ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

23.भगवान महावीर

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
भगवान महावीर

Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg
Gdfhdfgdf.jpg

जन्मभूमि कुण्डलपुर-जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र में आर्यखण्ड है। इस आर्यखण्ड में ‘‘विदेह नाम से एक प्रसिद्ध देश माना गया है। कभी यह देश खेट, खर्वट, मटंब, पुटभेदन, द्रोणामुख, आकर-सुवर्ण, चाँदी आदि की खान, खेत, ग्राम और घोषों से विभूषित था। जैसा कि वर्णन है-

सखेटखर्वटाटोपिमटंबपुटभेदनै:। द्रोणामुखाकरक्षेत्रग्रामघोषैर्विभूषित:।।३।।

जो देश नगर, नदी और पर्वत से घिरा हो, वह ‘‘खेट है। जो केवल पर्वतों से घिरा हो, वह ‘खर्वट है। जो पाँच सौ गाँवों से घिरा हो, वह ‘‘मटम्ब है। जो समुद्र के किनारे हो तथा जहाँ पर लोग नाव से उतरते हों, वह ‘‘पत्तन या ‘‘पुटभेदन कहलाता है। जो नदी के किनारे बसा हो, उसे ‘‘द्रोणामुख कहते हैं। जहाँ सोना-चाँदी आदि निकलते हैं, उसे ‘‘खान कहते हैं। अन्न उत्पन्न होने की भूमि क्षेत्र-‘‘खेत है। जिसमें बाढ़ से घिरे हुए घर हों, जिसमें अधिकतर किसान लोग निवास करते हों, जो बाग-बगीचा और मकानों से सहित हों, उन्हें ‘‘ग्राम कहते हैं और जहाँ अहीर लोग रहते हों, उसे ‘घोष कहते हैं। ये सब शास्त्रीय प्राचीन परिभाषाएँ हैं। इन सभी से सहित वह ‘विदेह देश था।

इस देश की राजधानी कुण्डपुर या कुण्डलपुर प्रसिद्ध थी। यह परकोटा एवं खाई आदि से विभूषित बहुत ही वैभवपूर्ण नगरी थी। इसका वर्णन बहुत ही सुन्दर किया गया है। यहाँ आचार्य कहते हैं कि-

एतावतैव पर्याप्तं, पुरस्य गुणवर्णनम्।

स्वर्गावतरणे तद्यद्वीरस्याधारतां गतम्।।१२।।

इस नगर के गुणों का वर्णन तो इतने से ही पर्याप्त हो जाता है कि वह नगर स्वर्ग से अवतार लेते समय भगवान महावीर का आधार हुआ था अर्थात् साक्षात् महावीर स्वामी जहाँ अवतीर्ण हुए थे।

राजा सिद्धार्थ के माता-पिता का नाम हरिवंशपुराण में वर्णित है-

सर्वार्थश्रीमतीजन्मा, तस्मिन् सर्वार्थदर्शन:।

सिद्धार्थोऽभवदर्काभो, भूप: सिद्धार्थपौरूष:।।३।।

यहाँ के राजा ‘‘सर्वार्थ महाराज थे और उनकी महारानी का नाम ‘‘श्रीमती था। इनके पुत्र का नाम ‘‘सिद्धार्थ था। इनकी रानी महाराजा चेटक की पुत्री ‘‘प्रियकारिणी थीं जिनका दूसरा नाम ‘‘त्रिशला था। जो राजा सिद्धार्थ वर्तमान में भगवान वद्र्धमान के पिता के पद को प्राप्त हुए थे, भला उनके उत्कृष्ट गुणों का वर्णन कौन कर सकता है ? तथा अपने पुण्य से तीर्थंकर महावीर को जन्म देने वाली उन त्रिशला के गुणों का वर्णन भी कोई मनुष्य नहीं कर सकता है।

महावीर प्रभु का जन्म कुण्डलपुर में हुआ, ऐसा वर्णन तिलोयपण्णत्ति एवं षट्खण्डागम में भी आया है। यथा-

सिद्धत्थरायपियकारिणीहिं, णयरम्मि कुंडले वीरो।

उत्तरफग्गुणिरिक्खे, चित्तसिया तेरसीए उप्पण्णे।।५४९।।

अब भगवान महावीर के नाना के कुल का संक्षिप्त वर्णन आपके लिए प्रस्तुत है-

सिंध्वाख्ये विषये भूभृद्वैशाली नगरेऽभवत्।

चेटकाख्योऽतिविख्यातो, विनीत: परमार्हत:।।३।।

सिंधुदेश के वैशालीनगर में चेटक नाम के प्रसिद्ध राजा थे, इनकी रानी का नाम भद्रा-सुभद्रा था। इनके दश पुत्र थे, जिनके नामधनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, शिवदत्त, हरिदत्त, कम्बोज, कम्पन, प्रयंग, प्रभंजन और प्रभास थे। ये दशों पुत्र दशधर्मों के समान निर्मल गुणों से विभूषित थे। इन्हीं राजा चेटक की महारानी ने सात ऋद्धियों के समान ही सात पुत्रियों को जन्म दिया था जो क्रमश: प्रियकारिणी, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावती, चेलिनी, ज्येष्ठा और चन्दना इन नाम को धारण करने वाली थीं।

विदेहदेश की कुण्डपुरी-कुण्डलपुरी नगरी में ‘‘नाथवंश के राजा सिद्धार्थ के साथ राजा चेटक ने अपनी बड़ी पुत्री प्रियकारिणी ‘‘त्रिशला का विवाह किया था। वत्सदेश में कौशाम्बी नगरी के चंद्रवंशी राजा शतानीक के साथ दूसरी पुत्री मृगावती का विवाह हुआ था। दशार्ण देश के हेरकच्छनगर में सूर्यवंशी राजा दशरथ राज्य करते थे, राजा चेटक की तृतीय पुत्री सुप्रभा इन दशरथ की पट्टरानी हुई थीं। कच्छदेश के ‘‘रोरुकनगर में राजा उदयन राज्य करते थे, चतुर्थ पुत्री प्रभावती उनकी महारानी हुई थीं। पांचवी पुत्री चेलिनी राजगृही के राजा श्रेणिक की पट्टरानी हुई थीं तथा ज्येष्ठा और चन्दना कुमारिका ने आर्यिका दीक्षा से अपना जीवन विभूषित किया था।

यही प्रकरण ‘‘वीरजिणिंदचरिउ ग्रंथ में भी आया है-

जम्बूद्वीप के विदेहप्रदेश में कुण्डपुर-कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ की महारानी प्रियकारिणी से भगवान महावीर जन्में हैं।

इसी ग्रन्थ में राजा चेटक की राजधानी वैशाली का वर्णन आया है इसे सिंधुदेश में माना है। इन राजा के दश पुत्र और प्रियकारिणी आदि सात पुत्रियाँ थीं। जिनमें से बड़ी पुत्री प्रियकारिणी को कुण्डलपुर के राजा सिद्धार्थ की महारानी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।

[सम्पादन]
गर्भकल्याणक

गर्भावतरण-भगवान महावीर होने वाले महापुरुष सोलहवें स्वर्ग के पुष्पोत्तर विमान में थे। जब उनकी आयु मात्र छह महिने की शेष रही, तब सौधर्मेन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने विदेहदेश की राजधानी कुण्डलपुरी में राजा सिद्धार्थ के आँगन में रत्नों की वृष्टि करना शुरू कर दी। ये रत्न प्रतिदिन साढ़े सात करोड़ बरसते थे।

जैसा कि उत्तरपुराण में लिखा है-

तस्मिन् षण्मासशेषायुष्यानाकादागमिष्यति।

भरतेऽस्मिन् विदेहाख्ये, विषये भवनांगणे।।२५१।।
राज्ञ: कुंडपुरेशस्य, वसुधाराप तत्पृथु।
सप्तकोटीमणी: साद्र्धा:, सिद्धार्थस्य दिनं प्रति।।२५२।।

यहाँ यह बात ध्यान में रखना है कि राजा सिद्धार्थ वैशाली के राजा नहीं थे और न ही वे वैशाली के अन्तर्गत छोटे से कुण्डग्राम के छोटे-मोटे राजा थे किन्तु वे तत्कालीन वैशाली के राजा चेटक, जो कि उनके श्वसुर थे, ये सिद्धार्थ इनसे भी श्रेष्ठ तथा इन्द्रों से भी पूज्य महान राजा थे।

इन राजा के महल का नाम ‘नंद्यावर्त था। यह सात खन का बहुत ही सुन्दर था। एक दिन महारानी त्रिशला अपने ‘‘नंद्यावर्त महल में रत्ननिर्मित सुंदर पलंग पर सोई हुई थीं, रात्रि में रत्नों के दीपों का प्रकाश पैâला हुआ था। आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन पिछली रात्रि में रानी ने सोलह स्वप्न देखे। प्रात: पतिदेव से उनका फल पूछने पर ‘‘आप तीर्थंकर पुत्र को जन्म देंगी ऐसा सुनकर प्रसन्नता को प्राप्त हुर्इं। तभी इन्द्रादिदेवगण ने आकर ‘गर्भकल्याणक उत्सव मनाया।

आचार्य श्री सकलकीर्ति विरचित ‘‘श्री महावीर पुराण में भी कहा है-

जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र में ‘विदेह' नाम का एक विस्तृत देश है। धार्मिक पुरुषों का निवास स्थान होने के कारण वह विदेहक्षेत्र तीर्थतुल्य ही शोभायमान है। इस स्थान से कितने ही मुनियों ने मोक्ष को प्राप्त किया है अत: नाम के अनुसार इसका गुण भी सार्थक है। यहाँ के निवासी कोई-कोई सोलहकारण आदि भावनाओं को भाकर तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया करते हैं। यहाँ के वन-पर्वत भी ध्यानस्थ योगियों से विशेषरूप से शोभायमान हैं एवं भव्य उत्तुंग जिनमंदिरों को देखकर किसी महान धार्मिक स्थान का बोध होता है। विदेह प्रदेश के ग्राम-मुहल्ले सभी जिनालयों से सुशोभित हैं। यहाँ पर मुनिसमूह चारों प्रकार के संघ के साथ धर्म प्रवृत्ति के लिये सदा विहार किया करता है।

इसी विदेह देश-जनपद के ठीक मध्य में ‘कुण्डलपुर' एक अत्यंत रमणीय नगर है। यहाँ के कोट द्वार एवं अलंघ्य खाइयों को देखकर अपराजिता-अयोध्या नगरी का भान होता है। देवगणों के आवागमन से इस नगर में सदा कोलाहल सा मचा रहता था। यहाँ के ऊँचे-ऊँचे जैन मंदिरों को देखकर लोगों को कुण्डलपुर के प्रति अपार श्रद्धा होती थी। वह नगर धर्म का समुद्र जैसा प्रतीत होता था। वहाँ के जिनालय ‘जय-जय' शब्द, स्तुति, नृत्य, गीत आदि से सर्वदा मुखरित रहते थे। स्वर्ग के दिव्य उपकरणों सहित रत्नमयी प्रतिमाओं का दर्शन कर वहाँ के लोग कृतार्थ हो जाया करते थे। उस नगर के ऊँचे परकोटे को देखकर यह भान होता था कि वे उच्च स्थान देने के लिये स्वर्ग के देवों को बुला रहे हैं। उस नगर के निवासी दाता, धर्मात्मा, शूरवीर, व्रत-शीलादि से युक्त संयमी होते थे। वे पुरुष जिनेन्द्रदेव की भक्ति, निग्र्रंन्थ गुरु भक्ति, सेवा एवं पूजा में सदा तत्पर रहा करते थे।

उस नगरी-राजधानी के राजा का नाम ‘सिद्धार्थ' था। वे नाथवंशरूपी गगन को सुशोभित करने वाले साक्षात् सूर्य थे। वे महाराज मति, श्रुत, अवधि तीनों ज्ञान को धारण करने वाले थे। उन्होंने सदा नीतिमार्ग को प्रश्रय दिया था। वे जिनदेव के भक्त, महादानी एवं दिव्य ज्ञान के धारक थे। उनके चरणों की सेवा बड़े-बड़े विद्याधर, भूमिगोचरी एवं देव किया करते थे। वे समस्त राजाओं में इन्द्र के समान शोभायमान थे।

उनकी त्रिशला नाम की अत्यन्त रूपवती महारानी थी। वे पति-परायणा सरस्वती के समान एवं सर्वगुण संपन्न थीं।

एक दिन सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने कुबेर से कहा-

हे धनपते! तुम भरतक्षेत्र के कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला के आंगन में दिव्य रत्नों की वर्षा करना प्रारम्भ कर दो। उस समय यह रत्न-सुवर्णमयी वर्षा आकाश से गिरती हुई ऐसी प्रतीत होती थी मानों प्रकाशरूपी माला श्रीजिनेन्द्र के माता-पिता की सेवा करने को आ रही हो। गर्भाधान के छह माह पूर्व से ही कल्पवृक्ष के पुष्प, सुगंधित जल, सुवर्ण एवं रत्नों के ढेर से राजमहल जगमगा उठा।

सोलह स्वप्न-एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में कोमल शय्या पर सोती हुई महारानी त्रिशला ने सोलह स्वप्न देखे, जो सर्वथा कल्याणकारी एवं सौभाग्यसूचक थे।

सोलह स्वप्नों में उन्होंने सर्वप्रथम मदोन्मत्त गजराज को देखा। बाद में चन्द्रमा के सदृश शुभ कांतियुक्त, ऊँचे कन्धेवाला बैल गम्भीर शब्द करता हुआ दिखलाई दिया। तीसरा स्वप्न अपूर्व कान्तिवान वृहद्काय लाल कन्धेवाला सिंह था। चौथे स्वप्न में कमलरूपी सिंहासन पर विराजमान लक्ष्मी देवी को उन्होंने देव-हस्तियों द्वारा अभिषेक करते हुए देखा। पाँचवें में दो सुगन्धित मालाएँ थीं। छट्ठे में ताराओं से घिरे हुए चन्द्रमा को देखा, जिससे सारा संसार आलोकित हो रहा था। सातवें स्वप्न में देवी ने अन्धकार का विनाश करने वाले सूर्य को उदयाचल पर्वत से निकलते हुए देखा। आठवें स्वप्न में कमल के पत्तों से आच्छादित मुखवाले सुवर्ण के दो कलश देखे। नवमें स्वप्न में तालाब में क्रीड़ा करती हुई मछलियाँ देखीं। वह तालाब खिली हुई कुमुदिनी एवं कमलिनी से शोभायमान हो रहा था। दशवें स्वप्न में उन्होंने एक भरपूर तालाब देखा, जिसमें कमल पुष्पों की पीत रज तैर रही थी। ग्यारहवें स्वप्न में गम्भीर गर्जन करता हुआ चंचल तरंगों से युक्त समुद्र दिखलाई दिया। बारहवें स्वप्न में उन्होंने दैदीप्यमान मणि से युक्त ऊँचा सिंहासन देखा। तेरहवाँ स्वप्न बहुमूल्य रत्नों से प्रकाशित स्वर्ग का विमान था। चौदहवें स्वप्न में पृथ्वी को भेदकर ऊपर की ओर जाता हुआ फणीन्द्र (भवनवासी देव) का ऊँचा भवन दिखलाई दिया। पन्द्रहवें स्वप्न में उन्होंने रत्नों की विशाल राशि देखी, जिसकी किरणों से आकाश तक दैदीप्यमान हो रहा था। सोलहवें स्वप्न में माता ने निर्धूम अग्नि देखी।

उपरोक्त सोलह स्वप्नों को देखने के पश्चात् महारानी त्रिशला ने पुत्र के आगमनसूचक ऊँचे शरीरवाले उत्तम गजराज को मुख-कमल में प्रवेश करते हुए देखा। माता के स्वप्न देखने के थोड़ी देर बाद ही प्रात:काल हुआ। महारानी त्रिशला को जगाने के लिए राजमहल में सुमधुर वाद्य बजने लगे।

बन्दीजनों ने कहना आरम्भ किया-‘हे महादेवी! अब जागने का समय हो गया है अतएव आप को अपनी शैय्या त्याग कर अपने योग्य शुभ कार्यों को आरम्भ कर देना चाहिये, जिससे कल्याणकारी वस्तुएँ आप को बड़ी सरलता से प्राप्त हों।

कुछ समय तक इसी प्रकार वाद्यों के शब्द एवं बन्दीजनों द्वारा मंगल गान होते रहे। महारानी त्रिशला एकाएक जाग उठीं। उन्हें प्रात:काल के देखे हुए स्वप्नों से अतीव प्रसन्नता हुई। शैय्या त्याग कर उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से स्तवन, सामायिक आदि उत्तम नित्य-कर्म करना आरम्भ किया। इस प्रकार की नित्य क्रिया सर्वथा कल्याणकारिणी है एवं सब प्रकार से मंगल करने वाली है।

तत्पश्चात् महारानी ने स्नान समाप्त कर अपना श्रृंगार किया। वे आभूषणों से सुसज्जित हो सेवकों को साथ लेकर राज्यसभा में गयीं। महाराज अपनी प्राणप्रिया को अपनी ओर आती हुई देखकर बड़े प्रसन्न हुए। बैठने के लिए उन्होंने रानी को अपना आधा आसन समर्पित कर दिया। महारानी प्रसन्नचित्त होकर उक्त आसन पर बैठ गयीं। उन्होंने बड़े मधुर शब्दों में महाराज से निवेदन किया- ‘हे देव! आज रात्रि के तीसरे प्रहर में मैंने अत्यन्त आश्चर्यजनक स्वप्न देखे हैं। मेरी अभिलाषा है कि गजराज इत्यादि इन सोलह स्वप्नों का फल आप मुझे अलग-अलग सुनाएँ।'

महारानी के मुख से स्वप्न की बातें सुनकर मति-श्रुति-अवधि तीनों ज्ञान के धारक महाराज सिद्धार्थ ने कहा-‘हे सुन्दरी! मैं इन स्वप्नों के शुभ फलों का शीघ्र ही वर्णन कर रहा हूँ। तुम सावधान होकर श्रवण करो।' महाराज ने कहना आरम्भ किया-हे कान्ते!

१. गजराज देखने का फल यह हुआ कि तेरा पुत्र तीर्थंकर होगा।

२. बैल देखने से फल यह हुआ कि वह धर्मचक्र का संचालक होगा।

३. सिंह के दर्शन से वह पुत्र कर्मरूपी गजराजों को विनष्ट करनेवाला अत्यन्त बलवान होगा।

४. लक्ष्मी का अभिषेक देखने का फल यह है कि सुमेरू पर्वत पर इन्द्रादि देवों के द्वारा इस बालक का स्नान कराया जाएगा।

५. स्वप्न में मालाओं के देखने से सुगन्धित शरीरवाला एवं श्रेष्ठ ज्ञानी होगा।

६. पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन से वह पुत्र अपने धर्मरूपी अमृत-वर्षण से भव्यजीवों को प्रसन्न करने वाला होगा।

७. सूर्य के देखने से वह अज्ञानरूपी अन्धकार का विनाशक तथा उन्हीं के समान कान्तिवाला होगा।

८. जल से परिपूर्ण घड़ों के देखने का फल यह है कि वह अनेक निधियों का स्वामी तथा ज्ञान- ध्यानरूपी अमृत का घट होगा।

९. मछली की जोड़ी देखने से सब के लिए कल्याणकारी तथा स्वयं महान सुखी होगा।

१०. सरोवर देखने से शुभ लक्षण तथा व्यंजनों से सुशोभित शरीरधारी होगा।

११. समुद्र के देखने से नौ केवल-लब्धियों वाला केवलज्ञानी होगा।

१२. सिंहासन के देखने से महाराज पद से वाच्य जगत् का स्वामी होगा।

१३. स्वर्ग का विमान देखने का फल यह हुआ कि वह पुत्र स्वर्ग से आकर अवतार धारण करेगा।

१४. नागेन्द्र भवन के अवलोकन से अवधिज्ञानरूपी नेत्र को धारण करने वाला होगा।

१५. रत्नों का ढेर देखने से वह सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र आदि रत्नों की खानि होगा।

१६. निर्धूम अग्नि के दर्शन से वह कर्मरूपी र्इंधन को भस्म करने वाला होगा।

अन्त में गजेन्द्र के दर्शन का फल यह हुआ कि वह अन्तिम तीर्थंकर स्वर्ग से आकर तुम्हारे निर्मल पवित्र गर्भ में प्रवेश कर चुका है। महाराज के मुख-कमल से सोलहों स्वप्नों का फल सुनकर पतिव्रता महारानी का हृदय प्रफुल्लित हो उठा। उन्हें ऐसा लगा कि जैसे उन्हें पुत्र की प्राप्ति ही हो गई हो। वे बड़ी प्रसन्न हुर्इं।

देवियों द्वारा माता की सेवा-उसी समय सौधर्म इन्द्र का आदेश पाकर पद्म आदि सरोवरों में निवास करने वाली श्री, ह्री आदि छ: देवियाँ राजमहल में आ गयीं। उन्होंने तीर्थंकर के गर्भाधान के लिए स्वर्ग से लाई हुई पवित्र वस्तुओं से माता के गर्भ का शोधन किया, जिससे उन्हें पुण्य की प्राप्ति हो पुन: वे अपने-अपने शुभ गुणों को माता में स्थापित कर उनकी सेवा में संलग्न हो गयीं।

श्री देवी ने शोभा, ह्री देवी ने लज्जा, धृति देवी ने धैर्य, कीर्ति देवी ने स्तुति, बुद्धि देवी ने श्रेष्ठ बुद्धि तथा लक्ष्मी देवी ने भाग्य ऐसे इन गुणों की वृद्धि की। वे जिनमाता बड़ी गुणवती हुर्इं। यों तो महारानी पूर्व में ही स्वभाव से पवित्र थीं, पर जब देवियों ने शुद्ध वस्तुओं से उन्हें शुद्ध किया, तब तो वे मानों स्फटिकमणि से ही बनाई गई हों, ऐसी शोभायमान प्रतीत होने लगीं। आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की शुद्ध तिथि षष्ठी को आषाढ़ नक्षत्र में एवं शुभ लग्न में वह देव (अच्युतेन्द्र) स्वर्ग से चयकर माता के शुद्ध गर्भ में आया। महावीर प्रभु के गर्भ में आते ही स्वर्ग के कल्पवासी देवों के विमानों में घण्टे की ध्वनि होने लगी एवं इन्द्र का आसन काँप उठा।

ज्योतिषी देवों के यहाँ स्वयं सिंहनाद होने लगा। भवनवासी देवों के यहाँ शंख की प्रचण्ड ध्वनि हुई। साथ ही व्यन्तर देवों के महलों में भेरी की विशेष ध्वनि हुई। केवल यही नहीं, अन्य भी अनेक आश्चर्यजनक घटनाएँ घटीं। उक्त आश्चर्यजनक घटनाओं को घटते देखकर चारों निकायों के देवों को यह ज्ञात हो गया कि महावीर प्रभु का गर्भावतरण हो गया है। तत्पश्चात् वे देवगण भगवान का गर्भ-कल्याणक उत्सव मनाने के उद्देश्य से नगर में पधारे। उस समय देवों के समूह को देखते ही बनता था। वे सर्वोत्तम सम्पदाओं से सुशोभित थे, अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ थे, उत्तम धर्म का पालन करने वाले उद्यमी थे। वे अपने अंग के आभूषणों एवं तेज से दशों दिशाओं को प्रकाशित करने वाले थे। उन्होंने अपने ध्वजा-छत्र-विमानादिकों से आकाश को मानो ढँक दिया था। वे देव अपनी देवियों के साथ ‘जय-जय' शब्द कर रहे थे।

उस समय नगर का वातावरण देखने योग्य ही था। विमानों, अप्सराओं एवं देवों की सेनाओं से घिरा हुआ वह नगर स्वर्ग जैसा सर्वोत्तम प्रतीत होने लगा। देवों के साथ इन्द्र ने भगवान के माता-पिता को सिंहासन पर बिठाकर सोने के कलशों से स्नान कराया तथा उन्हें दिव्य आभूषण-वस्त्र पहिनाए। माता के गर्भस्थ शिशु (भगवान) की सभी ने तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें प्रणाम किया अर्थात् माता की तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें प्रणाम किया।

इस प्रकार सौधर्म इन्द्र भगवान का गर्भकल्याणक सम्पन्न कर जिनमाता की सेवा में उपयुक्त देवियों को नियुक्त कर देवों के साथ पुण्य उपार्जन कर बड़ी प्रसन्नता के साथ पुन: स्वर्ग को वापस चले गये।

स्वर्ग से आई हुई देवियों में से कोई तो जिन-माता के समक्ष मंगल द्रव्य रखती थीं, कई देवियों ने महादेवी की शय्या को सुसज्जित करने का भार अपने ऊपर लिया, किसी ने दिव्य आभूषण पहिनाने का भार लिया तथा किसी ने माला तथा रत्नों के गहने देने का। कई देवियाँ माता की अंग-रक्षा के लिए खुले खड्गों से सज्जित होकर पहरा देती थीं एवं कई उनके लिए भोग्य सामग्रियों को एकत्रित करने में संलग्न थीं। कई एक देवियाँ पुष्प-रज से आच्छादित राज्य-प्रांगण की सफाई में लगी थीं एवं चन्दन-जल का छिड़काव करती जाती थीं।

उक्त देवियों ने रत्नों के चूर्ण से स्वस्तिक आदि की रचना की एवं महल को कल्पवृक्ष के पुष्पों से सजाया। किसी ने महलों के ऊँचे शिखरों पर रत्नों के दीप जलाये, जो अन्धकार को विनष्ट करने वाले थे। वस्त्र पहिनाना, आसन बिछाना आदि समस्त कार्य देवियाँ ही करती थीं। महादेवी की वन-क्रीड़ा के समय मधुर गीत, सुन्दर नृत्य एवं धार्मिक कथाएँ सुनाकर वे माता को सुख पहुँचाया करती थीं। इस प्रकार जिनदेव की माता महादेवी त्रिशला की सेवा देवियों द्वारा होती रही एवं उनकी शोभा अनुपम थी।

जब नवम मास निकट आया, तो गर्भवती महादेवी की बुद्धि अति प्रखर होती गई। उन्हें प्रसन्न रखने के उद्देश्य से देवियाँ मनोहर प्रहसन किया करतीं एवं तरह-तरह की कविताएँ सुनाया करती थीं। देवियाँ कुछ गूढ़ अर्थपूर्ण पहेलियाँ महादेवी से पूछा करती थीं एवं महादेवी उनका समुचित उत्तर दे दिया करती थीं। उदाहरण के रूप में निम्न पहेली एवं उसका उत्तर मनन करने योग्य है-

विरक्ता नित्यकामिन्या, कामुकोऽकामुको महान्।

सस्पृहो नि:स्पृहो लोके, परात्मान्यश्च य: स क:।।१।।

अर्थात् जो वैरागी होने पर भी सर्वदा कामिनी की इच्छा रखता है एवं निस्पृही होने पर भी इच्छा किया करता है, वह विलक्षण पुरुष इस संसार में कौन है? यह तो हुई पहेली। महादेवी ने पहेली का श्लोक में ही उत्तर दिया। महादेवी का उत्तर था-‘परमात्मा'। कारण, ‘परमात्मा' का एक अर्थ तो विलक्षण पुरुष होता है एवं दूसरा अर्थ परमात्मा भी होता है। परमात्मा नित्य-कामिनी अर्थात् अविनाशी मोक्षरूपी स्त्री में अनुरागी है एवं उसी की इच्छा रखनेवाला होता है। दूसरी एक पहेली भी सुनिये-

दृश्योऽदृश्योऽस्ति चिद्भूष:, प्रकृत्या निर्मलोऽव्यय:।

हन्ता देहविधेर्देवो, नाऽयं को वर्ततेऽद्य स: ।।२।।

अर्थात् जो अदृश्य है, फिर भी देखने योग्य है; स्वभाव से निर्मल होने पर भी देह की रचना का नाशक है, पर महादेव नहीं है, ऐसा वह कौन है ? इस श्लोक का महादेवी ने ‘देवोना' शब्द से उत्तर दिया। ‘देवोना' का अर्थ है-देवरूपी मनुष्य श्रीअर्हन्त देव।

इस प्रकार उन देवियों ने प्रश्नोत्तर के रूप में महादेवी से अनेक पहेलियाँ पूछीं, वे भिन्न प्रकार की हैं-‘हे सुन्दरी! असंख्यात मनुष्य एवं देवों द्वारा पूज्य तीनों जगत् का गुरू तेरा पुत्र अनेक उत्तम गुणों से युक्त तथा विजयी होे। जिसने दूसरी स्त्रियों से प्रेम करना त्याग दिया है, पर फिर भी अविनाशी मोक्ष-सुख में अनुरागी है, ऐसा गुणों का समुद्र तेरा पुत्र हमारी रक्षा करे। हे जगत् का कल्याण करनेवाली, तीन लोकों के स्वामी को गर्भ में धारण करने वाली! हरिहरादि के मन की रक्षा कर।

जगत् के कल्याण के लिए अपने गर्भ में तीर्थंकर को धारण करने वाली, हे महादेवी! धर्म-तीर्थ स्थापित करने वाले की उत्पत्ति में देव- विद्याधर-भूमिगोचरी जीवों का तीर्थ-स्थान बन। (इसमें ‘अठ' क्रिया गुप्त है)

देवी का प्रश्न-हे देवी महारानी! इहलोक एवं परलोक में कल्याण करने वाला कौन है ?

माता का उत्तर-जो धर्म-तीर्थ के प्रवर्तक हैं, वे ही श्रीअर्हन्त देव तीनों जगत् का कल्याण करने वाले हैं।

देवी का प्रश्न-गुरुओं में सबसे महान कौन है ?

माता का उत्तरजो तीन जगत् का गुरु एवं सब अतिशयों से तथा दिव्य अनन्त गुणों से सुशोभित है, ऐसे श्री जिनेन्द्र देव ही महान् गुरु हैं।

देवी का प्रश्न-इस जगत् में किसके वचन श्रेष्ठ एवं प्रामाणिक हैं ?

माता का उत्तर-जो सबको जानने वाले, दुनिया का हित करने वाले, अठारह दोषरहित एवं वीतरागी हैं, ऐसे श्री अर्हन्त भगवान के वचन ही श्रेष्ठ एवं मानने योग्य हैं। इसके सिवा दूसरे मिथ्यामतियों के नहीं।

देवी का प्रश्न-जन्म-मरणरूपी विष को दूर करने वाला अमृत के समान क्या पीना चाहिये ?

माता का उत्तर-श्री जिनेन्द्र के मुख-कमल से निकला हुआ ‘ज्ञानामृत' पीना चाहिये। दूसरे मिथ्या-ज्ञानियों के विषरूपी वचन नहीं मानने चाहिये।

देवी का प्रश्न-इहलोक में बुद्धिमानों को किसका ध्यान करना चाहिये ?

माता का उत्तर-पंच-परमेष्ठी का, जैन शास्त्र का एवं आत्म-तत्त्व का ध्यान करना चाहिये, दूसरा आर्त-रौद्ररूप खोटा ध्यान कभी नहीं करना चाहिये।

देवी का प्रश्न-शीघ्र कौन-सा काम करना चाहिए ?

माता का उत्तर-जिससे संसार के भोगों का नाश हो, ऐसे अनन्त ज्ञान-चारित्र का पालन करना चाहिए, मिथ्यात्वादिकों का नहीं।

देवी का प्रश्न-इस संसार में सज्जनों के साथ में जाने वाला कौन है ?

माता का उत्तर-दयामय धर्म ही सहायता करने वाला बन्धु है, जो सब दु:खों से रक्षा करने वाला है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई सहगामी नहीं है।

देवी का प्रश्न-धर्म के क्या-क्या लक्षण हैं एवं कार्य क्या हैं ?

माता का उत्तर-बारह तप, रत्नत्रय, महाव्रत, अणुव्रत, शील एवं उत्तम क्षमा आदि दशलक्षण धर्म, ये सब धर्म के कार्य एवं लक्षण हैं।

देवी का प्रश्न-इहलोक में धर्म का फल क्या है ?

माता का उत्तर-तीन लोक के स्वामियों की इन्द्र-धरणेन्द्र-चक्रवर्तीपदरूप सम्पदाएँ, श्री जिनेन्द्र का अनन्त सुख, ये सब धर्म के ही उत्तम फल हैं।

देवी का प्रश्न-धर्मात्माओं के चिन्ह क्या हैं ?

माता का उत्तर-शान्त स्वभाव, अभिमान का न होना एवं रात-दिन शुद्ध आचरणों का पालन-ये ही धर्मात्माओं की पहिचान है।

देवी का प्रश्न-पाप के चिन्ह क्या-क्या हैं ?

माता का उत्तर-मिथ्यात्वादि, क्रोधादि कषाय, खोटी संगति एवं छ: तरह के अनायतन, ये पाप के चिन्ह हैं।

देवी का प्रश्न-पाप का फल क्या है ?

माता का उत्तर-जो अपने को अप्रिय है, दु:ख का कारण एवं दुर्गति कराने वाला, अन्य रोग-क्लेशादि देने वाला है, ऐसे सभी निन्दनीय कार्य पाप के फल हैं।

देवी का प्रश्न-पापी जीवों की पहिचान क्या है ?

माता का उत्तर-क्रोध आदि कषायों का बहुत होना, दूसरों की निन्दा, अपनी प्रशंसा एवं रौद्रादि खोटे ध्यान का होना, ये सब पापियों के चिन्ह हैं।

देवी का प्रश्न-असली लोभी कौन है ?

माता का उत्तर-बुद्धिमान, मोक्ष का चाहने वाला भव्यजीव निर्मल आचरण से तथा कठिन तप से केवल धर्म का सेवन करने वाला ही असली लोभी है।

देवी का प्रश्न-इहलोक में विचारशील कौन है ?

माता का उत्तर-जो मन में निर्दोष देव-शास्त्र-गुरु का एवं उत्तम धर्म का विचार करता है, दूसरे का नहीं।

देवी का प्रश्न-धर्मात्मा कौन है ?

माता का उत्तर-जो श्रेष्ठ उत्तम क्षमा आदि दशलक्षण युक्त धर्म का पालन करता है। श्रीजिनेन्द्रदेव की आज्ञा का पालन करनेवाला ही बुद्धिमान, ज्ञानी एवं व्रती है, वही धर्मात्मा है, दूसरा कोई नहीं।

देवी का प्रश्न-परलोक जाते समय मार्ग का भोजन क्या है ?

माता का उत्तरदान, पूजा, उपवास, व्रत, शील एवं संयमादि से उपार्जन किया गया जो निर्मल पुण्य है, वही परलोक के मार्ग का उत्तम भोजन है।

देवी का प्रश्न-इहलोक में किसका जन्म सफल है ?

माता का उत्तर-जिसने मोक्ष-लक्ष्मी के सुख के प्रदाता उत्तम भेद-विज्ञान को पा लिया, उसी का जन्म सफल है, दूसरे का नहीं।

देवी का प्रश्न-संसार में सुखी कौन है ?

माता का उत्तर-जो सब परिग्रह की उपाधियों से रहित एवं ध्यानरूपी अमृत का पान करने वाला वन में रहता है अर्थात् योगी है, वही सुखी है, अन्य कोई नहीं।

देवी का प्रश्न-इस संसार में चिन्ता किस वस्तु की करनी चाहिए ?

माता का उत्तर-कर्मरूपी शत्रुओं के नाश करने की एवं मोक्ष-लक्ष्मी पाने की चिन्ता करनी चाहिये, दूसरे इन्द्रियादिक विषय-सुखों की नहीं।

देवी का प्रश्न-महान उद्योग किस कार्य में करना चाहिये ?

माता का उत्तर-मोक्ष देने वाले रत्नत्रय, तप, शुभ योग, सुज्ञानादिकों के पालने में महान यत्न करना चाहिये, धन एकत्रित करने में नहीं। कारण, धन तो धर्म से प्राप्त होगा ही।

देवी का प्रश्न-मनुष्यों का परम मित्र कौन है ?

माता का उत्तर-जो तप-दान-व्रतादिरूप धर्म को आग्रहपूर्वक समझाकर पालन करावे एवं पाप कर्मों को छुड़ावे।

देवी का प्रश्न-इस संसार में जीवों का शत्रु कौन है ?

माता का उत्तर-जो हित करने वाले तप-दीक्षा-व्रतादिकों का नहीं पालन करने दे, वह दुर्बुद्धि अपना एवं दूसरे का, दोनों का शत्रु है।

देवी का प्रश्न-प्रशंसा करने योग्य क्या है ?

माता का उत्तर-थोड़ा धन होने पर भी सुपात्र को दान देना, निर्बल शरीर होने पर भी निष्पाप तप करना, यही प्रशंसनीय है।

'देवी का प्रश्न-'हे महादेवी! आप के समान महारानी कौन है ?

माता का उत्तर-जो धर्म के प्रवर्तक, जगत् के गुरू, ऐसे तीर्थंकर देवाधिदेव को उत्पन्न करे, वही मेरे समान है, दूसरी कोई नहीं।

देवी का प्रश्न-पण्डिताई क्या है ?

माता का उत्तर-शास्त्रों को जानकर खोटा आचरण, खोटा अभिमान जरा भी नहीं करना एवं अन्य पाप की क्रियाएँ भी नहीं करना, यही पण्डिताई है।

देवी का प्रश्न-मूर्खता किसे कहते हैं ?

माता का उत्तर-ज्ञान के हित का कारण, निर्दोष तप, धर्म की क्रिया को जानकर आचरण नहीं करना।

देवी का प्रश्न-बड़े भारी चोर कौन हैं ?

माता का उत्तर-जो मनुष्यों के धर्मरत्न को चुराने वाले, पाप के कर्ता एवं अनर्थ करने वाले हैं, ऐसे पाँच इन्द्रियरूपी चोर हैं।

देवी का प्रश्न-इस संसार में शूरवीर कौन हैं ?

माता का उत्तर-जो धैर्यरूपी खड्ग से परिषहरूपी महायोद्धाओं को, कषायरूपी शत्रुओं को तथा काम-मोह आदि शत्रुओं को जीतने वाले हों।

'देवी का प्रश्न-'देव कौन हैं ?

माता का उत्तर-जो सबको जानने वाले, क्षुधादि अठारह दोषों से रहित, अनन्त गुणों के समुद्र, धर्म के प्रवर्तक हों, ऐसे अर्हन्त प्रभु ही देव हैं।

देवी का प्रश्न-महान गुरु कौन हैं ?

माता का उत्तर-जो इस संसार में बाह्य-आभ्यन्तर दोनों प्रकार के परिग्रहों से रहित हों। जगत् के भव्यजीवों के हित-साधन में उद्यत हों एवं स्वयं भी मोक्ष के लिए इच्छुक हों, वही महान गुरु हैं, दूसरा मिथ्यामती धर्मगुरु नहीं हो सकता।

इस प्रकार देवियों द्वारा किये गए प्रश्नों का उत्तर माता ने गर्भस्थ तीर्थंकर शिशु के प्रभाव से दिया। प्रथम तो महारानी की बुद्धि स्वभाव से ही निर्मल थी पुन: अपने उदर में तीन ज्ञान के धारक प्रकाशमान तीर्थंकर देव को धारण करने से वे अत्यधिक पवित्र हो गई थीं। महारानी के गर्भ में स्थित तीर्थंकर बालक को कोई कष्ट नहीं हुआ, क्योंकि सीप में रहने वाली जल-बिन्दु में कभी विकार उत्पन्न नहीं हो सकता है। उस महादेवी के उदर की त्रिवली भी भंग नहीं हुई। उदर पूर्व जैसा ही रहा, पर गर्भ की क्रमश: वृद्धि होती गई, यह सब प्रभु का ही प्रभाव था।

गर्भ में स्थित प्रभु के प्रभाव से महारानी की मुखाकृति बड़ी ही शोभायमान हो गई। उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता था कि मानो वे असंख्य रत्नों को धारण करने वाली पृथ्वी ही हों। अप्सराओं के साथ इन्द्र के द्वारा भेजी गई इन्द्राणी ही जिनकी सेवा कर रही हो, उनकी कान्ति एवं उनके मुख का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार लगातार नौ महीने तक महान उत्सव सम्पन्न होते रहे।

[सम्पादन]
जन्मकल्याणक

देखते-देखते नवमा महीना पूर्ण हो गया। शुभ चैत्र मास की शुक्ला त्रयोदशी के दिन अर्यमा नाम के शुभ योग में एवं शुभ लग्न में त्रिशला महादेवी ने अलौकिक पुत्र को जन्म दिया है। वह पुत्र अपने उज्ज्वल शरीर की कान्ति से अन्धकार को विनष्ट करने वाला, जगत् का हित करने वाला, मति-श्रुत-अवधि तीनों ज्ञान को धारण करने वाला, महा दैदीप्यमान एवं धर्म-तीर्थ का प्रवर्तक तीर्थंकर हुआ।

भगवान महावीर का जन्म तेरस की रात्रि में हुआ है, ऐसा जयधवला में वर्णित है-

‘आसाढ़ जोण्हपक्खछट्ठीए कंडलपुरणगराहिव-णाहवंस-सिद्धत्थणरिंदस तिसिला-देवीए गब्भमागंतूण तत्थ अट्ठदिवसाहियणवमासे अच्छिय चइत्तसुक्कपक्ख-तेरसीएरत्तीए-उत्तरफग्गुणीणक्खत्ते गब्भादो णिक्खंतो वड्ढमाणजिणिंदो।

आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष की षष्ठी के दिन कुंडलपुर नगर के स्वामी नाथवंशी सिद्धार्थ नरेन्द्र की रानी त्रिशला देवी के गर्भ में आकर और वहाँ नवमास आठ दिन रहकर चैत्रशुक्ला त्रयोदशी के दिन रात्रि में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के रहते हुये वद्र्धमान जिनेंद्र ने जन्म लिया।

उनके जन्म के साथ-साथ सभी दिशाएँ निर्मल हो गर्इं। आकाश में निर्मल वायु बहने लगी। स्वर्ग से कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा हुई एवं चारों निकायों के देवों के आसन कम्पायमान हो गये। स्वर्ग में बिना बजाये ही वाद्यों की ध्वनि होने लगी, मानो वे भी भगवान का जन्मोत्सव मना रहे हों। इसके अतिरिक्त अन्य तीनों जातियों (निकायों) के देवों के महलों में शंख-भेरी आदि के शब्द होने लगे।

कल्पेषु घण्टा भवनेषु शंखो, ज्योतिर्विमानेषु च सिंहनाद:।

दध्वान भेरी वनजालयेषु, यज्जन्मनि ख्यात जिन: स एष:।।

कल्पवासी देवों के यहाँ घंटे बजने लगे, भवनवासी देवों के यहाँ शंखध्वनि होने लगी, ज्योतिष्क देवों के यहाँ सिंहनाद होने लगा और व्यंतर देवों के यहाँ भेरी बजने लगी। जिनके जन्म के समय ऐसा हुआ, ये जिन भगवान वे ही हैं।

जैसे कि आज टेलीविजन या रेडियो का बटन दबाते ही हजारों किलोमीटर दूर के भी दृश्य और संगीत सामने आ जाते हैं किंतु वहाँ तो बटन दबाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी, प्रत्युत् तीर्थंकर प्रकृति का पुण्यरूपी बटन अपने आप ही दब गया और ४० करोड़ मील से अधिक ऊँचाई पर स्थित स्वर्गलोक में अतिशय फैल गया। तत्क्षण ही सौधर्म इंद्र असंख्य देवपरिवारों के साथ मध्यलोक में आए और जन्मजात शिशु को सुमेरू पर्वत पर ले जाकर १००८ कलशों से उनका जन्माभिषेक संपन्न किया।

कुछ विद्वान् सहज ही कह देते हैं कि वे तीर्थंकर हम और आप जैसे साधारण मानव थे लेकिन ऐसा नहीं है वे तीर्थंकर प्रकृति नामकर्म के बंध करने तक तो साधारण कहे जा सकते हैं किन्तु तीर्थंकर प्रकृति को बांध लेने के बाद उनमें कुछ विशेष ही अतिशय प्रगट हो जाते हैं इसीलिए तो श्रीसमन्तभद्रस्वामी ने कहा है-

मानुषीं प्रकृतिमभ्यतीतवान्, देवतास्वपि च देवता यत:।

तेन नाथ! परमासि देवता, श्रेयसे जिनवृष! प्रसीद न:।।

हे नाथ! आपने मनुष्ययोनि में जन्म तो लिया है किंतु आप मानुषी प्रकृति का उल्लंघन कर चुके हैं इसलिए आप देवताओं के भी देवता हैं, यही कारण है कि आप परमदेवता हैं।

हे जिनधर्म तीर्थंकर! आप हमारे कल्याण के लिए हम पर प्रसन्न होइये।

सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र भगवान के जन्म का समाचार पाकर उनका जन्मकल्याणक मनाने का विचार करने लगा। उसी समय इन्द्र की आज्ञा से देवों की सेनाएँ ‘जय-जयकार' करती हुई स्वर्ग से उतरीं। उनकी विशाल सेनाएँ समुद्र से उठती हुई प्रचण्ड लहरों के समान प्रतीत होती थीं। गजराज, अश्व, रथ, गन्धर्व, नर्तकी, पैदल एवं बैल आदि से युक्त सात प्रकार की सेनाएँ निकलीं। तत्पश्चात् सौधर्म स्वर्ग का स्वामी इन्द्र अपनी इन्द्राणी सहित ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर चला। उसके चारों ओर देवों की सेनाएँ फैली हुई थीं।

