ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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22. अपुत्रीन को तू भले पुत्र दीने

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अपुत्रीन को तू भले पुत्र दीने

(काव्य सत्ताइस से सम्बन्धित कथा)
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बिना फल का वृक्ष स्वयं को सन्तति विहीन समझकर मुरझा जाता है।कुमुदिनी रहित सरोवर उत्तुंग लहरों के स्थान पर मंद प्रवाह से बहता है।वही हाल राजा हरिशचन्द्र और उनकी धर्मपत्नी चन्द्रमती का था सन्तान का अभाव उन्हें चौबीसों घंटे संतप्त किये रहता था। कई मुस्टंडे पंडे और पुजारी राजा साहब के यहाँ पुत्र-यज्ञ के नाम घी, मिश्री और शक्कर उड़ा रहे थे और कई छद्मवेषी साधु रानी की मनोरथ की सिद्धी के लालच में ठग रहे थे। पीर पैगम्बर और औलियाओं की मिन् नतें-मनौती मनाई जा रही थी। एक दिन एक तपस्वी भिक्षा मांग कमर बोले-‘‘सौभाग्यवती पुत्री राजरानी होकर भी दुखी क्यों हो?’’ रानी चन्द्रमती ने अपना मनोरथ कहा तो साधु महाराज बोले-‘‘तुम्हें पिछले जन्म का साधुओं का प्रकोप है! बेटी! अब हम साधुओं को इस जन्म में इच्छानुसार दान दो, यह प्रकोप दूर हो सकता है और तब तुम्हारी सभी कामनायें फलवती हो सकती है।’’जटाजूटधारी साधु महाराज की बात रानी को जँच गई। फिर क्या था? वे यहाँ मिष्ठान भोजन पर हाथ साफ करने में जुट पड़े; और यह क्रम कई दिनों तक चलता ही रहा। साधु महाराज कुछ लालची प्रकृति के थे।सो हवन शान्ति के दिन इतना भोजन पा गये कि उनका उठना-बैठना दूभर हो गया। राजवैद्यों के उपचारों के बावजूद साधु महाराज फिर उठकर खड़े ही न हो सके। सच तो यह है कि ‘‘ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता ही गया।’’ साधु महाराज को बचाने के सारे प्रयत्न निष्फल सिद्ध हुए। रानी चन्दमती के माथे एक और साधु प्रकोप भड़का।उनका शरीर चेतनता शून्य हो गया।

ज्योतिषी जी भी एक दिन आकर बोले-‘‘शनिग्रह तुम्हारे विपरीत है रानी जी! यदि पवित्र मन से सौ ब्राह्मणों को भोजन और राज्य ज्योतिषियों को उनके इच्छानुसार दान-दक्षिणा दो तो शनि-देवता तुम्हारे अनुकूल हो सकता है?’’ राजवैद्य ने सलाह दी कि स्वर्ण-दान और स्वर्ण-भस्म का सेवन आपके लिये उपयुक्त रहेगा, और सुबह-शाम अमृत-घृत का उपयोग भी पुत्रवती होने में सहायक सिद्ध होगा। राज-विप्र भी कब पीछे रहने वाले थे, बोले-’’हस्त रेखाएँ ठीक नहीं है, परिहार हेतु पिण्डदान अत्यन्त आवश्यक है।’’ पीर पैगम्बर मौलवी और मुल्लाओं ने आपस में मशविरा कर सलाह दी कि सन्तति को जिन ने पकड़ रखा है, जब तक उनकी पूजा न की जायेगी; पुत्र-जन्म असंभव है। इस तरह दौड़-धूप चलती रही-चलती रही! एक दिन एकाएक नगर के बाहिरी उद्यान में मुनि श्री श्रुतकीर्ति महाराज का आगमन हुआ।राजा-रानी भी दर्शनार्थ गए। दोनों दम्पत्ति साधुओं और ज्योतिषियों आदि पेशेवर व्यक्तियों में अपना विश् वास खो चुके थे। निर्मोही निस्पृही मुनिराज ने महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र का रहस्य तथा उसका प्रभाव बतलाते हुए उसके सत्ताईसवें श्लोक का उच्चारण कर उसके महत्त्व का प्रतिपादन किया। तब तक दोनों में उस ओर कोई विशेष उत्साह न था। मुनिश्री श्रुतकीर्ति जी महाराज केवल भक्तिपूर्ण धार्मिक क्रिया को समाप्त करने के लिए मधुर वंâठ से पढ़ते ही जा रहे थे।... राज्य मंत्रियों और उपस्थित व्यक्तियों को आश्चर्य तो तब हुआ जब राजा हरिशचन्द्र अकेले उठकर जिनमन्दिर में पहँुचे और स्नान करने के पश्चात् भगवान् आदिनाथ की मूर्ति के सामने पर्यंकासन लगाकर जोर-जोर से पढ़ने लगे-

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणैरशैषे-स्त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश!
दोषैरुपात्त विविधाश्रय जातगर्वै: स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि।।२७।।

उपरोक्त श्लोक का स्वर बाहर के आदमियों को स्पष्ट सुनाई दे रहा था। राजा हरिचन्द्र तन्मयता से उसी श्लोक को बार-बार दुहरा रहे थे।किन्तु उनके स्वर से स्पष्ट प्रतीत होता था कि वे शब्द उनके अन्त:करण के नहीं थे। उन्होंने तो मन में मनोरथ सिद्धि का मुख्य-उद्देश्य बना रखा था-जिन स्तुति का नहीं। दो घन्टे अखण्ड पाठ करते हुये व्यतीत हो गए फिर भी कुछ निष्कर्ष न निकला! राजा बड़बडाते हुए बाहर निकले और प्रतीक्षा में खड़े हुए दरबारियों से बोले- धर्म कुछ नहीं थोथा प्रपंच है और उसके अनुयायी धर्मोपार्जन नहीं वरन् धर्म के नाम पर आजीविकोपार्जन कर रहे हैं अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए। प्रमुख राज्यमंत्री को राजा के भाव परिवर्तन पर आश्चर्य हुआ। और खेद भी!तत्काल वह स्वयं उपरोक्त श्लोक का पाठ बिना किसी इच्छा के धर्म स्थिति के हेतु जिनालय में कर रहा था।वह तल्लीन था-आस्थावान था। उसके कंठ से नि:सृत शब्दों में भक्ति की गंगा बह रही थी और आगे को बढ़ रही थी कि कुछ समय के उपरान्त जैन शासन की अधिष्ठात्री ‘‘धृत देवी’’ ने सम्मुख आकर राज्यमंत्री से वर याचना के लिए आग्रह किया। संसार के अगणित दु:खों से उबार कर मानव को मुक्ति-मन्दिर में पहूँचाने वाले धर्म के प्रति राजा की आस्था बनी रहे यह आवश्यक जानकर उसने अपने लिए नहीं, वरन् प्रजापति के यहाँ पुत्ररत्न की प्राप्ति हेतु वर की याचना की और ‘‘तथास्तु’’,कहकर धृतदेवी अन्तर्धान हो गई। पाँच वर्ष के बाद मुनिश्री श्रुतकीर्तिजी महाराज पुन: उसी नगर में अपने शिष्यों समेत आये।दलबल सहित राजा-रानी दर्शनार्थ पहूँचे। दम्पत्ति ने अपने चार वर्षीय बालक को मुनिश्री के चरणों में डालकर कहा- भगवन!इसे आशीर्वाद दीजिए।