रेत यह ग्रन्थ है इसकी चर्चा हमने यथा स्थान की ही है ‘आचरणपक्ष’ में भी यह अवलोकनीय है। ‘अनेकान्त एवं स्याद्वाद निरूपण हेतु इससे अनंतर द्वितीय दृश्टव्य है वहाँ विस्तार से यह चर्चित है।