इन्द्र के पीछे-पीछे बड़ी विभूतियों के साथ सामानिक देव आदि चल रहे थे। उस समय दुन्दुभी आदि वाद्यों की ध्वनि एवं देवों की ‘जय-जयकार' से सारा आकाश गूँजने लगा। मार्ग में कितने ही देव गाते हुए चल रहे थे। कोई नृत्य करता जाता था एवं कोई प्रसन्नता के कारण दौड़ लगा रहा था। उनके छत्र-चमर एवं ध्वजाओं से समस्त आकाश-मण्डल आच्छादित हो गया था। वे चारों निकाय के देव बड़ी विभूति के साथ क्रम-क्रम से कुण्डलपुर जा पहुँचे। उस समय आकाश में ऊपर एवं बीच का भाग देव-देवियों से घिर गया था। राजमहल का आँगन इन्द्रादिक देवों से बिलकुल भर गया था। इन्द्राणी ने तत्काल प्रसूतिग्रह में जाकर दिव्यशरीरधारी कुमार एवं जिनमाता का दर्शन किया। वे बारम्बार उन्हें प्रणाम कर जिनमाता के आगे खड़ी होकर उनके गुणों की प्रशंसा करने लगीं। इन्द्राणी ने कहा-‘हे महादेवी! आप तीनों जगत् के स्वामी को उत्पन्न करने के कारण समग्र विश्व की माता हो एवं आप ही महादेवी भी हो। महान देव उत्पन्न कर आपने अपना नाम सार्थक कर लिया है। संसार में आपकी तुलना की अन्य कोई स्त्री नहीं है।'

इस प्रकार महादेवी की स्तुति कर इन्द्राणी ने उन्हें निद्रित कर दिया। जब जिनमाता सो गयीं, तो इन्द्राणी ने उनके आगे एक माया का बालक बना कर सुला दिया एवं स्वयं अपने हाथों से शिशु भगवान को उठाकर उनके शरीर का स्पर्श किया। वे बारम्बार उनके मुख का चुम्बन करने लगीं। भगवान के शरीर से निकलती हुई उज्ज्वल ज्योति को देखकर उनके हर्ष का ठिकाना न रहा। तत्पश्चात् वह उस बालक भगवान को लेकर आकाशमार्ग की ओर चलीं। वे भगवान आकाश में ठीक सूर्य की तरह जान पड़ते थे। समस्त दिक्कुमारियाँ छत्र, ध्वजा, कलश, चमर एवं स्वस्तिक आदि आठ मांगलिक द्रव्यों को लेकर इन्द्राणी के आगे-आगे चल रही थीं।

उस समय इन्द्राणी ने जगत् को आनन्द प्रदान करने वाले जिनदेव को लाकर बड़ी प्रसन्नता से इन्द्र को सौंप दिया। भगवान की अपूर्व सुन्दरता व उनकी तेजोमय दीप्ति देखकर देवों का स्वामी इन्द्र उनकी स्तुति करने लगा-‘हे देव! आप हमें परम आनन्द प्रदान करने के लिए बाल-चन्द्रमा की भांति लोक को प्रकाश देने के लिए प्रगट हुए हो। हे ज्ञानी! आप विश्व के स्वामी इन्द्र-धरणेन्द्र-चक्रवर्ती के भी स्वामी हो। धर्म-तीर्थ के प्रवर्तक होने के कारण आप ही ब्रह्मा भी हो।'

‘हे देव! योगीराज आपको ज्ञानरूपी सूर्य का उदयाचल मानते हैं। आप भव्यपुरुषों के रक्षक एवं मोक्षरूपी स्त्री के पति हो। आप मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकूप में पड़े हुए अनेक भव्यजीवों को धर्मरूपी हाथ का सहारा देकर उद्धार करने वाले हो। संसार के सभी विचारशील व्यक्ति आपकी अलौकिक वाणी सुनकर अपने कर्मों को नष्ट कर परम पवित्र मोक्ष प्राप्त करेंगे एवं अनेक भव्य जीवों को स्वर्ग की प्राप्ति होगी। आज आपके अभ्युदय से सन्त पुरुषों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वस्तुत: आप ही धर्म की प्रवृत्ति के कारण हैं।'

अतएव हे देव! हम आपको प्रणाम करते हैं, आपकी सेवा करते हैं, भक्ति प्रकट करते हैं एवं प्रसन्नतापूर्वक केवल आपकी आज्ञा का पालन करते हैं, अन्य मिथ्यात्वी देव की नहीं।' इस तरह देवों का स्वामी सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र भगवान की स्तुति कर उन्हें गोद में उठाकर सुमेरू पर्वत पर चलने को उद्यत हुआ। उसने अन्य देवों को भी सुमेरू पर्वत पर चलने के लिए आज्ञा दी। उस समय सभी देवों ने ‘प्रभु की जय हो, आनन्द की वृद्धि हो' आदि शब्दों से ‘जय-जयकार' की। उनकी ध्वनि समस्त दिशाओं में फैली।

इन्द्र के साथ-साथ आये देव भी ‘जय-जय' शब्द करते हुए आनन्द मनाने लगे। प्रसन्नता के कारण उनका शरीर रोमांचित हो उठा। आकाश में प्रभु के समक्ष अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। गन्धर्वदेव भी वीणा आदि वाद्यों के साथ गान करने लगे। देवों की दुन्दुभी की आवाज से सारा आकाशमण्डल गूँज उठा। किन्नरियाँ हर्षित होकर अपने किन्नरों के साथ जिनदेव का गुणगान करने लगीं। उस समय सब देव भगवान का दर्शन कर अपने जीवन को सार्थक समझने लगे। वे बड़ी देर तक भगवान का दिव्य रूप देखते रहे। इन्द्र की गोद में विराजमान भगवान को ऐशान स्वर्ग के इन्द्र ने दिव्य छत्र लगाया। सनत्कुमार एवं माहेन्द्र स्वर्ग के इन्द्र भी चमर ढुराते हुए भगवान की सेवा करने लगे। श्री जिनेन्द्र भगवान की ऐसी विभुता देखकर अनेक देवों ने उसी समय सम्यक्त्व धारण किया। उन्होंने इन्द्र के वचनों को प्रमाण माना। वे इन्द्रादि देव ज्योति-चक्र को लाँघकर अपने शरीर के आभूषणों की किरणों से आकाश को प्रकाशित करते हुए जा रहे थे।

[सम्पादन]
जन्माभिषेक-

परस्पर सैकड़ों उत्सव मनाते हुए वे देव बड़ी विभूति के साथ उत्तुंग सुमेरू पर्वत पर जा पहुँचे। उस सुमेरू पर्वत की ऊँचाई एक लाख योजन की है। पर्वत के आरम्भ में ही ‘भद्रशाल वन' है। उस वन में परकोटा एवं ध्वजाओं से सुशोभित कल्याणकारक चार जैन-मन्दिर सुशोभित हैं। उस वन से ५०० योजन ऊपर ‘नंदनवन' है, यह पाँच सौ योजन प्रमाण कटनीरूप है। इसकी भी चारों दिशाओं में चार चैत्यालय हैं। इसके बाद साढ़े बासठ हजार योजन की ऊँचाई पर महा रमणीक ‘सौमनस वन' है, जहाँ पर सभी ऋतुओं में फल देने वाले एक सौ आठ वृक्ष हैं एवं जिन-चैत्यालयों की संख्या चार है। उस सौमनस वन से छत्तीस हजार योजन की ऊँचाई पर चौथा एवं अन्तिम ‘पाण्डुक वन' है। वहाँ जिन-चैत्यालयों के ऊँचे-ऊँचे समूह हैं। उस वन की सुन्दरता अपूर्व है। वन के बीच में एक चूलिका है। वह चालीस योजन ऊँची है। उसी चूलिका के ऊपर स्वर्ग है। मेरू की ईशान दिशा में सौ योजन लम्बी, पचास योजन चौड़ी, आठ योजन ऊँची एक ‘पाण्डुक' नाम की शिला है। वह सिद्धशिला चन्द्रमा के समान सुशोभित है। छत्र, चमर, स्वस्तिक, दर्पण, कलश, ध्वजा, ठोना, पंखा ये अष्ट मंगलद्रव्य उस शिला पर रक्खे हुए थे।

शिला के मध्य भाग में वैडूर्य मणि के सदृश रंगीन एक सिंहासन है। उसकी लम्बाई-चौड़ाई एवं ऊँचाई आधा योजन प्रमाण है। जिनेन्द्र भगवान के स्नान-जल से पवित्र हुए रत्नों के तेज से वह सिंहासन ऐसा प्रतीत होता था कि मानो सुमेरू का दूसरा शिखर ही हो। उसके ठीक दक्षिण की ओर दूसरा सिंहासन सौधर्म इन्द्र का है एवं उत्तर दिशा की ओर ईशान इन्द्र के बैठने का आसन है। सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने अन्य देवों के साथ महोत्सव सम्पन्न करते हुए, स्नान कराने के उद्देश्य से भगवान को उसी शिला पर विराजमान किया। देवराज ने सर्वप्रथम उस पर्वतराज की परिक्रमा की।

इस प्रकार देवेन्द्र ने पुण्योदय से बड़ी विभूति के साथ वर्तमान कालखण्ड के अन्तिम तीर्थंकर (शिशु) को शिला पर विराजमान किया अत: भव्यजन यदि ऐसी अतुलनीय सम्पदा एवं अपरम्पार सुख की आकांक्षा रखते हैं, तो उन्हें सोलहकारण भावनाओं के चिन्तवन से निर्मल पुण्य का उपार्जन करना चाहिए। ‘तीर्थंकर' सदृश अक्षुण्ण सम्पदा प्राप्त कराने में पुण्य ही सहायक होता है। पुण्य से इस जगत् में पवित्रता की वृद्धि होती है। पुण्य के अतिरिक्त इस जगत् में दूसरी कोई वस्तु सुख प्रदान करने वाली नहीं है। इस पुण्य का मूल कारण व्रत है। प्राणियों को पुण्य के बल से ही अनेक गुणों की प्राप्ति हुआ करती है।

श्री जिनेन्द्र भगवान के महान अभिषेक उत्सव को देखने की इच्छा रखने वाले धार्मिक देव उस पर्वतराज को घेर कर बैठ गये। दिक्पाल देव अपनी-अपनी मण्डली को साथ लेकर अपनी दिशा की ओर बैठे। उस स्थान पर देव शिल्पियों ने एक ऐसे मण्डप का निर्माण किया था, जिसमें सभी देव सुखपूर्वक बैठ सकते थे। मण्डप में यत्र-तत्र कल्पवृक्ष की मालाएँ लटक रही थीं। उन मालाओं पर बैठे हुए भौंरे इस प्रकार गूँज रहे थे, मानो वे प्रभु का गुणगान ही कर रहे हों।

गन्धर्व देव एवं किन्नरियों ने बड़े ही सुमधुर स्वरों में जिनदेव के कल्याणकारी गुणों का गान आरम्भ किया। अनेक देवियाँ हाव-भावपूर्वक नृत्य करने लगीं। देवों के विविध प्रकार के वाद्य बजने आरम्भ हो गये। कुछ देव पुण्यादि की अभिलाषा से पुष्पों की वर्षा करने लगे। इसके पश्चात् इन्द्र ने अभिषेक करने के लिए प्रस्ताव रख कलशों की रचना की। कलशनिर्माणमंत्र जानने वाले सौधर्म इन्द्र ने मोतियों की माला एवं चन्दन से युक्त कलश को हाथ में लिया एवं सब कल्पवासी देव ‘जय-जय' शब्द करते हुए कल्याणक संबंधी कार्य करने लगे। इन्द्राणी एवं देवियाँ भी कार्य करने में संलग्न हो गर्इं, उनके हर्ष का पारावार नहीं था। ‘स्वयम्भू' भगवान का शरीर स्वभाव से ही पवित्र है, उनके रक्त का रंग दुग्ध के सदृश श्वेत है अतएव उनके लिए क्षीर-समुद्र के जल के अतिरिक्त अन्य कोई जल स्पर्श करना उचित नहीं है, ऐसा सोचकर वे देवगण पर्वत से लेकर समुद्र तक कतारें बाँध कर खड़े हो गये। उस समय इन्द्र ने श्रीजिनेन्द्र को स्नान कराने के लिए मोतियों के हार से सुशोभित आठ योजन गहरे एवं एक योजन मुख वाले सुवर्णमय कलश को पकड़ने के उद्देश्य से दिव्य आभूषणों से युक्त हजार भुजाएँ बना लीं। उस समय इन्द्र की शोभा देखने ही योग्य थी। एक सहस्र हाथों से एक हजार कलशों को पकड़े हुए इन्द्र ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह ‘भाजनांग' जाति का कल्पवृक्ष ही हो। सौधर्म इन्द्र ने ‘जय-जय' शब्द का गम्भीर उच्चारण करते हुए भगवान के मस्तक पर पहली जलधारा छोड़ी। अन्य देव भी उस समय ‘जय हो, हमारी रक्षा करो' आदि जयघोष करने लगे। उनके गम्भीर निनाद से पर्वतराज पर बड़ा कोलाहल मचा। दूसरे देवेन्द्र भी सौधर्म इन्द्र के साथ भगवान के मस्तक पर गंगा की तीव्र धारा के सदृश जलधारा डालने लगे।

वह जलधारा बड़ी तीव्र गति से भगवान के मस्तक पर पड़ने लगी। वह धारा यदि दूसरे किसी पहाड़ पर पड़ती, तो उसके खण्ड-खण्ड हो जाते, पर अतुलित बलशाली होने के कारण भगवान के शरीर पर वह पुष्प जैसी सुकोमल अनुभूत हुई। जल के छींटे आकाश में बहुत ऊँचे उछलते हुए ऐसे प्रतीत होते थे, मानो वे भगवान के शरीर का स्पर्श करने से पापों से मुक्त होकर ऊध्र्वगति को जा रहे हैं। स्नान-जल के कितने ही छींटे मोतियों जैसे मालूम पड़ते थे। स्नान-जल का ऊँचा प्रवाह उस पर्वतराज के वनों में ऐसे वेग से बढ़ा कि देखने से मालूम होने लगा कि पर्वतराज को खण्ड-खण्ड कर देगा।

भगवान के स्नान किये हुए जल से डूबी हुई वनस्थली ऐसी दीखने लगी, मानो वह दूसरा क्षीरसमुद्र ही हो। महान उत्सवों से सम्पन्न, नृत्य-गीतादि से युक्त उस समय का उत्सव देखकर देवों के आनन्द की सीमा न रही। इन्द्र ने आत्मशुद्धि के लिए भगवान को शुद्ध स्नान कराया।

स्नान की जलधारा भगवान के शरीर का स्पर्श कर अत्यन्त पवित्र हो गई। अपार पुण्य प्राप्त कराने वाली एवं संसार की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करने वाली वह जलधारा हमें एवं भव्यजीवों को मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करे। जो जलधारा पुण्यास्त्र जलधारा के समान मनवांछित पदार्थों को प्रदान करने वाली है, वह समस्त भव्यजीवों को इच्छित वस्तुएँ प्रदान करे।

वह जलधारा तीक्ष्ण खड्ग के सदृश सत्पुरुषों के विघ्नों का नाश कर देती है। वह दु:ख एवं असह्य वेदना का नाश करने वाली है। जो जलधारा भगवान के शरीर से लगकर पवित्र हो चुकी है, वह हमारे दु:ख (कर्मरूपी मैल) को हटा कर हमें पवित्र करे। इस प्रकार देवों के अधिपति ने भगवान का अभिषेक करके ‘भव्यों को शान्ति हो' ऐसा कहा। उस सुगन्धित जल (गन्धोदक) को देवों ने शुद्धि के लिए मस्तक पर लगाया।

अभिषेक का उत्सव सम्पन्न होने के पश्चात् तीर्थंकर, इन्द्र एवं देवताओं द्वारा पूजे गये उन भगवान श्री महावीर की दिव्य गन्ध, मोतियों के अक्षत, कल्पवृक्ष के पुष्प, अमृत के पिण्डरूपी नैवेद्य, रत्नों के दीप, अष्टांग धूप, कल्पवृक्ष के फल, अर्घ, पुष्पांजलि आदि के साथ पूजा की गई। इस प्रकार इन्द्र ने बड़ी भक्ति के साथ भगवान की प्रार्थना करते हुए अभिषेक उत्सव सम्पन्न किया पुन: इन्द्र ने इन्द्राणी एवं अन्य देवों के साथ भगवान को प्रणाम किया।

उस समय का प्राकृतिक दृश्य बड़ा ही मनोरम था। आकाश से सुगन्धित जल के साथ पुष्पों की वर्षा होने लगी। देवों ने मन्द सुगन्ध एवं शीतल वायु प्रवाहित की। वस्तुत: जिन (प्रभु) के जन्माभिषेक का सिंहासन सुमेरूपर्वत है एवं स्नान कराने वाला इन्द्र है, मेघ के समान दुग्ध से भरे हुए कलश हैं, स्वयं देवियाँ नृत्य प्रस्तुत करने वाली हैं, स्नान के लिए क्षीरसमुद्र है एवं जिस जगह देवगण सेवक हैं, भला ऐसे जन्माभिषेक की महिमा का कोई कैसे वर्णन कर सकता है ? अर्थात् कोई नहीं कर सकता।

अभिषेक किए हुए भगवान (शिशु) के सर्वांग को इन्द्राणी ने उज्ज्वल वस्त्र से पोंछा। इसके बाद उसने भक्तिपूर्वक सुगन्धित द्रव्यों से उनका लेपन किया। यद्यपि वे प्रभु तीनों जगत् के तिलक थे, फिर भी भक्तिवश उसने उनके मस्तक पर तिलक लगाया। जगत् के चूड़ामणि भगवान के मस्तक में चूड़ामणि रत्न बाँधा गया। यद्यपि भगवान के नेत्र स्वभाव से ही काले थे, फिर भी लोक-व्यवहार दिखलाने के लिए उनके नेत्रों में इन्द्राणी ने अंजन लगाया।

भगवान के कानों में इन्द्राणी ने रत्नों के कुण्डल पहिनाए। प्रभु के कण्ठ में रत्नों का हार, बाहों में बाजूबन्द, हाथों में कड़े एवं अँगुलियों में अँगूठी पहिनाई। कमर में छोटी घण्टियों वाली मणियों की करधनी पहिनाई, जिसके तेज से सारी दिशाएँ व्याप्त हो गयीं। प्रभु के पैरों में मणिमय गोमुखी कड़े पहिनाए गए। इस प्रकार असाधारण दिव्य मण्डनों (गहनों) की कान्ति एवं स्वाभाविक गुणों से प्रदीप्त वे प्रभु ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो लक्ष्मी के पुंज ही हों।

भगवान का दिव्य शरीर आभूषणों से द्विगुणित शोभायमान हो गया। आभूषणों से सजे हुए इन्द्र की गोद में विराजमान श्री महावीर प्रभु को देखकर इन्द्राणी को परम आश्चर्य हुआ। इन्द्र को भी कम आश्चर्य नहीं हुआ। दोनों नेत्रों से उन्हें देखने से जब इन्द्र को तृप्ति नहीं हुई, तब उसने अपने हजार नेत्र कर लिये। अन्य देव-देवियाँ भी भगवान की रूप-सुधा का पान कर अत्यन्त हर्षित हुर्इं।

तत्पश्चात् सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र प्रभु की स्तुति करने के लिए प्रस्तुत हुआ। वह तीर्थंकर के पुण्योदय से उत्पन्न उनके गुणों की प्रशंसा करने लगा। उसने कहा ‘हे देव! बिना स्नान के ही आप का सर्वांग पवित्र है, पर मैंने अपने पापों की शान्ति के लिये आज भक्तिपूर्वक आप को स्नान कराया है। आप तीनों जगत् के आभूषण हैं, पर मैंने अपने सुखों की प्राप्ति के लिए आपको आभूषणों से विभूषित किया है। हे प्रभो! आपकी महान सत्ता आज सारे संसार पर अपने प्रभाव का विस्तार कर रही है।'

हे देव! कल्याण की कामना रखने वाले लोगों का कल्याण आपके ही द्वारा होगा। आप मोह के सागर में गिरे हुए व्यक्तियों के लिए सहारा हो। आप की अमृतमयी वाणी मोह-शत्रु का विनाश करेगी। आप धर्म- तीर्थरूपी जलपोत के द्वारा भव्यजीवों को संसार-समुद्र से पार उतारोगे। हे नाथ! आपकी वचनरूपी किरणें जीवों के मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकार का सर्वथा विनाश करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। हे स्वामिन्! आप केवल मोक्ष-प्राप्ति के उद्देश्य से ही नहीं उत्पन्न हुए हैं, आप का उद्देश्य मोक्ष की आकांक्षा रखने वाले जीवों को मार्ग दिखलाना भी है। आप सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय की वर्षा करते हुए सत्पुरुषों को निर्मल बनाएगे। आपका जन्म धारण करना सर्वथा स्तुत्य है।

हे महाभाग! मोक्षरूपी स्त्री आप में आसक्त हो रही है। भव्यजीव तो आपकी प्रतीक्षा करते ही हैं, वे बड़े प्रेम एवं भक्ति के साथ आपकी चरण-सेवा के लिए सन्नद्ध हैं। वे आपको मोहरूपी महायुद्ध के विजेता, शरण में आए हुए के रक्षक, कर्मरूपी शत्रुओं के विनाशक एवं मोक्षमार्ग प्रशस्त करने वाला मानते हैं। हे प्रभो! वस्तुत: आज हम आपका जन्माभिषेक कर अत्यन्त कृतार्थ हो गये हैं एवं आपका गुणानुवाद करने से हमारा मन अत्यन्त निर्मल हो गया है।

हे गुणों के अपार सागर! आपकी स्तुति करने से हमारा जन्म सफल हो गया एवं आपकी देह-सेवा से हमारा शरीर भी सफल हुआ। जिस प्रकार खान से निकलने वाले रत्न का संशोधन करने पर उसमें और अधिक चमक आने लगती है, ठीक उसी प्रकार आप स्नान आदि से बहुत सुशोभित हो रहे हैं। हे नाथ! आप समस्त संसार के नाथ हैं एवं आप बिना किसी कारण के ही लोकहितचिन्तक हैं। परमानंद प्रदान करने वाले हे विभो! आप को शत-शत प्रणाम है। तीनों ज्ञानरूपी नेत्रों के धारक आप को बारम्बार प्रणाम है।

धर्मतीर्थ के प्रवर्तक हे भगवन्! उत्तम गुणों के सागर एवं मल-स्वेद आदि से रहित शरीर धारण करने वाले आपको प्रणाम है। हे देव! निर्वाण का मार्ग दिखलाने वाले, कर्मरूपी शत्रुओं के संहारक, पंचेन्द्रियों के मोह को परास्त करने वाले, पंचकल्याणकों के भागी, स्वभाव से निर्मल, स्वर्ग-मोक्ष प्रदान करने वाले, अनन्त महिमा से मण्डित, बिना स्वार्थ के समस्त संसारी जीवों का हित करनेवाले, मोक्षरूपी भार्या के स्वामी, संसार का अन्धकार नष्ट करने वाले, तीनों जगत् के स्वामी एवं सत्पुरुषों के गुरू, आपको करबद्ध प्रणाम है।

हे देव, मैं आपकी स्तुति इसलिये नहीं करता कि मुझे तीनों जगत् की सम्पदा प्राप्त हो, बल्कि मुझे ऐसी सम्पदा प्रदान करो, जिससे मोक्ष का मार्ग सुलभ हो। वस्तुत: इस संसार में आपके सदृश अन्य कोई दाता नहीं है।' इस प्रकार श्री महावीर स्वामी की स्तुति कर सौधर्म स्वर्ग के इन्द्र ने व्यवहार की प्रसिद्धि के लिए उनके दो नाम रख दिये-कर्म-शत्रु पर विजय प्राप्त करने के कारण ‘श्रीमहावीर'१ एवं सद्गुणों की वृद्धि होने से ‘वद्र्धमान'। इस प्रकार भगवान का नामकरण कर इन्द्र ने देवों के साथ उनको ऐरावत गजराज पर बिठा कर कुण्डलपुर की ओर प्रस्थान किया।

कुण्डलपुर में जन्म महोत्सव-उस समय सारा नगर देव-देवियों से भर गया था। तत्पश्चात् इन्द्र ने थोड़े से देवों को साथ लेकर राजभवन में प्रवेश किया। वहाँ अत्यन्त रमणीक महल के आँगन में रत्नों के सिंहासन पर शिशु-भगवान को विराजमान किया। अपने बन्धु-बान्धवों के साथ महाराज सिद्धार्थ अनुपम गुण-कांतियुक्त पुत्र को देखने लगे।

इन्द्राणी ने जाकर मायामयी निद्रा में लीन महारानी को जगाया। उन्होंने बड़े प्रेम से आभूषणों से युक्त अपूर्व कान्ति वाले पुत्र को देखा। इन्द्राणी सहित इन्द्र को देखकर जगत्-पिता की माता को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने समझ लिया कि आज हमारा मनोरथ सिद्ध हो गया। इसके पश्चात् ही सब देवों ने मिलकर माता-पिता को वस्त्राभूषणों से अलंकृत कर उनकी विधिवत् पूजा की। इन्द्र ने बड़ी श्रद्धा के साथ माता-पिता की स्तुति की। उसने कहा ‘आप दोनों संसार में धन्य हो, आप श्रेष्ठ पुण्यवान एवं चराचर में प्रधान हो।'

आप विश्व के सम्मान एवं विश्व के माता-पिता हो। तीनों लोक के पिता को उत्पन्न करने के कारण आज आपकी मान्यता सारे संसार में है। आपकी कीर्ति अक्षुण्ण है, क्योंकि भविष्य में सबका उपकार एवं कल्याण होने में आप दोनों सहभागी हो। आज से आपका यह गृह चैत्यालय मंंदिर के सदृश हो गया है एवं गुरू (तीर्थंकर) के सम्बन्ध से आप हमारे पूज्य एवं मान्य हो'। इस प्रकार इन्द्र ने माता-पिता की स्तुति कर एवं भगवान को उन्हें सौंप कर सुमेरूपर्वत पर अभिषेक महोत्सव का पूर्ण विवरण सुनाया। वे दोनों ही जन्माभिषेक का विवरण सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए तथा उनके आनन्द की सीमा न रही।

इन्द्र की सम्मति से उन दोनों (माता-पिता) ने बन्धुवर्ग के साथ भगवान का जन्मोत्सव सम्पन्न किया। सर्वप्रथम श्रीजिनमन्दिर में भगवान की अष्ट द्रव्यों से पूजा की गई। इसके पश्चात् ही बन्धुओं एवं दास-दासियों को अनेक प्रकार के दान दिए गए। बन्दी२ एवं दीन अनाथों को भी उनकी योग्यता के अनुसार दान देकर उन्हें संतुष्ट किया गया। नगर को तोरण एवं मालाओं से खूब सजाया गया। वाद्य एवं शंख की गम्भीर ध्वनि होने लगी। ऐसे ही नृत्य-गीतादि सैकड़ों उत्सवों से वह नगर स्वर्ग जैसा प्रतीत होने लगा।

इस उत्सव से नगर की प्रजा एवं कुटुम्बीजनों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। पुरवासी एवं नगर-निवासी जनों को प्रसन्नता प्रगट करते देखकर देवेन्द्र ने भी स्वयं प्रसन्नता प्रकट की। उस समय इन्द्र ने प्रभु की सेवा के लिए देवियों के साथ त्रिवर्ग साधक फल का प्रदायक दिव्य नृत्य-नाटक मंचस्थ किया। इन्द्र का नृत्य आरम्भ होने पर गन्धर्व देवों ने वाद्य एवं गान आरम्भ किये। राजा सिद्धार्थ नवजात पुत्र को गोद में लेकर बैठे। आरम्भ में इन्द्र ने जन्माभिषेक सम्बन्धी दृश्य दिखलाया पुन: जिनेन्द्र के पूर्व जन्म के अवतारों को नाटक की तरह दिखलाता हुआ एवं नृत्य करता हुआ इन्द्र कल्पवृक्षसा प्रतीत हो रहा था। रंगभूमि के चारों ओर नृत्य करता हुआ वह इन्द्र विमान की भांति शोभायमान हुआ।

इधर इन्द्र का तांडव नृत्य चल रहा था एवं उधर देवगण भक्तिवश इन्द्र पर पुष्पवृष्टि कर रहे थे। नृत्य के साथ अनेकों सुमधुर वाद्य बजने आरम्भ हुए। किन्नरी देवियाँ भगवान का गुणगान करने लगीं। इन्द्र अनेक रसों से मण्डित ताण्डव नृत्य कर रहा था। हजारों भुजाओं वाले इन्द्र के नृत्य से पृथ्वी चंचल हो उठी। इन्द्र कभी एक रूप एवं कभी अनेक रूप, कभी स्थूल एवं कभी सूक्ष्म रूप धारण कर लेता था। क्षणभर में समीप, क्षणभर में दूर एवं क्षणभर में ही आकाश में पहुँच जाता था। इस प्रकार वह नृत्य-नाट्य बड़ा ही मनोरंजक एवं प्रभावोत्पादक हुआ। साथ-साथ देवांगनाओं के नृत्य भी बड़े आकर्षक हुए। वे बड़ी लय के साथ गातीं एवं हाव-भाव के साथ नृत्य करती थीं। उनमें से कई तो ऐरावत गजराज के ऊपर विराजमान इन्द्र की भुजाओं में से निकलती हुई एवं पुन: प्रवेश करती हुई कल्पबेलि के समान प्रतीत होती थीं। अनेक अप्सराएँ इन्द्र की हस्तांगुलि पर अपनी नाभि रखकर नृत्य करने लगीं। इन्द्र की प्रत्येक भुजा पर नृत्य करती हुई अनेक अप्सराएँ सबको प्रसन्न करने लगीं।

अप्सराएँ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार का नृत्य करती थीं। इस प्रकार नृत्य में सम्मिलित इन्द्र चतुर ऐन्द्रजालिक (पक्का जादूगर) मालूम होता था। इन्द्र की सारी कलाएँ उन नर्तकी देवियों में बँट गयीं। विक्रिया ऋद्धि से नृत्य करता हुआ इन्द्र भगवान के माता-पिता आदि सभी दर्शकों को मंत्र-मुग्ध करने लगा।

तत्पश्चात् श्रीजिनेन्द्रदेव की सेवा के लिए अनेक देवियों को तथा असुर कुमार देवों को वहाँ रखकर इन्द्र शेष देवों के साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग में चला गया। इस प्रकार पुण्य के फलस्वरूप तीर्थंकर स्वामी सम्पूर्ण सम्पदाओं से पूर्ण हुए, अतएव भव्यजनों को चाहिये कि वे सर्वदा धर्म का पालन करते रहें।

[सम्पादन]
बाल्यकाल की विशेषताएँ-

एक बार ‘संजय' और ‘विजय' नामक दो चारण मुनियों को किसी पदार्थ में संदेह हुआ, भगवान के जन्म के बाद ही वे उनके समीप आये और प्रभु के दर्शनमात्र से ही उनका संदेह दूर हो गया इसलिए उन्होंने बड़ी भक्ति से बालक का ‘सन्मति' यह नाम रखा। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर प्रतिदिन भगवान के समय, आयु और इच्छा के अनुसार स्वर्ग से भोगोपभोग की वस्तुओं को लाया करता था अर्थात् भगवान के भोजन, आभूषण आदि स्वर्ग से ही आते थे।

पूर्व के अध्याय में बतलाया जा चुका है कि भगवान की सेवा के लिए सौधर्म इन्द्र अनेक देव-देवियों को राजमहल में नियुक्त कर गये थे। उनमें से कोई धाय का काम करती, कोई वस्त्र-आभूषण आदि से उनके अंगों को सजाती, कोई अनेक प्रकार के खिलौने आदि के द्वारा उनका विशेष मनोरंजन करती थी। जब वे देवियाँ उन्हें सम्बोधन कर बुलातीं, तो भगवान मुस्कुराते हुए उनके पास चले जाते थे। तीर्थंकर भगवान चन्द्रकला की भाँति बढ़ने लगे। उनकी बाल-सुलभ चपलता से माता-पिता को बड़ा ही आनन्द होता था।

जब उनकी अवस्था कुछ अधिक बढ़ी, तो उनके मुख से सरस्वती की भाँति वाणी निकलने लगी। रत्नजटित भूमि पर चलते हुए उनके आभूषण सूर्य की किरणों की तरह दमदमाते थे एवं वे स्वयं किरणों से परिवेष्टित सूर्य से प्रतीत होते थे। उनकी क्रीड़ा के लिए देव स्वयं गजराज, अश्व आदि का कृत्रिम रूप ले लिया करते थे। वे उनके साथ क्रीड़ा किया करते थे। इस प्रकार विभिन्न क्रीड़ाओं से स्वयं प्रसन्न होकर दूसरों को प्रसन्न करते हुए वे भगवान कुमार अवस्था को प्राप्त हुए। पूर्व में उनका जो क्षायिक सम्यक्त्व था, उससे उन्हें समग्र पदार्थों का ज्ञान स्वत: हो गया।

उस समय प्रभु के दिव्य शरीर में स्वाभाविक मति-श्रुति-अवधि आदि ज्ञान वृद्धि को प्राप्त हुए। उन्हें समस्त कलाएँ एवं विद्याएँ स्वत: प्राप्त हो गयीं इसलिए वे प्रभु मनुष्यों तथा देवों के लिए गुरू सदृश हो गये, पर उनका कोई गुरू नहीं था। ठीक आठवें वर्ष में भगवान ने बारह व्रतों को ग्रहण किया। प्रभु का शरीर स्वेदरहित कान्तिवान एवं मल-मूत्रादि से रहित स्वर्ण सदृश था। श्वेत रुधिरयुक्त एवं महान सुगन्धित आठ शुभ लक्षणों से वे शोभायमान थे। आगे चलकर भगवान वङ्कावृषभनाराचसंहनन एवं समचतुरस्रसंस्थान वाले उत्तम रूपयुक्त एवं विशालकाय बलवान पुरुष हुए।

संगमदेव द्वारा बालक वद्र्धमान की परीक्षा-वे सबके लिए हितकारक एवं कर्णमधुर शब्दों का उच्चारण करते थे। इस प्रकार जन्मकाल से ही दिव्य दश अतिशयों से युक्त, धीरज आदि अपरिमित गुण, कीर्ति-कला-विज्ञान आदि सभी से वे सुशोभित थे। उनके शरीर का वर्ण तपाये हुए स्वर्ण के वर्ण जैसा था। वे दिव्य देह के धारक धर्म की प्रतिमूर्ति के सदृश जगत् के धर्मगुरू थे।

एक दिन की घटना है इन्द्र की सभा में देवों ने भगवान की दिव्यकथा पर चर्चा की। वे कहने लगे- ‘देखो! वीर जिनेश्वर तो कुमार अवस्था में ही धीर-वीरों में अग्रणी, अतुल पराक्रमी, दिव्य रूपधारी एवं अनेक गुणों के धारी सांसारिक क्षेत्र में क्रीड़ा करते हुए कितने मनोज्ञ प्रतीत होते हैं।' उसी स्थान पर संगम नाम का एक देव बैठा हुआ था। देवों की बातें सुनकर भगवान की परीक्षा लेने के लिए वह स्वर्ग से चल पड़ा। वह उस वन में आया, जहाँ प्रभु अन्य राजपुत्रों के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। उस देव ने प्रभु को डराने के उद्देश्य से काले सर्प का विकराल रूप बनाया। वह एक वृक्ष की जड़ से लेकर स्कन्ध तक लिपट गया। उस सर्प के भय से अन्यान्य राजकुमार वृक्ष से वूâदकर घबराये हुए दूर भाग गये।

किन्तु कुमार महावीर जरा भी भयभीत नहीं हुए। वे उस विकराल सर्प के ऊपर आरूढ़ होकर क्रीड़ा करने लगे। ऐसा मालूम हो रहा था, मानो वे माता की गोद में ही क्रीड़ा कर रहे हों। कुमार का धैर्य देखकर सर्परूपी देव बड़ा चकित हुआ। वह प्रगट होकर प्रभु की स्तुति करने लगा। उसने बड़े नम्र शब्दों में कहा-‘हे देव! आप संसार के स्वामी हो, आप महान धीर-वीर हो, आप कर्मरूपी शत्रु के विनाशक तथा समग्र जीवों के रक्षक हो।'

वह कहने लगा-‘हे देव! आपके अतुल पराक्रम से प्रगट हुई कीर्ति स्वच्छ चांदनी के सदृश लोक के कण-कण में विस्तृत हो रही है। आपका नाम स्मरण करने मात्र से ही प्रयोजनों को सिद्ध कराने वाला धैर्य प्राप्त होता है। अत्यन्त दिव्य मूर्तिवाली सिद्धि-वधू के स्वामी श्री महावीर! मैं आपको बारम्बार प्रणाम करता हूँ।' इस प्रकार वह देव भगवान की स्तुति कर उनका ‘महावीर' नाम सार्थक करता हुआ स्वर्ग को चला गया। कुमार ने भी अपने यशगान को बड़े ध्यान से सुना। देव की स्तुति बड़ी ही कर्णप्रिय तथा भगवान के यश को संसार में विस्तृत करने वाली थी।

इस प्रकार भगवान श्री महावीर स्वामी का गुणानुवाद बारम्बार हुआ करता था। वे भगवान किन्नरी देवियों द्वारा गाए गए अनेक गुणानुवाद को बड़े ध्यानपूर्वक सुना करते थे। कभी नेत्रों को तृप्त करने वाले स्वर्ग की अप्सराओं के नृत्य तथा विभिन्न प्रकार के नाटक देखते थे, तो कभी स्वर्ग से प्राप्त आभूषण-वस्त्र-माला आदि अन्य को दिखाकर प्रसन्न होते थे। अन्य देवकुमारों के साथ कभी जल-क्रीड़ा तथा कभी अपनी इच्छा से वन-क्रीड़ा करते थे। इस प्रकार क्रीड़ा में संलग्न धर्मात्मा कुमार का समय बड़े सुख से व्यतीत होने लगा।

सौधर्म स्वर्ग का इन्द्र भी अपनी कल्याणकामना के लिए देवियों से अनेक प्रकार के नृत्य-गीत करवाने लगा। काव्य आदि की गोष्ठी तथा धर्म-चर्चा में समय व्यतीत करते हुए कुमार ने संसार को सुखी करने वाली यौवनावस्था को प्राप्त किया। कुमार के मस्तक का मुकुट धर्मरूपी पर्वत के शिखर की भाँति शोभायमान हो रहा था। इनके कपोल तथा मस्तक की कान्ति ऐसी मालूम पड़ती थी, मानो पूर्णिमा के चन्द्रमा की ज्योत्स्ना ही हो। प्रभु की सुन्दर भौंहों से शोभित कमल-नेत्रों का वर्णन भला यह तुच्छ लेखनी क्या कर सकती थी, जिसके खुलने-मात्र से संसार के प्राणी तृप्त हो जाते थे।

प्रभु के कानों के कुण्डल बड़े ही भव्य दीखते थे। वे ऐसे शोभायमान होते थे, मानो ज्योतिष्क चक्र से घिरे हुए हों? भला प्रभु के मुखरूपी चन्द्रमा का क्या वर्णन किया जा सकता है ? जिसके द्वारा संसार का हित करने वाली ध्वनि निकलती है। प्रभु की नासिका-ओष्ठ-दन्त एवं कण्ठ की स्वाभाविक सुन्दरता जैसी थी, उसे बतलाने की शक्ति किसी में नहीं है। उनका विस्तृत वक्षस्थल रत्नों के हार से ऐसा सुसज्जित होता था, मानो लक्ष्मी का निवास ही हो।

अनेक प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित उनकी भुजाएँ ठीक कल्पवृक्ष के सदृश प्रतीत होती थीं। अंगुलियों के दशों नख अपनी किरणों से ऐसे प्रतिभासित हो रहे थे, मानो वे धर्म के दश अंग ही हों। उनकी गहरी नाभि सरस्वती एवं लक्ष्मी की क्रीड़ास्थली (सरोवर) जैसी प्रतीत होती थी। प्रभु के वस्त्र-पट की करधनी ऐसी मालूम होती थी, जैसे वह कामदेव को बांधने के लिए नागपाश ही हो।

प्रभु के दोनों जानु विस्तीर्ण एवं पुष्ट थे। यद्यपि वे कोमल थे, फिर भी व्युत्सर्गादि तप करने में उनकी समानता नहीं की जा सकती थी। भला प्रभु के ऐसे चरणकमलों की तुलना किससे की जा सकती है, जिनकी सेवा इन्द्र-धरणेन्द्र आदि सभी देव किया करते हैं। इस प्रकार शिखा से नख तक प्रभु के अंग-प्रत्यंग की शोभा अपूर्व थी। उसका वर्णन करना असाध्य है, मानो ब्रह्मा अथवा कर्म ने तीन जगत् में रहने वाले दिव्य प्रकाशमान, पवित्र एवं सुगन्धित परमाणुओं से प्रभु का अद्वितीय शरीर बनाया था। उस शरीर का पहिला गुण वङ्कावृषभनाराचसंहनन था।

प्रभु के शरीर में मद, स्वेद, दोष, रागादिक तथा वातादिक तीन दोषों से उत्पन्न रोग किसी समय भी नहीं होते थे। उनकी वाणी समस्त संसार को प्रिय थी। वह सबको सत्य एवं शुभ मार्ग दिखलाने वाली धर्ममाता के समान थी, दूसरे खोटे मार्ग को व्यक्त करने वाली नहीं थी। दिव्य शरीर को पाकर वे प्रभु ऐसे सुशोभित हो रहे थे, जैसे धर्मात्माओं को पाकर धर्मादि गुण सुशोभित होते हैं। भगवान के लक्षण ये हैं-

श्रीवृक्ष, शंख, पद्म, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चमर, श्वेत छत्र, ध्वजा, सिंहासन, दो मछलियाँ, दो घड़े, समुद्र, कछुआ, चक्र, तालाब, विमान, नाग-भवन, पुरुष-स्त्री का जोड़ा, बड़ा भारी सिंह, तोमर, गंगा, इन्द्र, सुमेरू, गोपुर, चन्द्रमा, सूर्य, घोड़ा, बींजना, मृदंग, सर्प, माला, वीणा, बांसुरी, रेशमी वस्त्र, दैदीप्यमान कुंडल, विचित्र आभूषण, फल सहित बगीचा, पके हुए अनाजवाला खेत, हीरा रत्न, बड़ा दीपक, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, सुवर्ण कमलबेल, चूड़ारत्न, महानिधि, गाय, बैल, जामुन का वृक्ष, पक्षिराज, सिद्धार्थ वृक्ष, महल, नक्षत्र, ग्रह, प्रातिहार्य आदि दिव्य एक सौ आठ लक्षणों से तथा नौ सौ सर्वश्रेष्ठ व्यंजनों से, विचित्र आभूषणों से एवं मालाओं से प्रभु का स्वभाव-सुन्दर, दिव्य, औदारिक शरीर अत्यन्त सुशोभित हुआ।

विशेष वर्णन ही क्या किया जाय! संसार में जितनी भी शुभ-लक्षणरूप सम्पदा एवं प्रिय वचन-विवेकादि गुण हैं, वे सब पुण्य कर्मों के उदय से तीर्थंकर भगवान में स्वत: ही समाविष्ट थे। अधिष्ठित स्वामी सदा उनकी सेवा में रत रहते थे। वे तीर्थंकर महावीर धर्म की सिद्धि के लिए मन-वचन-काय की शुद्धि से अतिचाररहित भक्तिपूर्वक गृहस्थों के बारह व्रतों का पालन करते थे। वे सर्वदा शुभ-ध्यान की ओर विचार किया करते थे। पुण्य के शुभोदय से प्राप्त हुए सुखों का उपभोग करते हुए वे कुमार आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे।

[सम्पादन]
भगवान का वैराग्य-

विश्वपति, मन्दरागी उन महाप्रभु ने तीस वर्ष का समय मानो क्षणभर में ही व्यतीत कर दिया। एक बार अच्छे होनहार के कारण चारित्र-मोह-कर्म के क्षयोपशम से उन्हें स्वत: अपने पूर्व के करोड़ों जन्मों का संसार-भ्रमण ज्ञात हो गया। वे इस प्रकार की पूर्व-घटित घटनाओं पर विचार कर बड़े ही क्षुब्ध हुए। उन्हें तत्काल ही वैराग्य उत्पन्न हो गया। वे विचार करने लगे कि मोहरूपी महान शत्रु का सर्वनाश करने के लिए रत्नत्रयरूप तप का पालन ही श्रेयस्कर है। उन्होंने सोचाचारित्र के अभाव में मेरा इतने दिन का समय व्यर्थ ही व्यतीत हो गया, जो अब लौट नहीं सकता। पूर्वकाल में ऋषभादि जितने भी तीर्थंकर हो गये हैं, उनकी आयु पर्याप्त दीर्घ थी, इसलिये वे सब कुछ कर सकने में समर्थ हुए थे, पर हम सरीखे थोड़ी-सी आयु वाले मनुष्य सांसारिक कार्य कुछ भी नहीं कर सकते। वे श्री नेमिनाथादि तीर्थंकर धन्य हैं, जिन्होंने अपने जीवन की अवधि थोड़ी-सी समझकर अल्पायु में ही मोक्ष के उद्देश्य से तपोवन की ओर प्रस्थान किया था अत: संसार हित चाहने वाले थोड़ी आयु वाले व्यक्तियों को एक क्षण भी संयम के बिना व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

वस्तुत: वे बड़े अज्ञानी हैं, जो थोड़ी आयु पाकर भी तपस्या के बिना अपने अमूल्य समय को नष्ट कर देते हैं। वे यहाँ तो दु:ख भोगते ही हैं एवं नरकादि में यातनाएँ भी। मैं ज्ञानी होते हुए भी संयम के अभाव में एक अज्ञानी की भांति भटक रहा हूँ। अब गृहस्थाश्रम में रहकर समय व्यतीत करना उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। वे तीनों ज्ञान ही किस काम के, जिनके द्वारा आत्मा को एवं कर्मों को अलग-अलग न किया जाय तथा मोक्षरूपी लक्ष्मी की उपासना न की जाय! ज्ञान प्राप्त करने का उत्तम फल उन्हीं महापुरुषों को प्राप्त है, जो निष्पाप तप का आचरण करते रहते हैं। दूसरों का ज्ञान तप के बिना नितान्त निष्फल है।

उस व्यक्ति के नेत्र निष्फल हैं, जो नेत्र होते हुए भी अन्धकूप में गिरता है। वही दशा ज्ञानी पुरुषों की है जो ज्ञान होते हुए भी मोहरूपी वूâप में गिरे रहते हैं। वस्तुत: अज्ञान (अनजान) में किये गये पाप से छुटकारा तो ज्ञान प्राप्त होने पर मिल भी जाता है, पर ज्ञानी (जानकार) का पाप से मुक्त होना बड़ा ही दुष्कर होता है। अतएव ज्ञानी पुरुषों को मोहादि निंद्य कर्मों के द्वारा किसी प्रकार पाप का बंध नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि मोह से राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं एवं राग-द्वेष से घोर पाप होता है। उस पाप के फलस्वरूप जीव को बहुत दिनों तक दुर्गतियों में भटकना पड़ता है। वह भटकना भी साधारण नहीं, अनन्तकाल तक का, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

