ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

21. सीता ने शील के प्रभाव से अग्नि का जल बना दिया

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
सीता ने शील के प्रभाव से अग्नि का जल बना दिया

(२३६)

फिर क्या था मेषकेतु सुर ने, अग्नी को जल में बदल दिया।
सिंहासन लगा कमल ऊपर, सीता को उसपे बिठा दिया।।
जल में जब लगे डूबने सब, सीता सम्मुख दौड़े आए।

अब क्षमा करो अब दया करो, आवाजें देकर चिल्लाए।।
(२३७)

रघुवर चरणों को छू करके,वह जल थल में था बदल गया ।
हो गया दंग था हर दर्शक,जनता का सुर भी बदल गया।।
बिजली सी फैल गयी कीरत, हो गयी धन्य जीवन बेला।

सीता की शील प्रशंसा का,था वहां नजारा अलबेला।।
(२३८)

लवकुश ममता में खिंचे हुए, आ गए पास में माता के ।
कर फेर—फेर कर प्यार किया, आशीष दिए सुख सीता के ।।
भारी अनुराग युक्त रघुवर,सीता से आकर कहते हैं।

हे देवि! क्षमा करो मुझको, जो कहो वही कर सकते हैं।।


(२३९)

तुम राज्य करो सब पर चलकर, मुझपर भी शासन करो प्रिये।
जो—जो स्थान तुम्हें प्रिय हों, चल करके तुम्हें घुमाऊँ मैं।।
अब क्रोध छोड़कर हे सीते! मेरे अपराध क्षमा कर दो।

मुझको प्रायश्चित्त करने का, बस एक बार तुम मौका दो।।