ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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20 - उपयोग प्ररूपणासार

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उपयोग प्ररूपणासार

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जीव का जो भाव वस्तु को ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त होता है उसको उपयोग कहते हैं। इसके दो भेद हैं—एक साकार दूसरा निराकार। साकार को ज्ञान और निराकार को दर्शन कहते हैं।

ज्ञान के पाँच भेद हैं और अज्ञान के तीन भेद हैं। मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय, केवलज्ञान, कुमति कुश्रुत, कुअवधिज्ञान।

दर्शन के चार भेद हैं—चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन। इनका वर्णन ज्ञानमार्गणा में आ चुका है। उपयोग चेतना का एक परिणमन है। यह छद्मस्थ जीवों में अधिक से अधिक अंतर्मुहूर्त तक ही रह सकता है। चार ज्ञान, तीन अज्ञान और तीन दर्शन क्षायोपशमिक हैं तथा केवलज्ञान और केवलदर्शन क्षायिक है। छद्मस्थ-जीवों में एक साथ दो उपयोग नहीं हो सकते हैं किन्तु केवली भगवान में एक साथ केवलज्ञान, दर्शन ये दोनों उपयोग होते हैं और ये शाश्वत, अनंत काल तक रहते हैंं। केवली भगवान और सिद्ध इन उपयोगों के द्वारा समस्त लोक, अलोक और उनकी भूत, भविष्यत, वर्तमानकालीन सभी पर्यायों को एक समय में युगपत् देखते और जानते हैं।

इस प्रकार गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणा और उपयोग इन बीस प्ररूपणाओं का संक्षिप्त वर्णन किया गया है।

सिद्ध भगवान चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमास, चार संज्ञा, छह पर्याप्ति, दश प्राण इनसे रहित होते हैं तथा इनके सिद्धगति, केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिक सम्यक्त्व और अनाहार को छोड़कर शेष नौ मार्गणाएँ नहीं पायी जाती हैं अर्थात् गति, ज्ञान, दर्शन, सम्यक्त्व और आहार मार्गणा के अतिाqरक्त इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, संयम, लेश्या, भव्यत्व, संज्ञी ये नौ मार्गणायें सिद्धों में नहीं हैं। सिद्धों में पाँच मार्गणा और केवलज्ञान, दर्शन, उपयोग ये विद्यमान हैं। ये सिद्ध सदा ही शुद्ध रहते हैं क्योेंकि मुक्ति प्राप्ति के बाद पुन: कर्मबंधन नहीं होता है।

जो भव्य जीव उक्त गुणस्थानादि बीस भेदों को (प्ररूपणाओं को) निक्षेप, एकार्थ (असाधारण लक्षण) नय, प्रमाण, निरुक्ति, अनुयोग आदि के द्वारा जान लेता है वही आत्मा के सद्भाव को समझता है अर्थात् जो भव्य जीव गुणस्थान, जीवसमास आदि बीस प्ररूपणाओं को प्रमाण, नय आदि से अच्छी तरह से समझ लेते हैं वे ही भव्य अपनी आत्मा के अस्तित्व को समझकर आत्मदया के साथ-साथ परदया का पालन करते हुए शीघ्र ही बीस प्ररूपणाओं में से छह प्ररूपणा से सहित एवं चौदह प्ररूपणा से रहित शाश्वत सिद्धधाम में विराजमान हो जाते हैं और वहाँ अनंतानंत काल तक पूर्ण ज्ञान में मग्न रहते हुए पूर्ण अक्षय सौख्य का उपभोग करते रहेंगे।