ऐसा समझ कर ज्ञानियों को चाहिये कि वे मोहरूपी शत्रु को वैराग्यरूपी खड्ग से मार दें। कारण, यह मोह ही सारे अनर्थों की जड़ है, पर यह स्मरण रहे कि यह मोह गृहस्थों द्वारा नहीं छोड़ा जा सकता इसलिये पाप के बन्धन गृह को तो त्यागना ही पड़ेगा। गृह-बन्धन बाल्यावस्था में तथा यौवनावस्था में सारे अनर्थ उत्पन्न करता रहता है अत: धीर-वीर पुरुष मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से गृह-बन्धन का सर्वथा परित्याग कर देते हैं। वे संसार में पूज्य एवं महापुरुष हैं, जो यौवनावस्था में दुर्जेय कामदेव को भी परास्त करने में समर्थ होते हैं।

यौवनावस्थारूपी राजा ने कामदेव को पंचेन्द्रिय आदि चारों काय के जीवों के जीवन को विकृत करने के लिए भेजा है; पर जब यौवन की अवस्था मन्द हो जाती है, तब उसके साथ बुढ़ापेरूपी फन्दे में बंधे हुए वे कामदेवादि भी ढीले पड़ जाते हैं। अतएव यह उचित होगा कि मैं यौवनावस्था में ही उग्र तप आरम्भ कर दूँ, जिससे कामदेव एवं पंचेन्द्रिय विषयरूपी शत्रुओं का सर्वनाश हो। इस प्रकार की चिन्ता कर वे महाबुद्धिमान महावीर प्रभु अपने चित्त को निर्मल कर राज्य-भोगादि से विरक्त हुए एवं मोक्ष-साधन में संलग्न हो गये।


[सम्पादन]
दीक्षा कल्याणक

वीर भगवान को वैराग्य उत्पन्न होने के पश्चात् आठों लौकान्तिक देवों ने अपने अवधिज्ञान से यह निश्चय कर लिया कि भगवान के तप-कल्याणक का उत्सव मनाना चाहिये। तत्पश्चात् वे भगवान श्रीमहावीर के पास आये। उन देवों ने अपने पूर्व जन्म में द्वादशांग श्रुत का अभ्यास किया था तथा वैराग्य भावनाओं का चिन्तवन किया था। चौदह श्रुत के जानने वाले, देवों में श्रेष्ठ वे देवर्षि कहलाते थे।

कर्मरूपी बैरियों को नाश करने में जो प्रयत्नशील हैं, ऐसे वीर भगवान को प्रणाम कर तथा स्वर्ग से लाये हुए पवित्र द्रव्यों से भगवान की पूजन कर वैराग्यमय परिणाम हो जाय, ऐसी वैराग्यमयी स्तुति के द्वारा वे विद्वान लौकान्तिक देव भगवान का गुणगान करने लगे-हे वीर प्रभु! आप जगत् के स्वामी हैं, गुरुओं के श्रेष्ठ महान गुरू हैं, ज्ञानियों में श्रेष्ठ ज्ञानी हैं, समझदारों में आप सर्वश्रेष्ठ समझदार हैं। आपको हम विशेष क्या समझा सकते हैं ? इसलिये स्वयंबुद्ध तथा सर्व पदार्थों के ज्ञाता आपको हम क्या समझावें ? क्योंकि आप स्वयं हमको सद्बुद्धि देने वाले हैं। जिस प्रकार प्रकाशमान दीपक समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है, उसी तरह आप भी संसार के समस्त पदार्थों को प्रकाशित करेंगे। परन्तु हे भगवन्! हमें सन्तोष होता है कि हम आपको समझाने के बहाने से आपके दर्शन एवं आपकी भक्ति करने को यहाँ आने का सौभाग्य प्राप्त कर लेते हैं। आप तो तीन ज्ञान के धारी हैं, आपको भला शिक्षा कौन दे सकता है ? क्या सूर्य का दर्शन करने के लिए दीपक की आवश्यकता होती है ? कदापि नहीं। हे देव! बलवान मोहरूपी शत्रु को जीतने के लिए आपने जो उद्यम किया है, उसे देख कर संसार-समुद्र पार होने की इच्छा रखने वाले अनेक भव्य आत्माओं का महान हित होगा। आप जैसे दुर्लभ जलपोत को पाकर असंख्यात भव्य जीव विकट संसार-सागर से पार हो सकेगे। कितने ही भव्यजीव आपके पवित्र उपदेश से रत्नत्रय को अंगीकार कर उसके द्वारा ‘सर्वार्थसिद्धि' जैसे स्थान में गमन करेंगे। कितने ही प्राणी आपकी वाणी को सुनकर मिथ्याज्ञानरूपी अन्धकार का निवारण कर सब पदार्थों के साथ-ही-साथ मोक्षलक्ष्मी को भी देखेंगे। हे प्रभु! आप से बुद्धिमानों को मनचाहे इष्ट पदार्थों की सिद्धि होगी। हे देव! आपके प्रसाद से ही स्वर्ग एवं मोक्ष की प्राप्ति हो सकेगी।

हे दीनानाथ! मोहरूपी फन्दे में फंसे हुए भव्य प्राणियों को आप ही लगातार सहारा देंगे, क्योंकि आप ही तीर्थ को चलाने वाले धर्म-प्रवर्तक हैं। आपके वचनरूपी मेघ से वैराग्यरूपी अपूर्व वङ्का को पाकर असंख्यात बुद्धिमान बहुत ऊँचे मोहरूपी शिखर को बात-की-बात में खण्ड-खण्ड कर देंगे। आपके उपदेश से पापी प्राणी अपने पापों को एवं कामी व्यक्ति काम-शत्रु को शीघ्र ही परास्त कर डालेंगे, इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं है। हे स्वामी! यह भी निश्चय है कि बहुत से प्राणी आपके चरण-कमलों के सेवन से दर्शन-विशुद्ध्यादि सोलह भावनाओं को स्वीकार करके आप ही के समान महान हो जायेंगे।

हे प्रभो! संसार से बैर करने वाले, वैराग्यरूपी अस्त्र को रखने वाले आपके अवलोकनमात्र से मोह एवं इन्द्रियरूपी शत्रु अपनी जीवन-लीला समाप्त होने के भय से कांप रहे हैं क्योंकि हे दीनबन्धु! आप बलवान सुभट हैं, दुर्जय परीषहरूपी वीरों को क्षण-मात्र में जीतने की सामथ्र्य रखते हैं। इसलिये हे वीर प्रभो! आप मोह एवं इन्द्रियरूपी बैरियों को जीतने में तथा भव्यात्माओं का उपकार करने के लिए चारों घातिया कर्मरूपी शत्रुओं के नाश करने का शीघ्र उपाय करें, क्योंकि अब यह उत्तम समय तपस्या करने के लिए एवं भव्यों को मोक्ष में ले जाने के लिए आपके हाथ में आया है।

हे वीर प्रभु! आपको प्रणाम है, आप जगत्-हितैषी हैं, आप ही मोक्षरूपी रमणी की प्राप्ति के लिए उद्योगी हैं, इसलिये आपको हम पुन: प्रणाम करते हैं। अपने ही शरीर के भोगों के सुख में इच्छारहित हैं, इसलिये भी आपको प्रणाम है। मोक्षरूपी स्त्री के साथ रमण करने की इच्छा रखते हैं, इसलिये आपको प्रणाम है। महान पराक्रमी, बाल ब्रह्मचारी, राज्यलक्ष्मी के त्यागी, अविनाशी लक्ष्मी में लीन आपको प्रणाम है। योगियों के भी आप महान गुरू हैं, इसलिये आपको प्रणाम है। सब जीवों के परम बन्धु हैं, सर्वज्ञ हैं, इसलिये पुन: आपको प्रणाम है।

‘हे महान प्रभु! इस स्तुति द्वारा हम यही प्रार्थना करते हैं कि परलोक में चारित्र की सिद्धि के लिए आप हमें पूरी शक्ति दें। हे वीर प्रभु! वह शक्ति मोहरूपी शत्रु का नाश करने वाली है। इस प्रकार जगत्पूज्य श्रीवीर भगवान की स्तुति एवं अनेक प्रार्थनाएँ करके वे लौकान्तिक देव अपने-अपने स्थान को चले गये।

उसी समय समस्त देवादि सहित चारों जाति के इन्द्रों ने घण्टादि के स्वत: बजने से भगवान का संयमोत्सव समझकर भक्तिभाव से अपनी इन्द्राणियों के साथ महान विभूति से विभूषित होकर अपनी-अपनी सवारियों पर आरूढ़ होकर नगरी में प्रवेश किया। देवों की सेना ने अपनी पत्नियों सहित, सवारियों पर चढ़े हुए नगर एवं वन को चारों ओर से घेर लिया। तत्पश्चात् इन्द्र ने भगवान महावीर स्वामी को एक सिंहासन पर बैठाकर अत्यन्त प्रसन्नता प्रदर्शित करते हुए गीत, नृत्य, ‘जय-जयकार' शब्दों का उच्चारण करते हुए क्षीर-सागर से भरे हुए एक हजार आठ स्वर्ण के कलशों से उनका अभिषेक किया। इन्द्र ने उन त्रिलोकीनाथ को दिव्य आभूषणों एवं वस्त्रों से अलंकृत किया, सुगन्धित दिव्य मालाएँ पहिनार्इं। इस तरह इन्द्र ने भगवान को खूब सजाया। तत्पश्चात्, भगवान ने जन्म देने वाली अपनी माता को ज्ञानामृत से सिंचित प्रभावशाली, सरल एवं मीठे शब्दों में सान्त्वना प्रदान कर, वैराग्य को उत्पन्न करने वाले उपदेशों के सैकड़ों वाक्यों से अपनी दीक्षा की बात समझा दी। संयमरूपी लक्ष्मी के सहवास-सुख में उद्यमी वे वीर प्रभु हर्ष के साथ समस्त राज-पाट, माता-पिता एवं बन्धुओं को त्याग कर इन्द्र द्वारा लाई हुई दैदीप्यमान ‘चन्द्रप्रभा' नाम की पालकी पर आरूढ़ होकर दीक्षा के लिए वन की ओर चले गये। उस समय वे जगत् के स्वामी समस्त देवों से घिरे हुए, दिव्य आभूषणों से युक्त, अत्यन्त मनोज्ञ प्रतीत होते थे।

सबसे पहिले भूमिगोचरी मनुष्यों ने पालकी को उठाया एवं सात पैंड आगे ले जाकर रख दिया। तत्पश्चात् विद्याधर आकाश-मार्ग से सात पैंड ले गये, उसके बाद धर्म से प्रेम रखने वाले समस्त देवों ने अपना-अपना कन्धा लगाया एवं आकाश-मार्ग से चलने लगे। इस समय की शोभा का वर्णन करना इसलिये असम्भव है कि जिस पालकी को ले जाने वाले स्वयं इन्द्र एवं स्वर्ग के देवता लोग हों, उसकी अनुपम छटा का वर्णन क्या सामान्य लेखनी द्वारा हो सकता है ? उस समय हर्ष से पुलकित समस्त देव पुष्पों की वर्षा कर रहे थे, वायुकुमार देव गंगाजल के कणों से युक्त मधुर पवन चला रहे थे, कुछ देव भेरी बजा रहे थे। इन्द्र की आज्ञा से उन देवों ने यह घोषणा की कि भगवान का यह समय मोहादि शत्रुओं को जीतने का है। यह सुन समस्त देवों ने हर्षित होकर प्रभु के सामने खूब उत्सव मनाया-‘जयवन्त हो', ‘आनन्दयुक्त' हो, ‘वृद्धि पाओ' आदि शब्द होने लगे। दुन्दुभी वाद्यों के शब्द होने लगे, अप्सराएँ नृत्य करने लगीं, किन्नरी देवियाँ मधुर शब्द में मोहरूपी शत्रु को जीतने का यशगान करने लगीं। प्रभु के आगे दिक्कुमारी देवियाँ मंगल-अर्घ लेकर चलने लगीं। महापुराण में लिखा है-

अग्रेसरीषु लक्ष्मीषु, पंकजव्यग्रपाणिषु।

समं समंगलार्धाभि-र्दिक्कुमारीभिरादरात्।।

हाथों में कमल धारण किए हुए लक्ष्मी आदि देवियां आगे-आगे जा रही थीं और बड़े आदर से मंगलद्रव्य तथा अघ्र्य लेकर दिक्कुमारी देवियाँ उनके साथ-साथ जा रही थीं।

इस प्रकार भगवान महावीर नगर से वन को चले गये। नगरवासियों ने प्रभु की भूरि-भूरि प्रशंसा की। कितने ही लोग यह भी कहते थे कि अभी जिनराज कुमार ही हैं, फिर भी थोड़ी-सी उम्र में इन्होंने कामरूपी शत्रु को पराजित कर बड़ा भारी उच्च कोटि का काम किया है एवं आज मोक्ष-लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए तपोवन को चले जा रहे हैं।

इस तरह के वाक्य सुनकर अन्य लोग भी इसी तरह कहने लगे कि मोह को तथा कामदेवरूपी शत्रु को प्रभु ने ही जीत पाया है, दूसरे में यह सामथ्र्य नहीं है। उसके पश्चात् सूक्ष्म विचार वाले इस तरह कहने लगे कि यह सब वैराग्य का ही माहात्म्य है, जो अन्तरंग शत्रुओं का नाश करने वाला है। वैराग्य के प्रभाव से पंचेन्द्रियरूपी चोरों को मारने के लिए स्वर्ग के भोग, तीन लोक की सम्पदाएँ त्याग दी जाती हैं, क्योंकि जिसके हृदय में पूर्ण वैराग्य का स्रोत बहता हो, वही चक्रवर्ती की विभूति को क्षण-भर में त्याग सकता है। दरिद्र मनुष्य अपनी कच्ची झोपड़ी को भी छोड़ने में समर्थ नहीं है। कुछ मनुष्य यह भी कहते सुने गये कि यह बात सत्य है कि वैराग्य के बिना मन पवित्र नहीं हो सकता। इस तरह की बातचीत करते हुए बहुत से नगर-निवासी इस कौतुक को देखने के लिए वन में जा पहुँचे किन्तु भगवान के दर्शन होते ही उनका मस्तक स्वयं झुक गया। इस प्रकार वे त्रिलोकीनाथ नगर के बाहर जा पहुँचे।

जब माता ने भगवान के वन-गमन का संवाद सुना, तो पुत्र-वियोग में वे मूच्र्छित होकर कोमल बेल के समान मुरझा गर्इं। तत्पश्चात् इस शोक को क्रमश: सहन करती हुई अनेक पुरजनों एवं बंधुओं के साथ उनके पीछे-पीछे चली गर्इं। जाती हुई माता विलाप करती थीं ‘हे पुत्र! तू तो मुक्ति से प्रेम लगा कर तपस्या करने चला, पर मुझे तेरे बिना कैसे चैन मिलेगा ? किस तरह जीवन व्यतीत करूँगी ? इस छोटी-सी अवस्था में तू तपस्या के महान उपसर्गों को किस प्रकार सहन करेगा ? हे पुत्र! शीत-काल की पवँपाती पवन में जब तू दिगम्बर भेष में वन में विचरेगा, तब कैसे उस शीत को सहन करेगा ? ग्रीष्म-काल की ज्वालाओं से समस्त वन जल जाता है, उस ज्वाला को कैसे सहेगा ? श्रावण-भादों की काली घटाओं को देखकर अच्छे-अच्छे साहसियों के भी छक्के छूट जाते हैं हे बेटा! इन सब कष्टों को क्या तू सहन कर सकेगा? बस, ज्यों-ज्यों मेरा हृदय इन सब बातों को विचारता है, त्यों-त्यों मुझे अत्यधिक कष्ट होता है। हे पुत्र! अति दुर्निवार इन्द्रिय-समूहों को, त्रैलोक्य-विजयी कामदेव को एवं कषायरूपी महा शत्रुओं को धैर्यपूर्वक तू अपने वश में कैसे कर सकेगा? हे बेटा! तू बालक है तथा अकेला है; फिर इस भयंकर वन की गुफाओं में किस प्रकार रह सकेगा ? क्योंकि उन गुफाओं में नाना प्रकार के हिंसक जंगली जीव रहा करते हैं।'

इस तरह जिन-माता अत्यन्त करुण स्वर में विलाप करती हुई मार्ग में अति कष्ट से पैरों को बढ़ाती हुई चली जा रही थीं कि इतने में उनके पास प्रमुख-प्रमुख देव आये। उन्होंने सान्त्वना देते हुए कहा-

‘हे महादेवी! क्या आप इन्हें नहीं पहिचानतीं ? ये आपके पुत्र संसार के स्वामी एवं अनुपम शक्तिशाली जगद्गुरू हैं। आत्मवेशी संसाररूपी समुद्र में अपने-आपको विलीन कर लेने के पहिले ही ये अपना उद्धार तो कर ही लेंगे, साथ ही अन्य कितने ही भव्य जीवों का भी उद्धार कर देंगे, यह ध्रुव सत्य है। जिस तरह कि भयानक सिंह भी मजबूत रस्सी से जकड़े जाने पर सहज ही में वशवर्ती हो जाता है, उसी तरह आपके ये महान पुत्र भी मोहादि पराक्रमी शत्रुओं को तपरूपी रस्सियों से बांधकर उन्हें अपने वश में कर लेंगे। जिनके लिए संसाररूपी समुद्र का दूसरा किनारा पा लेना कतई दुर्लभ नहीं है, ऐसे सामथ्र्यशाली आपके ये पुत्र भला दीनतापूर्वक कल्याणहीन घर में कैसे रह सकेगे? इनके ज्ञानरूपी तीन नेत्र हैं। संसार को इन्होंने सम्यक्रूपेण जान लिया है। फिर भला, वैराग्य उत्पन्न हो जाने पर कोई अन्धकूप में क्यों गिरेगा? इसलिये हे महादेवी! आप इस पापरूपी शोक को त्याग दो। त्रैलोक्य को अनित्य समझकर अपने घर जाओ एवं वहीं पर धर्म-साधना में अपने मन को लगाओ। अपनी प्रिय एवं इच्छित वस्तु के वियोगकाल में ज्ञानहीन पुरुष ही शोक किया करते हैं। जो ज्ञानी एवं बुद्धिमान होते हैं, वे सदैव संसार से डरा करते हैं एवं कल्याणकारी धर्म की ही उपासना किया करते हैं।' महत्तर देव की इन बातों को सुनकर जिन-माता कुछ शान्त हो गयीं। उनके हृदय में विवेकरूपी प्रकाशमयी किरणों का प्रादुर्भाव हुआ एवं हृदय का शोकान्धकार दूर हो गया। वे अपने विशाल हृदय में पवित्र धर्म को धारण कर अपने कुटुम्बियों एवं भृत्यजनों को साथ लेकर राजमहल को वापस लौट गयीं।

इसके बाद जिनेन्द्र महावीर प्रभु पार्श्वर्ती देवों के साथ मानव समाज का मंगल-गान आरम्भ करने के पूर्व ज्ञातृषंडवन नाम के विशाल वन में संयम धारण करने के लिए जा पहुँचे। वह वन अत्यन्त रमणीक था। वहाँ फल-पुष्पों से युक्त शीतल छाया वाले सुन्दर-सुन्दर वृक्ष थे, जो अध्ययन एवं ध्यान के लिए नितान्त उपयुक्त थे। महावीर स्वामी अपनी पालकी से उतर कर ‘चन्द्रकान्तमयी' एक स्वच्छ शिला पर बैठ गये। उस सुन्दर शिला की शोभा विचित्र थी। महावीर स्वामी के आने के पहिले ही देवों ने आकर उस शिला को सुरम्य बना दिया था। वह शिला गोलाकार थी। उस शिला पर विशाल वृक्षों की शीतल एवं घनी छाया पड़ रही थी। चन्द्रकिरणों से भीगी सुरभित जल की बूदें उस शिला पर छिड़की हुई थीं। बहुमूल्य रत्नों के चूर्ण द्वारा स्वयं इन्द्राणी के हाथ से उस शिला पर साथिये बनाये हुए थे। ऊपर वस्त्र का मण्डप बना हुआ था। उसमें ध्वजा एवं रंग-बिरंगी सुन्दर मालाएँ टँगी हुई थीं। चारों ओर धूप का सुगन्धित धुँआ फैल रहा था एवं पास में अनेक मंगल द्रव्य सजाये हुए थे।

महावीर स्वामी उस सुन्दर स्वच्छ शिला पर उत्तराभिमुख होकर बैठ गये एवं मनुष्यों का कोलाहल शांत हो जाने पर देह इत्यादि की इच्छा से विरक्त एवं मुक्ति-साधन में तत्पर होकर शत्रु-मित्रादि के प्रति उत्तम समान भाव का चिंतवन करने लगे। सर्वप्रथम उन्होंने पल्यंकासन लगा कर मोह-बन्धन में पँâसाने वाले केशों का लोंच किया (केश उखाड़ डाले)। उन्होंने क्षेत्र इत्यादि चेतन एवं अचेतनरूप बाह्य दस परिग्रहों का, मिथ्यात्व इत्यादि चौदह अन्तरंग परिग्रहों का तथा वस्त्र, अलंकार एवं माला इत्यादि वस्तुओं का परित्याग कर दिया तथा मनसा-वाचा-कर्मणा पवित्र होकर शरीरादि में निस्पृहतापूर्वक आत्म-सुख की प्राप्ति में लग गये। बाद में जिनेश्वर महावीर स्वामी सम्पूर्ण पाप-क्रियाओं से निर्मुक्त होकर अट्ठाईस मूल-गुणों के पालन करने में तत्पर हो गये। आतापनादि योग से उत्पन्न उत्तर गुणों को एवं महाव्रत, समिति तथा गुप्ति आदि को उन्होंने धारण किया। वे सबके प्रति समता भाव को धारण करने लगे तथा सम्पूर्ण दोषों से हीन एवं सर्वश्रेष्ठ सामायिक संयम को उन्होंने स्वीकार किया। इस प्रकार उन्होंने मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी तिथि के सायंकाल, हस्त-उत्तरा नक्षत्र के मध्य वाले शुभ समय में दुष्प्राप्य जिनदीक्षा को ग्रहण किया। यह जिनदीक्षा मुक्तिरूपी कामिनी की सहचरी (सखी) के समान थी।

महावीर स्वामी के मस्तक में चिरकाल रहने के कारण परम पवित्र उनके केशों को स्वयं इन्द्र ने रत्न-जड़ित मंजूषा (पिटारी) में अपने हाथों से संवार कर रक्खा। फिर इन्द्र ने केशों की पूजा की, उन्हें उत्तम बहुमूल्य वस्त्रों से ढांका एवं समारोहपूर्वक क्षीर-सागर के नैसर्गिक शुद्ध जल में डाल दिया। जब केश जैसी हीन वस्तु का भी, जिनेश्वर के संसर्ग में रहने के कारण, इतना अधिक सम्मान किया जा सकता है; तब जो पुरुष साक्षात् जिनेश्वर भगवान की निरन्तर सेवा-पूजा में लगे रहते हैं, उन्हें संसार में कौन-सी ऐसी अलभ्य वस्तु है, जो नहीं मिल सकती ? उनकी सेवा से सभी कुछ प्राप्त हो जाता है। इस संसार में जिन भगवान के चरण कमलोेंं के आश्रय में आ जाने से जिस प्रकार यक्षों को सम्मान प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार अरहन्त प्रभु का जो लोग सहारा लेते हैं, वे चाहे नीच पुरुष ही क्यों न हों, उनकी पूजा होती है एवं उन्हें अत्यन्त आदर की दृष्टि से देखा जाता है। इस प्रकार महावीर स्वामी ने दिगम्बर रूप को धारण किया। जब वे दिगम्बर हो गये, तब उनका शरीर तपाये हुए स्वर्ण जैसा प्रकाशमान एवं तेजस्वी दीखने लगा, मानो वह कान्ति एवं दीप्ति का स्वाभाविक तेजोमय समूह ही हो। इसके बाद परम आल्हादित इन्द्र स्वयं परमेष्ठी प्रभु (महावीर) का गुण-गौरव-गान (स्तुति) करने लगे- हे देव! इस संसार में सर्वश्रेष्ठ परमात्मा आप हो। इस चराचर जगत् के स्वामी आप हो। आप जगद्गुरू हो, गुण-सागर हो, शत्रु-विजेता हो एवं अत्यन्त निर्मल स्वयं हो। हे प्रभो! जब आपके असंख्य एवं अनन्त गुणों का वर्णन स्वयं गणधरादि देव नहीं कर सकते, तब मैं मन्दमति कहाँ तक आपके महान गुण एवं ऐश्वर्यों का वर्णन कर सकूगा? ऐसा सोच कर यद्यपि मेरी बुद्धि जड़ हो जाती है तथापि आपके प्रति हमारी अचल भक्ति ही आपकी स्तुति करने के लिए मुझे निरन्तर प्रोत्साहित कर रही है। हे योगीन्द्र! जिस प्रकार कि मेघ का आवरण हट जाने पर सूर्य-किरणों की स्वाभाविक छटा बिखर पड़ती है, उसी तरह आज आपके बाह्य एवं आभ्यन्तर मलों के एकदम नष्ट हो जाने के कारण, आपके निर्मल गुण समूह प्रकाशमान हो रहे हैं। हे स्वामिन्! यद्यपि आपने इन्द्रिय-विषयजन्य चंचल सुखों को क्षणस्थायी जान कर त्याग दिया है तथापि आपकी इच्छा अत्यन्त उत्कृष्ट आत्म-सुख की प्राप्ति के लिए लालायित है अत: आपको ‘निस्पृह' (इच्छाहीन) कैसे कहा जा सकता है ? यद्यपि आपने स्त्री के शरीर को नितान्त हेय, घृणित एवं अस्पृश्य समझकर उस पर से अपना अनुराग (प्रेम) हटा लिया है तथापि मुक्तिरूपी स्त्री में तो आपका अनन्य अनुराग बना हुआ है फिर आपको हम ‘वीतराग' (प्रीति-रहित) भी कैसे कह सकते हैं ? जिन्हें लोग ‘रत्न' कहा करते हैं, यद्यपि उन पत्थरों को आपने त्याग दिया है तथापि सम्यक्दर्शन आदि रत्नत्रय को आपने धारण कर लिया है फिर आपको त्यागी भी कैसे कहा जाये ? यद्यपि आपने क्षणभंगुर राज्य-सत्ता को पाप का आश्रय जानकर छोड़ दिया है तथापि नित्य, अविनाशी एवं अनुपमेय त्रैलोक्य के विशाल साम्राज्य पर एकाधिपत्य तो आप ही स्थापित करने जा रहे हैं फिर भला आप निस्पृह कैसे रहे? (यह निन्दा-स्तुति है।) हे जगत् के स्वामी! आपने इस संसार की चंचला लक्ष्मी का परित्याग करके लोकोत्तर सम्पत्ति (मोक्ष-लक्ष्मी) को प्राप्त करने की इच्छा की है, फिर आपको इच्छा-रहित कैसे समझा जाय ? हे देव! यद्यपि आपने अपने ब्रह्मचर्यरूपी तीक्ष्ण बाण से अपने शत्रु कामदेव को परास्त कर दिया है तथापि कामदेव की स्त्री रति को आपने विधवा भी बना दिया है फिर आप कृपालु कहाँ रहे ? हे नाथ! आपने अपने ध्यानरूपी अस्त्र से मोह-नृपति के साथ-ही-साथ अन्य सब कर्मरूपी शत्रुओं का नाश कर डाला है फिर आपके हृदय में दयालुता कहाँ रही ? हे प्रभो! यद्यपि आपने अपने गिने-गिनाये अल्पसंख्यक बन्धुओं का परित्याग कर दिया है तथापि अब तो स्वयं अपने गुणों के प्रभाव से सम्पूर्ण जगत् को ही अपना बन्धु बनाने जा रहे हैं, फिर आपको कैसे कोई बान्धवहीन कह सकता है ?

हे चतुर शिरोमणि! आपने सांसारिक भोगों को सर्प की काँचुली के समान त्याग कर शुक्लध्यानरूपी अमृत को पी लिया है फिर आपका ‘प्रोषधव्रत' कैसे पूर्ण होगा ?

हे स्वामिन्! आपकी इस दीक्षा को बुद्धिमानों ने आदर की दृष्टि से देखा है एवं इसने संसार के दाह को एकदम शान्त कर दिया है। आप की यह परम पवित्र महादीक्षा पुण्य-धारा के समान सदैव हम भव्य-जीवों की रक्षा करे। हे देव! मन-वचन-काय की विशुद्धतापूर्वक सम्पूर्ण जगत को पवित्र कर देने वाली दीक्षा को आपने ग्रहण किया है। इसी महादीक्षा के बल पर मोक्ष चाहने वाले आपको प्रणाम है। आप शरीर आदि के सुख से मुख मोड़ चुके हैं, मोक्षमार्ग में निरन्तर अग्रसर हो रहे हैं, तपरूपी लक्ष्मी से प्रीति करने वाले हैं, अन्तरंग-बहिरंग परिग्रहों को त्यागने वाले हैं, आपको प्रणाम है।

हे ईश! सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप तीन बहुमूल्य आभूषणों से अलंकृत, किन्तु अन्य पार्थिव आभूषणों से हीन आपको प्रणाम है। आपने सम्पूर्ण वस्त्रों का परित्याग कर दिशारूपी शून्य वस्त्रों को धारण किया है, ईश्वरत्व प्राप्ति की साधना में सोत्साह प्रवृत्त हैं, अत: आपको प्रणाम है। हे जिनेश्वर! आप सकल परिग्रहों से हीन एवं गुणरूपी सम्पत्तियों से युक्त हैं, आपको मुक्ति अत्यन्त प्यारी है, इसलिये आपको प्रणाम है। हे नाथ! आप इन्द्रियातीत अक्षय सुख में चित्त को लगाने वाले विरक्त पुरुष हैं, उपवास करके शुक्लध्यानरूपी अमृत के भोक्ता हैं, आपको प्रणाम है। हे देव! आप दीक्षित होकर ज्ञानरूपी चार नेत्रों के धारक हैं, बालब्रह्मचारी हैं, तीर्थेश हैं एवं स्वयंबुद्ध हैं, आपको प्रणाम है। आप कर्मरूपी शत्रुओं की सन्तति के नाशकत्र्ता हैं, गुणसागर हैं एवं उत्तम क्षमा इत्यादि शुभ-लक्षणों से युक्त हैं, आपको प्रणाम है। हे देव! आप इस संसार की सम्पूर्ण आशाओं को पूर्ण करने वाले हैं, परन्तु हम जो आपकी स्तुति कर रहे हैं, वह संसार की उत्तम सम्पदाओं को पाने के लिए नहीं है, किन्तु जिस शक्ति के प्रभाव से बाल्यावस्था में ही आपने तप-दीक्षा ग्रहण की है, वही अतुलनीय शक्ति हमें भी प्राप्त हो। इस तरह देवों के इन्द्र ने भगवान महावीर की पूजा-स्तुति की एवं फिर करबद्ध प्रणाम करके अपार पुण्य का उपार्जन किया।

इसके बाद महावीर स्वामी ने निश्चेष्ट होकर अपने सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगों का अवरोध किया एवं कर्म-रूपी शत्रुओं की नाशक योग-क्रिया का अवलम्बन लिया। उस समय वे चेष्टाशून्य, सुन्दर पत्थर की मूर्ति के समान जान पड़ते थे। उस परमोत्तम ध्यान के प्रभाव से उन्हें चतुर्थ मन:पर्यय ज्ञान प्रादुर्भूत हुआ, जो कि महावीर प्रभु के लिए केवलज्ञान प्राप्त होने का निर्देशन था। उन अनुपमेय महान गुणशाली वीरनाथ की मैं स्तुति करता हूँ एवं उन्हें करबद्ध प्रणाम करता हूँ।

भगवान का प्रथम आहार-इसके बाद महावीर स्वामी यद्यपि छ: मास पर्यंत अनशन तप करने में पूर्ण योग्य थे तथापि अन्य मुनीश्वरों को चर्या-मार्ग की प्रवृत्ति दिखलाने की इच्छा से उन्होंने ‘पारणा' कर लेने का निश्चय किया। यह पारणा (उपवास के बाद का आहार) शरीर की स्थिति को शक्ति प्रदान करती है। महावीर प्रभु ईर्यापथ की शुद्धि को ध्यान में रखकर विचरने लगे-आहार-दान देने वाला निर्धन है या धनवान? इत्यादि विकल्प न करके वे अपने चित्त में तीन प्रकार के वैराग्य का चिन्तवन करते हुए अनेक दानियों को अपनी चर्या से सन्तुष्ट करते हुए स्वयं विशुद्ध आहार की खोज में घूमने लगे। वे न तो मन्दगति से चलते थे एवं न एकदम तीव्रगति से ही। साधारण-सी चाल से पैरों को बढ़ाते हुए उन्होंने ‘कूल' नाम के एक सुन्दर नगर में प्रवेश किया। उस नगर का राजा ‘कूल' अत्यन्त परिश्रम के बाद प्राप्त हुए प्रिय धन-कोष (खजाना) की तरह अनायास ही आये हुए जिनदेव जैसे उत्तम पात्र को देखकर परम प्रसन्न हुआ। राजा ‘कूल' ने महावीर स्वामी की तीन प्रदक्षिणा दी एवं भूमि पर पाँचों अंगों को फैला कर प्रणाम किया। बाद में आनन्दोल्लास के कारण ‘तिष्ठ-तिष्ठ' (ठहरिये-ठहरिये) ऐसा कहा। धर्म-बुद्धि राजा ने प्रभु को एक पवित्र एवं ऊँचे स्थान पर बैठाया एवं उनके कमल जैसे सुन्दर एवं कोमल चरणों को पवित्र जल से धोया। उन प्रभु के पाद-प्रक्षालित जल को राजा ने अपने सम्पूर्ण अंगों में लगाया। इसके बाद राजा ने जलादि आठ प्रकार के प्रासुक द्रव्यों से प्रभु की भक्तिपूर्वक पूजा की। राजा ने अपने मन में विचारा कि आज घर में सुपात्र उत्तम अतिथि के आ जाने से मेरा गार्हस्थ्य-जीवन सफल हुआ। मैं पुण्यकर्मा हूँ। इस पवित्र विवेक से राजा का मन विशेष रूप से पवित्र हो गया। ‘हे देव! हे प्रभो! आज आपके आगमन से मैं धन्य हो गया, आपने मेरे घर को परम पवित्र बना दिया' ऐसा कहने से राजा का वचन पवित्र हो गया। ‘पात्रदान करने से मेरा हाथ एवं शरीर पवित्र हो गया' ऐसा सोचने से राजा की काय-शुद्धि हो गयी। उसने कृत आदि दोषों से हीन प्रासुक अन्न से होने वाले विमल आहार-दान से ‘एषणा' को शुद्ध किया। इस प्रकार उस राजा ‘कूल' ने नवधा-भक्तिपूर्वक महान पुण्य का उपार्जन किया।

‘यह परम दुर्लभ उत्तम पात्र मेरे भाग्य से प्राप्त हुआ है; इसलिये मेरा यह आहार-दान सविधि एवं पूर्णरूपेण सम्पूर्ण है' ऐसा श्रेष्ठ विचार करके वह राजा अत्यन्त श्रद्धावान बन कर अपनी शक्ति के अनुसार पात्र-दान के महान उद्योग में लग गया। उस महादान के प्रभाव से उत्पन्न अजस्त्र रत्नवृष्टि एवं कीर्ति की अभिलाषा उस राजा ने नहीं की थी। वह सेवा-पूजा इत्यादि के द्वारा प्रभु की भक्ति में लग गया एवं धर्म-सिद्धि के निमित्त वह जो अन्य कर्मों को किया करता था, उन सबको तिलांजलि दे दी। उस राजा ने सोचा कि यह प्रासुक आहार है एवं दान देने का यही श्रेष्ठ समय है। यह संयमशील पुरुष उपवासों के उन असह्य क्लेशों को धैर्यपूर्वक सहन कर लेते हैं, इसलिये इन्हें उत्तम विधि से आहार देना ही चाहिये। इस प्रकार राजा ने महान फल को देने वाले श्रेष्ठ-दाता के उत्तम गुणों को अपने में ग्रहण किया। इसके बाद राजा ने हितकारक उत्तम पात्र को मनसा-वाचा-कर्मणा से पवित्र होकर श्रद्धा-भक्ति के साथ विधिपूर्वक खीर का आहार-दान दिया। वह विशुद्ध आहार प्रासुक एवं स्वादिष्ट था, निर्मल तप को बढ़ाने वाला था एवं क्षुधा-पिपासा को शांत करने वाला था।

उस राजा के दान से देवता लोग बहुत प्रसन्न हुए एवं पुण्योदय के कारण राज-प्रासाद के आँगन में रत्नों की अविरल वर्षा हुई। उस रत्नवर्षा के साथ-ही-साथ पुष्पवृष्टि एवं जलवृष्टि भी हुई। उसी समय आकाश-मंडल में ‘दुन्दुभि' इत्यादि वाद्यों की गम्भीर तुमुल ध्वनि हुई। उन वाद्यों के मधुर स्वरों को सुनने से ऐसा जान पड़ता था, मानो वे राजा के पुण्य एवं उत्तम यश का गम्भीर स्वर में गान कर रहे हों। उसी समय देव भी ‘जय-जय' इत्यादि शुभ शब्दों का उच्चारण करते हुए कहने लगे ‘हे प्राणियों! यह परमोत्तम पात्र (महावीर प्रभु) दाता को इस संसाररूपी महासमुद्र से अनायास ही पार उतार देने वाले हैं। वह दाता निश्चय ही अत्यन्त भाग्यशाली एवं धन्य है, जिसके यहाँ जिनराज स्वयं पहुँच जाएँ। ऐसे उत्तम दान के प्रभाव से दाता को स्वर्ग एवं मोक्ष दोनों ही कालक्रम से प्राप्त होते हैं। इहलोक में तो आपने देखा कि उत्तम पात्र को दान देने से बहुमूल्य अपार रत्नराशि की प्राप्ति होती है एवं विमल यश का विस्तार होता है; वैसे ही परलोक में भी स्वर्ग-सम्पदाएँ एवं भोग-विभूतियाँ प्राप्त होती हैं, जिनके द्वारा चिरकाल तक आनन्दोपभोग किया जाता है।'

रत्नवृष्टि के कारण राजमहल का आँगन भर गया। आँगन में पड़े हुए उन रत्नों के ढेर को देखकर बहुत से लोग परस्पर कहने लगे कि देखो, दान का फल कैसा उत्तम होता है! नेत्रों से देखते-ही-देखते यह राजप्रासाद बहुमूल्य रत्नों की वर्षा से भर गया। दूसरे ने कहा-यहाँ क्या देखते हो ? इस अत्यन्त सामान्य फल को ही तुम अपने नेत्रों से देख रहे हो। उत्तम पात्र-दान से तो स्वर्ग एवं मोक्ष के अक्षय सुख भी अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। इन लोगों के कथोपकथन को सुनकर एवं अपने नेत्रों से प्रत्यक्ष पात्र-दान की महिमा को देखकर बहुत-से जीव स्वर्ग एवं मोक्ष की कल्पना करने लगे एवं पात्र-दान की महत्ता में विश्वास रखने लगे।

आहार-दान के समय वीतरागी तीर्थंकर महावीर ने अपने शरीर की स्थिति के विचार से अंजलिरूपी पात्र के द्वारा खीर का आहार ग्रहण किया तथा इस आहार-ग्रहण के उत्तम फल से राजा को अनुगृहीत कर एवं उसके घर को पवित्र कर पुन: वन को चले गये। राजा ने भी अपने जन्म, घर एवं धन को अप्रत्याशित पुण्योदय से प्राप्त हुआ समझा एवं इसे वे अपना अहोभाग्य समझने लगे। इस श्रेष्ठ दान का मन-वचन-काय द्वारा अनुमोदन करने के कारण अर्थात् दाता एवं पात्र की प्रशंसा करके बहुत से लोगों ने दाता के समान ही उत्तम पुण्य का उपार्जन कर लिया।

भगवान पर उपसर्ग-अतुलनीय पराक्रमी महावीर प्रभु ने सम्पूर्ण कठिन परिषहों को तथा वन के अति उग्र उपद्रवों को अपनी विलक्षण शक्ति के प्रभाव से जीत लिया तथा उत्तम ज्ञान-प्राप्ति के लिए अतिचार-रहित तथा भावना-सहित पंच महाव्रतों का पालन किया। पाँच समिति एवं तीन गुप्ति इन आठ का वे नित्यश: पालन करते हुये इनके द्वारा कर्म-धूलि को नष्ट करने के लिए सदैव तत्पर रहते थे। वे महावीर प्रभु सर्वश्रेष्ठ थे, इसलिये निरालस होकर सम्पूर्ण अन्यान्य गुणों के साथ ही सारे मूलगुणों की पालना में सचेष्ट होकर किसी भी दोष को स्वप्न में भी अपने पास नहीं फटकने देते थे। इस प्रकार के परमोज्वल चारित्रयुक्त महावीर प्रभु सम्पूर्ण पृथ्वी पर विहार करते हुए उज्जयिनी नाम की एक महानगरी के ‘अतिमुक्तक' नामक श्मशान में जा पहुँचे। उस महाभयानक श्मशान में पहुँचकर महावीर प्रभु ने मोक्ष प्राप्ति के लिए शरीर का ममत्व त्याग कर ‘प्रतिमायोग' धारण कर लिया तथा पर्वत के समान अचल भाव से अवस्थित हो गये। सुमेरू पर्वत के उन्नत श्रृङ्ग के समान एवं परमात्मा के ध्यान में लीन श्रीजिनेन्द्र महावीर प्रभु को देखकर उनके धैर्य की परीक्षा करने के लिए वहाँ के स्थाणु नामक अन्तिम रूद्र को उपसर्ग करने की इच्छा हुई। इसी समय पूर्वकृत कुछ कर्म का असाता उदय जिनेन्द्र के होने वाला था। वह स्थाणु रूद्र अनेक भयंकर स्थूलकाय पिशाचों को अपने संग लेकर महावीर स्वामी के ध्यान को भंग करने के लिये प्रस्तुत हुआ। रात्रि के समय में वह अपने बड़े-बड़े रक्तवर्ण नेत्रों को फाड़-फाड़ कर देखते हुए जिनेन्द्र प्रभु के सन्मुख आया। उस समय वह किलकारियाँ भर रहा था, नुकीले भयानक दाँतों को दिखला-दिखला कर अट्टहास कर रहा था, भगवान का ध्यान भंग करने के लिए प्रचण्ड ताल, स्वर एवं लय में गान-वाद्य कर नाच रहा था, साथ ही विशाल मुख-विवर को फाड़े हुए तथा हाथों में तीक्ष्ण आयुधों को धारण किये हुए था। इस प्रकार के महाभयोत्पादक स्वरूप को लेकर वह महावीर स्वामी के सन्मुख आया तथा उनके ध्यान को भंग करने के लिये उन पर बड़ा भारी उपसर्ग किया परन्तु इन उपद्रवों का महावीर प्रभु पर किसी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ा तथा उनका ध्यान यथापूर्व अचल एवं अटूट बना रहा।

जब इतना करने पर भी जिनेन्द्र के ध्यान को वह भंग नहीं कर सका, तब उसने दूसरे उपायों का अवलम्बन लिया। स्थाणुरूद्र ने सर्प, सिंह, गजराज, प्रबल वायु तथा अग्नि इत्यादि के रूप में आकर तथा उत्पीड़क वचनों के द्वारा उग्र उपसर्गों को आरम्भ किया। इन उपसर्गों से निर्बल हृदयों में तो भय का संचार हो सकता था, किन्तु भगवान महावीर के हृदय में डर कहाँ ? वे तो लगातार अचल ही बने रहे। उनका ध्यान भंग होना तो दूर रहा, उत्तरोत्तर ध्यान की गम्भीरता बढ़ती ही गयी। जब स्थाणुरूद्र को इतने पर भी सफलता नहीं मिली, तब वह अन्य प्रकार के घोर उपसर्गों को करने लगा। भीलों का रूप धारण कर भयानक शस्त्रास्त्रों को दिखला कर प्रभु के हृदय में उसने भय उत्पन्न करना चाहा, परन्तु इन अनेक उग्र उपद्रवों के होते रहने पर भी जगत् स्वामी जिनेन्द्र (महावीर प्रभु) रंचमात्र भी चलायमान नहीं हुए एवं पर्वत के समान एकदम अचल बने रहे, किंचित्मात्र भी खिन्नता का आभास उनकी मुखाकृति से नहीं मिला। आचार्य देव ने कहा है कि सम्भव है कि अचल पर्वत भी चलायमान हो जाय, परन्तु श्रेष्ठ योगियों का चित्त हजारों उग्र उपद्रव के द्वारा भी कदापि चलायमान नहीं हो सकता। इस संसार में वे ही लोग धन्य हैं, जो कि ध्यानमग्न हो जाने पर अनेक उग्र उपद्रवों के होते रहने पर भी विकारयुक्त होकर ध्यान भंग कदापि नहीं होने देते।

इसके बाद जब जिनेन्द्र (महावीर प्रभु) के ध्यान को भंग करने में स्थाणुरूद्र को कुछ भी सफलता प्राप्त करने की आशा नहीं रही, तब हताश एवं लज्जित होकर वह वहीं उनकी स्तुति करने लगा-‘हे देव! इस संसार में आप ही बली हो, आप ही जगद्गुरू हो एवं वीर-शिरोमणि हो, इसलिये आपका नाम ‘महावीर' है। आप महाध्यानी हो, सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हो, सकल परीषहों के विजेता हो, वायु के समान नि:संग वीर हो एवं कुलाचल की तरह अचल हो। आप क्षमा में पृथ्वी के समान, गम्भीरता में समुद्र के समान एवं प्रसन्नचित्त होने के कारण निर्मल जल के समान हो। कर्मरूपी जंगल को नष्ट करने के लिए आप अग्नि-अंगार के समान हो। हे प्रभो! आप त्रिलोक में वद्र्धिष्णु हो एवं श्रेष्ठ बुद्धिशाली होने के कारण ‘सन्मति' हो। आप ही महाबली तथा परमात्मा हो। हे नाथ! आप निश्चलरूप के धारण करने वाले हैं एवं प्रतिमायोग के धारण करने वाले हैं। आप परमात्मा-स्वरूप हैं, आपको सदैव नमस्कार है।' इस प्रकार स्थाणुरूद्र ने महावीर प्रभु की स्तुति करके प्रणाम किया तथा भगवान के प्रति ईष्र्या त्याग कर अपनी प्रिय पत्नी के साथ आनन्दित होकर अपने स्थान को चला गया। जब महापुरुषों के योगजन्य साहस तथा शक्ति को देखकर दुर्जन भी परम आनन्दित हो जाते हैं, तब सत्पुरुषों का तो कहना ही क्या ? सज्जनों का तो दूसरों के गुणों पर मुग्ध हो जाने का स्वभाव ही होता है।

भगवान महावीर के पाँच नाम-उत्तरपुराण ग्रन्थ के आधार से भगवान महावीर के पांचों नामों का वर्णन यहाँ बताया जा रहा है-

विदेहदेश के कुण्डपुर-कुंडलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला ने आषाढ़ शुक्ला षष्ठी तिथि को गर्भ में तीर्थंकर शिशु को धारण किया पुन: नवमाह बाद चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को तीर्थंकर पुत्र को जन्म दिया। त्रिशला माता का दूसरा नाम प्रियकारिणी था। रानी प्रियकारिणी ने उन जिनबालक को जन्म देकर मनुष्यों, तिर्यंचों और देवों पर बहुत भारी प्रेम उत्पन्न किया था इसीलिए उनका ‘प्रियकारिणी यह नाम सार्थक हुआ था।

वीर और वर्धमान नाम-तभी सौधर्मेन्द्र ने जिनबालक को सुमेरूपर्वत पर ले जाकर प्रभु का १००८ कलशों से जन्माभिषेक महोत्सव किया पुन: वस्त्राभरणों से अलंकृत कर ‘वीर और ‘वर्धमान ऐसे दो नाम रखे थे। कहा भी है-

अलं तदिति तं भक्त्या, विभूष्योद्घविभूषणै:।

वीर: श्रीवर्धमानश्चेत्यस्याख्याद्वितयं व्यधात्।। २७६।।

सन्मति नाम-किसी समय ‘संजय और ‘विजय नाम के दो चारणऋद्धिधारी मुनियों को किसी पदार्थ में संदेह उत्पन्न हुआ तभी वे जन्म के बाद जिनबालक के समीप आए और उनके दर्शनमात्र से उनका संदेह दूर हो गया तभी उन्होंने बड़ी भक्ति से जिनशिशु का ‘सन्मति यह नामकरण करके अतीव प्रसन्नता व्यक्त की थी। कहा भी है-

संजयस्यार्थसंदेहे संजाते विजयस्य च।

जन्मानन्तरमेवैन-मभ्येत्यालोकमात्रत:।।२८२।।
तत्संदेहे गते ताभ्यां चारणाभ्यां स्वभक्तित:।
अस्त्वेष सन्मतिर्देवो भावीति समुदाह्रत: ।। २८३।।

महावीर नाम-जिनबालक देव बालकों के साथ क्रीड़ा किया करते थे। एक समय की घटना है कि स्वर्ग में सुधर्मा सभा में प्रभु के गुणों की चर्चा हो रही थी साथ ही उनकी शूरवीरता की भी प्रशंसा हो रही थी तभी संगम नाम के एक देव ने उनकी परीक्षा करनी चाही। एक समय बालक वर्धमान अनेक राजकुमारों के साथ बगीचे में वृक्ष पर चढ़े हुए क्रीड़ा में तत्पर थे। यह देख संगमदेव ने उन्हें भयभीत करने की इच्छा से बहुत बड़े सांप का रूप धारणकर उस वृक्ष की जड़ से लेकर स्कंध तक लिपट गया। सब बालक उस सांप को देखकर भय से कांप उठे और शीघ्र ही डालियों से कूद - कूदकर इधर - उधर भाग गए। इस महाभय के उपस्थित होने पर भी तीर्थंकर के अवतार ‘वीर ‘वर्धमान किंचित् भी भयभीत नहीं हुए प्रत्युत् लहलहाती हुई सौ जिह्वाओं से अत्यन्त भयंकर ऐसे सर्प के फणा पर पैर रखकर खड़े हो गए और उसके साथ क्रीड़ा करते हुए नीचे उतर आए। वर्धमान कुमार की इस क्रीड़ा से प्रसन्न हो संगमदेव ने अपनी विक्रिया समेटकर भगवान की स्तुति की और प्रभु का ‘महावीर यह नाम घोषित कर दिया।इस सन्दर्भ में उत्तरपुराण की पंक्ति देखिए-

ललज्जिह्वाशतात्युग्रमारूह्य तमहिं विभी:।

कुमार: क्रीडयामास मातृपर्यंकवत्तदा।।२९४।।
विजृंभमाणहर्षाम्भोनिधि: संगमकोऽरम:।
स्तुत्वा भवान्महावीर इति नाम चकार स:।।२९५।।

महतिमहावीर नाम-भगवान महावीर जब तीस वर्ष की अवस्था में थे तब एक समय उन्हें पूर्वभव का ‘जातिस्मरण हो गया। तत्क्षण ही उन्हें वैराग्य हो गया। लौकांतिक देवों द्वारा स्तुति को प्राप्त भगवान ने षण्डवन या ज्ञातृवन में ‘सालवृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा ले ली।

उज्जयिन्यामथान्येद्युस्तं श्मशानेऽतिमुक्तके।

वर्धमानं महासत्त्वं प्रतिमायोग-धारिणम्।।३३१।।
निरीक्ष्य स्थाणुरेतस्य दौष्ट्याद्धैर्यं परीक्षितुम्।
उत्कृत्य कृत्तिकास्तीक्ष्णा: प्रविष्टजठराण्यलम्।।३३२।।
व्यात्ताननाभिभीष्माणि नृत्यन्ति विविधैर्लयै:।
तर्जयन्ति स्पुâरद्ध्वानै: साट्टहासैर्दुरीक्षणै:।।३३३।।
स्थूलवेतालरूपाणि निशि कृत्वा समन्तत:।
पराण्यपि फणीन्द्रेभसिंहवन्ह्यानिलै: समम्।। ३३४।।
किरातसैन्यरूपाणि पापैकार्जनपंडित:।
विद्याप्रभावसंभावितोपसर्गैर्भयावहै:।।३३५।।
स्वयं स्खलयितुं चेत: समाधेरसमर्थक:।
समहतिमहावीराख्यां कृत्वा विविधा: स्तुती:।। ३३६।।
उमया सममाख्याय नर्तित्वागादमत्सर:।
पापिनोऽपि प्रतुष्यन्ति प्रस्पष्टं दृष्टसाहसा:।।३३७।।

कई वर्षों तक तपश्चरण करते हुए एक बार प्रभु उज्जयिनी नगरी के अतिमुक्तक नाम के श्मशान में प्रतिमायोग से विराजमान थे। उन्हें देखकर रूद्र ने उनके धैर्य की परीक्षा के लिए रात्रि में बड़े - बड़े वेतालों का रूप लेकर उपसर्ग करना शुरू कर दिया। ये वेताल भयंकर शब्दों को करते हुए अट्टहास और विकराल दृष्टि से डरा रहे थे। इनके सिवाय उसने सर्प, हाथी, सिंह, अग्नि और वायु के साथ भीलों की सेना बनाकर उपसर्ग किया। उस रूद्र द्वारा विद्या के बल से नाना प्रकार के भयंकर उपसर्गों से भी भगवान महावीर ध्यान से चलायमान नहीं हुए। तब उसने अपनी विद्या समेटकर भगवान की खूब स्तुति करते हुए उनका ‘महतिमहावीर नाम रखा पुन: अपनी पत्नी के साथ-साथ प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करते हुए प्रभु की भक्ति करके अपने स्थान पर चला गया।

कहीं-कहीं यह पाँचवाँ नाम ‘अतिवीर नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त है।

इस प्रकार भगवान महावीर के ‘वीर और ‘वर्धमान ये दो नाम इन्द्र द्वारा रखे गए हैं। ‘सन्मति नाम ‘संजय-विजय नाम के चारणऋद्धिधारी मुनियों द्वारा रखा गया है। ‘संगमदेव ने ‘महावीर नाम रखा है एवं ‘रूद्र ने ‘महतिमहावीर नाम रखा है।

प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की तीर्थंकर परम्परा में पाँच नामों से विभूषित अंतिम एवं चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी हम और आप सबका कल्याण करें।

चन्दना के बन्धन टूट गये-एक बार महामुनि भगवान महावीर कौशाम्बी में आहार के लिए आये। वहां के सेठ वृषभदत्त की पत्नी-भद्रा, सेठ के प्रति संदिग्ध दृष्टि होने से चन्दना को खाने के लिए मिट्टी के सकोरे में कांजी से मिश्रित कोदों का भात दिया करती थी और क्रोधवश उसे सांकल से बांधे रखती थी। किसी दिन उस कौशाम्बी नगरी में आहार के लिए भगवान् महावीर स्वामी आ गये। उन्हें देखकर चन्दना उनके सामने जाने लगी। उसी समय उसके सांकल के सब बन्धन टूट गये, उसके शिर पर केश आ गये, वस्त्र-आभूषण सुन्दर हो गये। शील के माहात्म्य से मिट्टी का सकोरा स्वर्ण पात्र और कोदों का भात चावल की खीर बन गया। उस चन्दना ने भगवान को पड़गाह कर नवधा भक्ति से आहारदान दिया। उसके वहाँ पंचाश्चर्यों की वर्षा हुई अनंतर अपने बंधुओं के साथ उसका समागम हो गया।

महासती चंदना का संक्षिप्त परिचय-सिन्धु नामक देश की वैशाली नगरी में चेटक नामका अतिशय प्रसिद्ध, विनीत और जिनेन्द्र देव का अतिशय भक्त राजा था। उसकी रानी का नाम सुभद्रा था। उनके दश पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, शिवदत्त, हरिदत्त, कम्बोज, कम्पन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास नाम से प्रसिद्ध थे तथा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों के समान जान पड़ते थे। इन पुत्रों के सिवाए सात ऋद्धियों के समान सात पुत्रियां भी थीं। जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलिनी, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी।

विदेह देश के कुण्डपुर नगर में नाथवंश के शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियों से सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्य के प्रभाव से प्रियकारिणी उन्हीं की रानी हुई थीं। वत्सदेश की कौशाम्बी नगरी में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे। मृगावती नाम की दूसरी पुत्री उनकी स्त्री हुई थी। दशार्ण देश के हेमकच्छ नामक नगर के स्वामी राजा दशरथ थे जो कि सूर्यवंशरूपी आकाश के चन्द्रमा के समान जान पड़ते थे, सूर्य की निर्मलप्रभा के समान सुप्रभा नाम की तीसरी पुत्री उनकी रानी हुई थी, कच्छ देश की रोरुका नामक नगरी में उदयन नाम का एक बड़ा राजा था प्रभावती नामकी चौथी पुत्री उसी की हृदयवल्लभा हुई थी। अच्छी तरह शीलव्रत धारण करने से इसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था। पांचवी पुत्री चेलना राजगृही के राजा श्रेणिक की पट्टरानी हुई थीं तथा ज्येष्ठा और चंदना बालब्रह्मचारिणी थीं।

किसी एक समय वह चन्दना अपने परिवार के लोगों के साथ अशोक नामक वन में क्रीड़ा कर रही थी। उसी समय दैवयोग से विजयार्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी के सुवर्णाभ नगर का राजा मनोवेग विद्याधर अपनी मनोवेगा रानी के साथ स्वच्छन्द क्रीड़ा करता हुआ वहाँ से निकला और क्रीड़ा करती हुई चन्दना को देखकर काम के द्वारा छोड़े हुए बाणों से जर्जर शरीर हो गया। वह शीघ्र ही अपनी स्त्री को घर भेजकर रूपिणी विद्या से अपना दूसरा रूप बनाकर उसे सिंहासन पर बैठा आया और अशोक वन में आकर तथा चन्दना को लेकर शीघ्र ही वापिस चला गया। उधर मनोवेगा उसकी माया को जान गई जिससे क्रोध के कारण उसके नेत्र लाल होकर भयंकर दिखने लगे। उसने उस विद्या देवता को बाएं पैर की ठोकर देकर मार दिया जिससे वह अट्टहास करती हुई सिंहासन से उसी समय चली गई। तदनन्तर वह मनोवेगा रानी आलोकिनी नाम की विद्या से अपने पति की सब चेष्टा जानकर उसके पीछे दौड़ी और आधे मार्ग में चन्दना सहित लौटते हुए पति को देखकर बोली कि यदि आप अपना जीवन चाहते हो तो इसे छोड़ दो। इस प्रकार क्रोध से उसने उसे बहुत ही डाँटा। मनोवेग अपनी रानी से बहुत ही डर गया इसलिए उसने हृदय में बहुत ही शोककर सिद्ध की हुई पर्णलघ्वी नामकी विद्या से उस चन्दना को भूतरमण नामक वन में ऐरावती नदी के दाहिने किनारे पर छोड़ दिया।

पञ्चनमस्कार मंत्र का जप करने में तत्पर रहने वाली चन्दना ने वह रात्रि बड़े कष्ट से बिताई। प्रात:काल जब सूर्य का उदय हुआ तब भाग्यवश एक कालक नामका भील वहां स्वयं आ पहुँचा। चन्दना ने उसे अपने बहुमूल्य देदीप्यमान आभूषण दिये और धर्म का उपदेश भी दिया जिससे वह भील बहुत ही संतुष्ट हुआ। वहीं कहीं भीमवूâट नामक पर्वत के पास रहने वाला एक सिंह नाम का भीलों का राजा था, जो कि भयंकर नामक पल्ली का स्वामी था। उस कालक नामक भील ने वह चन्दना उसी सिंह राजा को सौंप दी। सिंह पापी था अत: चन्दना को देखकर उसका हृदय काम से मोहित हो गया। वह व्रूर ग्रह के समान निग्रह कर उसे अपने आधीन करने के लिए उद्यत हुआ। यह देख उसकी माता ने उसे समझाया कि हे पुत्र! तू ऐसा मत कर, यह प्रत्यच्छ देवता है, यदि कुपित हो गई तो कितने ही संताप, शाप और दु:ख देने वाली होगी। इस प्रकार माता के कहने से डरकर उसने स्वयं दुष्ट होने पर भी वह चन्दना छोड़ दी। तदनन्तर चन्दना ने उस भील की माता के साथ निश्चिन्त होकर कुछ काल वहीं पर व्यतीत किया।

अथानन्तर-वत्स देश के कौशाम्बी नामक श्रेष्ठ नगर में एक वृषभसेन नाम का सेठ रहता था। उसका मित्रवीर नामका एक कर्मचारी था जो कि उस भीलराज का मित्र था। भीलों के राजा ने वह चन्दना उस मित्रवीर को दे दी और मित्रवीर ने भी बहुत भारी धन के साथ भक्तिपूर्वक वह चन्दना अपने सेठ के लिए सौंप दी। किसी एक दिन वह चन्दना उस सेठ को जल पिला रही थी उस समय उसके केशों का कलाप छूट गया था और जल से भीगा हुआ पृथिवी पर लटक रहा था। उसे वह बड़े यत्न से एक हाथ से संभाल रही थी। सेठ की स्त्री भद्रा नामक सेठानी ने जब चन्दना का रूप देखा तो वह शंका से भर गई। उसने मन में समझा कि हमारे पति का इसके साथ संपर्क है। ऐसा विचार कर वह बहुत ही कुपित हुई। क्रोध के कारण उसके ओंठ काँपने लगे। उस दुष्टा ने चन्दना को साँकल से बाँध दिया तथा खराब भोजन और ताड़न-मारण आदि के द्वारा वह उसे निरन्तर कष्ट पहुंचाने लगी परन्तु चन्दना यही विचार करती थी कि यह सब मेरे द्वारा किए हुए अशुभ-कर्म का फल है। यह बेचारी सेठानी क्या कर सकती है ? ऐसा विचारकर वह निरन्तर आत्मनिन्दा करती रहती थी। उसने यह सब समाचार अपनी बड़ी बहिन मृगावती के लिए भी कहलाकर नहीं भेजे थे।

तदनन्तर किसी दूसरे दिन भगवान् महावीर स्वामी ने आहार के लिए उसी नगरी में प्रवेश किया। उन्हें देख चन्दना बड़ी भक्ति से आगे बढ़ी। आगे बढ़ते ही उसकी साँकल टूट गयी और आभरणों से उसका सब शरीर सुन्दर दिखने लगा। उन्हीं के भार से मानो उसने झुककर शिर से पृथिवी तल का स्पर्श किया, उन्हें नमस्कार किया और विधिपूर्वक पड़गाहन कर उन्हें आहार दिया। इस आहार दान के प्रभाव से वह मानिनी बहुत ही संतुष्ट हुई, देवों ने उसका सम्मान किया, रत्नधारा की वृष्टि की, सुगन्धित फूल बरसाए, देव-दुन्दुभियों का शब्द हुआ और दान की महिमा की घोषणा होने लगी, सो ठीक ही है क्योंकि उत्कृष्ट पुण्य अपने बड़े भारी फल के साथ तत्काल ही फलते हैं।

तदनन्तर चन्दना की बड़ी बहिन मृगावती यह समाचार जानकर उसी समय अपने पुत्र उदयन के साथ उसके समीप आई और स्नेह से उसका आलिंगन कर पिछला समाचार पूछने लगी। तब वह पिछला समाचार सुनकर बहुत ही व्याकुल हुई। तदनन्तर रानी मृगावती उसे अपने घर ले जाकर सुखी हुई। यह देख भद्रा सेठानी और वृषभसेन सेठ दोनों ही भय से घबड़ाये और मृगावती के चरणों की शरण में आये। दयालु रानी ने उन दोनों से चन्दना के चरण-कमलों में प्रणाम कराया। चन्दना के क्षमा कर देने पर वे दोनों बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि यह मानो मूर्तिमती क्षमा ही है। इस समाचार के सुनने से उत्पन्न हुए स्नेह के कारण वैशाली से चंदना के भाई-बंधु भी उसके पास आ गये।

कालांतर में चंदना ने भगवान महावीर के समवसरण में आर्यिका दीक्षा लेकर सभी आर्यिकाओं में गणिनीपद को प्राप्त किया है।

[सम्पादन]
केवलज्ञान कल्याणक

जगद्बंधु वद्र्धमान भगवान ने निग्र्रंथ मुद्रा में नगर, वन आदि में विहार करते हुये छद्मस्थ अवस्था के बारह वर्ष व्यतीत कर दिये। श्री पूज्यपाद स्वामी कहते हैं-

ग्रामपुरखेटकर्वट-मटम्बघोषाकरान् प्रविजहार।

उग्रैस्तपोविधानैद्र्वादशवर्षाण्यमरपूज्य: ।।

देवों द्वारा पूज्य भगवान महावीर ने उग्र-उग्र तपश्चरण करते हुये ग्राम, पुर, खेट कर्वट, मटम्ब, पत्तन, घोष, आकर आदि स्थलों में विहार करते हुये दीक्षित जीवन में बारह वर्ष व्यतीत कर दिये।

किसी एक दिन वे भगवान जृंभिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के किनारे मनोहर नाम के वन के मध्य सालवृक्ष के नीचे रत्नमयी एक बड़ी शिला पर दो दिन के उपवास का नियम लेकर प्रतिमायोग से विराजमान हो गये। शुक्लध्यान में आरूढ़ भगवान वैशाख शुक्ला दशमी के दिन अपराण्ह काल में हस्त और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के बीच में चन्द्रमा के रहते हुये परिणामों की विशुद्धि को बढ़ाते हुये क्षपकश्रेणी में स्थित हो गये।

उसी समय द्वितीय शुक्लध्यान के द्वारा घातिया कर्मों को नष्ट कर भगवान ने दिव्य केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। उसी समय भगवान के जन्म समय के समान ही चारों प्रकार के देवों के यहाँ बिना बजाये बाजे बजने लगे। सौधर्मेंद्र ने भगवान के केवलज्ञान की प्रगटता को जानकर तत्क्षण ही कुबेर को समवसरण रचना बनाने की आज्ञा दी एवं स्वयं चारों निकाय के देवों के साथ अर्धनिमिष मात्र में वहाँ आ गया।

भगवान महावीर का समवसरण-केवलज्ञान के उत्पन्न होते ही तीर्थंकर का परमौदारिक शरीर पृथ्वी से पाँच हजार धनुष१ (२०००० हाथ प्रमाण) ऊपर चला जाता है। उस समय तीनों लोकों में अतिशय क्षोभ उत्पन्न होता है और सौधर्म आदि इन्द्रों के आसन कंपायमान हो जाते हैं। भवनवासी देवों के यहाँ अपने आप शंख का नाद होने लगता है, व्यंतर देवों के यहाँ भेरी बजने लगती है, ज्योतिषी देवों के यहाँ सिंहनाद होने लगता है और कल्पवासी देवों के यहाँ घण्टा बजने लगता है। इंद्रों के मुकुट के अग्रभाग स्वयमेव झुक जाते हैं और कल्पवृक्षों से पुष्पों की वर्षा होने लगती है। इन सभी कारणों से इन्द्र और देवगण तीर्थंकर के केवलज्ञान की उत्पत्ति को जानकर भक्तियुक्त होते हुये सात पैर आगे बढ़कर भगवान् को प्रणाम करते हैं। जो अहमिन्द्रदेव हैं, वे भी आसनों के कंपित होने से केवलज्ञान की उत्पत्ति को जानकर सात पैर आगे बढ़कर वहीं से परोक्ष में जिनेंद्रदेव की वंदना कर अपना जीवन सफल कर लेते हैं। सोलह स्वर्ग तक के देव-देवियाँ तो भगवान् की वंदना के लिये चले आते हैं।

उसी क्षण सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विक्रिया के द्वारा तीर्थंकर के समवसरण (धर्मसभा) को विचित्र रूप से रचता है। उस समवसरण के अनुपम संपूर्ण स्वरूप का वर्णन करने के लिये साक्षात् सरस्वती भी समर्थ नहीं हंै। यहाँ पर लेशमात्र वर्णन किया जाता है२। इस समवसरण के वर्णन में यहाँ ३१ विषय बताये जा रहे हैं-

सामान्य भूमि, सोपान, विन्यास, वीथी, धूलिशाल, चैत्यप्रासाद भूमि, नृत्यशाला, मानस्तम्भ, वेदी, खातिका, वेदी, लताभूमि, साल, उपवनभूमि, नृत्यशाला, वेदी, ध्वजाभूमि, साल, कल्पभूमि, नृत्यशाला, वेदी, भवनभूमि, स्तूप, साल, श्रीमण्डप, ऋषि आदि गणों का विन्यास, वेदी, प्रथम पीठ, द्वितीय पीठ, तृतीय पीठ और गंधकुटी।

१. सामान्य भूमि-समवसरण की संपूर्ण सामान्य भूमि सूर्यमण्डल के सदृश गोल, इन्द्रनीलमणिमयी होती है। यह सामान्यतया बारह योजन प्रमाण होती है। विदेह क्षेत्र के संपूर्ण तीर्थंकरों की समवसरण भूमि का यही प्रमाण है। भरत और ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों की समवसरण भूमि का उत्कृष्ट प्रमाण यही है, जघन्य प्रमाण एक योजन मात्र है, मध्यम के अनेक भेद हैं। जैसे कि भगवान ऋषभदेव का समवसरण बारह योजन का था शेष तीर्थंकरों का घटते-घटते अंतिम भगवान महावीर का एक योजन मात्र था।

२. सोपान-समवसरण में चढ़ने के लिए भूमि से १ हाथ ऊपर से आकाश में चारों ही दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में ऊपर-ऊपर २०,००० सीढ़ियाँ होती हैं। ये सीढ़ियाँ १ हाथ ऊँची और इतनी ही विस्तार वाली रहती हैंं, ये सब स्वर्ण से निर्मित होती हैं। देव-मनुष्य और तिर्यंचगण अंतर्मुहूर्त मात्र में ही इन सभी सीढ़ियों को पार कर समवसरण में पहुँच जाते हैं।

३. विन्यास-समवसरण में चार कोट, पाँच वेदियाँ, इनके बीच में आठ भूमियाँ और सर्वत्र प्रत्येक अन्तर भाग में तीन पीठ होते हैं। इस क्रम से समवसरण में सारी रचनाएँ रहती हैं। इन सबका वर्णन क्रम से आ जावेगा।

४. वीथी-प्रत्येक समवसरण में प्रारम्भ से लेकर प्रथम पीठ (कटनी) पर्यंत, सीढ़ियों की लम्बाई के बराबर विस्तार वाली चार वीथियाँ होती हैंं। यहाँ ‘वीथी' से जाने का मार्ग (सड़क) समझना चाहिये। इन वीथियों के पाश्र्व भाग में स्फटिकपाषाण से बनी हुई वेदियाँ होती हैं। ये बाउंड्रीवाल के समान हैं। जो आठ भूमियाँ कही जायेंगी, उन आठों भूमियों के मूल में वङ्कामय कपाटों से सुशोभित बहुत से तोरणद्वार होते हैं जिनमें देव, मनुष्य और तिर्यंचों का संचार बना रहता है।

५. धूलिसाल-सबके बाहर विशाल एवं समान गोल, मानुषोत्तर पर्वत के आकार वाला धूलिसाल नाम का कोट होता है यह पंचवर्णी रत्नों से निर्मित होता है, इसलिये इसका धूलिसाल नाम सार्थक है। इस कोट में मार्ग, अट्टालिकाएँ और पताकाएँ रहती हंै। चार गोपुर द्वार (मुख्य फाटक) होते हैंं यह तीनों लोकों को विस्मित करने वाला बहुत ही सुन्दर दिखता है। इस कोट के चारों गोपुर द्वारों में से पूर्वद्वार का नाम ‘विजय' है, दक्षिणद्वार का ‘वैजयंत' है, पश्चिमद्वार को ‘जयंत' और उत्तरद्वार को ‘अपराजित' कहते हैं। ये चारों द्वार सुवर्ण से बने रहते हैं, तीन भूमियों (खनों) से सहित, देव और मनुष्य के जोड़ों से संयुक्त और तोरणों पर लटकती हुई मणिमालाओं से शोभायमान होते हैं। प्रत्येक द्वार के बाहर और मध्य भाग में, द्वार के पाश्र्व भागों में मंगलद्रव्य, नवनिधि और धूपघट से युक्त विस्तीर्ण पुतलियाँ होती हैं। झारी, कलश, दर्पण, चामर, ध्वजा, पंखा, छत्र और सुप्रतिष्ठ (ठोना) ये ८ मंगलद्रव्य हैं। ये प्रत्येक १०८-१०८ होते हैं। काल, महाकाल, पाण्डु, माणवक, शंख, पद्म, नैसर्प, पिंगल और नानारत्न, ये नव निधियाँ प्रत्येक १०८ होती हैं। ये निधियाँ क्रम से ऋतु के योग्य द्रव्य-माला आदि, भाजन, धान्य, आयुध, वादित्र, वस्त्र, महल, आभरण और सम्पूर्ण रत्नों को देती हैं। वहाँ एक-एक पुतली के ऊपर गोशीर्ष, मलयचन्दन और कालागरू आदि धूपों के गंध से व्याप्त एक-एक धूपघट होते हैं। इन विजय आदि द्वार के प्रत्येक बाह्य भाग में सैकड़ों मकरतोरण और अभ्यंतर भाग में सैकड़ों रत्नमय तोरण होते हैं। इन द्वारों के बीच दोनों पाश्र्व भागों में एक-एक नाट्यशाला होती है जिसमें देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं। इस धूलिसाल के चारों गोपुर द्वारों पर ज्योतिष्कदेव द्वार रक्षक होते हैं जो कि हाथ में रत्नदण्ड को लिये रहते हैं। इन चारों दरवाजों के बाहर और अन्दर भाग में सीढ़ियाँ बनी रहती हैं जिनसे सुखपूर्वक संचार किया जाता है। प्रत्येक समवसरण के धूलिसाल कोट की ऊँचाई अपने तीर्थंकर के शरीर से चौगुनी होती है। इस कोट की ऊँचाई से तोरणों की ऊँचाई अधिक रहती है और इससे भी अधिक विजय आदि द्वारों की ऊँचाई रहती है।

६. चैत्यप्रासाद भूमि-धूलिसाल के अभ्यंतर भाग में ‘चैत्यप्रासाद' नामक भूमि सकलक्षेत्र को घेरे हुए बनी रहती है। इसमें एक-एक जिनभवन के अन्तराल से ५-५ प्रासाद बने रहते हैं जो विविध प्रकार के वनखण्ड और बावड़ी आदि से रमणीय होते हैं। इन जिनभवन और प्रासादों की ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुणी रहती है।

७. नृत्यशाला-प्रथम पृथ्वी में पृथक्-पृथक् वीथियों के दोनों पाश्र्व भागों में उत्तम सुवर्ण एवं रत्नों से निर्मित दो-दो नाट्यशालाएँ होती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में ३२ रंगभूमियाँ और प्रत्येक रंगभूमि में ३२ भवनवासी देवियाँ नृत्य करती हुई नाना अर्थ से युक्त दिव्य गीतों द्वारा तीर्थंकरों के विजय के गीत गाती हैं और पुष्पाञ्जलि क्षेपण करती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में नाना प्रकार की सुगंधित धूप से दिग्मंडल को सुवासित करने वाले दो-दो धूपघट रहते हैं।

८. मानस्तम्भ-प्रथम पृथ्वी के बहुमध्य भाग में चारों वीथियों के बीचों-बीच समान गोल मानस्तम्भ भूमियाँ होती हैं। उनके अभ्यंतर भाग में चार गोपुर द्वारों से सुन्दर कोट होते हैं। इनके भी मध्य भाग में विविध प्रकार के दिव्य वृक्षों से युक्त वनखण्ड होते हैं। इनके मध्य में पूर्वादि दिशाओं में क्रम से सोम, यम, वरुण और कुबेर इन लोकपालों के रमणीय क्रीड़ानगर होते हैं। उनके अभ्यंतर भाग में चार गोपुरद्वार से युक्त कोट और इसके आगे वनवापिकाएँ होती हैं जिनमें नीलकमल खिले रहते हैं। उनके बीच में लोकपालों के अपनी-अपनी दिशा तथा चार विदिशाओं में भी दिव्य क्रीड़ानगर होते हैं। उनके अभ्यंतर भाग में उत्तम विशाल द्वारों से युक्त कोट होते हैं और फिर इनके बीच में पीठ होते हैं। इनमें से पहला पीठ वैडूर्यमणिमय, उसके ऊपर दूसरा पीठ सुवर्णमय और उसके ऊपर तीसरा पीठ बहुत वर्ण के रत्नों से निर्मित होता है। ये तीन पीठ तीन कटनी रूप होते हैं। इन पीठों के ऊपर मानस्तम्भ होते हैं। इन मानस्तम्भों की ऊँचाई अपने-अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी होती है। प्रत्येक मानस्तम्भ का मूलभाग वङ्का से युक्त और मध्यम भाग स्फटिकमणि से निर्मित होता है। इन मानस्तम्भों के उपरिमभाग वैडूर्यमणिमय रहते हैं। ये मानस्तम्भ गोलाकार होते हैं। इनमें चमर, घंटा, किंकणी, रत्नहार और ध्वजाएँ सुशोभित रहती हैं। इनके शिखर पर प्रत्येक दिशा में आठ प्रातिहार्यों से युक्त रमणीय एक-एक जिनेन्द्र प्रतिमायें होती हैं। दूर से ही मानस्तम्भों के देखने से मान से युक्त मिथ्यादृष्टि लोग अभिमान से रहित हो जाते हैं, इसीलिये इनका ‘मानस्तम्भ' यह नाम सार्थक है।

सभी समवसरण में तीनों कोटों के बाहर चार दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में क्रम से पूर्वादि वीथी (गली) के आश्रित वापिकाएँ होती हैं। पूर्व दिशा के मानस्तम्भ के पूर्वादि भागों में क्रम से नंदोत्तरा, नंदा, नंदवती और नंदिघोषा नामक चार वापिकाएँ होती हैं। दक्षिण मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में विजया, वैजयंता, जयन्ता और अपराजिता नामक चार वापिकाएँ होती हैं। पश्चिम मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में क्रम से अशोका, सुप्रबुद्धा, कुमुदा और पुण्डरीका ये चार वापिकाएँ होती हैं। उत्तर मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में क्रम से हृदयानन्दा, महानन्दा, सुप्रतिबुद्धा और प्रभंकरा ये चार वापिकाएँ होती हैं। ये वापिकाएँ समचतुष्कोण, कमलादि से संयुक्त, टंकोत्कीर्ण, वेदिका, चार तोरण एवं रत्नमालाओं से रमणीय होती हैं। सब वापिकाओं के चारों तटों में से प्रत्येक तट पर जलक्रीड़ा के योग्य दिव्य द्रव्यों से परिपूर्ण मणिमयी सीढ़ियाँ होती हैं। इन वापिकाओं में भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी देव तथा मनुष्य क्रीड़ा किया करते हैं। प्रत्येक वापिकाओं के आश्रित, निर्मल जल से परिपूर्ण दो-दो कुण्ड होते हैं, जिनमें देव, मनुष्य और तिर्यंच अपने पैरों की धूलि धोया करते हैं।

९. प्रथम वेदी-इस समवसरण में उत्तम रत्नमय ध्वजा, तोरण और घंटाओं से युक्त प्रथम वेदिका होती है। इसमें गोपुर द्वार, पुत्तलिका, १०८ मंगलद्रव्य एवं नव निधियाँ पूर्व के समान ही होती हैं। इन वेदियों के मूल और उपरिम भाग का विस्तार धूलिशाल कोट के मूलविस्तार के समान होता है।

१०. खातिका-इसके आगे स्वच्छ जल से परिपूर्ण और अपने जिनेन्द्रदेव की ऊँचाई के चतुर्थभाग प्रमाण खातिका (खाई) होती है। इस खातिका में खिले हुये कुमुद, कुवलय और कमल अपनी सुगन्धि फैलाते रहते हैं, इनमें मणिमय सीढ़ियाँ बनी रहती हैं एवं हंस, सारस आदि पक्षी सदा क्रीड़ा किया करते हैं।

११. द्वितीय वेदी-यह वेदिका भी अपनी पूर्व वेदी के सदृश है। इसका विस्तार प्रथम वेदिका से दूना माना गया है।

१२. लताभूमि-इसके आगे पुन्नाग, नाग, कुब्जक, शतपत्र और अतिमुक्त आदि से संयुक्त, क्रीड़ा पर्वतों से सुशोभित, फूले हुये कमलों से सहित जल भरी बावड़ियों से मनोहर ऐसी लताभूमि शोभायमान होती है।

१३. साल-इसके आगे दूसरा कोट है इसे ही साल कहते हैं। इसका सारा वर्णन धूलिसाल कोट के समान है। अन्तर इतना ही है कि यह विस्तार में उससे दूना रहता है, रजतमयी है एवं यक्ष जाति के देव इसके चारों द्वारों पर खड़े रहते हैं।

१४. उपवन भूमि-द्वितीय कोट के आगे चौथी उपवन भूमि होती है। इसमें पूर्वादि दिशाओं के क्रम से अशोकवन, सप्तपर्णवन, चम्पकवन और आम्रवन, ये चार वन शोभायमान होते हैं। यह भूमि विविध प्रकार के वन समूहों से मण्डित, विविध नदियों के पुलिन और क्रीड़ा पर्वतों से तथा अनेक प्रकार की उत्तम वापिकाओं से रमणीय होती है। इस भूमि में अशोक, सप्तपर्ण, चम्पक और आम्र ये चार सुन्दर वृक्ष होते हैं इन्हें चैत्यवृक्ष कहते हैं। इनकी ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी रहती है। एक-एक चैत्यवृक्ष के आश्रित आठ प्रातिहार्यों से संयुक्त चार-चार मणिमय जिनप्रतिमाँँ होती हैं। इस उपवन भूमि की बावड़ियों के जल में निरीक्षण करने पर प्रत्येक जन अपने अतीत-अनागत सात भवों को देख लेते हैं।

एक-एक चैत्यवृक्ष के आश्रित तीन कोटों से वेष्टित व तीन कटनियों के ऊपर चार-चार मानस्तम्भ होते हैं। इन मानस्तम्भों के चारों तरफ भी कमल आदि फूलों से युक्त स्वच्छ जल से भरित वापियाँ होती हैं। वहाँ कहीं पर रमणीय भवन, कहीं क्रीड़नशाला और कहीं नृत्य करती हुई देवांगनाओं से युक्त नाट्यशालाएँ होती हैं। ये रमणीय भवन पंक्तिक्रम से इस भूमि में शोभायमान होते हैं। ये भवन भी कई खनों से निर्मित अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणे ऊँचे होते हैं। अपनी प्रथम भूमि की अपेक्षा इस उपवन भूमि का विस्तार दूना होता है।

१५. नृत्यशाला-सब वनों के आश्रित सब वीथियों (गलियों) के दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो नाट्यशालाएँ होती हैं। इनमें से आदि की आठ नाट्यशालाओं में भवनवासिनी देवांगनाएँ और इससे आगे की आठ नाट्यशालाओं में कल्पवासिनी देवांगनाएँ नृत्य किया करती हैं। इन नाट्यशालाओं का सुन्दर वर्णन पूर्व के समान है।

१६. तृतीय वेदी-यह तीसरी वेदिका अपनी दूसरी वेदिका के समान है, अन्तर इतना ही है कि यहाँ के चारों द्वारों के रक्षक यक्षेन्द्र रहते हैं।

१७. ध्वजाभूमि-वेदिका के आगे इस पंचम ध्वजाभूमि में दिव्य ध्वजाएँ होती हैं जिनमें सिंह, गज, वृषभ, गरुड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, पद्म और चक्र ये दश प्रकार के चिन्ह बने रहते हैं। चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में इन दश प्रकार की ध्वजाओं में से प्रत्येक १०८ रहती हैं और इनमें से भी प्रत्येक ध्वजा अपनी १०८ क्षुद्रध्वजाओं से संयुक्त रहती हैं। इस प्रकार इस ध्वजाभूमि में महाध्वजा १०²१०८²४·४३२० व क्षुद्रध्वजाएँ १०²१०८²१०८²४·४६६५६० समस्त ध्वजाएँ ४३२०±४६६५६०·४७०८८० होती हैं। ये समस्त ध्वजाएँ रत्नों से खचित सुवर्णमय स्तम्भों में लगी रहती हैं। इन ध्वजस्तम्भों की ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी रहती है।

१८. साल-इस ध्वजभूमि के आगे चाँदी के समान वर्णवाला तीसरा कोट अपने धूलिसाल कोट के ही सदृश है। इस कोट का विस्तार द्वितीय कोट की अपेक्षा दूना है और इसके द्वाररक्षक भवनवासी देव रहते हैं।

१९. कल्पभूमि-इस छठी भूमि का नाम कल्पभूमि है, यह दश प्रकार के कल्पवृक्षों से परिपूर्ण है। पानांग, तुर्यांग, भूषणांग, वस्त्रांग, भोजनांग, आलयांग, दीपांग, भाजनांग, मालांग और तेजांग, ये दशप्रकार के कल्पवृक्ष हैं। इस भूमि में कहीं पर कमल, उत्पल से सुगंधित बावड़ियाँ हैं, कहीं पर रमणीय प्रासाद, कहीं पर क्रीड़नशालाएँ और कहीं पर जिनेन्द्रदेव के विजयचरित्र के गीतों से युक्त प्रेक्षणशालाएँ होती हैं। ये सब भवन बहुत भूमियों (खनों) से सुशोभित, रत्नों से निर्मित पंक्तिक्रम से शोभायमान होते हैं। इस कल्पभूमि के भीतर पूर्वादि दिशाओं में नमेरु, मंदार, संतानक और पारिजात ये चार-चार महान सिद्धार्थ वृक्ष होते हैं। ये वृक्ष तीन कोटों से युक्त और तीन मेखलाओं के ऊपर स्थित होते हैं। इनमें से प्रत्येक वृक्ष के मूलभाग में विचित्र पीठों से युक्त, रत्नमय चार-चार सिद्धों की प्रतिमाएँ होती हैं। ये वंदना करने मात्र से तुरंत संसार के भय को नष्ट कर देती हैं। एक-एक सिद्धार्थ वृक्ष के आश्रित, तीन कोटों से वेष्टित, पीठत्रय के ऊपर चार-चार मानस्तम्भ होते हैं। कल्पभूमि में स्थित सिद्धार्थ वृक्ष, क्रीड़नशालाएँ और प्रासाद जिनेन्द्र की ऊँचाई से बारहगुणे ऊँचे होते हैं।

२०. नाट्यशाला-इस कल्पभूमि के पाश्र्वभागों में प्रत्येक वीथी (गली) के आश्रित, दिव्य रत्नों से निर्मित और अपने चैत्यवृक्षों के सदृश ऊँचाई वाली चार-चार नाट्यशालाएँ होती हैं। सब नाट्यशालाएँ पांच भूमियों (खनों) से विभूषित, बत्तीस रंगभूमियों से सहित और नृत्य करती हुई ज्योतिषी देवांगनाओं से रमणीय होती हैं।

२१. वेदी-इस नाट्यशाला के आगे प्रथम वेदी के सदृश ही चौथी वेदी होती है। यहाँ भवनवासी देव द्वारों की रक्षा करते हैं।

२२. भवनभूमि-इस वेदी के आगे भवनभूमि नाम से सातवीं भूमि होती है। इसमें रत्नों से खचित, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओं से सहित और उत्तम तोरण युक्त उन्नत द्वारों वाले भवन होते हैं। वे एक-एक भवन सुरयुगलों के गीत, नृत्य एवं बाजे के शब्दों से तथा जिनाभिषेकों से शोभायमान होते हैं। यहाँ पर भी उपवन, वापिका आदि की सुन्दर शोभा पूर्व के समान रहती है।

२३. स्तूप-इस भवनभूमि के पाश्र्वभागों में प्रत्येक वीथी के मध्य जिन और सिद्धों की अनुपम प्रतिमाओं से व्याप्त नौ-नौ स्तूप होते हैं। इन स्तूपों की छतों पर छत्र फिरते रहते हैं, ध्वजाएँ फहराती रहती हैं, ये दिव्यरत्नों से निर्मित रहते हैं और आठ मंगल द्रव्यों से सहित होते हैं। एक-एक स्तूप के बीच में मकर के आकार के सौ तोरण होते हैं। इन स्तूपों की ऊँचाई अपने चैत्यवृक्षों की ऊँचाई के समान होती है। भव्यजीव इन स्तूपों का अभिषेक, पूजन और प्रदक्षिणा किया करते हैं।

२४. साल-स्तूपों के आगे आकाश स्फटिक के सदृश और मरकत मणिमय चार गोपुरद्वारों से रमणीय चौथा कोट होता है। यहाँ के द्वारों पर कल्पवासी देव उत्तम रत्नमय दण्डों को हाथ में लेकर खड़े रहते हैं। ये जिनेन्द्र भगवान् के चरणों की परम भक्ति से द्वारपाल का कार्य करते हैं।

२५. श्रीमण्डप भूमि-इस आठवीं भूमि का नाम ‘श्रीमण्डप' है। यह अनुपम उत्तमरत्नों के खम्भों पर स्थित और मुक्ताजालादि से शोभायमान रहती है। इसमें निर्मल स्फटिकमणि से निर्मित सोलह दीवालों के बीच में बारह कोठे होते हैं। इन कोठों की ऊँचाई अपने जिनेन्द्र की ऊँचाई से बारहगुणी होती है।

२६. गणविन्यास-इन बारह कोठों के भीतर पूर्वादि प्रदक्षिणा क्रम से पृथक्-पृथक् ऋषि आदि बारहगण बैठते हैं। उनका क्रम यह है - प्रथम कोठे में संपूर्ण ऋद्धियों के धारक गणधरदेव और सर्वदिगंबर मुनिगण बैठते हैं। स्फटिकमणि की दीवाल से व्यवहित दूसरे कोठे में कल्पवासिनी देवियाँ, तीसरे कोठे में अतिशय नम्र आर्यिकाएँ तथा श्राविकाएँ बैठती हैं। चतुर्थ कोठे में ज्योतिर्वासी देवियाँ, पांचवें में व्यंतर देवियाँ, छठे में भवनवासी देवियाँ, सातवें में भवनवासी देव, आठवें में व्यंतरदेव, नौवें में सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतिषीदेव, दशवें में कल्पवासीदेवी, ग्यारहवें में चक्रवर्ती, मण्डलीक राजा एवं अन्य मनुष्य तथा बारहवें में परस्पर वैरभाव को छोड़कर सिंह, व्याघ्र, नकुल, हरिण आदि तिर्यंचगण बैठते हैं।

२७. वेदी-इसके अनंतर निर्मल स्फटिक पाषाण से बनी हुई पाँचवीं वेदिका होती है जिसका सर्व वर्णन प्रथम वेदी के सदृश ही है।

२८. प्रथम पीठ-इस पाँचवी वेदी के आगे वैडूर्यमणि से निर्मित प्रथम पीठ होती है। इन पीठों की ऊँचाई भी अपने मानस्तम्भ की पीठ के सदृश है। इस प्रथमपीठ के ऊपर बारह कोठों में से प्रत्येक कोठे के प्रवेश द्वारों में और समस्त (चार) वीथियों के सन्मुख सोलह-सोलह सीढ़ियाँ होती हैंं। चूड़ी के सदृश गोल नाना प्रकार के पूजा द्रव्य और मंगल द्रव्यों से सहित इस पीठ पर चारों दिशाओं में अपने शिर पर धर्मचक्र को रखे हुये यक्षेंद्र स्थित रहते हैं। वे गणधर देव आदि बारहगण इस पीठ (कटनी) पर चढ़कर और प्रदक्षिणा देकर जिनेन्द्रदेव के सम्मुख हुए यथायोग्य वंदना, पूजा, भक्ति आदि करते हैं। सैकड़ों स्तुतियों द्वारा गुणकीर्तन करके असंख्यात गुणश्रेणीरूप से अपने कर्मों की निर्जरा करते हुए प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने कोठों में प्रवेश करते हैं।

२९. द्वितीय पीठ-प्रथम पीठ (कटनी) के ऊपर दूसरा पीठ होता है। यह पीठ भी नाना रत्नों से खचित भूमियुक्त होता है। इस सुवर्णमय पीठ पर चढ़ने के लिए चारों दिशाओं में पाँच वर्ण के रत्नों से निर्मित सीढ़ियाँ होती हैं। इस पीठ के ऊपर मणिमय स्तम्भों पर लटकती हुई ध्वजाएँ होती हैं, जिनमें सिंह, बैल, कमल, चक्र, माला, गरुड़, वस्त्र और हाथी ऐसे आठ प्रकार के चिन्ह बने रहते हैं। इसी पीठ पर धूपघट, मंगलद्रव्य, पूजनद्रव्य और नवनिधियाँ रहती हैं जिनका वर्णन करने के लिये कोई भी समर्थ नहीं है।

३०. तृतीय पीठ-द्वितीय पीठ के ऊपर विविध प्रकार के रत्नों से खचित तीसरा पीठ (कटनी) होता है। सूर्यमण्डल के समान गोल इस पीठ के चारों ओर रत्नमय और सुखकर स्पर्शवाली आठ-आठ सीढ़ियाँ होती हैं।

३१. गंधकुटी-इस तृतीय पीठ के ऊपर एक गंधकुटी होती है। यह चामर, किंकणी, वन्दनमाला और हार आदि से रमणीय, गोशीर, मलय, चंदन, कालागरू आदि धूपों के गंध से व्याप्त, प्रज्वलित रत्नों के दीपकों से सहित तथा फहराती हुई विचित्र ध्वज पंक्तियों से संयुक्त होती है। ऋषभदेव के समय गंधकुटी की ऊँचाई ९०० धनुष थी। आगे घटते-घटते वीरनाथ के समय ७५ धनुष प्रमाण रह गई थी। गंधकुटी के मध्य में पादपीठ सहित, उत्तम स्फटिक मणि से निर्मित, घंटाओं के समूहादि से रमणीय सिंहासन होता है। रत्नों से खचित उस सिंहासन की ऊँचाई तीर्थंकर की ऊँचाई के ही योग्य हुआ करती है।

इस प्रकार यहाँ ३१ अधिकारों द्वारा समवसरण का वर्णन किया गया है। लोक और अलोक को प्रकाशित करने के लिये सूर्य के समान भगवान् अर्हंतदेव उस सिंहासन के ऊपर आकाशमार्ग में चार अंगुल के अन्तराल से स्थित रहते हैं।

अतिसंक्षेप में पुन: इस समवसरण को बताते हैं-

समवसरण में आठ भूमि और तीन कटनी-

१. पहली- ‘चैत्यप्रासाद भूमि' है, इसमें एक-एक जिनमंदिर के अंतराल में पाँच-पाँच प्रासाद हैं।

२. दूसरी-खातिका भूमि है, इसके स्वच्छ जल में हंस आदि कलरव कर रहे हैं और कमल आदि पुष्प खिले हुये हैं।

३. तीसरी-लताभूमि है, इसमें छहों ऋतुओं के पुष्प खिले हुये हैं।

४. चौथी-उपवनभूमि है, इसमें पूर्व आदि दिशा में क्रम से अशोक, सप्तच्छद, चंपक और आम्र के वन हैं। प्रत्येक वन में एक-एक चैत्यवृक्ष हैं जिनमें ४-४ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं।

५. पाँचवी-ध्वजाभूमि है, इसमें सिंह, गज, वृषभ, गरुड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, पद्म और चक्र इन दशचिन्हों से सहित महाध्वजाएँ और उनके आश्रित लघु ध्वजाएँ सब मिलाकर ४,७०,८८० हैंं।

६. छठी-कल्पभूमि है, इसमें भूषणांग आदि दश प्रकार के कल्पवृक्ष हैं। चारों दिशा में क्रम से नमेरु, मंदार, संतानक और पारिजात ऐसे एक-एक सिद्धार्थवृक्ष हैं। इनमें चार-चार सिद्धप्रतिमाएँ विराजमान हैं।

७. सातवीं-भवनभूमि में भवन बने हुये हैं। इस भूमि के पार्श्व भागों में अर्हंत और सिद्ध प्रतिमाओं से सहित नौ-नौ स्तूप हैं।

८. आठवीं-श्रीमण्डपभूमि है, इसमें १६ दीवालों के बीच में १२ कोठे हैं जिनमें १-गणधरादि मुनि २-कल्पवासिनी देवी ३-आर्यिका और श्राविका ४-ज्योतिषी देवी ५-व्यंतर देवी ६-भवनवासिनी देवी ७-भवनवासी देव ८-व्यंतर देव ९-ज्योतिष देव १०-कल्पवासी देव ११-चक्रवर्ती आदि मनुष्य और १२-सिंहादि तिर्यंच, ऐसे बारहगण के असंख्यातों भव्यजीव बैठकर धर्मोपदेश सुनते हैं। वहाँ पर रोग, शोक, जन्म, मरण, उपद्रव आदि बाधाएँ नहीं हैं।

पुन: प्रथम कटनी पर आठ महाध्वजाएँ, आठ मंगलद्रव्य आदि हैं। तृतीय कटनी पर गंधकुटी में सिंहासन पर लाल कमल की कर्णिका पर भगवान महावीर चार अंगुल अधर विराजमान हैं। इनका मुख एक तरफ होते हुये भी चारों तरफ दिखने से ये चतुर्मुख ब्रह्मा कहलाते हैंं। भगवान के पास अशोक वृक्ष, तीन छत्र, सिंहासन, भामंडल, चौंसठ चंवर, सुरपुष्पवृष्टि, दुंदभि बाजे और हाथ जोड़े सभासद ये आठ महाप्रातिहार्य होते हैं। वहीं पर भगवान महावीर के जिनशासन देव मातंगयक्ष और शासनदेवी सिद्धायिनी यक्षी विद्यमान हैं।

चौंतीस अतिशय-तीर्थंकर के जन्म से लेकर अन्त तक ३४ अतिशय होते हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार है-

जन्म के १० अतिशय, घातिकर्म क्षय से ११ अतिशय और देवों के द्वारा किये गये १३ अतिशय, ऐसे कुल मिलाकर ३४ अतिशय होते हैं। पसीना का न होना, शरीर में मल-मूत्र का न होना, दूध के समान सफेद रुधिर का होना, वङ्कावृषभनाराचसंहनन, समचतुरस्रसंस्थान, अत्यन्त सुन्दर शरीर, नवचंपक की उत्तम गंध के समान सुगन्धित शरीर, १००८ उत्तम लक्षणों का होना, अनंत बल-वीर्य, हित-मित एवं मधुर भाषण, प्रत्येक तीर्थंकर के जन्मकाल से ही ये स्वाभाविक दश अतिशय होते हैं।

अपने पास से चारों दिशाओं में १०० योजन तक सुभिक्षता, आकाश में गमन, हिंसा का अभाव, भोजन का अभाव, उपसर्ग का अभाव, सबकी ओर मुख करके स्थित होना, छाया का न होना, पलकों का न झपकना, सर्व विद्याओं की ईश्वरता, नख और केशों का न बढ़ना, अठारह महाभाषा, सात सौ क्षुद्र भाषा तथा और भी जो संज्ञी जीवों की समस्त अक्षर-अनक्षरात्मक भाषाएँ हैं उनमें तालु, दाँत, ओष्ठ और कण्ठ के व्यापार से रहित होकर एक साथ भव्यजनों को दिव्य उपदेश देना। भगवान जिनेन्द्रदेव की स्वभावत: अस्खलित और अनुपम दिव्यध्वनि तीनों संध्या कालों में नव मुहूर्तों तक निकलती है और एक योजनपर्यंत जाती है। इससे अतिरिक्त गणधर देव, इन्द्र अथवा चक्रवर्ती मुख्यश्रोता के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरूपणार्थ वह दिव्यध्वनि शेष समयों में भी निकलती है। यह दिव्यध्वनि भव्यजीवों को छह द्रव्य, नव पदार्थ, पाँच अस्तिकाय और सात तत्त्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरूपण करती है। इस प्रकार घातिया कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुये ये महान् आश्चर्यजनक ग्यारह अतिशय तीर्थंकर को केवलज्ञान के होने पर प्रगट होते हैं।

तीर्थंकर के माहात्म्य से संख्यात योजनों तक वन असमय में ही पत्ते, फूल और फलों की समृद्धि से युक्त हो जाता है। कंटक और रेती को दूर करती हुई सुखदायक वायु चलने लगती है। जीव पूर्व वैर को छोड़कर मैत्रीभाव से रहने लगते हैं। उतनी भूमि दर्पण तल के सदृश स्वच्छ और रत्नमय हो जाती है। सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से मेघकुमार देव सुगंधित जल की वर्षा करता है। देव विक्रिया से फलों के भार से नम्रीभूत शालि और जौ आदि खेत को रचते हैं। सब जीवों को नित्य आनंद उत्पन्न होता है। वायुकुमार देव विक्रिया से शीतल पवन चलाता है। कुएँ और तालाब आदि निर्मल जल से पूर्ण हो जाते हैं। आकाश धुआँ और उल्कापात आदि से रहित होकर निर्मल हो जाता है। संपूर्ण जीवों को रोगादि की बाधाएँ नहीं होती हैं। यक्षेन्द्रों के मस्तकों पर स्थित और किरणों से उज्ज्वल ऐसे दिव्य धर्मचक्रों को देखकर जनों को आश्चर्य होता है। तीर्थंकर की (विदिशाओं सहित) चारों दिशाओं में छप्पन सुवर्ण कमल, एक पादपीठ और दिव्य एवं विविध प्रकार के पूजनद्रव्य होते हैं। इस प्रकार ये चौंतीस अतिशय कहे गये हैं।

आठ महाप्रातिहार्य-ऋषभ आदि तीर्थंकरों को जिन वृक्षों के नीचे केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है वे ही अशोक वृक्ष कहलाते हैं। ये जिनेन्द्रदेव के शरीर की ऊँचाई से बारह गुणे अधिक ऊँचे होते हैं। ये इतने सुन्दर होते हैं कि इनको देखकर इन्द्र का चित्त भी अपने नन्दन वनों में नहीं रमता है। तीर्थंकर के मस्तक के ऊपर बिना स्पर्श किये ही चंद्रमण्डल के सदृश, मुक्ता के समूह से युक्त तीन छत्र शोभित होते हैं। निर्मल स्फटिक पाषाण से निर्मित और उत्कृष्ट रत्नों से खचित सिंहासन होता है। गाढ़ भक्ति में आसक्त, हाथों को जोड़े हुये, विकसित मुख कमल से संयुक्त, बारह गण के मुनिगण आदि भव्यजीव भगवान को घेरकर स्थित रहते हैं। मोह से रहित होकर जिनप्रभु के शरण में आवो, आवो, ऐसा कहते हुये ही मानों देवों का दुंदुभी बाजा बजता रहता है। भगवान् के चरणों के मूल में देवों के द्वारा की गई पुष्पवृष्टि होती रहती है। करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान प्रभामण्डल अपने दर्शनमात्र से ही सम्पूर्ण लोगों को सात भवों को दिखला देता है। कुंदपुष्प के समान श्वेत चौंसठ चंवर देवों के द्वारा ढुराये जाते हैं। ये आठ महाप्रातिहार्य कहलाते हैं।

इन चौंतीस अतिशय और आठ महाप्रातिहार्य से संयुक्त मोक्षमार्ग के नेता और तीनों लोकों के स्वामी ऐसे अर्हंतदेव की मैं वंदना करता हूँ।

समवसरण में कितने जीव रहते हैं ?-प्रत्येक समवसरण में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात् असंख्यात जीव जिनेन्द्रदेव की वंदना में प्रवृत्त हुए स्थित रहते हैं। कोठों के क्षेत्र से यद्यपि जीवों का क्षेत्रफल असंख्यात गुणा है, फिर भी वे सब भव्यजीव जिनदेव के माहात्म्य से एक दूसरे से अस्पृष्ट रहते हैं। वहाँ पर बालक से लेकर वृद्ध तक सभी लोग प्रवेश करने में अथवा निकलने में अंतर्मुहूर्त काल (४८ मिनट) के भीतर संख्यात योजन चले जाते हैं। इन कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कदापि नहीं होते, तथा अनध्यवसाय, संदेह और विपरीतता से युक्त जीव भी नहीं होते हैं। इससे अतिरिक्त वहाँ पर जिन भगवान के माहात्म्य से आतंक, रोग, मरण, उत्पत्ति, वैर, काम बाधा तथा भूख और प्यास की बाधाएँ भी नहीं होती हैं।

यक्ष-यक्षिणी-गोवदन, महायक्ष, त्रिमुख, यक्षेश्वर, तुम्बुरु, कुसुम, वरनन्दि, विजय, अजित, ब्रह्मेश्वर, कुमार, षण्मुख, पाताल, किन्नर, किंपुरुष, गरुड़, गंधर्व, महेन्द्र, कुबेर, वरुण, विद्युत्प्रभ, सर्वाण्ह, धरणेन्द्र और मातंग चौबीस तीर्थंकरों के ये चौबीस यक्ष हैं। अपने-अपने तीर्थंकर के ये यक्ष अपने-अपने जिनेंद्रदेव के पास में स्थित रहते हैं। इन्हें जिनशासन देव कहते हैं।

चव्रेश्वरी, रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वङ्काशृंखला, पुरुषदत्ता, मनोवेगा, काली, ज्वालामालिनी, महाकाली, मानवी, गौरी, गांधारी, वैरोटी, अनन्तमती, मानसी, महामानसी, जया, विजया, अपराजिता, बहुरूपिणी, चामुण्डी, कूष्माण्डी, पद्मावती और सिद्धायिनी चौबीस तीर्थंकरों के क्रम से ये चौबीस यक्षिणी हैं। अपने-अपने तीर्थंकर के समीप में एक-एक यक्षिणी रहा करती हैं। इन्हें जिनशासनदेवी कहते हैं।

दिव्यध्वनि का माहात्म्य-जैसे चन्द्रमा से अमृत झरता है उसी प्रकार खिरती हुई जिन भगवान् की वाणी को अपने कत्र्तव्य के बारे में सुनकर वे बारह गणों के भिन्न-भिन्न जीव नित्य ही अनन्तगुणश्रेणीरूप से विशुद्ध परिणामों को धारण करते हुये अपने असंख्यात-गुणश्रेणीरूप कर्मों को नष्ट कर देते हैं। वहाँ पर रहते हुये वे भव्य जीव जिनेन्द्रदेव के चरणकमलों में परम आस्थावान होते हुये परम भक्ति में आसक्त होकर अतीत, वर्तमान और भावीकाल को भी नहीं जानते हैं अर्थात् बहुत सा काल व्यतीत कर देते हैं। इस प्रकार से तीर्थंकर को जब आर्हंत्य पद नामक परमस्थान प्राप्त होता है तब समवसरण की विभूति आदि महा अतिशय प्रगट होते है।

आर्हंत्य परमस्थान में यह समवसरण आदि विभूति तो बहिरंग वैभव है। इसके साथ चार घातिया कर्मों के नाश होने से चार अनंत गुण प्रगट हो जाते हैं। ज्ञानावरण कर्म के अभाव से अनन्तज्ञान, दर्शनावरण के नाश से अनन्तदर्शन, मोहनीय के नाश से अनन्तसुख और अन्तराय के क्षय से अनन्तवीर्य प्रगट हो जाते हैं। ये चार गुण ही अनन्तचतुष्टय कहे जाते हैं।

भगवान् की सभा में द्वादशांग श्रुत के ज्ञाता, मन:पर्ययज्ञानपर्यंत चार ज्ञान के धारी और चौंसठ ऋद्धियों से समन्वित गणधर देव रहते हैं जो भगवान् की दिव्यध्वनि को श्रवण कर जन-जन में उसका विस्तार करते हैं। गणधर के अभाव में तीर्थंकर की दिव्यदेशना नहीं होती है ऐसा नियम है। भगवान की बारह सभा में मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, यह चतुर्विध संघ रहता है। असंख्यातों देव-देवियाँ रहते हैं और संख्यातों तिर्यंच रहते हैं। ये सभी भगवान् के दिव्य उपदेश को सुनकर सम्यक्त्व को और अपने योग्य व्रतों को ग्रहण कर अपनी आत्मा को मोक्षमार्गी बना लेते हैं।

विपुलाचल पर्वत पर प्रथम दिव्यध्वनि खिरी-भगवान महावीर का समवसरण बन गया था किन्तु भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरी थी। जब प्रभु का श्रीविहार होता था, तब समवसरण विघटित हो जाता था एवं प्रभु का श्रीविहार आकाश में अधर होता था। देवगण भगवान के श्रीचरण कमलों के नीचे-नीचे स्वर्णमयी सुगंधित दिव्य कमलों की रचना करते रहते थे पुनः जहाँ भगवान रुकते, अर्धनिमिष मात्र में कुबेर आकाश में अधर ही समवसरण बना देता था।

हरिवंश पुराण में आया है कि छ्यासठ दिन तक मौन से विहार करते हुये प्रभु राजगृह में पहुँचे-

षट्षष्टिदिवसान् भूयो, मौनेन विहरन् विभुः।

आजगाम जगत्ख्यातं, जिनो राजगृहं पुरम्।।६१।।
आरुरोह गिरिं तत्र, विपुलं विपुलश्रियं।
प्रबोधार्थं स लोकानां, भानुमानुदयं यथा।।६२।।
इन्द्राग्निवायुभूत्याख्याः, कौडिन्याख्याश्च पण्डिताः।
इन्द्रनोदनयाऽऽयाताः, समवस्थानमर्हतः।।६८।।
प्रत्येकं सहिता सर्वे, शिष्याणां पंचभिः शतैः।
त्यक्ताम्बरादिसंबंधाः, संयमं प्रतिपेदिरे।।६९।।
सुता चेटकराजस्य, कुमारी चंदना तदा।
धौतैकाम्बरसंवीता, जातार्याणां पुरःसरी।।७०।।
श्रेणिकोऽपि च संप्राप्तः, सेनया चतुरंगया।
सिंहासनोपविष्टं तं, प्रणनाम जिनेश्वरम्।।७१।।
प्रत्यक्षीकृतविश्वार्थं, कृतदोषत्रयक्षयम्।
जिनेंद्रं गौतमोऽपृच्छत्, तीर्थार्थं पापनाशनम्।।८९।।
स दिव्यध्वनिना विश्वसंशयच्छेदिना जिनः।
दुन्दुभिध्वनिधीरेण, योजनान्तरयायिना।।९०।।
श्रावणस्यासिते पक्षे, नक्षत्रेऽभिजिति प्रभुः।
प्रतिपद्यन्हि पूर्वाण्हे, शासनार्थमुदाहरत्।।९१।।

तदनन्तर छ्यासठ दिन तक मौन से विहार करते हुय श्रीवर्धमान जिनेन्द्र जगत्प्रसिद्ध राजगृह नगर आये। वहाँ जिस प्रकार सूर्य उदयाचल पर आरूढ़ होता है उसी प्रकार वे लोगों को प्रतिबद्ध करने के लिये विपुल लक्ष्मी के धारक विपुलाचल पर्वत पर आरूढ़ हुये।।६१-६२।।

इन्द्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति तथा कौण्डिन्य आदि पण्डित इन्द्र की प्रेरणा से श्रीअर्हंत देव के समवसरण में आये। वे सभी पंडित अपने पाँच-पाँच सौ शिष्यों से सहित थे, इन सभी ने वस्त्रादि का त्याग कर संयम धारण कर लिया। उसी समय राजा चेटक की पुत्री कुमारी ‘चन्दना’ एक स्वच्छ वस्त्र धारण कर आर्यिकाओं में प्रमुख गणिनी हो गयीं। राजा श्रेणिक भी अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ समवसरण में पहुँचे और वहाँ पर सिंहासन पर विराजमान श्रीवद्र्धमान भगवान को नमस्कार किया।।६८-७१।।

तीनों लोकों के समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष जानने वाले एवं राग-द्वेष और मोह को क्षय करने वाले, पापनाशक श्री जिनेन्द्रदेव से श्री गौतम गणधर ने तीर्थ की प्रवृत्ति करने के लिये प्रश्न किया।

अनंतर श्रीमहावीर स्वामी ने श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के प्रातःकाल के समय अभिजित् नक्षत्र में समस्त संशयों को छेदने वाले, दुन्दुभि के शब्द के समान गंभीर तथा एक योजन तक फैलने वाली दिव्यध्वनि के द्वारा शासन की परंपरा चलाने के लिये उपदेश दिया।।८०-८१।।

अन्यत्र ग्रन्थों में आया है कि-

जब इंद्रराज ने देखा कि भगवान को केवलज्ञान होकर ६५ दिन व्यतीत हो गये, फिर भी प्रभु की दिव्यध्वनि नहीं खिर रही है क्या कारण है ? चिंतन कर यह पाया कि गणधर का अभाव होने से ही दिव्यध्वनि नहीं खिरी है। तब सौधर्मेंद्र ने इन्द्रभूति ब्राह्मण को इस योग्य जानकर उस अभिमानी को लेने के लिये युक्ति से वृद्ध का रूप बनाया और वहाँ ‘गौतमशाला’ में पहुँचे। वहाँ के प्रमुख गुरु ‘इंद्रभूति’ से बोले-

‘मेरे गुरु इस समय ध्यान में लीन होने से मौन हैं अतः मैं आपके पास एक श्लोक का अर्थ समझने आया हूँ।’

गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ब्राह्मण ने विद्या से गर्विष्ठ होकर पूछा-

‘यदि मैं इसका अर्थ बता दूँगा तो तुम क्या दोगे?’

तब वृद्ध ने कहा कि ‘यदि आप इसका अर्थ कर देंगे, तो मैं सब लोगों के सामने आपका शिष्य हो जाऊँगा और यदि आप अर्थ न बता सके तो इन सब विद्यार्थियों और अपने दोनों भाइयों के साथ आप मेरे गुरु के शिष्य बन जाना।’

महाअभिमानी इंद्रभूति ने यह शर्त मंजूर कर ली, क्योंकि वह यह समझता था कि मेरे से अधिक विद्वान् इस भूतल पर कोई है ही नहीं। तब वृद्ध ने वह काव्य पढ़ा-

धर्मद्वयं त्रिविधकालसमग्रकर्म, षड्द्रव्यकायसहिताः समयैश्च लेश्याः।

तत्त्वानि संयमगती सहितं पदार्थै-रंगप्रवेदमनिशं वद चास्तिकायम्।।

तब गौतम गोत्र से ‘गौतम’ नाम से प्रसिद्ध इन्द्रभूति ने कुछ देर सोचकर कहा-‘अरे ब्राह्मण! तू अपने गुरु के पास ही चल। वहीं मैं इसका अर्थ बताकर तेरे गुरु के साथ वाद-विवाद करूँगा।’

सौधर्मेंद्र तो यही चाहते थे। तब वेषधारी इंद्रराज गौतम को लेकर भगवान के समवसरण की ओर चल पड़े।

वहाँ मानस्तम्भ को देखते ही गौतम का मान गलित हो गया और उन्हें सम्क्त्व प्रगट हो गया। समवसरण के सारे वैभव को देखते हुए महान् आश्चर्य को प्राप्त उन्होंने भगवान महावीर स्वामी का दर्शन किया और भक्ति में गद्गद होकर स्तुति करने लगे-

जयति भगवान् हेमाम्भोज-प्रचार-विजृंभिता-वमर मुकुटच्छायोद्गीर्ण-प्रभापरिचुम्बितौ।।

कलुषहृदया मानोद्भ्रान्ताः परस्परवैरिणो। विगतकलुषाः पादौ यस्य प्रपद्य विशश्वसुः।।१।।

स्तुति करके विरक्तमना होकर उन इंद्रभूति ने प्रभु के चरण सानिध्य में जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। तत्क्षण ही उन्हें मति-श्रुत ज्ञान के साथ ही अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान प्रगट हो गया। वे गणधर पद को प्राप्त हो गये तभी भगवान की दिव्यध्वनि खिरी थी।

‘कषायपाहुड़’ ग्रन्थ में प्रथम दिव्यध्वनि के बारे में प्रश्नोत्तर रूप में बहुत ही सुंदर वर्णन किया है-

जिन्होंने धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करके समस्त प्राणियों को संशयरहित किया है, जो वीर हैं, जिन्होंने विशेषरूप से समस्त पदार्थसमूह को प्रत्यक्ष कर लिया है, जो जिनों में श्रेष्ठ हैं तथा राग, द्वेष और भय से रहित हैं ऐसे भगवान महावीर धर्मतीर्थ के कर्ता हैं।

प्रश्न-भगवान महावीर ने धर्मतीर्थ का उपदेश कहाँ पर दिया ?

उत्तर-‘सेणियराए सचेलणे महामंडलीए सयलवसुहामंडलं भुंजति मगहामंडल-तिलओवम..‘ रायगिहणयर - णेरयि -दिसमहिट्ठिय - विउलगिरिपव्वए सिद्धचारणसेविए बारहगण-परिवेड्ढिएण कहियं।

जब महामण्डलीक श्रेणिक राजा अपनी चेलना रानी के साथ सकल पृथिवीमंडल का उपभोग करता था तब मगधदेश के तिलक के समान राजगृह नगर को नैऋत्य दिशा में स्थित तथा सिद्ध और चारणों द्वारा सेवित विपुलाचल पर्वत के ऊपर बारह गणों की सभाओं से परिवेष्टित भगवान महावीर ने धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया।

राजगृह नगर के पास स्थित पंचशैलपुर है जिसे पंचपहाड़ी कहते हैं। पूर्व दिशा में चौकोर आकार वाला ऋषिगिरि नाम का पर्वत है। दक्षिण दिशा में वैभार पर्वत, नैऋत्य दिशा में विपुलाचल नाम का पर्वत है, ये दोनों त्रिकोण आकार वाले हैं। पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा में धनुष के आकार वाला ‘छिन्न’ नाम का पर्वत है। ऐशान दिशा में गोलाकार पांडु नाम का पर्वत है। ये सब पर्वत कुश के अग्रभागों से ढके हुये हैं।

प्रश्न-किस काल में धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है ?

उत्तर-भरतक्षेत्रसंबंधी अवसर्पिणी काल के दुःषमसुषमा नामक चौथे काल में नौ दिन, छह महिना अधिक तेतीस वर्ष अवशिष्ट होने पर धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है। कहा भी है-

इम्मिस्सेवसप्पिणीए चउत्थकालस्स पच्छिमे भाए।

चोत्तीसवासावसेसे किंचि विसेसूणकालम्मि।।

इस अवसर्पिणी काल के दुःषमसुषमा नामक चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम चौंतीस वर्ष बाकी रहने पर धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है।

आगे इसी को स्पष्ट करते हैं कि चौथे काल में पंद्रह दिन और आठ महीना अधिक पचहत्तर वर्ष बाकी रहने पर आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन बहत्तर वर्ष की आयु लेकर मति-श्रुत-अवधिज्ञान के धारक भगवान महावीर पुष्पोत्तर विमान से च्युत होकर गर्भ में अवतीर्ण हुये। उन बहत्तर वर्षों में तीस वर्ष कुमार काल है, बारह वर्ष छद्मस्थ काल है तथा तीस वर्ष केवलीकाल है। इन तीनों कालों का जोड़ बहत्तर वर्ष होता है। इस ७२ वर्ष प्रमाण काल को पंद्रह दिन और आठ महीना अधिक ७५ वर्ष में घटा देने पर वद्र्धमान जिनेंद्र के मोक्ष जाने पर जितना चतुर्थ काल शेष रहता है, उसका प्रमाण होता है।

इस काल में छ्यासठ दिन कम केवलिकाल अर्थात् २९ वर्ष, नौ महीना और चौबीस दिन के मिला देने पर चतुर्थकाल में नौ दिन और छह महीना अधिक तैतीस वर्ष बाकी रहते हैं।

शंका-केवलिकाल में से छ्यासठ दिन किसलिये कम किये हैं ?

समाधान-भगवान महावीर को केवलज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर भी छ्यासठ दिन तक धर्मतीर्थ की उत्पत्ति नहीं हुई थी, इसलिये केवलिकाल में से छ्यासठ दिन कम किये गये हैं। जयधवला में कहा है-

‘‘दिव्वज्झुणीए किमट्ठं तत्थापउत्ती?

गणिंदाभावादो।
सोहम्मिंदेण तक्खणे चेव गणिंदो किण्ण ढोइदो?
ण, काललद्धीए विणा असहेज्जस्स देविंदस्स तड्ढोयणसत्तीए अभावादो।’’

शंका-केवलज्ञान की उत्पत्ति के अनंतर छ्यासठ दिन तक दिव्यध्वनि की प्रवृत्ति क्यों नहीं हुई ?

समाधान-गणधर न होने से उतने दिन तक दिव्यध्वनि की प्रवृत्ति नहीं हुई।

शंका-सौधर्मेन्द्र ने केवलज्ञान प्राप्त होते ही गणधर देव को क्यों नहीं उपस्थित किया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि काललब्धि के बिना सौधर्म इन्द्र गणधर को उपस्थित करने में असमर्थ था, उसमें उसी समय गणधर को उपस्थित करने की शक्ति नहीं थी।

शंका-जिसने अपने तीर्थंकर पादमूल में महाव्रत स्वीकार किया है ऐसे पुरुष को छोड़कर अन्य के निमित्त से दिव्यध्वनि क्यों नहीं खिरती है ?

समाधान-ऐसा ही स्वभाव है और स्वभाव दूसरों के द्वारा प्रश्न करने योग्य नहीं होता है, क्योंकि यदि स्वभाव में ही प्रश्न होने लगे तो कोई व्यवस्था ही न बन सकेगी।

अतएव कुछ कम चौंतीस वर्ष प्रमाण चौथे काल के रहने पर तीर्थ की उत्पत्ति हुई, यह सिद्ध हुआ।

कोई अन्य आचार्य ‘‘भगवान वद्र्धमान की आयु ७१ वर्ष, ३ माह २५ दिन प्रमाण है’’ ऐसा कहते हैं।

आषाढ़ शुक्ला षष्ठी से चैत्र शुक्ला त्रयोदशी तक ९ माह ८ दिन हुये। चैत्र शुक्ला चतुर्दशी से अट्ठाईस वर्ष व्यतीत कर पुनः मगसिर कृष्णा दशमी तक लेने से अट्ठाईस वर्ष सात माह बारह दिन (२८ वर्ष ७ माह १२ दिन) होते हैं। मगसिर कृ.११ से आगे बारह वर्ष के बाद वैशाख शुक्ला दशमी को केवलज्ञान हुआ अतः १२ वर्ष, ५ माह १५ दिन बाद केवली हुये हैं। वैशाख शुक्ला ११ से आगे वैशाख शुक्ला १० तक उनतीस वर्ष पुनः वैशाख शुक्ला ११ से कार्तिक कृष्णा अमावस्या तक ५ माह, २० दिन ऐसे २९ वर्ष, ५ माह, २० दिन का केवली काल है। इस प्रकार वद्र्धमान जिनेन्द्र की आयु ७१ वर्ष, ३ माह, २५ दिन प्रमाण मानी गयी है।

भगवान महावीर की आयु बहत्तर वर्ष की थी। दूसरे मत से इकहत्तर वर्ष, तीन माह, पच्चीस दिन की थी। ये दोनों मत जयधवला ग्रंथ में आये हैं।१ श्रावण कृष्णा एकम के दिन भगवान की प्रथम दिव्यध्वनि खिरी थी, जब इंद्रभूति ब्राह्मण ने वद्र्धमान भगवान से जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की थी। उत्तरपुराण में कहा है-

‘श्रीवद्र्धमानमानम्य संयमं प्रतिपन्नवान्।’

श्रीवद्र्धमान स्वामी को नमस्कार करके सकलसंयम ग्रहण कर लिया था।
दिव्यध्वनि का वर्णन तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ में आया है।
जोयणपमाणसंठिद - तिरियामरमणुव णिवहपडिबोहो।
मिदुमधुरगभीरतरा - विसदविसयसयलभासाहिं।
अट्ठरसमहाभासा खुल्लयभासा वि सत्तसयसंखा।
अक्खरअणक्खरप्पय, सण्णीजीवाण सयलभासाओ।।
एदासिं भासाणं, तालुवदंतोट्ठकंठवावारं।
परिहरिय एक्ककालं, भव्वजणाणंदकर-भासो।।

एक योजन प्रमाण तक स्थित तिर्यंच देव और मनुष्यों के समूह को बोध प्रदान करने वाली भगवान की दिव्यध्वनि होती है। यह दिव्यध्वनि मृदु-मधुर, अतिगंभीर और विशद-स्पष्ट विषयों को कहने वाली संपूर्ण भाषामय होती है। यह संज्ञी जीवों की अक्षर और अनक्षररूप अठारह भाषा और सात सौ लघु भाषाओं में परिणत होती हुई, तालु-ओंठ-दाँत तथा कंठ के हलन-चलनरूप व्यापार से रहित होकर एक ही समय में भव्यजीवों को आनंदित करने वाली होती है, ऐसी दिव्यध्वनि के स्वामी तीर्थंकर भगवान होते हैं।

षट्खंडागम ग्रन्थ में श्रीवीरसेनस्वामी कहते हैं-

‘‘तेण महावीरेण केवलणाणिणा कहिदत्थो तम्हि चेव काले तत्थेव खेत्ते खयोवसम -जणिदचउ- रमलबुद्धिसंपण्णेण बह्मणेण गोदमगोत्तेण सयलदुस्सुदि-पारएण जीवाजीवविसयसंदेह -विणासणट्ठ -मुवगयवड्ढमाणपादमूलेण इंदिभूदिणावहारिदो।’’

इस प्रकार केवलज्ञानी भगवान महावीर के द्वारा कहे गये पदार्थ को उसी काल में और उसी क्षेत्र में क्षयोपशम विशेष से उत्पन्न चार प्रकार के-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्ययरूप निर्मल ज्ञान से युक्त संपूर्ण दुःश्रुति-अन्यमतावलंबी वेद-वेदांग में पारंगत, गौतमगोत्रीय ऐसे इन्द्रभूति ब्राह्मण ने जीव-अजीवविषयक संदेह को दूर करने के लिये श्रीवद्र्धमान भगवान के चरणकमल का आश्रय लेकर ग्रहण किया अर्थात् प्रभु की दिव्यध्वनि को सुना। इसीलिये भगवान महावीर ‘अर्थकर्ता’ कहलाए हैं।

‘पुणो तेणिदंभूदिणा भावसुदपज्जय-परिणदेण बारहंगाणं चोद्दसपुव्वाणं च गंथणमेक्केण चेवमुहूत्तेण रयणा कदा।’’

पुनः उन इन्द्रभूति गौतमस्वामी ने भावश्रुत पर्याय से परिणत होकर बारह अंग और चौदह पूर्वरूप ग्रन्थों की रचना एक ही मुहूर्त में कर दी।

सारांश यह है कि आज से पच्चीस सौ अट्ठावन वर्ष पूर्व श्रावण कृष्णा प्रतिपदा को राजगृही के विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि खिरी थी, यही प्रथम देशना दिवस-‘वीरशासन जयंती’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसी दिन श्री गौतमस्वामी ने गणधर पद प्राप्त करके द्वादशांगरूप श्रुत की रचना की थी जोकि मौखिक मानी गई, उसे लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता है। इन द्वादशांग श्रुत में क्या विषय है ? उसका नाममात्र वर्णन आगे किया जा रहा है।

[सम्पादन]
केवलज्ञान कल्याणक

जगद्बंधु वद्र्धमान भगवान ने निग्र्रंथ मुद्रा में नगर, वन आदि में विहार करते हुये छद्मस्थ अवस्था के बारह वर्ष व्यतीत कर दिये। श्री पूज्यपाद स्वामी कहते हैं-

ग्रामपुरखेटकर्वट-मटम्बघोषाकरान् प्रविजहार।

उग्रैस्तपोविधानैद्र्वादशवर्षाण्यमरपूज्य: ।।

देवों द्वारा पूज्य भगवान महावीर ने उग्र-उग्र तपश्चरण करते हुये ग्राम, पुर, खेट कर्वट, मटम्ब, पत्तन, घोष, आकर आदि स्थलों में विहार करते हुये दीक्षित जीवन में बारह वर्ष व्यतीत कर दिये।

किसी एक दिन वे भगवान जृंभिक ग्राम के समीप ऋजुकूला नदी के किनारे मनोहर नाम के वन के मध्य सालवृक्ष के नीचे रत्नमयी एक बड़ी शिला पर दो दिन के उपवास का नियम लेकर प्रतिमायोग से विराजमान हो गये। शुक्लध्यान में आरूढ़ भगवान वैशाख शुक्ला दशमी के दिन अपराण्ह काल में हस्त और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के बीच में चन्द्रमा के रहते हुये परिणामों की विशुद्धि को बढ़ाते हुये क्षपकश्रेणी में स्थित हो गये।

उसी समय द्वितीय शुक्लध्यान के द्वारा घातिया कर्मों को नष्ट कर भगवान ने दिव्य केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। उसी समय भगवान के जन्म समय के समान ही चारों प्रकार के देवों के यहाँ बिना बजाये बाजे बजने लगे। सौधर्मेंद्र ने भगवान के केवलज्ञान की प्रगटता को जानकर तत्क्षण ही कुबेर को समवसरण रचना बनाने की आज्ञा दी एवं स्वयं चारों निकाय के देवों के साथ अर्धनिमिष मात्र में वहाँ आ गया।

भगवान महावीर का समवसरण-केवलज्ञान के उत्पन्न होते ही तीर्थंकर का परमौदारिक शरीर पृथ्वी से पाँच हजार धनुष१ (२०००० हाथ प्रमाण) ऊपर चला जाता है। उस समय तीनों लोकों में अतिशय क्षोभ उत्पन्न होता है और सौधर्म आदि इन्द्रों के आसन कंपायमान हो जाते हैं। भवनवासी देवों के यहाँ अपने आप शंख का नाद होने लगता है, व्यंतर देवों के यहाँ भेरी बजने लगती है, ज्योतिषी देवों के यहाँ सिंहनाद होने लगता है और कल्पवासी देवों के यहाँ घण्टा बजने लगता है। इंद्रों के मुकुट के अग्रभाग स्वयमेव झुक जाते हैं और कल्पवृक्षों से पुष्पों की वर्षा होने लगती है। इन सभी कारणों से इन्द्र और देवगण तीर्थंकर के केवलज्ञान की उत्पत्ति को जानकर भक्तियुक्त होते हुये सात पैर आगे बढ़कर भगवान् को प्रणाम करते हैं। जो अहमिन्द्रदेव हैं, वे भी आसनों के कंपित होने से केवलज्ञान की उत्पत्ति को जानकर सात पैर आगे बढ़कर वहीं से परोक्ष में जिनेंद्रदेव की वंदना कर अपना जीवन सफल कर लेते हैं। सोलह स्वर्ग तक के देव-देवियाँ तो भगवान् की वंदना के लिये चले आते हैं।

उसी क्षण सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से कुबेर विक्रिया के द्वारा तीर्थंकर के समवसरण (धर्मसभा) को विचित्र रूप से रचता है। उस समवसरण के अनुपम संपूर्ण स्वरूप का वर्णन करने के लिये साक्षात् सरस्वती भी समर्थ नहीं हंै। यहाँ पर लेशमात्र वर्णन किया जाता है२। इस समवसरण के वर्णन में यहाँ ३१ विषय बताये जा रहे हैं-

सामान्य भूमि, सोपान, विन्यास, वीथी, धूलिशाल, चैत्यप्रासाद भूमि, नृत्यशाला, मानस्तम्भ, वेदी, खातिका, वेदी, लताभूमि, साल, उपवनभूमि, नृत्यशाला, वेदी, ध्वजाभूमि, साल, कल्पभूमि, नृत्यशाला, वेदी, भवनभूमि, स्तूप, साल, श्रीमण्डप, ऋषि आदि गणों का विन्यास, वेदी, प्रथम पीठ, द्वितीय पीठ, तृतीय पीठ और गंधकुटी।

१. सामान्य भूमि-समवसरण की संपूर्ण सामान्य भूमि सूर्यमण्डल के सदृश गोल, इन्द्रनीलमणिमयी होती है। यह सामान्यतया बारह योजन प्रमाण होती है। विदेह क्षेत्र के संपूर्ण तीर्थंकरों की समवसरण भूमि का यही प्रमाण है। भरत और ऐरावत क्षेत्र के तीर्थंकरों की समवसरण भूमि का उत्कृष्ट प्रमाण यही है, जघन्य प्रमाण एक योजन मात्र है, मध्यम के अनेक भेद हैं। जैसे कि भगवान ऋषभदेव का समवसरण बारह योजन का था शेष तीर्थंकरों का घटते-घटते अंतिम भगवान महावीर का एक योजन मात्र था।

२. सोपान-समवसरण में चढ़ने के लिए भूमि से १ हाथ ऊपर से आकाश में चारों ही दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में ऊपर-ऊपर २०,००० सीढ़ियाँ होती हैं। ये सीढ़ियाँ १ हाथ ऊँची और इतनी ही विस्तार वाली रहती हैंं, ये सब स्वर्ण से निर्मित होती हैं। देव-मनुष्य और तिर्यंचगण अंतर्मुहूर्त मात्र में ही इन सभी सीढ़ियों को पार कर समवसरण में पहुँच जाते हैं।

३. विन्यास-समवसरण में चार कोट, पाँच वेदियाँ, इनके बीच में आठ भूमियाँ और सर्वत्र प्रत्येक अन्तर भाग में तीन पीठ होते हैं। इस क्रम से समवसरण में सारी रचनाएँ रहती हैं। इन सबका वर्णन क्रम से आ जावेगा।

४. वीथी-प्रत्येक समवसरण में प्रारम्भ से लेकर प्रथम पीठ (कटनी) पर्यंत, सीढ़ियों की लम्बाई के बराबर विस्तार वाली चार वीथियाँ होती हैंं। यहाँ ‘वीथी' से जाने का मार्ग (सड़क) समझना चाहिये। इन वीथियों के पाश्र्व भाग में स्फटिकपाषाण से बनी हुई वेदियाँ होती हैं। ये बाउंड्रीवाल के समान हैं। जो आठ भूमियाँ कही जायेंगी, उन आठों भूमियों के मूल में वङ्कामय कपाटों से सुशोभित बहुत से तोरणद्वार होते हैं जिनमें देव, मनुष्य और तिर्यंचों का संचार बना रहता है।

५. धूलिसाल-सबके बाहर विशाल एवं समान गोल, मानुषोत्तर पर्वत के आकार वाला धूलिसाल नाम का कोट होता है यह पंचवर्णी रत्नों से निर्मित होता है, इसलिये इसका धूलिसाल नाम सार्थक है। इस कोट में मार्ग, अट्टालिकाएँ और पताकाएँ रहती हंै। चार गोपुर द्वार (मुख्य फाटक) होते हैंं यह तीनों लोकों को विस्मित करने वाला बहुत ही सुन्दर दिखता है। इस कोट के चारों गोपुर द्वारों में से पूर्वद्वार का नाम ‘विजय' है, दक्षिणद्वार का ‘वैजयंत' है, पश्चिमद्वार को ‘जयंत' और उत्तरद्वार को ‘अपराजित' कहते हैं। ये चारों द्वार सुवर्ण से बने रहते हैं, तीन भूमियों (खनों) से सहित, देव और मनुष्य के जोड़ों से संयुक्त और तोरणों पर लटकती हुई मणिमालाओं से शोभायमान होते हैं। प्रत्येक द्वार के बाहर और मध्य भाग में, द्वार के पाश्र्व भागों में मंगलद्रव्य, नवनिधि और धूपघट से युक्त विस्तीर्ण पुतलियाँ होती हैं। झारी, कलश, दर्पण, चामर, ध्वजा, पंखा, छत्र और सुप्रतिष्ठ (ठोना) ये ८ मंगलद्रव्य हैं। ये प्रत्येक १०८-१०८ होते हैं। काल, महाकाल, पाण्डु, माणवक, शंख, पद्म, नैसर्प, पिंगल और नानारत्न, ये नव निधियाँ प्रत्येक १०८ होती हैं। ये निधियाँ क्रम से ऋतु के योग्य द्रव्य-माला आदि, भाजन, धान्य, आयुध, वादित्र, वस्त्र, महल, आभरण और सम्पूर्ण रत्नों को देती हैं। वहाँ एक-एक पुतली के ऊपर गोशीर्ष, मलयचन्दन और कालागरू आदि धूपों के गंध से व्याप्त एक-एक धूपघट होते हैं। इन विजय आदि द्वार के प्रत्येक बाह्य भाग में सैकड़ों मकरतोरण और अभ्यंतर भाग में सैकड़ों रत्नमय तोरण होते हैं। इन द्वारों के बीच दोनों पाश्र्व भागों में एक-एक नाट्यशाला होती है जिसमें देवांगनाएँ नृत्य करती रहती हैं। इस धूलिसाल के चारों गोपुर द्वारों पर ज्योतिष्कदेव द्वार रक्षक होते हैं जो कि हाथ में रत्नदण्ड को लिये रहते हैं। इन चारों दरवाजों के बाहर और अन्दर भाग में सीढ़ियाँ बनी रहती हैं जिनसे सुखपूर्वक संचार किया जाता है। प्रत्येक समवसरण के धूलिसाल कोट की ऊँचाई अपने तीर्थंकर के शरीर से चौगुनी होती है। इस कोट की ऊँचाई से तोरणों की ऊँचाई अधिक रहती है और इससे भी अधिक विजय आदि द्वारों की ऊँचाई रहती है।

६. चैत्यप्रासाद भूमि-धूलिसाल के अभ्यंतर भाग में ‘चैत्यप्रासाद' नामक भूमि सकलक्षेत्र को घेरे हुए बनी रहती है। इसमें एक-एक जिनभवन के अन्तराल से ५-५ प्रासाद बने रहते हैं जो विविध प्रकार के वनखण्ड और बावड़ी आदि से रमणीय होते हैं। इन जिनभवन और प्रासादों की ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुणी रहती है।

७. नृत्यशाला-प्रथम पृथ्वी में पृथक्-पृथक् वीथियों के दोनों पाश्र्व भागों में उत्तम सुवर्ण एवं रत्नों से निर्मित दो-दो नाट्यशालाएँ होती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में ३२ रंगभूमियाँ और प्रत्येक रंगभूमि में ३२ भवनवासी देवियाँ नृत्य करती हुई नाना अर्थ से युक्त दिव्य गीतों द्वारा तीर्थंकरों के विजय के गीत गाती हैं और पुष्पाञ्जलि क्षेपण करती हैं। प्रत्येक नाट्यशाला में नाना प्रकार की सुगंधित धूप से दिग्मंडल को सुवासित करने वाले दो-दो धूपघट रहते हैं।

८. मानस्तम्भ-प्रथम पृथ्वी के बहुमध्य भाग में चारों वीथियों के बीचों-बीच समान गोल मानस्तम्भ भूमियाँ होती हैं। उनके अभ्यंतर भाग में चार गोपुर द्वारों से सुन्दर कोट होते हैं। इनके भी मध्य भाग में विविध प्रकार के दिव्य वृक्षों से युक्त वनखण्ड होते हैं। इनके मध्य में पूर्वादि दिशाओं में क्रम से सोम, यम, वरुण और कुबेर इन लोकपालों के रमणीय क्रीड़ानगर होते हैं। उनके अभ्यंतर भाग में चार गोपुरद्वार से युक्त कोट और इसके आगे वनवापिकाएँ होती हैं जिनमें नीलकमल खिले रहते हैं। उनके बीच में लोकपालों के अपनी-अपनी दिशा तथा चार विदिशाओं में भी दिव्य क्रीड़ानगर होते हैं। उनके अभ्यंतर भाग में उत्तम विशाल द्वारों से युक्त कोट होते हैं और फिर इनके बीच में पीठ होते हैं। इनमें से पहला पीठ वैडूर्यमणिमय, उसके ऊपर दूसरा पीठ सुवर्णमय और उसके ऊपर तीसरा पीठ बहुत वर्ण के रत्नों से निर्मित होता है। ये तीन पीठ तीन कटनी रूप होते हैं। इन पीठों के ऊपर मानस्तम्भ होते हैं। इन मानस्तम्भों की ऊँचाई अपने-अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी होती है। प्रत्येक मानस्तम्भ का मूलभाग वङ्का से युक्त और मध्यम भाग स्फटिकमणि से निर्मित होता है। इन मानस्तम्भों के उपरिमभाग वैडूर्यमणिमय रहते हैं। ये मानस्तम्भ गोलाकार होते हैं। इनमें चमर, घंटा, किंकणी, रत्नहार और ध्वजाएँ सुशोभित रहती हैं। इनके शिखर पर प्रत्येक दिशा में आठ प्रातिहार्यों से युक्त रमणीय एक-एक जिनेन्द्र प्रतिमायें होती हैं। दूर से ही मानस्तम्भों के देखने से मान से युक्त मिथ्यादृष्टि लोग अभिमान से रहित हो जाते हैं, इसीलिये इनका ‘मानस्तम्भ' यह नाम सार्थक है।

सभी समवसरण में तीनों कोटों के बाहर चार दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में क्रम से पूर्वादि वीथी (गली) के आश्रित वापिकाएँ होती हैं। पूर्व दिशा के मानस्तम्भ के पूर्वादि भागों में क्रम से नंदोत्तरा, नंदा, नंदवती और नंदिघोषा नामक चार वापिकाएँ होती हैं। दक्षिण मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में विजया, वैजयंता, जयन्ता और अपराजिता नामक चार वापिकाएँ होती हैं। पश्चिम मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में क्रम से अशोका, सुप्रबुद्धा, कुमुदा और पुण्डरीका ये चार वापिकाएँ होती हैं। उत्तर मानस्तम्भ के आश्रित पूर्वादि भागों में क्रम से हृदयानन्दा, महानन्दा, सुप्रतिबुद्धा और प्रभंकरा ये चार वापिकाएँ होती हैं। ये वापिकाएँ समचतुष्कोण, कमलादि से संयुक्त, टंकोत्कीर्ण, वेदिका, चार तोरण एवं रत्नमालाओं से रमणीय होती हैं। सब वापिकाओं के चारों तटों में से प्रत्येक तट पर जलक्रीड़ा के योग्य दिव्य द्रव्यों से परिपूर्ण मणिमयी सीढ़ियाँ होती हैं। इन वापिकाओं में भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और कल्पवासी देव तथा मनुष्य क्रीड़ा किया करते हैं। प्रत्येक वापिकाओं के आश्रित, निर्मल जल से परिपूर्ण दो-दो कुण्ड होते हैं, जिनमें देव, मनुष्य और तिर्यंच अपने पैरों की धूलि धोया करते हैं।

९. प्रथम वेदी-इस समवसरण में उत्तम रत्नमय ध्वजा, तोरण और घंटाओं से युक्त प्रथम वेदिका होती है। इसमें गोपुर द्वार, पुत्तलिका, १०८ मंगलद्रव्य एवं नव निधियाँ पूर्व के समान ही होती हैं। इन वेदियों के मूल और उपरिम भाग का विस्तार धूलिशाल कोट के मूलविस्तार के समान होता है।

१०. खातिका-इसके आगे स्वच्छ जल से परिपूर्ण और अपने जिनेन्द्रदेव की ऊँचाई के चतुर्थभाग प्रमाण खातिका (खाई) होती है। इस खातिका में खिले हुये कुमुद, कुवलय और कमल अपनी सुगन्धि फैलाते रहते हैं, इनमें मणिमय सीढ़ियाँ बनी रहती हैं एवं हंस, सारस आदि पक्षी सदा क्रीड़ा किया करते हैं।

११. द्वितीय वेदी-यह वेदिका भी अपनी पूर्व वेदी के सदृश है। इसका विस्तार प्रथम वेदिका से दूना माना गया है।

१२. लताभूमि-इसके आगे पुन्नाग, नाग, कुब्जक, शतपत्र और अतिमुक्त आदि से संयुक्त, क्रीड़ा पर्वतों से सुशोभित, फूले हुये कमलों से सहित जल भरी बावड़ियों से मनोहर ऐसी लताभूमि शोभायमान होती है।

१३. साल-इसके आगे दूसरा कोट है इसे ही साल कहते हैं। इसका सारा वर्णन धूलिसाल कोट के समान है। अन्तर इतना ही है कि यह विस्तार में उससे दूना रहता है, रजतमयी है एवं यक्ष जाति के देव इसके चारों द्वारों पर खड़े रहते हैं।

१४. उपवन भूमि-द्वितीय कोट के आगे चौथी उपवन भूमि होती है। इसमें पूर्वादि दिशाओं के क्रम से अशोकवन, सप्तपर्णवन, चम्पकवन और आम्रवन, ये चार वन शोभायमान होते हैं। यह भूमि विविध प्रकार के वन समूहों से मण्डित, विविध नदियों के पुलिन और क्रीड़ा पर्वतों से तथा अनेक प्रकार की उत्तम वापिकाओं से रमणीय होती है। इस भूमि में अशोक, सप्तपर्ण, चम्पक और आम्र ये चार सुन्दर वृक्ष होते हैं इन्हें चैत्यवृक्ष कहते हैं। इनकी ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी रहती है। एक-एक चैत्यवृक्ष के आश्रित आठ प्रातिहार्यों से संयुक्त चार-चार मणिमय जिनप्रतिमाँँ होती हैं। इस उपवन भूमि की बावड़ियों के जल में निरीक्षण करने पर प्रत्येक जन अपने अतीत-अनागत सात भवों को देख लेते हैं।

एक-एक चैत्यवृक्ष के आश्रित तीन कोटों से वेष्टित व तीन कटनियों के ऊपर चार-चार मानस्तम्भ होते हैं। इन मानस्तम्भों के चारों तरफ भी कमल आदि फूलों से युक्त स्वच्छ जल से भरित वापियाँ होती हैं। वहाँ कहीं पर रमणीय भवन, कहीं क्रीड़नशाला और कहीं नृत्य करती हुई देवांगनाओं से युक्त नाट्यशालाएँ होती हैं। ये रमणीय भवन पंक्तिक्रम से इस भूमि में शोभायमान होते हैं। ये भवन भी कई खनों से निर्मित अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणे ऊँचे होते हैं। अपनी प्रथम भूमि की अपेक्षा इस उपवन भूमि का विस्तार दूना होता है।

१५. नृत्यशाला-सब वनों के आश्रित सब वीथियों (गलियों) के दोनों पाश्र्व भागों में दो-दो नाट्यशालाएँ होती हैं। इनमें से आदि की आठ नाट्यशालाओं में भवनवासिनी देवांगनाएँ और इससे आगे की आठ नाट्यशालाओं में कल्पवासिनी देवांगनाएँ नृत्य किया करती हैं। इन नाट्यशालाओं का सुन्दर वर्णन पूर्व के समान है।

१६. तृतीय वेदी-यह तीसरी वेदिका अपनी दूसरी वेदिका के समान है, अन्तर इतना ही है कि यहाँ के चारों द्वारों के रक्षक यक्षेन्द्र रहते हैं।

१७. ध्वजाभूमि-वेदिका के आगे इस पंचम ध्वजाभूमि में दिव्य ध्वजाएँ होती हैं जिनमें सिंह, गज, वृषभ, गरुड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, पद्म और चक्र ये दश प्रकार के चिन्ह बने रहते हैं। चारों दिशाओं में से प्रत्येक दिशा में इन दश प्रकार की ध्वजाओं में से प्रत्येक १०८ रहती हैं और इनमें से भी प्रत्येक ध्वजा अपनी १०८ क्षुद्रध्वजाओं से संयुक्त रहती हैं। इस प्रकार इस ध्वजाभूमि में महाध्वजा १०²१०८²४·४३२० व क्षुद्रध्वजाएँ १०²१०८²१०८²४·४६६५६० समस्त ध्वजाएँ ४३२०±४६६५६०·४७०८८० होती हैं। ये समस्त ध्वजाएँ रत्नों से खचित सुवर्णमय स्तम्भों में लगी रहती हैं। इन ध्वजस्तम्भों की ऊँचाई अपने तीर्थंकर की ऊँचाई से बारहगुणी रहती है।

१८. साल-इस ध्वजभूमि के आगे चाँदी के समान वर्णवाला तीसरा कोट अपने धूलिसाल कोट के ही सदृश है। इस कोट का विस्तार द्वितीय कोट की अपेक्षा दूना है और इसके द्वाररक्षक भवनवासी देव रहते हैं।

१९. कल्पभूमि-इस छठी भूमि का नाम कल्पभूमि है, यह दश प्रकार के कल्पवृक्षों से परिपूर्ण है। पानांग, तुर्यांग, भूषणांग, वस्त्रांग, भोजनांग, आलयांग, दीपांग, भाजनांग, मालांग और तेजांग, ये दशप्रकार के कल्पवृक्ष हैं। इस भूमि में कहीं पर कमल, उत्पल से सुगंधित बावड़ियाँ हैं, कहीं पर रमणीय प्रासाद, कहीं पर क्रीड़नशालाएँ और कहीं पर जिनेन्द्रदेव के विजयचरित्र के गीतों से युक्त प्रेक्षणशालाएँ होती हैं। ये सब भवन बहुत भूमियों (खनों) से सुशोभित, रत्नों से निर्मित पंक्तिक्रम से शोभायमान होते हैं। इस कल्पभूमि के भीतर पूर्वादि दिशाओं में नमेरु, मंदार, संतानक और पारिजात ये चार-चार महान सिद्धार्थ वृक्ष होते हैं। ये वृक्ष तीन कोटों से युक्त और तीन मेखलाओं के ऊपर स्थित होते हैं। इनमें से प्रत्येक वृक्ष के मूलभाग में विचित्र पीठों से युक्त, रत्नमय चार-चार सिद्धों की प्रतिमाएँ होती हैं। ये वंदना करने मात्र से तुरंत संसार के भय को नष्ट कर देती हैं। एक-एक सिद्धार्थ वृक्ष के आश्रित, तीन कोटों से वेष्टित, पीठत्रय के ऊपर चार-चार मानस्तम्भ होते हैं। कल्पभूमि में स्थित सिद्धार्थ वृक्ष, क्रीड़नशालाएँ और प्रासाद जिनेन्द्र की ऊँचाई से बारहगुणे ऊँचे होते हैं।

२०. नाट्यशाला-इस कल्पभूमि के पाश्र्वभागों में प्रत्येक वीथी (गली) के आश्रित, दिव्य रत्नों से निर्मित और अपने चैत्यवृक्षों के सदृश ऊँचाई वाली चार-चार नाट्यशालाएँ होती हैं। सब नाट्यशालाएँ पांच भूमियों (खनों) से विभूषित, बत्तीस रंगभूमियों से सहित और नृत्य करती हुई ज्योतिषी देवांगनाओं से रमणीय होती हैं।

२१. वेदी-इस नाट्यशाला के आगे प्रथम वेदी के सदृश ही चौथी वेदी होती है। यहाँ भवनवासी देव द्वारों की रक्षा करते हैं।

२२. भवनभूमि-इस वेदी के आगे भवनभूमि नाम से सातवीं भूमि होती है। इसमें रत्नों से खचित, फहराती हुई ध्वजा-पताकाओं से सहित और उत्तम तोरण युक्त उन्नत द्वारों वाले भवन होते हैं। वे एक-एक भवन सुरयुगलों के गीत, नृत्य एवं बाजे के शब्दों से तथा जिनाभिषेकों से शोभायमान होते हैं। यहाँ पर भी उपवन, वापिका आदि की सुन्दर शोभा पूर्व के समान रहती है।

२३. स्तूप-इस भवनभूमि के पाश्र्वभागों में प्रत्येक वीथी के मध्य जिन और सिद्धों की अनुपम प्रतिमाओं से व्याप्त नौ-नौ स्तूप होते हैं। इन स्तूपों की छतों पर छत्र फिरते रहते हैं, ध्वजाएँ फहराती रहती हैं, ये दिव्यरत्नों से निर्मित रहते हैं और आठ मंगल द्रव्यों से सहित होते हैं। एक-एक स्तूप के बीच में मकर के आकार के सौ तोरण होते हैं। इन स्तूपों की ऊँचाई अपने चैत्यवृक्षों की ऊँचाई के समान होती है। भव्यजीव इन स्तूपों का अभिषेक, पूजन और प्रदक्षिणा किया करते हैं।

२४. साल-स्तूपों के आगे आकाश स्फटिक के सदृश और मरकत मणिमय चार गोपुरद्वारों से रमणीय चौथा कोट होता है। यहाँ के द्वारों पर कल्पवासी देव उत्तम रत्नमय दण्डों को हाथ में लेकर खड़े रहते हैं। ये जिनेन्द्र भगवान् के चरणों की परम भक्ति से द्वारपाल का कार्य करते हैं।

२५. श्रीमण्डप भूमि-इस आठवीं भूमि का नाम ‘श्रीमण्डप' है। यह अनुपम उत्तमरत्नों के खम्भों पर स्थित और मुक्ताजालादि से शोभायमान रहती है। इसमें निर्मल स्फटिकमणि से निर्मित सोलह दीवालों के बीच में बारह कोठे होते हैं। इन कोठों की ऊँचाई अपने जिनेन्द्र की ऊँचाई से बारहगुणी होती है।

२६. गणविन्यास-इन बारह कोठों के भीतर पूर्वादि प्रदक्षिणा क्रम से पृथक्-पृथक् ऋषि आदि बारहगण बैठते हैं। उनका क्रम यह है - प्रथम कोठे में संपूर्ण ऋद्धियों के धारक गणधरदेव और सर्वदिगंबर मुनिगण बैठते हैं। स्फटिकमणि की दीवाल से व्यवहित दूसरे कोठे में कल्पवासिनी देवियाँ, तीसरे कोठे में अतिशय नम्र आर्यिकाएँ तथा श्राविकाएँ बैठती हैं। चतुर्थ कोठे में ज्योतिर्वासी देवियाँ, पांचवें में व्यंतर देवियाँ, छठे में भवनवासी देवियाँ, सातवें में भवनवासी देव, आठवें में व्यंतरदेव, नौवें में सूर्य, चन्द्र आदि ज्योतिषीदेव, दशवें में कल्पवासीदेवी, ग्यारहवें में चक्रवर्ती, मण्डलीक राजा एवं अन्य मनुष्य तथा बारहवें में परस्पर वैरभाव को छोड़कर सिंह, व्याघ्र, नकुल, हरिण आदि तिर्यंचगण बैठते हैं।

२७. वेदी-इसके अनंतर निर्मल स्फटिक पाषाण से बनी हुई पाँचवीं वेदिका होती है जिसका सर्व वर्णन प्रथम वेदी के सदृश ही है।

२८. प्रथम पीठ-इस पाँचवी वेदी के आगे वैडूर्यमणि से निर्मित प्रथम पीठ होती है। इन पीठों की ऊँचाई भी अपने मानस्तम्भ की पीठ के सदृश है। इस प्रथमपीठ के ऊपर बारह कोठों में से प्रत्येक कोठे के प्रवेश द्वारों में और समस्त (चार) वीथियों के सन्मुख सोलह-सोलह सीढ़ियाँ होती हैंं। चूड़ी के सदृश गोल नाना प्रकार के पूजा द्रव्य और मंगल द्रव्यों से सहित इस पीठ पर चारों दिशाओं में अपने शिर पर धर्मचक्र को रखे हुये यक्षेंद्र स्थित रहते हैं। वे गणधर देव आदि बारहगण इस पीठ (कटनी) पर चढ़कर और प्रदक्षिणा देकर जिनेन्द्रदेव के सम्मुख हुए यथायोग्य वंदना, पूजा, भक्ति आदि करते हैं। सैकड़ों स्तुतियों द्वारा गुणकीर्तन करके असंख्यात गुणश्रेणीरूप से अपने कर्मों की निर्जरा करते हुए प्रसन्नचित्त होकर अपने-अपने कोठों में प्रवेश करते हैं।

२९. द्वितीय पीठ-प्रथम पीठ (कटनी) के ऊपर दूसरा पीठ होता है। यह पीठ भी नाना रत्नों से खचित भूमियुक्त होता है। इस सुवर्णमय पीठ पर चढ़ने के लिए चारों दिशाओं में पाँच वर्ण के रत्नों से निर्मित सीढ़ियाँ होती हैं। इस पीठ के ऊपर मणिमय स्तम्भों पर लटकती हुई ध्वजाएँ होती हैं, जिनमें सिंह, बैल, कमल, चक्र, माला, गरुड़, वस्त्र और हाथी ऐसे आठ प्रकार के चिन्ह बने रहते हैं। इसी पीठ पर धूपघट, मंगलद्रव्य, पूजनद्रव्य और नवनिधियाँ रहती हैं जिनका वर्णन करने के लिये कोई भी समर्थ नहीं है।

३०. तृतीय पीठ-द्वितीय पीठ के ऊपर विविध प्रकार के रत्नों से खचित तीसरा पीठ (कटनी) होता है। सूर्यमण्डल के समान गोल इस पीठ के चारों ओर रत्नमय और सुखकर स्पर्शवाली आठ-आठ सीढ़ियाँ होती हैं।

३१. गंधकुटी-इस तृतीय पीठ के ऊपर एक गंधकुटी होती है। यह चामर, किंकणी, वन्दनमाला और हार आदि से रमणीय, गोशीर, मलय, चंदन, कालागरू आदि धूपों के गंध से व्याप्त, प्रज्वलित रत्नों के दीपकों से सहित तथा फहराती हुई विचित्र ध्वज पंक्तियों से संयुक्त होती है। ऋषभदेव के समय गंधकुटी की ऊँचाई ९०० धनुष थी। आगे घटते-घटते वीरनाथ के समय ७५ धनुष प्रमाण रह गई थी। गंधकुटी के मध्य में पादपीठ सहित, उत्तम स्फटिक मणि से निर्मित, घंटाओं के समूहादि से रमणीय सिंहासन होता है। रत्नों से खचित उस सिंहासन की ऊँचाई तीर्थंकर की ऊँचाई के ही योग्य हुआ करती है।

इस प्रकार यहाँ ३१ अधिकारों द्वारा समवसरण का वर्णन किया गया है। लोक और अलोक को प्रकाशित करने के लिये सूर्य के समान भगवान् अर्हंतदेव उस सिंहासन के ऊपर आकाशमार्ग में चार अंगुल के अन्तराल से स्थित रहते हैं।

अतिसंक्षेप में पुन: इस समवसरण को बताते हैं-

समवसरण में आठ भूमि और तीन कटनी-

१. पहली- ‘चैत्यप्रासाद भूमि' है, इसमें एक-एक जिनमंदिर के अंतराल में पाँच-पाँच प्रासाद हैं।

२. दूसरी-खातिका भूमि है, इसके स्वच्छ जल में हंस आदि कलरव कर रहे हैं और कमल आदि पुष्प खिले हुये हैं।

३. तीसरी-लताभूमि है, इसमें छहों ऋतुओं के पुष्प खिले हुये हैं।

४. चौथी-उपवनभूमि है, इसमें पूर्व आदि दिशा में क्रम से अशोक, सप्तच्छद, चंपक और आम्र के वन हैं। प्रत्येक वन में एक-एक चैत्यवृक्ष हैं जिनमें ४-४ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं।

५. पाँचवी-ध्वजाभूमि है, इसमें सिंह, गज, वृषभ, गरुड़, मयूर, चन्द्र, सूर्य, हंस, पद्म और चक्र इन दशचिन्हों से सहित महाध्वजाएँ और उनके आश्रित लघु ध्वजाएँ सब मिलाकर ४,७०,८८० हैंं।

६. छठी-कल्पभूमि है, इसमें भूषणांग आदि दश प्रकार के कल्पवृक्ष हैं। चारों दिशा में क्रम से नमेरु, मंदार, संतानक और पारिजात ऐसे एक-एक सिद्धार्थवृक्ष हैं। इनमें चार-चार सिद्धप्रतिमाएँ विराजमान हैं।

७. सातवीं-भवनभूमि में भवन बने हुये हैं। इस भूमि के पार्श्व भागों में अर्हंत और सिद्ध प्रतिमाओं से सहित नौ-नौ स्तूप हैं।

८. आठवीं-श्रीमण्डपभूमि है, इसमें १६ दीवालों के बीच में १२ कोठे हैं जिनमें १-गणधरादि मुनि २-कल्पवासिनी देवी ३-आर्यिका और श्राविका ४-ज्योतिषी देवी ५-व्यंतर देवी ६-भवनवासिनी देवी ७-भवनवासी देव ८-व्यंतर देव ९-ज्योतिष देव १०-कल्पवासी देव ११-चक्रवर्ती आदि मनुष्य और १२-सिंहादि तिर्यंच, ऐसे बारहगण के असंख्यातों भव्यजीव बैठकर धर्मोपदेश सुनते हैं। वहाँ पर रोग, शोक, जन्म, मरण, उपद्रव आदि बाधाएँ नहीं हैं।

पुन: प्रथम कटनी पर आठ महाध्वजाएँ, आठ मंगलद्रव्य आदि हैं। तृतीय कटनी पर गंधकुटी में सिंहासन पर लाल कमल की कर्णिका पर भगवान महावीर चार अंगुल अधर विराजमान हैं। इनका मुख एक तरफ होते हुये भी चारों तरफ दिखने से ये चतुर्मुख ब्रह्मा कहलाते हैंं। भगवान के पास अशोक वृक्ष, तीन छत्र, सिंहासन, भामंडल, चौंसठ चंवर, सुरपुष्पवृष्टि, दुंदभि बाजे और हाथ जोड़े सभासद ये आठ महाप्रातिहार्य होते हैं। वहीं पर भगवान महावीर के जिनशासन देव मातंगयक्ष और शासनदेवी सिद्धायिनी यक्षी विद्यमान हैं।

चौंतीस अतिशय-तीर्थंकर के जन्म से लेकर अन्त तक ३४ अतिशय होते हैं, जिनका वर्णन निम्न प्रकार है-

जन्म के १० अतिशय, घातिकर्म क्षय से ११ अतिशय और देवों के द्वारा किये गये १३ अतिशय, ऐसे कुल मिलाकर ३४ अतिशय होते हैं।

पसीना का न होना, शरीर में मल-मूत्र का न होना, दूध के समान सफेद रुधिर का होना, वङ्कावृषभनाराचसंहनन, समचतुरस्रसंस्थान, अत्यन्त सुन्दर शरीर, नवचंपक की उत्तम गंध के समान सुगन्धित शरीर, १००८ उत्तम लक्षणों का होना, अनंत बल-वीर्य, हित-मित एवं मधुर भाषण, प्रत्येक तीर्थंकर के जन्मकाल से ही ये स्वाभाविक दश अतिशय होते हैं।

अपने पास से चारों दिशाओं में १०० योजन तक सुभिक्षता, आकाश में गमन, हिंसा का अभाव, भोजन का अभाव, उपसर्ग का अभाव, सबकी ओर मुख करके स्थित होना, छाया का न होना, पलकों का न झपकना, सर्व विद्याओं की ईश्वरता, नख और केशों का न बढ़ना, अठारह महाभाषा, सात सौ क्षुद्र भाषा तथा और भी जो संज्ञी जीवों की समस्त अक्षर-अनक्षरात्मक भाषाएँ हैं उनमें तालु, दाँत, ओष्ठ और कण्ठ के व्यापार से रहित होकर एक साथ भव्यजनों को दिव्य उपदेश देना। भगवान जिनेन्द्रदेव की स्वभावत: अस्खलित और अनुपम दिव्यध्वनि तीनों संध्या कालों में नव मुहूर्तों तक निकलती है और एक योजनपर्यंत जाती है। इससे अतिरिक्त गणधर देव, इन्द्र अथवा चक्रवर्ती मुख्यश्रोता के प्रश्नानुरूप अर्थ के निरूपणार्थ वह दिव्यध्वनि शेष समयों में भी निकलती है। यह दिव्यध्वनि भव्यजीवों को छह द्रव्य, नव पदार्थ, पाँच अस्तिकाय और सात तत्त्वों का नाना प्रकार के हेतुओं द्वारा निरूपण करती है। इस प्रकार घातिया कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुये ये महान् आश्चर्यजनक ग्यारह अतिशय तीर्थंकर को केवलज्ञान के होने पर प्रगट होते हैं।

तीर्थंकर के माहात्म्य से संख्यात योजनों तक वन असमय में ही पत्ते, फूल और फलों की समृद्धि से युक्त हो जाता है। कंटक और रेती को दूर करती हुई सुखदायक वायु चलने लगती है। जीव पूर्व वैर को छोड़कर मैत्रीभाव से रहने लगते हैं। उतनी भूमि दर्पण तल के सदृश स्वच्छ और रत्नमय हो जाती है। सौधर्म इन्द्र की आज्ञा से मेघकुमार देव सुगंधित जल की वर्षा करता है। देव विक्रिया से फलों के भार से नम्रीभूत शालि और जौ आदि खेत को रचते हैं। सब जीवों को नित्य आनंद उत्पन्न होता है। वायुकुमार देव विक्रिया से शीतल पवन चलाता है। कुएँ और तालाब आदि निर्मल जल से पूर्ण हो जाते हैं। आकाश धुआँ और उल्कापात आदि से रहित होकर निर्मल हो जाता है। संपूर्ण जीवों को रोगादि की बाधाएँ नहीं होती हैं। यक्षेन्द्रों के मस्तकों पर स्थित और किरणों से उज्ज्वल ऐसे दिव्य धर्मचक्रों को देखकर जनों को आश्चर्य होता है। तीर्थंकर की (विदिशाओं सहित) चारों दिशाओं में छप्पन सुवर्ण कमल, एक पादपीठ और दिव्य एवं विविध प्रकार के पूजनद्रव्य होते हैं। इस प्रकार ये चौंतीस अतिशय कहे गये हैं।

आठ महाप्रातिहार्य-ऋषभ आदि तीर्थंकरों को जिन वृक्षों के नीचे केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है वे ही अशोक वृक्ष कहलाते हैं। ये जिनेन्द्रदेव के शरीर की ऊँचाई से बारह गुणे अधिक ऊँचे होते हैं। ये इतने सुन्दर होते हैं कि इनको देखकर इन्द्र का चित्त भी अपने नन्दन वनों में नहीं रमता है। तीर्थंकर के मस्तक के ऊपर बिना स्पर्श किये ही चंद्रमण्डल के सदृश, मुक्ता के समूह से युक्त तीन छत्र शोभित होते हैं। निर्मल स्फटिक पाषाण से निर्मित और उत्कृष्ट रत्नों से खचित सिंहासन होता है। गाढ़ भक्ति में आसक्त, हाथों को जोड़े हुये, विकसित मुख कमल से संयुक्त, बारह गण के मुनिगण आदि भव्यजीव भगवान को घेरकर स्थित रहते हैं। मोह से रहित होकर जिनप्रभु के शरण में आवो, आवो, ऐसा कहते हुये ही मानों देवों का दुंदुभी बाजा बजता रहता है। भगवान् के चरणों के मूल में देवों के द्वारा की गई पुष्पवृष्टि होती रहती है। करोड़ों सूर्य के समान देदीप्यमान प्रभामण्डल अपने दर्शनमात्र से ही सम्पूर्ण लोगों को सात भवों को दिखला देता है। कुंदपुष्प के समान श्वेत चौंसठ चंवर देवों के द्वारा ढुराये जाते हैं। ये आठ महाप्रातिहार्य कहलाते हैं।

इन चौंतीस अतिशय और आठ महाप्रातिहार्य से संयुक्त मोक्षमार्ग के नेता और तीनों लोकों के स्वामी ऐसे अर्हंतदेव की मैं वंदना करता हूँ। समवसरण में कितने जीव रहते हैं ?-प्रत्येक समवसरण में पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण अर्थात् असंख्यात जीव जिनेन्द्रदेव की वंदना में प्रवृत्त हुए स्थित रहते हैं। कोठों के क्षेत्र से यद्यपि जीवों का क्षेत्रफल असंख्यात गुणा है, फिर भी वे सब भव्यजीव जिनदेव के माहात्म्य से एक दूसरे से अस्पृष्ट रहते हैं। वहाँ पर बालक से लेकर वृद्ध तक सभी लोग प्रवेश करने में अथवा निकलने में अंतर्मुहूर्त काल (४८ मिनट) के भीतर संख्यात योजन चले जाते हैं। इन कोठों में मिथ्यादृष्टि, अभव्य और असंज्ञी जीव कदापि नहीं होते, तथा अनध्यवसाय, संदेह और विपरीतता से युक्त जीव भी नहीं होते हैं। इससे अतिरिक्त वहाँ पर जिन भगवान के माहात्म्य से आतंक, रोग, मरण, उत्पत्ति, वैर, काम बाधा तथा भूख और प्यास की बाधाएँ भी नहीं होती हैं।

यक्ष-यक्षिणी-गोवदन, महायक्ष, त्रिमुख, यक्षेश्वर, तुम्बुरु, कुसुम, वरनन्दि, विजय, अजित, ब्रह्मेश्वर, कुमार, षण्मुख, पाताल, किन्नर, किंपुरुष, गरुड़, गंधर्व, महेन्द्र, कुबेर, वरुण, विद्युत्प्रभ, सर्वाण्ह, धरणेन्द्र और मातंग चौबीस तीर्थंकरों के ये चौबीस यक्ष हैं। अपने-अपने तीर्थंकर के ये यक्ष अपने-अपने जिनेंद्रदेव के पास में स्थित रहते हैं। इन्हें जिनशासन देव कहते हैं।

चव्रेश्वरी, रोहिणी, प्रज्ञप्ति, वङ्काशृंखला, पुरुषदत्ता, मनोवेगा, काली, ज्वालामालिनी, महाकाली, मानवी, गौरी, गांधारी, वैरोटी, अनन्तमती, मानसी, महामानसी, जया, विजया, अपराजिता, बहुरूपिणी, चामुण्डी, कूष्माण्डी, पद्मावती और सिद्धायिनी चौबीस तीर्थंकरों के क्रम से ये चौबीस यक्षिणी हैं। अपने-अपने तीर्थंकर के समीप में एक-एक यक्षिणी रहा करती हैं। इन्हें जिनशासनदेवी कहते हैं।

दिव्यध्वनि का माहात्म्य-जैसे चन्द्रमा से अमृत झरता है उसी प्रकार खिरती हुई जिन भगवान् की वाणी को अपने कत्र्तव्य के बारे में सुनकर वे बारह गणों के भिन्न-भिन्न जीव नित्य ही अनन्तगुणश्रेणीरूप से विशुद्ध परिणामों को धारण करते हुये अपने असंख्यात-गुणश्रेणीरूप कर्मों को नष्ट कर देते हैं। वहाँ पर रहते हुये वे भव्य जीव जिनेन्द्रदेव के चरणकमलों में परम आस्थावान होते हुये परम भक्ति में आसक्त होकर अतीत, वर्तमान और भावीकाल को भी नहीं जानते हैं अर्थात् बहुत सा काल व्यतीत कर देते हैं। इस प्रकार से तीर्थंकर को जब आर्हंत्य पद नामक परमस्थान प्राप्त होता है तब समवसरण की विभूति आदि महा अतिशय प्रगट होते है।

आर्हंत्य परमस्थान में यह समवसरण आदि विभूति तो बहिरंग वैभव है। इसके साथ चार घातिया कर्मों के नाश होने से चार अनंत गुण प्रगट हो जाते हैं। ज्ञानावरण कर्म के अभाव से अनन्तज्ञान, दर्शनावरण के नाश से अनन्तदर्शन, मोहनीय के नाश से अनन्तसुख और अन्तराय के क्षय से अनन्तवीर्य प्रगट हो जाते हैं। ये चार गुण ही अनन्तचतुष्टय कहे जाते हैं।

भगवान् की सभा में द्वादशांग श्रुत के ज्ञाता, मन:पर्ययज्ञानपर्यंत चार ज्ञान के धारी और चौंसठ ऋद्धियों से समन्वित गणधर देव रहते हैं जो भगवान् की दिव्यध्वनि को श्रवण कर जन-जन में उसका विस्तार करते हैं। गणधर के अभाव में तीर्थंकर की दिव्यदेशना नहीं होती है ऐसा नियम है। भगवान की बारह सभा में मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका, यह चतुर्विध संघ रहता है। असंख्यातों देव-देवियाँ रहते हैं और संख्यातों तिर्यंच रहते हैं। ये सभी भगवान् के दिव्य उपदेश को सुनकर सम्यक्त्व को और अपने योग्य व्रतों को ग्रहण कर अपनी आत्मा को मोक्षमार्गी बना लेते हैं।

विपुलाचल पर्वत पर प्रथम दिव्यध्वनि खिरी-भगवान महावीर का समवसरण बन गया था किन्तु भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरी थी। जब प्रभु का श्रीविहार होता था, तब समवसरण विघटित हो जाता था एवं प्रभु का श्रीविहार आकाश में अधर होता था। देवगण भगवान के श्रीचरण कमलों के नीचे-नीचे स्वर्णमयी सुगंधित दिव्य कमलों की रचना करते रहते थे पुनः जहाँ भगवान रुकते, अर्धनिमिष मात्र में कुबेर आकाश में अधर ही समवसरण बना देता था।

हरिवंश पुराण में आया है कि छ्यासठ दिन तक मौन से विहार करते हुये प्रभु राजगृह में पहुँचे-

षट्षष्टिदिवसान् भूयो, मौनेन विहरन् विभुः।

आजगाम जगत्ख्यातं, जिनो राजगृहं पुरम्।।६१।।
आरुरोह गिरिं तत्र, विपुलं विपुलश्रियं।
प्रबोधार्थं स लोकानां, भानुमानुदयं यथा।।६२।।
इन्द्राग्निवायुभूत्याख्याः, कौडिन्याख्याश्च पण्डिताः।
इन्द्रनोदनयाऽऽयाताः, समवस्थानमर्हतः।।६८।।
प्रत्येकं सहिता सर्वे, शिष्याणां पंचभिः शतैः।
त्यक्ताम्बरादिसंबंधाः, संयमं प्रतिपेदिरे।।६९।।
सुता चेटकराजस्य, कुमारी चंदना तदा।
धौतैकाम्बरसंवीता, जातार्याणां पुरःसरी।।७०।।
श्रेणिकोऽपि च संप्राप्तः, सेनया चतुरंगया।
सिंहासनोपविष्टं तं, प्रणनाम जिनेश्वरम्।।७१।।
प्रत्यक्षीकृतविश्वार्थं, कृतदोषत्रयक्षयम्।
जिनेंद्रं गौतमोऽपृच्छत्, तीर्थार्थं पापनाशनम्।।८९।।
स दिव्यध्वनिना विश्वसंशयच्छेदिना जिनः।
दुन्दुभिध्वनिधीरेण, योजनान्तरयायिना।।९०।।
श्रावणस्यासिते पक्षे, नक्षत्रेऽभिजिति प्रभुः।
प्रतिपद्यन्हि पूर्वाण्हे, शासनार्थमुदाहरत्।।९१।।

तदनन्तर छ्यासठ दिन तक मौन से विहार करते हुय श्रीवर्धमान जिनेन्द्र जगत्प्रसिद्ध राजगृह नगर आये। वहाँ जिस प्रकार सूर्य उदयाचल पर आरूढ़ होता है उसी प्रकार वे लोगों को प्रतिबद्ध करने के लिये विपुल लक्ष्मी के धारक विपुलाचल पर्वत पर आरूढ़ हुये।।६१-६२।।

इन्द्रभूति, अग्निभूति, वायुभूति तथा कौण्डिन्य आदि पण्डित इन्द्र की प्रेरणा से श्रीअर्हंत देव के समवसरण में आये। वे सभी पंडित अपने पाँच-पाँच सौ शिष्यों से सहित थे, इन सभी ने वस्त्रादि का त्याग कर संयम धारण कर लिया। उसी समय राजा चेटक की पुत्री कुमारी ‘चन्दना’ एक स्वच्छ वस्त्र धारण कर आर्यिकाओं में प्रमुख गणिनी हो गयीं। राजा श्रेणिक भी अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ समवसरण में पहुँचे और वहाँ पर सिंहासन पर विराजमान श्रीवद्र्धमान भगवान को नमस्कार किया।।६८-७१।।

तीनों लोकों के समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष जानने वाले एवं राग-द्वेष और मोह को क्षय करने वाले, पापनाशक श्री जिनेन्द्रदेव से श्री गौतम गणधर ने तीर्थ की प्रवृत्ति करने के लिये प्रश्न किया।

अनंतर श्रीमहावीर स्वामी ने श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के प्रातःकाल के समय अभिजित् नक्षत्र में समस्त संशयों को छेदने वाले, दुन्दुभि के शब्द के समान गंभीर तथा एक योजन तक फैलने वाली दिव्यध्वनि के द्वारा शासन की परंपरा चलाने के लिये उपदेश दिया।।८०-८१।।

अन्यत्र ग्रन्थों में आया है कि-

जब इंद्रराज ने देखा कि भगवान को केवलज्ञान होकर ६५ दिन व्यतीत हो गये, फिर भी प्रभु की दिव्यध्वनि नहीं खिर रही है क्या कारण है ? चिंतन कर यह पाया कि गणधर का अभाव होने से ही दिव्यध्वनि नहीं खिरी है। तब सौधर्मेंद्र ने इन्द्रभूति ब्राह्मण को इस योग्य जानकर उस अभिमानी को लेने के लिये युक्ति से वृद्ध का रूप बनाया और वहाँ ‘गौतमशाला’ में पहुँचे। वहाँ के प्रमुख गुरु ‘इंद्रभूति’ से बोले-

‘मेरे गुरु इस समय ध्यान में लीन होने से मौन हैं अतः मैं आपके पास एक श्लोक का अर्थ समझने आया हूँ।’

गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ब्राह्मण ने विद्या से गर्विष्ठ होकर पूछा-

‘यदि मैं इसका अर्थ बता दूँगा तो तुम क्या दोगे?’

तब वृद्ध ने कहा कि ‘यदि आप इसका अर्थ कर देंगे, तो मैं सब लोगों के सामने आपका शिष्य हो जाऊँगा और यदि आप अर्थ न बता सके तो इन सब विद्यार्थियों और अपने दोनों भाइयों के साथ आप मेरे गुरु के शिष्य बन जाना।’

महाअभिमानी इंद्रभूति ने यह शर्त मंजूर कर ली, क्योंकि वह यह समझता था कि मेरे से अधिक विद्वान् इस भूतल पर कोई है ही नहीं। तब वृद्ध ने वह काव्य पढ़ा-

धर्मद्वयं त्रिविधकालसमग्रकर्म, षड्द्रव्यकायसहिताः समयैश्च लेश्याः।

तत्त्वानि संयमगती सहितं पदार्थै-रंगप्रवेदमनिशं वद चास्तिकायम्।।

तब गौतम गोत्र से ‘गौतम’ नाम से प्रसिद्ध इन्द्रभूति ने कुछ देर सोचकर कहा-‘अरे ब्राह्मण! तू अपने गुरु के पास ही चल। वहीं मैं इसका अर्थ बताकर तेरे गुरु के साथ वाद-विवाद करूँगा।’

सौधर्मेंद्र तो यही चाहते थे। तब वेषधारी इंद्रराज गौतम को लेकर भगवान के समवसरण की ओर चल पड़े।

वहाँ मानस्तम्भ को देखते ही गौतम का मान गलित हो गया और उन्हें सम्क्त्व प्रगट हो गया। समवसरण के सारे वैभव को देखते हुए महान् आश्चर्य को प्राप्त उन्होंने भगवान महावीर स्वामी का दर्शन किया और भक्ति में गद्गद होकर स्तुति करने लगे-

जयति भगवान् हेमाम्भोज-प्रचार-विजृंभिता-वमर मुकुटच्छायोद्गीर्ण-प्रभापरिचुम्बितौ।।

कलुषहृदया मानोद्भ्रान्ताः परस्परवैरिणो। विगतकलुषाः पादौ यस्य प्रपद्य विशश्वसुः।।१।।

स्तुति करके विरक्तमना होकर उन इंद्रभूति ने प्रभु के चरण सानिध्य में जैनेश्वरी दीक्षा ले ली। तत्क्षण ही उन्हें मति-श्रुत ज्ञान के साथ ही अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान प्रगट हो गया। वे गणधर पद को प्राप्त हो गये तभी भगवान की दिव्यध्वनि खिरी थी।

‘कषायपाहुड़’ ग्रन्थ में प्रथम दिव्यध्वनि के बारे में प्रश्नोत्तर रूप में बहुत ही सुंदर वर्णन किया है-

जिन्होंने धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करके समस्त प्राणियों को संशयरहित किया है, जो वीर हैं, जिन्होंने विशेषरूप से समस्त पदार्थसमूह को प्रत्यक्ष कर लिया है, जो जिनों में श्रेष्ठ हैं तथा राग, द्वेष और भय से रहित हैं ऐसे भगवान महावीर धर्मतीर्थ के कर्ता हैं।

प्रश्न-भगवान महावीर ने धर्मतीर्थ का उपदेश कहाँ पर दिया ?

उत्तर-‘सेणियराए सचेलणे महामंडलीए सयलवसुहामंडलं भुंजति मगहामंडल-तिलओवम..‘ रायगिहणयर - णेरयि -दिसमहिट्ठिय - विउलगिरिपव्वए सिद्धचारणसेविए बारहगण-परिवेड्ढिएण कहियं।

जब महामण्डलीक श्रेणिक राजा अपनी चेलना रानी के साथ सकल पृथिवीमंडल का उपभोग करता था तब मगधदेश के तिलक के समान राजगृह नगर को नैऋत्य दिशा में स्थित तथा सिद्ध और चारणों द्वारा सेवित विपुलाचल पर्वत के ऊपर बारह गणों की सभाओं से परिवेष्टित भगवान महावीर ने धर्मतीर्थ का प्रवर्तन किया।

राजगृह नगर के पास स्थित पंचशैलपुर है जिसे पंचपहाड़ी कहते हैं। पूर्व दिशा में चौकोर आकार वाला ऋषिगिरि नाम का पर्वत है। दक्षिण दिशा में वैभार पर्वत, नैऋत्य दिशा में विपुलाचल नाम का पर्वत है, ये दोनों त्रिकोण आकार वाले हैं। पश्चिम, वायव्य और उत्तर दिशा में धनुष के आकार वाला ‘छिन्न’ नाम का पर्वत है। ऐशान दिशा में गोलाकार पांडु नाम का पर्वत है। ये सब पर्वत कुश के अग्रभागों से ढके हुये हैं।

प्रश्न-किस काल में धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है ?

उत्तर-भरतक्षेत्रसंबंधी अवसर्पिणी काल के दुःषमसुषमा नामक चौथे काल में नौ दिन, छह महिना अधिक तेतीस वर्ष अवशिष्ट होने पर धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है। कहा भी है-

इम्मिस्सेवसप्पिणीए चउत्थकालस्स पच्छिमे भाए।

चोत्तीसवासावसेसे किंचि विसेसूणकालम्मि।।

इस अवसर्पिणी काल के दुःषमसुषमा नामक चौथे काल के पिछले भाग में कुछ कम चौंतीस वर्ष बाकी रहने पर धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई है।

आगे इसी को स्पष्ट करते हैं कि चौथे काल में पंद्रह दिन और आठ महीना अधिक पचहत्तर वर्ष बाकी रहने पर आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन बहत्तर वर्ष की आयु लेकर मति-श्रुत-अवधिज्ञान के धारक भगवान महावीर पुष्पोत्तर विमान से च्युत होकर गर्भ में अवतीर्ण हुये। उन बहत्तर वर्षों में तीस वर्ष कुमार काल है, बारह वर्ष छद्मस्थ काल है तथा तीस वर्ष केवलीकाल है। इन तीनों कालों का जोड़ बहत्तर वर्ष होता है। इस ७२ वर्ष प्रमाण काल को पंद्रह दिन और आठ महीना अधिक ७५ वर्ष में घटा देने पर वद्र्धमान जिनेंद्र के मोक्ष जाने पर जितना चतुर्थ काल शेष रहता है, उसका प्रमाण होता है।

इस काल में छ्यासठ दिन कम केवलिकाल अर्थात् २९ वर्ष, नौ महीना और चौबीस दिन के मिला देने पर चतुर्थकाल में नौ दिन और छह महीना अधिक तैतीस वर्ष बाकी रहते हैं।

शंका-केवलिकाल में से छ्यासठ दिन किसलिये कम किये हैं ?

समाधान-भगवान महावीर को केवलज्ञान की उत्पत्ति हो जाने पर भी छ्यासठ दिन तक धर्मतीर्थ की उत्पत्ति नहीं हुई थी, इसलिये केवलिकाल में से छ्यासठ दिन कम किये गये हैं। जयधवला में कहा है-

‘‘दिव्वज्झुणीए किमट्ठं तत्थापउत्ती?

गणिंदाभावादो।
सोहम्मिंदेण तक्खणे चेव गणिंदो किण्ण ढोइदो?
ण, काललद्धीए विणा असहेज्जस्स देविंदस्स तड्ढोयणसत्तीए अभावादो।’’

शंका-केवलज्ञान की उत्पत्ति के अनंतर छ्यासठ दिन तक दिव्यध्वनि की प्रवृत्ति क्यों नहीं हुई ?

समाधान-गणधर न होने से उतने दिन तक दिव्यध्वनि की प्रवृत्ति नहीं हुई।

शंका-सौधर्मेन्द्र ने केवलज्ञान प्राप्त होते ही गणधर देव को क्यों नहीं उपस्थित किया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि काललब्धि के बिना सौधर्म इन्द्र गणधर को उपस्थित करने में असमर्थ था, उसमें उसी समय गणधर को उपस्थित करने की शक्ति नहीं थी।

शंका-जिसने अपने तीर्थंकर पादमूल में महाव्रत स्वीकार किया है ऐसे पुरुष को छोड़कर अन्य के निमित्त से दिव्यध्वनि क्यों नहीं खिरती है ?

समाधान-ऐसा ही स्वभाव है और स्वभाव दूसरों के द्वारा प्रश्न करने योग्य नहीं होता है, क्योंकि यदि स्वभाव में ही प्रश्न होने लगे तो कोई व्यवस्था ही न बन सकेगी।

अतएव कुछ कम चौंतीस वर्ष प्रमाण चौथे काल के रहने पर तीर्थ की उत्पत्ति हुई, यह सिद्ध हुआ।

कोई अन्य आचार्य ‘‘भगवान वद्र्धमान की आयु ७१ वर्ष, ३ माह २५ दिन प्रमाण है’’ ऐसा कहते हैं।

आषाढ़ शुक्ला षष्ठी से चैत्र शुक्ला त्रयोदशी तक ९ माह ८ दिन हुये। चैत्र शुक्ला चतुर्दशी से अट्ठाईस वर्ष व्यतीत कर पुनः मगसिर कृष्णा दशमी तक लेने से अट्ठाईस वर्ष सात माह बारह दिन (२८ वर्ष ७ माह १२ दिन) होते हैं। मगसिर कृ.११ से आगे बारह वर्ष के बाद वैशाख शुक्ला दशमी को केवलज्ञान हुआ अतः १२ वर्ष, ५ माह १५ दिन बाद केवली हुये हैं। वैशाख शुक्ला ११ से आगे वैशाख शुक्ला १० तक उनतीस वर्ष पुनः वैशाख शुक्ला ११ से कार्तिक कृष्णा अमावस्या तक ५ माह, २० दिन ऐसे २९ वर्ष, ५ माह, २० दिन का केवली काल है। इस प्रकार वद्र्धमान जिनेन्द्र की आयु ७१ वर्ष, ३ माह, २५ दिन प्रमाण मानी गयी है।

भगवान महावीर की आयु बहत्तर वर्ष की थी। दूसरे मत से इकहत्तर वर्ष, तीन माह, पच्चीस दिन की थी। ये दोनों मत जयधवला ग्रंथ में आये हैं।१ श्रावण कृष्णा एकम के दिन भगवान की प्रथम दिव्यध्वनि खिरी थी, जब इंद्रभूति ब्राह्मण ने वद्र्धमान भगवान से जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण की थी। उत्तरपुराण में कहा है-

‘श्रीवद्र्धमानमानम्य संयमं प्रतिपन्नवान्।’

श्रीवद्र्धमान स्वामी को नमस्कार करके सकलसंयम ग्रहण कर लिया था।
दिव्यध्वनि का वर्णन तिलोयपण्णत्ति ग्रन्थ में आया है।
जोयणपमाणसंठिद - तिरियामरमणुव णिवहपडिबोहो।
मिदुमधुरगभीरतरा - विसदविसयसयलभासाहिं।
अट्ठरसमहाभासा खुल्लयभासा वि सत्तसयसंखा।
अक्खरअणक्खरप्पय, सण्णीजीवाण सयलभासाओ।।
एदासिं भासाणं, तालुवदंतोट्ठकंठवावारं।
परिहरिय एक्ककालं, भव्वजणाणंदकर-भासो।।

एक योजन प्रमाण तक स्थित तिर्यंच देव और मनुष्यों के समूह को बोध प्रदान करने वाली भगवान की दिव्यध्वनि होती है। यह दिव्यध्वनि मृदु-मधुर, अतिगंभीर और विशद-स्पष्ट विषयों को कहने वाली संपूर्ण भाषामय होती है। यह संज्ञी जीवों की अक्षर और अनक्षररूप अठारह भाषा और सात सौ लघु भाषाओं में परिणत होती हुई, तालु-ओंठ-दाँत तथा कंठ के हलन-चलनरूप व्यापार से रहित होकर एक ही समय में भव्यजीवों को आनंदित करने वाली होती है, ऐसी दिव्यध्वनि के स्वामी तीर्थंकर भगवान होते हैं। षट्खंडागम ग्रन्थ में श्रीवीरसेनस्वामी कहते हैं-

‘‘तेण महावीरेण केवलणाणिणा कहिदत्थो तम्हि चेव काले तत्थेव खेत्ते खयोवसम -जणिदचउ- रमलबुद्धिसंपण्णेण बह्मणेण गोदमगोत्तेण सयलदुस्सुदि-पारएण जीवाजीवविसयसंदेह -विणासणट्ठ -मुवगयवड्ढमाणपादमूलेण इंदिभूदिणावहारिदो।’’

इस प्रकार केवलज्ञानी भगवान महावीर के द्वारा कहे गये पदार्थ को उसी काल में और उसी क्षेत्र में क्षयोपशम विशेष से उत्पन्न चार प्रकार के-मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्ययरूप निर्मल ज्ञान से युक्त संपूर्ण दुःश्रुति-अन्यमतावलंबी वेद-वेदांग में पारंगत, गौतमगोत्रीय ऐसे इन्द्रभूति ब्राह्मण ने जीव-अजीवविषयक संदेह को दूर करने के लिये श्रीवद्र्धमान भगवान के चरणकमल का आश्रय लेकर ग्रहण किया अर्थात् प्रभु की दिव्यध्वनि को सुना। इसीलिये भगवान महावीर ‘अर्थकर्ता’ कहलाए हैं।

‘पुणो तेणिदंभूदिणा भावसुदपज्जय-परिणदेण बारहंगाणं चोद्दसपुव्वाणं च गंथणमेक्केण चेवमुहूत्तेण रयणा कदा।’’

पुनः उन इन्द्रभूति गौतमस्वामी ने भावश्रुत पर्याय से परिणत होकर बारह अंग और चौदह पूर्वरूप ग्रन्थों की रचना एक ही मुहूर्त में कर दी। सारांश यह है कि आज से पच्चीस सौ अट्ठावन वर्ष पूर्व श्रावण कृष्णा प्रतिपदा को राजगृही के विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर की दिव्यध्वनि खिरी थी, यही प्रथम देशना दिवस-‘वीरशासन जयंती’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसी दिन श्री गौतमस्वामी ने गणधर पद प्राप्त करके द्वादशांगरूप श्रुत की रचना की थी जोकि मौखिक मानी गई, उसे लिपिबद्ध नहीं किया जा सकता है। इन द्वादशांग श्रुत में क्या विषय है ? उसका नाममात्र वर्णन आगे किया जा रहा है।

[सम्पादन]
भगवान महावीर के पूर्व भव

पुरुरवा भील-इस जम्बूद्वीप के पूर्व विदेहक्षेत्र में सीता नदी के उत्तर किनारे पर ‘पुष्कलावती' नाम का देश है। उसकी ‘पुण्डरीकिणी' नगरी में एक ‘मधु' नाम का वन है। उसमें ‘पुरुरवा' नाम का एक भीलों का राजा अपनी ‘कालिका' नाम की स्त्री के साथ रहता था१। किसी दिन दिग्भ्रम के कारण ‘श्री सागरसेन' नामक मुनिराज को इधर-उधर भ्रमण करते हुये देखकर यह भील उन्हेें मारने को उद्यत हुआ उसकी स्त्री ने यह कहकर मना कर दिया कि ‘ये वन के देवता घूम रहे हैं इन्हें मत मारो।' वह पुरुरवा उसी समय मुनि को नमस्कार कर तथा उनके वचन सुनकर शांत हो गया। मुनिराज ने उसे मद्य, मांस और मधु इन तीन मकारोें का त्याग करा दिया। मांसाहारी भील भी इन तीनों के त्यागरूप व्रत को जीवनपर्यन्त पालन कर आयु के अंत में मरकर सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की आयु को धारण करने वाला देव हो गया। कहाँ तो वह हिंसक व्रूर भील पाप करके नरक चला जाता और कहाँ उसे गुरू का समागम मिला कि जिनसे हिंसा का त्याग करके स्वर्ग चला गया!

मरीचि कुमार-जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र सम्बन्धी आर्यखंड के मध्य भाग में कौशल नाम का देश है। इस देश के मध्य भाग में अयोध्या नगरी है। वहाँ ऋषभदेव भगवान के ज्येष्ठ पुत्र भरत चक्रवर्ती की अनंतमती रानी से ‘यह पुरुरवा भील का जीव देव' मरीचि कुमार नाम का पुत्र हुआ। अपने बाबा भगवान ऋषभदेव की दीक्षा के समय स्वयं ही गुरू भक्ति से प्रेरित होकर मरीचि ने कच्छ आदि चार हजार राजाओं के साथ दिगम्बर दीक्षा धारण कर ली। भगवान् तो छह महीने का उपवास लेकर ध्यान में लीन हो गये। मरीचि आदि चार हजार राजा स्वयं ही फल, आवरण आदि को ग्रहण करने लगे, तब वनदेवता ने प्रगट होकर कहा-‘निग्र्रंथ दिगम्बर-जिनमुद्रा को धारण करने वालों का यह क्रम नहीं है अर्थात् यह अर्हंतमुद्रा तीनों लोकों में पूज्य है इसको धारण कर यह स्वच्छंद प्रवृत्ति करना कथमपि उचित नहीं है अत: तुम लोग अपनी-अपनी इच्छानुसार अन्य वेष ग्रहण कर लो।

ऐसा सुनकर प्रबल मिथ्यात्व से प्रेरित हुए मरीचि ने भी सबसे पहले परिव्राजक की दीक्षा धारण कर ली। वास्तव में जिनका संसार दीर्घ होता है उनके लिये यह मिथ्यात्व कर्म मिथ्यामार्ग ही दिखलाता है। उस समय उसे उन सब विषयों का ज्ञान भी स्वयं ही प्रगट हो गया सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनों के समान दुर्जनों को भी अपने विषय का ज्ञान स्वयं ही हो जाता है। उसने तीर्थंकर भगवान के वचन सुनकर भी समीचीन धर्म ग्रहण नहीं किया था। वह मरीचि साधु सोचता रहता था कि जिस प्रकार भगवान ऋषभदेव ने अपने आप समस्त परिग्रहों कर त्याग कर तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न करने वाली सामथ्र्य प्राप्त की है उसी प्रकार मैं भी संसार में अपने द्वारा चलाये हुये दूसरे मत की व्यवस्था करूँगा और उसके मिमित्त से होने वाले बड़े भारी प्रभाव के कारण इन्द्र की प्रतीक्षा को प्राप्त करूँगा-इन्द्र द्वारा की हुई पूजा को प्राप्त करूँगा। मैं समझता हूँ कि मेरे यह सब अवश्य होगा। इस प्रकार मान कर्म के उदय से वह पापबुद्धि सहित हुआ खोटे मत से विरक्त नहीं हुआ और अनेक दोषों से दूषित वही वेष धारण कर रहने लगा।

तभी कच्छ आदि चार हजार राजा जो दीक्षित हुए, उन सभी मुनिवेषधारियों ने भी अनेक वेष बना लिये।

मरीचि का भवभ्रमण-मरीचिकुमार आयु के अंत में मरकर ब्रह्मस्वर्ग में दस सागर आयु वाला देव हो गया। वहाँ से आकर जटिल ब्राह्मण हुआ, पुन: पारिव्राजक बना पुन: मरकर सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ पुन: वहाँ से आकर अग्निसह ब्राह्मण होकर पारिव्राजक दीक्षा ले ली पुन: मरकर देव हुआ, वहाँ से च्युत होकर अग्निमित्र ब्राह्मण होकर पारिव्राजक तापसी हुआ पुुनरपि माहेन्द्र स्वर्ग में देव हुआ, वहाँ से आकर भारद्वाज ब्राह्मण होकर त्रिदण्डी साधु बन गया और पुनरपि स्वर्ग में गया, वहाँ से च्युत होकर मिथ्यात्व के निमित्त से यह मरीचि कुमार त्रस-स्थावार योनियों में असंख्यात वर्ष तक परिभ्रमण करता रहा।

वह मरीचि कुमार का जीव इस तरह असंख्यात वर्षों तक इन कुयोनियों में भ्रमण करते हुये श्रांत हो गया। कुछ पुण्य से राजगृह नगर के शांडिल्य ब्राह्मण की पारशरी पत्नी से ‘स्थावर' नाम का पुत्र हुआ। वहाँ भी सम्यग्दर्शन से शून्य पारिव्राजक की दीक्षा लेकर अंत में मरकर माहेन्द्र स्वर्ग में सात सागर की आयु वाला देव हो गया।

विश्वनंदी-इसी मगधदेश के राजगृह नगर में ‘विश्वभूति' राजा की ‘जैनी' नामकी रानी से यह मरीचि कुमार का जीव स्वर्ग में आकर ‘विश्वनंदी' नाम का राजपुत्र हो गया। विश्वभूति राजा का एक विशाखभूति नाम का छोटा भाई था, उसकी लक्ष्मणापत्नी से ‘विशाखनन्दि' नाम का मूर्ख पुत्र हो गया। किसी दिन विश्वभूति राजा ने विरक्त होकर छोटे भाई विशाखभूति को राज्य देकर अपने पुत्र ‘विश्वनन्दि' को युवराज बना दिया और स्वयं तीन सौ राजाओं के साथ श्रीधर मुनि के पास दीक्षित हो गये।

किसी दिन विश्वनंदी युवराज अपने ‘मनोहर' नामक उद्यान में अपनी स्त्रियों के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। उसे देख, चाचा के पुत्र विशाखनंदी ने अपने पिता के पास जाकर उस उद्यान की याचना की। विशाखभूति ने भी युवराज विश्वनंदी को ‘विरुद्ध राजाओं को जीतने के बहाने' बाहर भेजकर पुत्र को बगीचा दे दिया। विश्वनंदी को इस घटना का तत्काल पता लग जाने से वह व्रुद्ध होकर वापस विशाखनंदी को मारने को उद्यत हुआ। तब विशाखनंदी वैथे के वृक्ष पर चढ़ गया, इसने वैथे के वृक्ष को उखाड़ दिया। तब वह भागा और पत्थर के खम्भे के पीछे हो गया, यह विश्वनंदी पत्थर के खंभे को उखाड़कर उससे उसे मारने को दौड़ा। विशाखनंदी वहाँ से डर कर भागा, तब युवराज के हृदय में सौहार्द और करुणा जाग्रत हो गयी। उसने उसी समय उसे अभयदान देकर बगीचा भी दे दिया और स्वयं ‘संभूत' नामक मुनि के पास दीक्षा धारण कर ली, तब विशाखभूति ने भी पापों का पश्चाताप कर दीक्षा ले ली।

किसी दिन मुनि विश्वनंदी अत्यन्त कृश शरीरी मथुरा मेें आहार के लिए आये, उस समय यह विशाखनंदि वेश्या के महल की छत से मुनि को देख रहा था। मुनि को गाय ने धक्के से गिरा दिया यह देख विशाखनंदि बोला ‘तुम्हारा पत्थर का खम्भा तोड़ने वाला पराक्रम कहाँ गया'‘ मुनि ने यह दुर्वचन सुने, उन्हें क्रोध आ गया अन्त में निदान सहित संन्यास से मरकर महाशुक्र स्वर्ग में देव हो गये, वहीं पर चाचा विशाखभूति भी देव हो गये। दोनों की आयु सोलह सागर प्रमाण थी।

अर्धचक्री त्रिपृष्ठकुमार-सुरम्य देश के पोदनपुर नगर में प्रजापति महाराज की जयावती रानी से ‘विशाखभूति का जीव' विजय नाम का पुत्र हुआ और महाराज की दूसरी रानी मृगावती से ‘विश्वनंदी का जीव' त्रिपृष्ठ नाम का पुत्र हुआ। विजय बलभद्रपद के धारक हुये और ये त्रिपृष्ठ अर्धचक्री पद के धारक हुये। उधर विशाखनंदि का जीव चिरकाल तक संसार में भ्रमण करता हुआ कुछ पुण्य से विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी के अलकापुर नगर में मयूरग्रीव विद्याधर की नीलांजना रानी से ‘अश्वग्रीव' पुत्र हुआ। यह प्रतिनारायण हुआ था। कालांतर में युद्ध में अश्वग्रीव के चक्ररत्न से ही अश्वग्रीव को मारकर त्रिखण्डाधिपति राजा त्रिपृष्ठ ने अपने भाई विजय के साथ बहुत काल तक राज्यलक्ष्मी का उपभोग किया, अन्त में भोगलिप्सा में मरकर सप्तम नरक में चला गया क्योंकि सम्यग्दर्शन और पाँच अणुव्रतों से रहित राज्य वैभव नरक का ही कारण है।

नरक में इस मरीचि कुमार के जीव ने क्या-क्या कष्ट सहे हैं उनको असंख्य जिह्वाओं से भी नहीं कहा जा सकता! करोंत से चीरना, कुंभी-पाक में पकाना, अग्नि में जलाना, तिल-तिल खंड करना आदि के अनेकों दुख भोगे फिर भी आयु पूर्ण हुये बिना मर नहीं सका। वहाँ पर तेंतीस सागरों की आयु भोगकर सिंह हुआ और गर्मी-सर्दी, भूख, प्यास आदि बाधाओं से दु:खी हुआ, वहाँ पर प्राणी हिंसा से मांसाहार करते हुये पुन: मरकर पहले नरक चला गया। वहाँ के दु:खों को भोगकर वहाँ से निकल कर पुनरपि इसी जम्बूद्वीप में सिंधुकूट की पूर्व दिशा में हिमवान् पर्वत के शिखर पर सुन्दर बालों से युक्त सिंह हुआ।

पुण्यशाली मृगेन्द्र-वह सिंह किसी समय एक हिरण को पकड़कर खा रहा था। उसी समय अतिशय दयालु ‘अजितञ्जय' और ‘अमितगुण' नामक दो चारणऋद्धिधारी मुनि आकाशमार्ग से उतरकर उस सिंह के पास पहुँचे और शिलातल पर बैठकर जोर-जोर से उपदेश देने लगे। उन्होंने कहा कि ‘हे भव्य मृगराज! तू अर्धचक्री त्रिपृष्ठ के भव में पाँचों इन्द्रियों के विषयों का सेवन कर तृप्त नहीं हुआ तथा सम्यग्दर्शन से रहित होने के कारण तू नरक में चला गया, वहाँ अत्यन्त प्रचंड और लोहे के घनों की चोट से तेरा चूर्ण किया जाता था, इत्यादि दु:खों को भोगकर तू वहाँ से निकलकर सिंह हुआ पुन: हिंसा के पाप से मरकर नरक गया, वहाँ से निकलकर पुन: सिंह होकर हिंसा में रत है। तू ऋषभदेव के समय मरीचि के भव में तीर्थंकर वृृषभदेव के वचनों का अनादर कर त्रस-स्थावर योनियों में असंख्यात वर्ष तक भ्रमण करता रहा। अब इस भव से दसवें भव में तू अन्तिम तीर्थंकर होगा। यह सब मैंने श्रीधर तीर्थंकर से सुना है। इन सब बातों को सुनते ही सिंह को जातिस्मरण हो गया। संसार के भयंकर दु:खों की स्मृति से उसका शरीर कांपने लगा तथा आंखोें से अश्रु गिरने लगे। बहुत देर तक अश्रु गिरते रहने से ऐसा मालूम होता था कि मानों हृदय मेें सम्यक्त्व को स्थान देने की इच्छा से मिथ्यात्व ही बाहर निकल रहा है।

उसकी शांत भावना को देखकर मुनि ने उसे सम्यक्त्व और अणुव्रत ग्रहण कराये। सिंह ने मुनिराज की भक्ति से बार-बार प्रदक्षिणाएँ दीं, बार-बार प्रणाम किया और तत्काल ही काललब्धि के आ जाने से तत्त्वश्रद्धानपूर्वक श्रावक के व्रत ग्रहण किये। सिंह का मांसाहार के सिवाय और कोई आहार नहीं, अत: मांस का त्याग करने से उसने ‘निराहार व्रत ग्रहण किया था।

सम्यग्दर्शन-सच्चे देव, शास्त्र, गुरु और तत्त्वों का श्रद्धान करना।

अहिंसाणुव्रत-मनवचनकाय से किसी भी जीव को नहीं मारना।

सत्याणुव्रत-स्थूल झूठ नहीं बोलना।

अचौर्याणुव्रत-बिना दी हुई पर की वस्तु नहीं लेना।

ब्रह्मचर्याणुव्रत-अपनी स्त्री के सिवाय सबको माता, बहन समझना।

परिग्रह परिमाणाणुव्रत-धन-धान्य आदि परिग्रह का जीवन भर के लिए प्रमाण कर लेना।

तिर्यंचों के संयमासंयम के आगे व्रत नहींं हो सकते इसलिए वह देशव्रती कहलाया। वह सिंह सब कुछ त्याग कर शिलातल पर बेैठकर चित्रलिखित (पत्थर की मूर्ति) के समान हो गया था। चारण मुनि उसे शिक्षा देकर बार-बार उसका स्पर्श करते हुये चले गये।

महावीर चरित में लिखा है कि-

‘यह मरा हुआ है ऐसा समझ मदोन्मत्त हाथियों ने उसकी जटाओं को नष्ट कर दिया, डांस, मक्खी और मच्छरों ने मर्म स्थानों को काट डाला, लोमड़ी और श्रृगाल मृतक समझकर उस सिंह को तीक्ष्ण नखों के द्वारा नोंच-नोंच कर खाने लगे तो भी उस सिंह ने अपनी परम समाधि नहीं छोड़ी, क्षमा भाव से सब सहन करता रहा। पूर्वोक्त प्रकार से एक महीने तक निश्चल रहकर अनशन धारण कर पाप रहित हुआ प्राणों से शरीर को छोड़ा।' इस प्रकार सन्यास विधि से मरा और शीघ्र ही सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नाम का देव हो गया, वहाँ दो सागर तक उत्तम सुख भोगे।

पुन: मरीचि कुमार के जीव की जैनेश्वरी दीक्षा-स्वर्ग से आकर, धातकीखंड द्वीप के पूर्व मेरुसम्बंधी पूर्व विदेह के मंगलावती देश के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में कनकप्रभ नगर के राजा कनकपुंख विद्याधर और कनकमाला रानी के ‘कनकोज्ज्वल' नाम का पुत्र हुआ। किसी दिन प्रियमित्र नाम के अवधिज्ञानी मुनि से दयामय जैनधर्म का उपदेश सुनकर दीक्षा ले ली। बहुत काल तक तपश्चरण करते हुये ‘कनकोज्ज्वल' मुनिराज सन्यास विधि से मरकर सातवें स्वर्ग में देव हो गये। वहाँ के भोगों को भोगकर समाधिपूर्वक प्राण छोड़े और इसी अयोध्या के राजा वङ्कासेन की रानी शीलवती के ‘हरिषेण' पुत्र हो गया। राज्य वैभव का अनुभव करके हरिषेण ने श्रुतसागर मुनि से दीक्षा ले ली। तपश्चरण के प्रभाव से महाशुक्र स्वर्ग मेें देव हो गये। वहाँ से चयकर धातकीखंड की पुंडरीकिणी नगरी के राजा सुमित्र की रानी मनोरमा से ‘प्रियमित्र' नाम का पुत्र हो गया। यह प्रियमित्र चक्रवर्तीपद को प्राप्त हुआ, चक्ररत्न से छहखंड को जीतकर बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजाओं से सेवित अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी लाख हाथी, छ्यानवे हजार रानियों के वैभव का अनुभव करते हुये क्षेमंकर जिनेन्द्र से धर्मोपदेश सुनकर दीक्षित हो गया। यह प्रियमित्र मुनि आयु के अंत में समाधिकपूर्वक मरण करके सहस्रार स्वर्ग में ‘सूर्यप्रभ' नाम के देव हुये। वहाँ पर अठारह सागर तक दिव्य सुखों का अनुभव कर जम्बूद्वीप के छत्रपुर नगर के राजा नंदिवर्धन की वीरवती रानी से ‘नंंद' नाम का एक सज्जन पुत्र हुआ। यहाँ भी अभिलषित राज्य का उपभोग कर ‘प्रोष्ठिल' नाम के श्रेष्ठ गुरु के पास दीक्षा ले ली और ग्यारह अंगोेंं का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

सिंहकेतु देव-वह सिंह सल्लेखना विधि से मरकर सौधर्म स्वर्ग में सिंहकेतु नाम का देव हो गया। वहाँ उसकी आयु दो सागर प्रमाण थी। स्वर्ग में देव उपपादशय्या से सोलह वर्ष के नवयुवक के समान शरीर से परिपूर्ण होकर उठकर बैठ जाते हैं। तभी वहाँ वाद्यों की ध्वनि आदि से अन्य परिवार देवगण-देवांगना आदि आकर जय-जयकार करते हुये नव आगत देव का स्वागत करते हैं।

वहां देव जन्म लेकर तत्क्षण सोचते हैं कि मैं यहाँ कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? इत्यादि सोचते ही उन्हें भवप्रत्यय नाम के अवधिज्ञान से सभी जानकारी मिल जाती है। इन सिंहकेतु देव ने भी जान लिया कि मैं सिंह की पर्याय में दिगंबर महामुनि के संबोधन से सम्यक्त्व और अणुव्रतों को प्राप्त कर समाधिपूर्वक मरण करके यहाँ प्रथम स्वर्ग में देवपद को प्राप्त हुआ हूँ। अनंतर अपने परिवार देवों का अवलोकन करके वस्त्राभरणों से अलंकृत हो अपने जिनमंदिर में गया, विधिवत् अभिषेक पूजन किया। कभी-कभी देव-देवांगनाओं के साथ सभा में नानाप्रकार की चर्चा किया करता था।

कभी-कभी वह देव अपने देव परिवार एवं देवांगनाओं के साथ मध्यलोक में आकर अनेक तीर्थों की वंदना किया करता था। कभी वह सिंहकेतु देव पंचमेरुओं की वंदना करके नंदीश्वर द्वीप में पहुँचकर बावन जिनमंदिरों की वंदना करने पहुँच जाता था।

नंदीश्वर द्वीप-मध्यलोक में सर्वप्रथम द्वीप का नाम जंबूद्वीप है एवं आठवें द्वीप का नाम नंदीश्वर द्वीप है। वहाँ चारों दिशाओं में एक-एक अंजनगिरि पर्वत हैं। इस अंजनगिरि के चारों तरफ एक-एक विशाल बावड़ियाँ हैं ये बावड़ियाँ चौकोन हैं। इन प्रत्येक बावड़ियों के मध्य एक-एक ‘दधिमुख' पर्वत हैं। इस प्रकार चार अंजनगिरि संबंधी चार-चार दधिमुख पर्वत होने से सोलह दधिमुख माने हैं।

इन बावड़ियों के बाहिरी कोनों पर दो-दो रतिकर पर्वत हैं ऐसे ये रतिकर बत्तीस हो गये हैं।

इस प्रकार चार अंजनगिरि, सोलह दधिमुख एवं बत्तीस रतिकर ऐसे ४±१६±३२·५२ बावन पर्वतों पर एक-एक जिनमंदिर बने हुये हैं। ये अकृत्रिम जिनमंदिर हैं।

वह सिंहकेतु देव इन मंदिरों की वंदना किया करता था। इस प्रकार दो सागर की आयु पूर्ण कर वह देव वहाँ से च्युत होकर मध्यलोक में आ गया। विद्याधर राजा कनकोज्ज्वल-तदनंतर वहाँ से च्युत होकर धातकीखंड द्वीप के पूर्वमेरु से पूर्व की ओर जो विदेहक्षेत्र है, उसके मंगलावती देश के विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में अत्यंत श्रेष्ठ ‘कनकप्रभ' नगर है। वहाँ के राजा कनकपुंख विद्याधर और उनकी महारानी कनकमाला के कनकोज्ज्वल नाम का पुत्र हुआ। कालांतर में राजा कनकपुंख ने पुत्र को राज्यभार सौंप दिया। एक दिन राजा कनकोज्ज्वल अपनी रानी कनकवती के साथ वंदना करने के लिये मंदरगिरि-सुमेरु पर्वत पर पहुँच गये। वहाँ भगवंतों की प्रतिमाओं के दर्शन करके महामुनि ‘श्रीप्रियमित्र' गुरु के दर्शन किये, वे मुनिराज अवधिज्ञानी थे। उन विद्याधर राजा कनकोज्ज्वल ने भक्तिपूर्वक महामुनि की तीन प्रदक्षिणा देकर उन्हें नमस्कार किया और प्रश्न किया- हे भगवन्! धर्म का स्वरूप कहिए।

महामुनि ने कहा-

धर्मो दयामयो धर्मं, श्रय धर्मेण नीयसे।

मुक्तिं धर्मेण कर्माणि, छिंधि धर्माय सन्मतिम्।।
देहि नापेहि धर्मात्त्वं, याहि धर्मस्य भृत्यताम्।
धर्मे तिष्ठ चिरं धर्मं, पाहि मामिति चिंतय।।

हे वत्स! धर्म दयामय है, तुम धर्म का आश्रय करो, धर्म के द्वारा ही तुम मोक्ष के निकट पहुँच सकते हो, धर्म के द्वारा तुम कर्मबंधन का छेदन करो, धर्म के लिये सद्बुद्धि दो-लगावो, धर्म से पीछे मत हटो, धर्म की दासता स्वीकार करो, धर्म में स्थिर रहो और हे धर्म! तुम मेरी रक्षा करो। इस प्रकार धर्म का निश्चय करके सातों विभक्तियों के द्वारा धर्म का चिंतन करते रहो। ऐसा करने से तुम कुछ ही समय में-भवों में मोक्ष को प्राप्त कर लोगे।

राजा कनकोज्ज्वल मुनिराज से धर्मरूपी रसायन का पान कर ऐसे संतुष्ट हुए जैसे कि प्यासा मनुष्य जल पाकर संतुष्ट होता है। राजा ने उसी क्षण भोगों से विरक्त हो वैराग्य भावना का चिंतन किया और समस्त परिग्रह का त्यागकर गुरुदेव से दीक्षा ग्रहण कर ली।

बहुत दिनों तक अट्ठाईस मूलगुणों का पालन करते हुए विहार किया। कभी वे वनों में आत्मा का ध्यान करते थे, कभी आतापन योग से स्थित हो संसार, शरीर और भोगों की असारता का चिंतन करते हुये चिच्चैतन्य स्वरूप आत्मा का चिंतन करते थे, कभी जिनमंदिरों में जाकर भगवंतों की वंदना करके नाना प्रकार की स्तुति करते हुये महान पुण्य का संचय किया करते थे।

इस प्रकार संयम की साधना करते हुए आयु के अंत में संन्यास विधि से मरण करके संयम के प्रभाव से सातवें स्वर्ग में देव हो गये।

सातवें स्वर्ग में देव-वहाँ देव उपपादशय्या से उठकर अवधिज्ञान को प्राप्त करके चिंतन करने लगे-

मैंने जैनेश्वरी दीक्षा लेकर जो संयम धारण किया था उसी के फलस्वरूप यह देवों का वैभव प्राप्त किया है अत: धर्म के फल का चिंतन करते हुये सर्वप्रथम भगवान के मंदिर में जाकर भक्तिपूर्वक भगवान की पूजा की। अनंतर अपने देवपरिवार के बीच में बैठकर सभासदों में चर्चा करते थे। कभी-कभी अप्सराओं के नृत्य को देखते हुये देवों के सुखों का अनुभव करते थे।

कभी-कभी मध्यलोक में आकर भगवान के समवसरण में पहुँचकर भगवान की स्तुति-वंदना करके कल्पवासी देवों की सभा में बैठ गये। भगवान की दिव्यध्वनि सुनकर संतुष्ट हुये पुन: अपने पूर्वभवों को तथा अग्रिम भवों को पूछने लगे। भगवान की दिव्यध्वनि से अपने आगे के भवों को सुनकर अतीव प्रसन्न हुए कि मैं अब सातभवों के बाद नियम से संसार के दु:खों से छुटकारा प्राप्त कर लूँगा।

कभी-कभी ये देव समवसरण के वैभव को देखकर चिंतन किया करते थे कि सचमुच में एक दिन भरतक्षेत्र के अंतिम तीर्थंकर के रूप में मेरा भी समवसरण देवों द्वारा बनाया जावेगा, यह सब पुण्य की ही महिमा है।

कभी-कभी ये देव स्वर्ग में ही अपने नंदनवन में देव-देवांगनाओं के साथ जलक्रीड़ा, गीत, संगीत, नृत्य आदि करते हुये आमोद-प्रमोद में समययापन करते थे।

कभी तत्त्वचर्चा में निमग्न होते थे तो कभी अकृत्रिम चैत्यालयों की वंदना करते हुये महान पुण्य का संचय करते थे।

पुन: पुन: मध्यलोक में आकर भगवान के समवसरण में नाना प्रकार के प्रश्नों से बारहगणों के भव्यों को भी संतुष्ट कर रहे थे। प्रश्नों के उत्तर में श्रीगणधर देव कहते थे-

भव्यात्माओं! सुनो, यह अहिंसा प्रधान धर्म चार प्रकार का है। जीवदया, रत्नत्रय, वस्तुस्वभाव और दशलक्षणस्वरूप। प्राणीमात्र के प्रति करुणा भावना, संकल्पीहिंसा का त्याग या पूर्णरूपेण त्रस, स्थावरस्वरूप षट्काय के जीवों की हिंसा का त्याग करना ‘अहिंसा धर्म जीवदया धर्म है।

सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रय को स्वीकारना रत्नत्रय धर्म है।

जीव का स्वरूप ज्ञानदर्शनमय है, पुद्गल का स्वभाव अचेतन-जड़ है। इत्यादि प्रकार से द्रव्यों के स्वरूप का चिंतन करना। अनेकांत स्वरूप वस्तु का चिंतन करना वस्तु स्वभाव धर्म है।

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दशधर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म हैं। श्रावक इन धर्मों का एकदेश पालन करते हैं और साधुगण इन्हें पूर्णरूप से पालन करते हुये उसी भव से या दो चार भवों से मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

इस प्रकार वहाँ सातवें-लांतव नामक स्वर्ग में तेरह सागर की आयुप्रमाण सुखों का अनुभव कर अंत में समाधिपूर्वक प्राणों को छोड़कर इस मध्यलोक में अवतीर्ण हो गये।

राजा हरिषेण-इसी जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र में कौशल देश है। उसकी राजधानी साकेतपुरी-अयोध्या में राजा वङ्कासेन की रानी शीलवती थीं। सातवें स्वर्ग से च्युत होकर उस देव का जीव रानी शीलवती के गर्भ में आ गया। रानी ने उत्तम-उत्तम दोहले प्राप्त किये। नव माह के बाद पुत्र का जन्म होते ही राजा ने पूरे शहर में उत्सव मनाया। पुत्र का नाम ‘हरिषेण' रखा। बाल्यक्रीड़ाओं के द्वारा माता-पिता आदि परिवार के जनों को हर्षित करते हुए हरिषेण जहाँ राजमहल में आनंद की वृद्धि कर रहे थे, वहीं पूरी अयोध्या के नागरिकों के आनंद समुद्र को बढ़ा रहे थे। युवावस्था में राजा वङ्कासेन ने अपने पुत्र को राज्य सौंप दिया।

कभी-कभी ये राजा हरिषेण अपनी राज्यसभा में नर्तकियों का नृत्य आदि देखते हुये आनंद विभोर हो जाते थे। कभी-कभी धर्मानुष्ठानों से प्रजा को धर्म में लगाकर आनंद का अनुभव करते थे। एक बार विरक्त होकर सारहीन माला के समान समस्त राज्यलक्ष्मी का त्याग कर दिया तथा उत्तम व्रत और शास्त्रज्ञान से सुशोभित श्री श्रुतसागर महामुनि के पास जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। दीक्षा के समय उनके गुरू ने ‘शिष्य हरिषेण' के मस्तक पर विधिवत् मंत्रों से अट्ठाईस मूलगुणों के संस्कार किये थे। दीक्षा के अनंतर कुछ समय गुरू के निकट रहकर पश्चात् गुरू की आज्ञा से जिनकल्पी एकलविहारी महामुनि बन गये।

तब ये हरिषेण मुनिराज पर्वतों की चोटी पर बैठकर ध्यान करते थे। गर्मी के दिनों में पर्वत की चोटी पर ध्यान करना आतापन योग है। वर्षाऋतु में वृक्षों के नीचे ध्यान लगाकर बैठ जाना एवं शीतऋतु में खुले मैदान में ध्यान करना यह त्रिकाल योग कहलाता है। कहा भी है-

गिम्हे गिरिसिहरत्था, वरिसायाले रूक्खमूलरयणीसु।

सिसिरे बाहिरसयणा, ते साहू वंदिमो णिच्चं।।

ग्रीष्मकाल में पर्वत के शिखर पर स्थित होकर, वर्षाकाल में रात्रि में वृक्षों के नीचे बैठकर एवं शीतकाल में खुले मैदान में स्थित होकर जो तपस्या करते हैं ऐसे साधुओं की हम नित्य ही वंदना करते हैं।

कभी-कभी ये महामुनि उद्यान में आये हुये शिष्यसमूह के लिये धर्म का उपदेश दिया करते थे। यह धर्मामृत की वर्षा सच्चे साधु ही कर सकते हैं। आजकल इस पंचमकाल में यहाँ इस भरतक्षेत्र में ऐसे सत्यधर्म के उपदेशक मुनि बहुत ही दुर्लभ हैं। कहा भी है-

कलिप्रावृड् मिथ्यादिङ्मेघच्छन्नासु दिक्ष्विह।

खद्योतवत् सुदेष्टारो हा द्योतन्ते क्वचित्-क्वचित्।।

इस कलिकालरूपी वर्षाकाल में चारों तरफ से मिथ्यात्व के बादल छाए हुए हैं, ऐसे समय में सच्चे धर्म के उपदेष्टा जुगुनू के समान कहीं-कहीं ही चमकते हैं, यह बड़े खेद की बात है।

किंतु महामुनि हरिषेण तो चतुर्थकाल में एक महान साधु हुए हैं। इन्होंने व्रतों की विशुद्धि को बढ़ाते हुए अंत में समाधिपूर्वक शरीर को छोड़ा और महाशुक्र नाम के दसवें स्वर्ग में देवपद को प्राप्त हो गये।

दसवें स्वर्ग में देव-वहाँ पर महाशुक्र स्वर्ग में हरिषेणचर देव अपनी देवांगनाओं और देवपरिवार के साथ अनेक दिव्यसुखों का अनुभव करते रहते थे। कभी-कभी वे मध्यलोक में संयम की मूर्ति महामुनियों के दर्शनार्थ आ जाते थे, यहाँ आकर मुनियों की वंदना, भक्ति करके उनके प्रवचन सुनते थे, अनेक प्रकार के प्रश्नों से जिनधर्म का विशेष ज्ञान प्राप्त करते थे। कभी-कभी वे मध्यलोक के ४५८ जिनमंदिरों की वंदना करते थे। कभी-कभी जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र के हिमवान पर्वत पर आकर पद्मसरोवर आदि के कमलों की सुंदरता देखते हुये ‘श्रीदेवी' के महल में मंदिर का भी दर्शन करते थे। हिमवान पर्वत के ग्यारह कूटों में जो पूर्व दिशा का सिद्धकूट है, वहाँ जाकर अकृत्रिम जिनमंदिर में जिन प्रतिमाओं की वंदना करते पुन: विजयार्ध पर्वत के नव कूटों में से जो पूर्व दिशा का एक सिद्धकूट है उसके जिनमंदिर की वंदना करके गंगा-सिंधु नदियों की रमणीयता देखते थे। जो भरतक्षेत्र की रचना है, उसका अवलोकन करते हुए छह खण्डों का विभाजन एवं आर्यखंड में अयोध्या, सम्मेदशिखर जैसे शाश्वत तीर्थों की वंदना करके विजयार्ध के विद्याधरों की श्रेणियों में भी जो कृत्रिम जिनमंदिर हैं तथा वहाँ जो केवली, श्रुतकेवली, महामुनि आदि तत्काल में विद्यमान थे, उनके दर्शन करके प्रसन्न होते थे।

देवों में सम्यग्दृष्टि देवों का तो यह स्वभाव ही मानना चाहिए कि मध्यलोक में आकर धर्मायतनों के दर्शन करना, तीर्थंकरों के समवसरण में जाना,अकृत्रिम-कृत्रिम जैन मंदिर और जिनप्र्रतिमाओं के दर्शन करना।

जंबूद्वीप, धातकीखंड, पुष्करार्धद्वीप ऐसे ढ़ाई द्वीप के तथा नंदीश्वर द्वीप, कुंडलवर द्वीप और रुचकवर द्वीप के अकृत्रिम जिनमंदिरों की वंदना करना, सर्वत्र विक्रिया के बल से विचरण करते हुए भरतक्षेत्र आदि की सुंदरता को देखना इत्यादि आनंद के लिये ही नहीं, प्रत्युत् महान सातिशय पुण्यबंध के लिये भी कारण माने गये हैं।

वर्तमान में यह जंबूद्वीप नाम के प्रथम द्वीप की सुंदर भव्य आकर्षक रचना हस्तिनापुर तीर्थक्षेत्र पर बनी हुई है। इसे देखकर आप सभी भव्यात्मा जंबूद्वीप की, भरतक्षेत्र की एवं विदेहक्षेत्र आदि की सुंदरता का अनुमान लगा सकते हैं। आज जो महानुभाव हस्तिनापुर पहुँचकर जम्बूद्वीप का दर्शन करते हैं उनके मुख से एक बार सहसा यह वाक्य निकलता है कि-‘अहो! हम तो स्वर्ग में आ गये! इससे अच्छा स्वर्ग भला और क्या होगा ? जब कृत्रिम रचना को देखकर इतना आनंद होता है, तब भला जो अकृत्रिम रचनाओं का साक्षात्कार करते होंगे, उन्हें कितना आनंद प्राप्त होता होगा ? वास्तव में देवगण ऐसे आनंद का अनुभव करते रहते हैं।

इस प्रकार यह हरिषेणचर देव वहाँ दसवें स्वर्ग में सोलह सागर की आयुपर्यंत दिव्यसुखों का अनुभव करके अंत में वहां की आयुपूर्ण कर वहाँ से च्युत होकर मध्यलोक में आ गया।

प्रियमित्र चक्रवर्ती-धातकीखंडद्वीप की पूर्वदिशासंबंधी विदेहक्षेत्र के पूर्वभाग में स्थित पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी के राजा सुमित्र थे तथा उनकी रानी का नाम मनोरमा था। इनके एक पुत्ररत्न का जन्म हुआ उसका नाम ‘प्रियमित्र' रखा गया। यह बालक धीरे-धीरे वृद्धि को प्राप्त हुआ पुन: चक्रवर्ती पद को प्राप्त कर समस्त भोगों का उपभोग किया।

चक्रवर्ती का वैभव-ऐरावत हाथी के समान चौरासी लाख हाथी, वायु के समान वेगशाली रत्नों से निर्मित चौरासी लाख रथ, पृथ्वी की तरह आकाश में भी गमन करने वाले अठारह करोड़ उत्तम घोड़े एवं योद्धाओं का मर्दन करने वाले ऐसे चौरासी करोड़ पदाति-पियादे थे।

स्वयं चक्रवर्ती का शरीर वङ्कामय-वङ्कावृषभनाराचसंहनन, समचतुरस्रसंस्थान का था। छहखंड के सभी राजाओं में जितना कुछ बल होता है, उन सबसे अधिक बल उनके एक शरीर में था। उनके चक्ररत्न के प्रभाव से छह खंड के सभी राजा उनकी आज्ञा को सिर पर धारण करते थे। बत्तीस हजार मुकुटबद्ध राजा उनके चरणों में नत थे।

चक्रवर्ती के छियानवे हजार रानियाँ थीं, जिनमें से बत्तीस हजार रानियाँ आर्यखंड की, बत्तीस हजार रानियाँ विद्याधरों की कन्याएँ एवं बत्तीस हजार रानियाँ म्लेच्छ खंड में जन्में राजाओं की थीं। ये सब अप्सराओं के समान सुंदर थीं।

बत्तीस हजार नाट्यशालाएँ थीं जिनमें हमेशा गीत, नृत्य, वाद्य आदि चलते रहते थे। स्वर्गपुरी के समान बहत्तर हजार नगर, नंदनवन जैसे बगीचों से शोभायमान छियानवे करोड़ गांव थे, निन्यानवे हजार द्रोणमुख थे जो कि समुद्र के समीपवर्ती थे एवं धन धान्य से अतिशय समृद्ध थे, अड़तालीस हजार पत्तन, जोकि रत्नों की खान होने से रत्नाकर के समान थे, सोलह हजार ‘खेट', जोकि कोट, अटारी, खाई और परकोटों से शोभायमान थे, समुद्र के बीच में होने वाले और कुभोगभूमिज मनुष्यों से भरे छप्पन अंतद्र्वीप थे जिनके चारों ओर खाई थी ऐसे चौदह हजार संवाह अर्थात् पर्वतों पर बसने वाले शहर थे।

भोजनशाला में चावल पकाने के लिये एक करोड़ बड़े-बड़े हंडे थे। जिनमें बीज बोने की नली लगी हुई है ऐसे एक करोड़ हल थे, सात सौ कुक्षिवास थे, अठारह हजार आर्यखंड के म्लेच्छ राजा थे।

नवनिधियाँ-काल, महाकाल, नैसर्प, पांडुक, पद्म, माणव, पिंगल, शंख और सर्वरत्न ये नवनिधियों के नाम हैं।

काल निधि-से काव्य, कोष, अलंकार, व्याकरण आदि शास्त्र और वीणा, बांसुरी, नगाड़े आदि मिलते रहते हैं।

महाकाल निधि से-असि, मषि, कृषि आदि छह कर्मों के साधन ऐसे समस्त पदार्थ और संपदाएँ निरंतर उत्पन्न होती रहती हैं।

नैसर्प निधि-शय्या, आसन, मकान आदि देती है।

पांडुक निधि-समस्त धान्य और छहों रसों को उत्पन्न करती है।

पद्मनिधि-रेशमी, सूती आदि वस्त्र प्रदान करती है।

शंखनिधि-सूर्य की प्रभा को तिरस्कृत करने वाले सुवर्ण को देती है।

सर्वरत्ननिधि-इन्द्रनील, पद्मराग, वैडूर्य, स्फटिक आदि अनेक प्रकार के रत्नों को एवं नाना प्रकार की मणियों को देती है।

इन नवनिधियों के साथ चक्रवर्तियों के चौदह रत्न होते हैं, जिनमें सात सजीव होते हैं और सात निर्जीव माने हैं। ये सब रत्न पृथ्वी की रक्षा, विशाल ऐश्वर्य और उपयोग के साधन हैं। चक्र, छत्र, दण्ड, खड्ग, मणि, चर्म और कांकिणी ये सात निर्जीव रत्न हैं। सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, तक्ष-सिलावट और पुरोहित ये सात सजीव रत्न हैं।

प्रियमित्र चक्रवर्ती ने सुदर्शन नामक चक्ररत्न से छहों खंडों को जीत लिया था। उनका ‘सूर्यप्रभ' नाम का छत्र राजसभा में जगमग ज्योति फैलाता हुआ सूर्य की प्रभा को भी लज्जित करता रहता था। दण्डरत्न से विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार खोला गया था। सौजन्दक तलवार को देखकर वैरी राजा कंपित होकर चक्रवर्ती की शरण में आ जाते थे। मणि-चूड़ामणि रत्न अंधकार को दूर कर देता था। चर्मरत्न से मेघकृत जल के उपद्रव से सेना की रक्षा होती थी। कांकिणीरत्न से गुफा में सूर्यचंद्र के आकार बनाकर प्रकाश फैलाया जाता था। सेनापति रत्न दिग्विजय में सभी योद्धाओं से अजेय रहता था। कामवृष्टि नामक गृहपति रत्न घर के सारे काम काज संभालता था। विजयगिरि नाम का उत्तम हाथी रत्न चक्रवर्ती का वाहन था। पवनंजय नाम का अश्वरत्न (घोड़ा) स्थल के समान समुद्र में भी दौड़ लगाता था। युवति नाम की स्त्रीरत्न चक्रवर्ती के भोगसुख का साधन थी जोकि अपने हाथ की शक्ति से वङ्का को भी चूर कर सकती थी। भद्रमुख नाम का तक्षरत्न दिग्विजय के समय स्थान-स्थान पर सुंदर महलों का निर्माण करता था और पुरोहित रत्न सभी निमित्तज्ञान आदि में प्रवीण हुआ संपूर्ण धार्मिक कार्यों को संपन्न कराता था।

दशांग भोग-चक्रवर्ती के रत्नों के साथ ही दशांग भोग माने गये हैं-

१. नवनिधियाँ २. पट्टरानियाँ ३. नगर ४. शय्या ५. आसन ६. सेना ७. नाट्यशालाएँ ८.भाजन ९.भोजन और १०. वाहन ये दश प्रकार के भोगोपभोग के साधन रहते हैं।

सोलह हजार गणबद्ध जाति के व्यंतर देव हाथ में तलवार लेकर निधिरत्न और चक्रवर्ती की रक्षा करने में तत्पर रहते थे। प्रियमित्र चक्रवर्ती ने पूर्वपुण्य के प्रभाव से ऐसे चक्रवर्ती के वैभव को प्राप्त किया।

उन्होंने चक्ररत्न के प्राप्त होने पर दिग्विजय के लिये प्रस्थान करके छहखंड पृथ्वी को जीत लिया पुन: न्यायनीतिपूर्वक एकछत्र शासन करते हुए प्रजा को पुत्र के समान सुख प्रदान किया।

एक दिन ‘क्षेमंकर' भगवान के समवसरण में पहुँचकर भगवान के दर्शन किये। मनुष्यों के कोठे में बैठकर भगवान की दिव्यध्वनि से तत्वों का उपदेश सुना पुन: संसार के समस्त भोगों को क्षणभंगुर मानकर विरक्त हो गये। वापस आकर ‘सर्वमित्र' नाम के अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ प्रभु के श्रीचरणों में दीक्षित हो गये। उस समय पांच समितियों और तीन गुप्तियोंरूप आठ प्रवचनमातृकाओं के साथ-साथ अहिंसा महाव्रत आदि पाँच महाव्रत उन मुनिराज में पूर्ण प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए थे। बहुत काल तक पृथ्वीतल पर विहरण करते हुये निर्जनवनों में ध्यान करते थे। कभी-कभी शरीर को रत्नत्रय का साधन मानकर श्रावक के घर में छ्यालीस दोष और बत्तीस अंतराय टालकर करपात्र में शुद्ध प्रासुक आहार ग्रहण करते थे पुन: वन में जाकर आत्मसिद्धि हेतु योगसाधना में लीन हो जाते थे। इस प्रकार मुनिचर्या का पालन करते हुये अन्त में समाधिपूर्वक शरीर को छोड़कर महान त्याग के प्रभाव से बारहवें स्वर्ग में देव हो गये।

बारहवें स्वर्ग के देव-प्रियमित्र चक्रवर्ती महामुनि ने सहस्रार स्वर्ग में देवपद प्राप्त किया, सूर्यप्रभ इनका नाम था। वहाँ उनकी आयु अठारह सागर प्रमाण थी। अणिमा, महिमा आदि अनेक ऋद्धियों से सहित थे। सबसे पहले ये देव जिनमंदिरों में पहुँचते हैं। जिनमंदिर में प्रतिमाओं की वंदना-स्तुति करके पूजा की। इन जिनमंदिरों में एक सौ आठ जिनप्रतिमाएँ विराजमान रहती हैं। प्रत्येक मंदिर में झारी, कलश, दर्पण, चंवर, बीजना, सिंहासन, छत्र और ठोना ये आठ मंगल द्रव्य एक सौ आठ-एक सौ आठ रहते हैं। इन मंदिरों में दुंदुभि, मृदंग, मर्दल, जयघंटा, भेरी, झांझ, वीणा और बांसुरी आदि वाद्यों के उत्तम-उत्तम शब्द सदैव होते रहते हैं।

प्रत्येक जिनप्रतिमाएँ आठ प्रातिहार्यों से सहित हैं। अशोकवृक्ष, सुरपुष्पवृष्टि, दिव्यध्वनि, चामर, सिंहासन, छत्रत्रय, भामंडल और देव-दुंदुभि ये आठ प्रातिहार्य माने हैं।

सम्यग्दृष्टि देव कर्मक्षय के निमित्त गाढ़ भक्ति से सहित होकर विविध अष्टद्रव्यों से जिनेंद्र प्रतिमाओं की पूजा करते हैं।

तीनों लोकों में अकृत्रिम जिनमंदिरों की संख्या का प्रमाण बताया है। अधोलोक में नरकधरा के ऊपर भवनवासी देवों के सात करोड़ बहत्तर लाख जिनमंदिर हैं। मध्यलोक में जंबूद्वीप नाम के प्रथम द्वीप से लेकर रुचकवर' नाम के तेरहवें द्वीप तक चार सौ अट्ठावन मंदिर हैं । इनमें से जंबूद्वीप में सुमेरूपर्वत के १६, गजदंत के ४, जंबूवृक्ष-शाल्मलिवृक्ष के २, सोलह वक्षारों के १६, चांैतीस विजयार्ध पर्वतों के ३४ एवं षट् कुलाचलों के ६ ये १६±४±२±१६±३४±६·७८ हुये। ऐसे पूर्वधातकी खंड के ७८, पश्चिम धातकी खंड के ७८, पूर्व पुष्करार्धद्वीप के ७८, पश्चिम पुष्करार्ध द्वीप के ७८, इष्वाकार के ४, मानुषोत्तर पर्वत के ४, नंदीश्वर द्वीप के ५२, कुंडलवर द्वीप के ४ और रुचकवर द्वीप के ४ ऐसे ७८±७८±७८±७८±७८± ४±४± ५२±४±४·४५८ हो गये।

ऊध्र्वलोक के चौरासी लाख, सत्तानवे हजार तेईस हैं। स्वर्गों के एवं नवग्रैवेयक आदि के जितने विमान हैं, उतने ही जिनमंदिर हैं। सौधर्मस्वर्ग में ३२ लाख, ईशान में २८ लाख, सानत्कुमार में १२ लाख, माहेन्द्र में ८ लाख, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर युगल में ४ लाख, लांतव-कापिष्ठ में ५० हजार, शुक्र-महाशुक्र में ४० हजार, शतार- सहस्रार में ६ हजार, आनत-प्राणत, आरण और अच्युत ऐसे चार कल्पों में ७००, तीन अधोग्रैवेयक में १११, तीन मध्यग्रैवेयक में १०७, तीन ऊध्र्वग्रैवेयक में ९१, नव अनुदिश में ९ और पांच अनुत्तर में ५ ऐसे सब मिलाकर ३२०००००±२८०००००±१२०००००±८०००००±४०००००±५००००± ४००००±६०००± ७००±१११±१०७±९१±९±५·८४९७०२३ अकृत्रिम जिनमंदिर हैं। कुल मिलाकर ७७२०००००±४५८± ८४९७०२३·८५६९७४८१ अकृत्रिम जिनमंदिर हैं।

इसके आगे व्यंतर देवों के यहाँ और ज्योतिषी देवों के यहां असंख्यातों जिनमंदिर माने गये हैं। इन प्रत्येक जिनमंदिरों में १०८-१०८ जिनप्रतिमाएँ विराजमान हैं अत: उपर्युक्त जिनमंदिरों के जिन प्रतिमाओं की संख्या नव सौ पचीस करोड़ त्रेपन लाख, सत्ताइस हजार, नव सौ अड़तालीस हैं।

नव सौ पचीस कोटी त्रेपन, लाख सताइस सहस प्रमाण।

नव सौ अड़तालिस जिनप्रतिमा, शिवसुख हेतू करूँ प्रणाम।।

सम्यग्दृष्टि देव इन मंदिरों में से मध्यलोक के अकृत्रिम जिनमंदिरों की तो अतीव भक्ति से पूजा करते ही हैं, जहाँ-जहाँ संभव है, वहाँ-वहाँ जाकर वे सूर्यप्रभ देव जिनप्रतिमाओं की वंदना किया करते हैं शेष जिनमंदिरों की परोक्ष से ही वंदना का पुण्य संचय किया करते थे।

कभी-कभी ये देव अपने देवपरिवार के साथ मध्यलोक में आकर महामुनियों की वंदना करके उनके श्रीमुख से धर्मोपदेश सुनकर प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार धर्माराधना में समय व्यतीत किया करते हैं।

आयु के अंत में स्वर्ग में ही सुंदर उद्यान में कल्पवृक्ष के नीचे महामंत्र का स्मरण करते हुए ध्यान में लीन हो गये। देवशरीर से प्राण निकल गये और वैक्रियिक शरीर तत्क्षण ही कपूर जैसा विलीयमान हो गया। वे मध्यलोक में इसी भरतक्षेत्र के छत्रपुर नगर में रानी के पुत्र हो गये।

नंदनमहाराज-जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र के आर्यखंड में एक छत्रपुर नाम का नगर था। वहाँ के राजा नंदिवर्धन की रानी वीरवती के गर्भ में उपर्युक्त सूर्यप्रभ देव का जीव आ गया। नव माह के बाद रानी ने पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में आनंद मंगल होने से राजा ने पुत्र का नाम ‘नंद' रखा, इसे नंदन भी कहते थे। नंदन बालक माता की अंगुली पकड़कर खेलते हुये महाराजा नंदिवर्धन का मनोरंजन किया करता था।

पुत्र के यौवनावस्था को प्राप्त होने पर राजा ने अपना राज्यभार पुत्र को सौंप दिया, क्योंकि यही सनातन परंपरा है। राजा नंद ने भी चिरकाल तक राज्य संचालन करते हुए प्रजा को खूब संतुष्ट किया। इष्ट-अभिलषित राज्य का उपभोग कर राजा नंद ने ‘प्रोष्ठिल' नाम के गुरू के पास जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। मुनियों के संघ में धर्मोपदेश देकर सच्चे मोक्षमार्ग का दिग्दर्शन कराते रहते थे।

इन्होंने ज्ञानावरण कर्म के क्षयोपशम विशेष से गुरू के सान्निध्य में ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। अंग और पूर्वरूप श्रुत का ज्ञान गुरू के मुख से ही प्राप्त होता है कभी किसी को बिना गुरू के नहींं होता है।

[सम्पादन]
तीर्थंकर प्रकृति का बंध-

अच्युतेन्द्र-नंद महामुनि समाधिमरण के प्रभाव से सोलहवें स्वर्ग में पुष्पोत्तर विमान में ‘इन्द्र' हो गये। इस सोलहवें स्वर्ग का नाम अच्युत है अत: ये इन्द्र अच्युतेन्द्र कहलाते थे।

देवों की उत्पत्ति के बारे में मूलाचार में कहा है-

देहस्स य णिव्वत्ती, भिण्णमुहुत्तेण होइ देवाणं।

सव्वंगभूसणगुणं, जोव्वणमवि होदि देहम्मि।।
टीका में-जोव्वणं- यौवनं प्रथमवय: परमरमणीयावस्था सर्वालंकारसमन्विता अतिशयमतिशोभनं सर्वजननयनाल्हादनपरं, होदि- भवति, देहम्मि-देहे शरीरे। देवानां यौवनमपि शोभनं सर्वांगभूषणयुतं तेनैव भिन्नमुहूर्तेन भवतीति।

भवनवासी आदि चारों प्रकार के देवों के कुछ कम दो घड़ी के काल से कुछ कम अंतर्मुहूर्त के काल से छहों पर्याप्तियाँ पूर्ण हो जाती हैं। सर्वकार्य करने में समर्थ शरीर भी पूर्ण बन जाता है। हाथ-पैर, मस्तक, कंठ आदि को विभूषित करने वाले वस्त्र-आभूषण और नाना गुण भी पूर्ण हो जाते हैं। वह देवशरीर नवयौवन से संपन्न, परमरमणीय, सर्वालंकार से समन्वित, अतिशय सुंदर और सर्वजनों को आल्हादित करने वाला हो जाता है।

इन अच्युतेन्द्र की आयु बाईस सागर प्रमाण थी, तीन हाथ ऊँचा शरीर था, द्रव्य से-शरीर वर्ण से और भाव से दोनों ही शुक्ल लेश्याएँ थीं, बाईस पक्ष में एक बार श्वांस लेते थे। बाईस हजार वर्ष में एक बार मानसिक अमृत का आहार था, सदा मानसिक प्रवीचार-कामसेवन था अर्थात् मन में ही देवांगनाओं का स्मरण करने से कामभोग की तृप्ति हो जाती थी। अणिमा, महिमा आदि दिव्य ऋद्धियों से नाना प्रकार के सुखों का अनुभव करते थे। उनका अवधिज्ञान छठी पृथ्वी तक की बातों को जान लेता था, उनके विक्रिया की सीमा थी अर्थात् उनके अवधिज्ञान क्षेत्र के बराबर थी। अपने सामानिक आदि देवों और देवांगनाओं से घिरे हुये वे इंद्रराज अपने पुण्य कर्म के विशेष उदय से सुखरूपी सागर में सदा निमग्न रहते थे।

कभी वे अपनी इन्द्रसभा में देव अप्सराओं का नृत्य देखते थे, कभी देव-देवियों के साथ मध्यलोक में जाकर द्वीप-समुद्रों की शोभा देखकर आनंद का अनुभव किया करते थे।

मध्यलोक में अकृत्रिम जिनमंदिर तेरहद्वीपों तक ही हैं अत: कभी-कभी ये इन्द्रराज रुचकवरद्वीप आदि में पहुँचकर क्षीरसागर के जल से भरे १००८ दिव्य कलशों से जिनप्रतिमाओं का महाभिषेक करके उत्सव मनाते थे, अष्टद्रव्य से पूजा करते थे और महान पुण्य का संचय कर लिया करते थे। इस प्रकार ये अच्युतेन्द्र बाइस सागर पर्यंत दिव्य सुखों का अनुभव करके जब मनुष्यलोक में आने वाले थे, आयु में छह माह शेष रह गये, तक सौधर्मेन्द्र ने कुबेर को आज्ञा दी कि इस जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र के आर्यखंड में कुंडलपुर नगर में अंतिम तीर्थंकर का जन्म होने वाला है अत: तुम जाकर जन्म से पंद्रह महिने पूर्व से ही रत्नों की वर्षा करना प्रारंभ कर दो। अच्युतेन्द्र सुरराज अपने पुष्पोत्तर विमान में ही थे और यहाँ कुंडलपुर का माहात्म्य बढ़ने लगा था।

[सम्पादन]
पंचकल्याणक वैभव-

जब अच्युतेन्द्र की आयु छह मास बाकी रह गई, तब इस भरतक्षेत्र के विदेह नामक देश में कुंडलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ के भवन के आँगन में प्रतिदिन साढ़े सात करोड़ प्रमाण रत्नों की धारा बरसने लगी। आषाढ़ शुक्ल षष्ठी के दिन रात्रि के पिछले प्रहर में रानी प्रियकारिणी ने सोलह स्वप्न देखे और पुष्पोत्तर विमान से अच्युतेन्द्र का जीव च्युत होकर रानी के गर्भ में आ गया। प्रात:काल राजा के मुख से स्वप्नों का फल सुनकर रानी अत्यन्त संतुष्ट हुई। तदनंतर देवों ने आकर गर्भ कल्याणक उत्सव मनाकर माता-पिता का अभिषेक करके उत्सव मनाया।

नव मास पूर्ण होने के बाद चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन रानी त्रिशला ने पुत्र को जन्म दिया। भगवान महावीर का जन्म तेरस की रात्रि में हुआ है, ऐसा जयधवला में वर्णित है-

‘आषाढजोण्हपक्खछट्ठीए कुंडलपुरणगराहिव-णाहवंस-सिद्धत्थणरिंदस्स तिसिलादेवीए गब्भमागंतूण तत्थ अट्ठदिवसाहियणवमासे अच्छिय चइत्तसुक्कपक्ख-तेरसीए रत्तीए उत्तरफग्गुणीणक्खत्ते गब्भादो णिक्खंतो वड्ढमाणजिणिंदो।।

आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन कुंडलपुर नगर के स्वामी नाथवंशी सिद्धार्थ नरेन्द्र की रानी त्रिशला देवी के गर्भ में आकर और वहाँ नव मास, आठ दिन रहकर चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन रात्रि में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के रहते हुए वद्र्धमान जिनेन्द्र ने जन्म लिया। उस समय देवों के स्थानों में अपने आप वाद्य बजने लगे, तीनों लोकों में सर्वत्र हर्ष की लहर दौड़ गई। सौधर्म इन्द्र ने बड़े वैभव के साथ सुमेरूपर्वत की पांडुकशिला पर क्षीरसागर के जल से भगवान का जन्माभिषेक किया। इन्द्र ने उस समय उनके ‘वीर और ‘वर्धमान ऐसे दो नाम रखे।

श्री पार्श्वनाथ तीर्थंकर के बाद दो सौ पचास वर्ष बीत जाने पर श्री महावीर स्वामी उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु भी इसी में शामिल है। कुछ कम बहत्तर वर्ष की आयु थी, सात हाथ ऊँचे, स्वर्ण वर्ण के थे। एक बार संजय और विजय नाम के चारणऋद्धिधारी मुनियों को किसी पदार्थ में संदेह उत्पन्न होने से भगवान के जन्म के बाद ही वे उनके समीप आकर उनके दर्शन मात्र से ही संदेह से रहित हो गये, तब उन मुनियों ने उन बालक का ‘सन्मति नाम रखा। किसी समय संगम नामक देव ने सर्प बनकर परीक्षा ली और भगवान को सफल देखकर उनका ‘महावीर यह नाम रखा।

तीस वर्ष के बाद भगवान को पूर्वभव का स्मरण होने से वैराग्य हो गया, तब लौकान्तिक देवों द्वारा स्तुति को प्राप्त भगवान ने ज्ञातृवन में सालवृक्ष के नीचे जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली और तत्काल मन:पर्यय ज्ञान प्राप्त कर लिया। पारणा के दिन कूलग्राम की नगरी के कूल नामक राजा के यहाँ खीर का आहार ग्रहण किया। किसी समय उज्जयिनी के अतिमुक्तक वन में ध्यानारूढ़ भगवान पर महादेव नामक रूद्र ने भयंकर उपसर्ग करके विजयी भगवान का ‘महतिमहावीर नाम रखकर स्तुति की। किसी दिन कौशाम्बी नगरी में सांकलों में बंधी चंदनबाला ने भगवान का पड़गाहन किया, तब उसकी बेड़ी आदि टूट गई, मिट्टी का सकोरा स्वर्णपात्र बन गया एवं कोदों का भात शालीचावल की खीर बन गया, तभी सती चंदना ने नवधाभक्तिपूर्वक महामुनि महावीर को आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किया।

छद्मस्थ अवस्था के बारह वर्ष बाद जृंभिक ग्राम की ऋजुकूला नदी के किनारे मनोहर नामक वन में सालवृक्ष के नीचे वैशाख शुक्ला दशमी के दिन भगवान को केवलज्ञान प्राप्त हो गया। उस समय इन्द्र ने केवलज्ञान की पूजा की। भगवान की दिव्यध्वनि के न खिरने पर इन्द्र गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति ब्राह्मण को युक्ति से लाये, तब उनका मान गलित होते ही वे भगवान से दीक्षित होकर मन:पर्ययज्ञान और सप्तऋद्धि से विभूषित होकर भगवान के प्रथम गणधर हो गये, तब भगवान की दिव्यध्वनि खिरी। श्रावण कृष्ण एकम् के दिन दिव्यध्वनि को सुनकर गौतम गणधर ने सायंकाल मेें द्वादशांग श्रुत की रचना की। इसके बाद वायुभूति आदि ग्यारह गणधर हुए हैं। भगवान के समवसरण में मुनीश्वरों की संख्या चौदह हजार थी, चंदना आदि छत्तीस हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख श्रावक, तीन लाख श्राविकाएँ, असंख्यात देव-देवियाँ और संख्यातों तिर्यंच थे। बारह गणों से वेष्टित भगवान ने विपुलाचल पर्वत पर और अन्यत्र भी आर्यखंड में विहार कर सप्ततत्त्व आदि का उपदेश दिया।


[सम्पादन]
निर्वाणकल्याणक

अंत में पावापुर नगर के मनोहर नामक वन में अनेक कमलों से सुशोभित सरोवर के बीच शिलापट्ट पर विराजमान होकर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को अंतिम प्रहर में स्वाति नक्षत्र में मोक्ष पद को प्राप्त कर लिया। तब देवों ने मोक्ष कल्याणक की पूजा कर दीपमालिका जलायी थी। तब से लेकर आज तक कार्तिक कृष्णा अमावस्या को दीपावली पर्व मनाया जाता है।

भगवान के जीवनवृृत्त से हमें यह समझना है कि मिथ्यात्व के फलस्वरूप जीव त्रस-स्थावर योनियों में परिभ्रमण करता है। सम्यक्त्व और व्रतों के प्रसाद से चतुर्गति के दुखों से छूटकर शाश्वत सुख को प्राप्त कर लेता है अत: मिथ्यात्व का त्याग कर सम्यग्दृष्टि बन करके व्रतों से अपनी आत्मा को निर्मल बनाना चाहिए।

भगवान महावीर निर्वाणभूमि पावापुरी जलमंदिर पावापुरी में सरोवर के मध्य स्थित जलमंदिर ही भगवान महावीर की निर्वाणभूमि है।

श्री पूज्यपाद आचार्य ने निर्वाणभक्ति में कहा है-

पद्मवनदीर्घिकाकुल-विविधद्रुमखण्डमण्डिते रम्ये।

पावानगरोद्याने, व्युत्सर्गेण स्थित: स मुनि:।।१६।।
कार्तिककृष्णस्यान्ते, स्वातावृक्षे निहत्य कर्मरज:।
अवशेषं संप्राप्द्-व्यजराममरमक्षयं सौख्यम् ।।१७।।
परिनिर्वृतं जिनेन्द्रं, ज्ञात्वा विबुधा ह्यथाशु चागम्य।
देवतरुरक्तचंदन - कालागुरुसुरभिगोशीर्षै:।।१८।।
अग्नीन्द्राज्जिनदेहं, मुकुटानलसुरभिधूपवरमाल्यै:।
अभ्यच्र्य गणधरानपि, गता दिवं खं च वनभवने।।१९।।
पुनश्च-
पावापुरस्य बहिरुन्नतभूमिदेशे, पद्मोत्पलाकुलवतां सरसां हि मध्ये।
श्री वद्र्धमानजिनदेव इति प्रतीतो, निर्वाणमाप भगवान् प्रविधूतपाप्मा।।२४।।
श्रीगुणभद्र आचार्य ने उत्तरपुराण में कहा है-
क्रमात्पावापुरं प्राप्य, मनोहरवनान्तरे।
बहूनां सरसां मध्ये, महामणिशिलातले।।५०९।।
स्थित्वा दिनद्वयं वीत-विहारो वृद्धनिर्जर:।
कृष्णकार्तिकपक्षस्य, चतुर्दश्यां निशात्यये।।५१०।।
स्वातियोगो तृतीयेद्ध:, शुक्लध्यानपरायण:।
कृतत्रियोगसंरोध:, समुच्छिन्नक्रियं श्रित:।।५११।।
हताघातिचतुष्क: सन्नशरीरो गुणात्मक:।
गन्ता मुनिसहस्रेण, निर्वाणं सर्ववाञ्छितम्।।५१२।।
तदेव पुरुषार्थस्य, पर्यन्तोऽनन्तसौख्यकृत्।
अथ सर्वेऽपि देवेन्द्रा, यह्नन्द्रमुकुटस्फुरत्।।५१३।।
हुताशनशिखान्यस्त-तद्देहा मोहविद्विषम्।
अभ्यच्र्य गन्धमाल्यादि-द्रव्यैर्दिव्यैर्यथाविधि।।५१४।।
वन्दिष्यन्ते भवातीत-मथ्र्यैर्वन्दारव: स्तवै:।
वीरनिर्वृतिसम्प्राप्त-दिन एवास्तघातिक:।।५१५।।
भविष्याम्यहमप्युद्यत्केवलज्ञानलोचन:।
भव्यानां धर्मदेशेन-विहृत्य विषयांस्तत:।।५१६।।

यहाँ अभिप्राय यह है कि पावापुरी के मनोहर नाम के उद्यान में कमलों से व्याप्त सरोवर के मध्य महामणिमयी शिला पर भगवान विराजमान हुए, उस समय समवसरण विघटित हो चुका था। श्रीविहार बंद कर दो दिन तक ध्यान में लीन हुए महावीर स्वामी ने कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की रात्रि के अंत में अघातिया कर्मों को नष्ट कर निर्वाणपद प्राप्त कर लिया। तभी सौधर्मेन्द्र आदि इन्द्रों ने अग्निकुमार इन्द्र के मुकुट के अग्रभाग से निर्गत अग्नि पर प्रभु का शरीर स्थापित कर दिव्य चन्दन आदि के द्वारा पूजा करके संस्कार कर दिया। उसी दिन गौतमस्वामी को वहीं पर केवलज्ञान प्रगट हुआ है।

हरिवंशपुराण में भी यही लिखा है एवं दीपावली पर्व तभी प्रारंभ हुआ, ऐसा कहा है-

जिनेंद्रवीरोऽपि विबोध्य संततं, समन्ततो भव्यसमूहसन्ततिम्।

प्रपद्य पावानगरीं गरीयसीं, मनोहरोद्यानवने तदीयके।।१५।।
चतुर्थकालेऽर्धचतुर्थमासवै-र्विहीनताविश्चतुरब्दशेषके।
स कार्तिके स्वातिषु कृष्णभूतसु-प्रभातसन्ध्यासमये स्वभावत:।।१६।।
अघातिकर्माणि निरुद्धयोगको, विधूय घातीन्धनवद् विबंधन:।
विबन्धनस्थानमवाप शंकरो, निरन्तरायोरुसुखानुबन्धनम् ।।१७।।
स पञ्चकल्याणमहामहेश्वर:, प्रसिद्धनिर्वाणमहे चतुर्विधै:।
शरीरपूजाविधिना विधानत:, सुरै: समभ्यच्र्यत सिद्धशासन:।।१८।।
ज्वलत्प्रदीपालिकया प्रवृद्धया, सुरासुरैर्दीपितया प्रदीप्तया।
तदा स्म पावानगरी समन्तत:, प्रदीपिताकाशतला प्रकाशते।।१९।।
तथैव च श्रेणिकपूर्वभूभुज:, प्रकृत्य कल्याणमहं सहप्रजा:।
प्रजग्मुरिन्द्राश्च सुरैर्यथायथं, प्रयाचमाना जिनबोधिमर्थिन:।।२०।।
ततस्तु लोक: प्रतिवर्षमादरात्, प्रसिद्धदीपालिकयात्र भारते।
समुद्यत: पूजयितुं जिनेश्वरं, जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिभाक्।।२१।।

सार यही है कि भगवान महावीर पावापुरी के मनोहर उद्यान में विराजमान हुए। जब चतुर्थकाल में तीन वर्ष साढ़े आठ मास बाकी रहे, तब स्वाति नक्षत्र में कार्तिक अमावस्या के दिन प्रात:-उषाकाल के समय स्वभाव से योग निरोधकर शुक्लध्यान के द्वारा सर्वकर्म नष्ट कर निर्वाण को प्राप्त हो गये। उस समय चार निकाय के देवों ने विधिपूर्वक भगवान के शरीर की पूजा की। अनन्तर सुर-असुरों द्वारा जलाई हुई बहुत भारी देदीप्यमान दीपकों की पंक्ति से पावानगरी का आकाश सब ओर से जगमगा उठा। श्रेणिक आदि राजाओं ने भी प्रजा के साथ मिलकर भगवान के निर्वाणकल्याणक की पूजा की पुन: रत्नत्रय की याचना करते हुए सभी इन्द्र, मनुष्य आदि अपने-अपने स्थान चले गये।

उस समय से लेकर भगवान के निर्वाण कल्याणक की भक्ति से युक्त संसार के प्राणी इस भरतक्षेत्र में प्रतिवर्ष आदरपूर्वक प्रसिद्ध दीपमालिका के द्वारा भगवान महावीर की पूजा करने के लिए उद्यत रहने लगे अर्थात् भगवान के निर्वाणकल्याणक की स्मृति में दीपावली पर्व मनाने लगे।

[सम्पादन]
इन्द्र ने प्रभु के चरण उत्कीर्ण किए-

एक प्रकरण हरिवंशपुराण में आया है कि-

जब भगवान नेमिनाथ गिरनार पर्वत से निर्वाण प्राप्त कर चुके, तब इन्द्रों ने भगवान की निर्वाणकल्याणक पूजा के बाद गिरनार पर्वत पर वङ्का से चरण उत्कीर्ण कर इस लोक में पवित्र सिद्धशिला का निर्माण किया तथा उसे जिनेन्द्र भगवान के लक्षणों के समूह से युक्त किया। यथा-

ऊर्जयन्तगिरौ वङ्काी, वङ्कोणालिख्य पावनीम्।

लोके सिद्धशिलां चव्रे, जिनलक्षण पंक्तिभि:।।१४।।
श्री समन्तभद्रस्वामी ने भी स्वयंभूस्तोत्र में लिखा है-
ककुदं भुव: खचरयोषि-दुषितशिखरैरलंकृत:।
मेघपटलपरिवीत तटस्तव लक्षणानि लिखितानि वङ्किाणा।।१२७।।
वहतीति तीर्थमृषिभिश्च, सततमभिगम्यतेऽद्य च।
प्रीतिविततहृदयै: परितो, भृशमूर्जयन्त विश्रुतोऽचल:।।१२८।।

बीसवीं सदी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज कहते थे कि इसी प्रकार से पावापुरी सरोवर के मध्य मणिमयी शिला से भगवान के मोक्ष जाने के बाद इन्द्रों ने वङ्का से यहाँ पर भी चरणचिन्ह उत्कीर्ण करके इस शिला को सिद्धशिला के समान पूज्य पवित्र बनाया था।

एक बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि भगवान केवलज्ञान होने के बाद पाँच हजार धनुष-बीस हजार हाथ प्रमाण ऊपर आकाश में अधर पहुँच जाते हैं। अधर मेंं ही कुबेर द्वारा समवसरण की रचना की जाती है। जब भगवान श्रीविहार करते हैं, तब समवसरण विघटित हो जाता है और भगवान आकाश में अधर चलते हैं तब देवगण प्रभु के चरणों के नीचे स्वर्णमयी दिव्य कमलों की रचना करते रहते हैं। निर्वाणभक्ति के पूर्व भी जब भगवान योग निरोध करते हैं तब वे आकाश में अधर ही रहते हैं फिर भी उनके ठीक नीचे की भूमि भगवान की निर्वाणभूमि मानी जाती है चूँकि सिद्ध भगवान सिद्धशिला पर भी ठीक उसी भूमि के ऊपर विराजमान हैं।

इससे यह स्पष्ट है कि भगवान महावीर स्वामी जहाँ से मोक्ष गये हैं, ठीक वहीं पर उनके शरीर का संस्कार किया गया है और वहीं पर सरोवर के मध्य मणिमयी शिला पर इन्द्रोेंं ने चरण उत्कीर्ण किए थे। ऐसे ही सम्मेदशिखर पर्वत के सभी टोंकोें पर इन्द्रों द्वारा चरण उत्कीर्ण किए गये हैं, ऐसा मानना चाहिए।

ऐसी सिद्धभूमि पावापुरी को मेरा अनन्त-अनन्त बार नमस्कार होवे।


[सम्पादन]
श्रुतपरम्परा

श्रुतज्ञान के भेद-श्रुतज्ञानके अंगप्रविष्ट और अंगबाह्य से दो भेद भी माने हैं। जिसमें अंग प्रविष्ट के द्वादशांगरूप बारह भेद और अंगबाह्य के अनेकों भेद होते हैं। द्वादशांग में प्रत्येक के दो पदों का प्रमाण बतलाया गया है जो कि श्रुतस्कंध यंत्र में स्पष्ट है और जिन अक्षरों के पद न बन सके, वे ही अंगबाह्य कहलाते हैं। उनके सामायिक, स्तव, वंदना आदि भेद वर्णित हैं।

गणधर१ देव के शिष्य-प्रशिष्यों द्वारा अल्पायु, बुद्धि वाले प्राणियों के अनुग्रह के लिए अंगों के आधार से रचे गये संक्षिप्त ग्रंथ अंगबाह्य हैं। इसमें कालिक, उत्कालिक आदि अनेकों भेद है। स्वाध्याय काल में जिनके पठन-पाठन का नियम है उन्हें कालिक एवं जिनके पठन-पाठन का नियत समय न हो, उन्हें उत्कालिक कहते हैं।

भगवान की वाणी को चार अनुयोगरूप से भी विभाजित किया गया है-प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग।

प्रथमानुयोग-चार पुरुषार्थों का आख्यान जिसमें है, ऐसे ग्रन्थ-चरित ग्रन्थ, पुराण ग्रन्थ, पुण्योत्पादक शास्त्र, बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति और समाधि के लिए खानस्वरूप शास्त्र प्रथमानुयोग कहलाते हैं। इस अनुयोग में मुख्य रूप से त्रेसठ शलाका पुरुषों के चरित का वर्णन किया जाता है।

करणानुयोग-जो शास्त्र लोकालोक के विभाग को, युग के परिवर्तन और चतुर्गतियों को दिखलाने के लिए दर्पण के समान है, वह करणानुयोग है।

चरणानुयोग-श्रावक और मुनियों के चरित्र की उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षा का जिसमें वर्णन है, वह चरणानुयोग है।

द्रव्यानुयोग-जिसमें जीव-अजीव, पुण्य-पाप और बंध-मोक्ष का विस्तृत वर्णन है, वे द्रव्यानुयोग शास्त्र हैं।

वर्तमान काल के-त्रेसठ शलाका पुरुषों के नाम-इस चतुर्थ काल में २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलभद्र, ९ नारायण और ९ प्रतिनारायण ऐसे त्रेसठ महापुरुष होते हैं। इनमें से भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर और महाराज भरत प्रथम चक्रवर्ती हुुए हैं।

२४ तीर्थंकर-ऋषभ, अजित, संभव, अभिनंदन, सुमति, पद्मप्रभ, सुपार्श्व, चंदप्रभ, पुष्पदंत, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनंत, धर्म, शांति, कुन्थु, अरनाथ, मल्लि, मुुनिसुव्रत, नमि, नेमि, पार्श्व, और वर्धमान।

१२ चक्रवर्ती-भरत, सगर, मघवा, सनत्कुमार, शान्ति, कुन्थु, अर, सुभौम, पद्म, हरिषेण, जयसेन और ब्रह्मदत्त।

९ बलभद-विजय, अचल, सुधर्म, सुप्रभ सुदर्शन, नंदी, नंदिमित्र, रामचन्द्र और पद्म।

९ नारायण-त्रिपृष्ठ, द्विपृष्ठ, स्वयंभू, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुण्डरीक, दत्त, लक्ष्मण और श्रीकृष्ण।

९ प्रतिनारायण-अश्वग्रीव, तारक, मेरक, मधुवैटभ, निशुंभ, बलि, प्रहरण, रावण और जरासन्ध।

ये शलाकापुरुष चतुर्थकाल में ही होते हैं। ऐसे ही ये महापुरुष पूर्वकाल में भी अनंतों हो चुके हैं और भविष्य में भी होते ही रहेंगे।

धर्मतीर्थ व्युच्छित्ति-पुष्पदंत से लेकर धर्मनाथपर्यंत सात तीर्थों में जिनधर्म की व्युच्छित्ति हुई है, शेष सोलह तीर्थंकरों के तीर्थों में धर्म की परंपरा निरंतर रही है, अर्थात् पुष्पदंत भगवान के तीर्थ में पावपल्य, शीतलनाथ के तीर्थ में अद्र्धपल्य, श्रेयांसनाथ के तीर्थ में पौन पल्य, वासुपूज्य के तीर्थ में एक पल्य, विमलनाथ के तीर्थ में पौन पल्य, अनंतनाथ के तीर्थ में अद्र्धपल्य और धर्मनाथ के तीर्थ में पाव पल्य प्रमाण धर्मतीर्थ का उच्छेद रहा है। उस समय दीक्षा लेने वालों का अभाव होने से धर्मरूपी सूर्य अस्त हो गया था, हुंडावसर्पिणी के दोष से ये सात व्युच्छेद होते हैं।

कुदान की प्रथा-श्री शीतलनाथ के तीर्थ के अंतिम भाग में कालदोष से वक्ता, श्रोता और आचरण करने वालों का अभाव हो जाने से समीचीन धर्म का नाश हो गया। मदिल देश में मलय देश का राजा मेघरथ कुछ दान देना चाहता था, उसने कुमार्गगामी परंपरा से आगत आहार, औषधि, अभय और शास्त्रदान को छोड़कर मुंडशालायन ब्राह्मण के द्वारा कहे हुए कन्यादान, हस्तिदान, सुवर्णदान, अश्वदान, गोदान, दासीदान, तिलदान, रथदान, भूमिदान और गृहदान यह दश प्रकार का दान स्वेच्छा से चलाया।

हिंसा यज्ञ की उत्पत्ति-मुनिसुव्रतनाथ के मोक्ष जाने के बाद एक समय ‘क्षीरकदंब' उपाध्याय के पास राजपुत्र वसु, गुरूपुत्र पर्वत और धर्मनिष्ठ श्रावक नारद इन तीनों ने विद्याध्ययन किया था। गुरू के दीक्षित होने के बाद किसी समय पर्वत ने सभा में कहा कि ‘अजैर्यष्टव्यं' बकरों से होम करना चाहिए, ऐसा अर्थ है, तब नारद ने कहा ‘अज' का अर्थ, न उगने योग्य पुराने धान्य हैं, उनसे यज्ञ करना चाहिए, ऐसा गुरुदेव ने अर्थ किया था किंतु पर्वत ने अपना दुराग्रह नहीं छोड़ा। अंत में राजा वसु के राजदरबार में निर्णय गया। वसु ने यथार्थ जानते हुए भी गुरुपत्नी पर्वत की माता से वचनबद्ध होने से पर्वत के हिंसामय वचनों को सत्य कह दिया, जिसके फलस्वरूप पृथ्वी में सिंहासन के धँसने से मरकर नरक गया। इधर पर्वत ने महाकाल नामक असुर की सहायता से यज्ञ में खूब हिंसा कराई और उसके फल से ये सब दुर्गति के पात्र हो गये किंतु नारद हिंसा का निषेध करने से स्वर्ग गया।

भगवान मुनिसुव्रत के तीर्थ में ही मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र हुए हैं। नेमिनाथ भगवान के समय उनके चचेरे बंधु श्रीकृष्ण नारायण हुए हैं।

तीर्थंकरों का अंतराल-भगवान ऋषभदेव के मोक्ष चले जाने के बाद पचास लाख करोड़ सागर बीत जाने पर अजितनाथ तीर्थंकर का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी अंतराल में शामिल थी।

आगे सर्वत्र अंतराल की संख्या में उन-उन तीर्थंकरों की आयु को सम्मिलित ही समझना।

श्री अजितनाथ तीर्थंकर के मोक्ष जाने के बाद तीस लाख करोड़ सागर बीत जाने पर संभवनाथ उत्पन्न हुए थे।

श्री संभवनाथ के बाद दश लाख करोड़ वर्ष का अंतराल बीत जाने पर अभिनंदननाथ अवतीर्ण हुए थे।

इनके बाद नौ लाख करोड़ सागर बीत जाने पर सुमतिनाथ उत्पन्न हुए थे।

इनके बाद नब्बे हजार करोड़ सागर बीत जाने पर पद्मप्रभ तीर्थंकर उत्पन्न हुए थे।

इनके अनंतर नौ हजार करोड़ सागर बीत जाने पर सुपार्श्वनाथ उत्पन्न हुए थे।

अनंतर नौ सौ करोड़ सागर का अंतर बीत जाने पर चंद्रप्रभ जिनेन्द्र ने जन्म लिया था।

इसके पश्चात नब्बे करोड़ सागर का अंतर निकल जाने पर पुष्पदंत तीर्थंकर हुए हैं।

इनके बाद नौ करोड़ सागर का अंतर बीत जाने पर शीतलनाथ ने जन्म लिया है।

इन शीतलनाथ के अनंतर जब सौ सागर तथा छ्यासठ लाख छब्बीस हजार वर्ष कम एक सागर प्रमाण अंतराल निकल गया, तब श्रेयांसनाथ का जन्म हुआ है।

श्रेयांसनाथ के बाद जब चौवन सागर प्रमाण अंतर बीत चुका था और अंतिम पल्य के तृतीय भाग में जब धर्म की संतति का व्युच्छेद हो गया था, तब वासुपूज्य का जन्म हुआ था।

इनके बाद जब तीस सागर वर्ष बीत गये और पल्य के अंतिम भाग में धर्म का विच्छेद हो गया था, तब विमलनाथ का जन्म हुआ था।

विमलनाथ के मोक्ष चले जाने के बाद नौ सागर और पौन पल्य बीत जाने पर तथा अंतिम समय में धर्म का विच्छेद हो जाने पर श्री अनंतनाथ का जन्म हुआ था।

इनके बाद चार सागर प्रमाण काल बीत चुका और अंतिम पल्य का आधा भाग जब धर्म रहित हो गया, तब धर्मनाथ का जन्म हुआ था।

धर्मनाथ के बाद पौन पल्य कम तीन सागर के बीत जाने पर तथा पाव पल्य तक धर्म का विच्छेद हो लेने पर श्री शांतिनाथ भगवान उत्पन्न हुए थे।

इनके बाद अर्धपल्य बीत जाने पर श्री कुंथुनाथ उत्पन्न हुए हैं।

इनके अनंतर एक हजार करोड़ वर्ष कम पल्य का चतुर्थ भाग बीत जाने पर श्री अरनाथ उत्पन्न हुए हैं।

इनके बाद एक हजार करोड़ वर्ष बीत जाने पर मल्लिनाथ उत्पन्न हुए हैं।

इनके बाद चौवन लाख वर्ष बीत जाने पर मुनिसुव्रतनाथ उत्पन्न हुए हैं।

इनके बाद साठ लाख वर्ष बीत जाने पर नमिनाथ उत्पन्न हुए हैं।

इनके बाद पाँच लाख वर्ष बीत जाने पर नेमिजिनेन्द्र उत्पन्न हुए हैं।

श्री नेमिनाथ भगवान के बाद तिरासी हजार सात सौ पचास वर्ष बीत जाने पर पार्श्वनाथ जिनेन्द्र का जन्म हुआ है।

श्री पार्श्वनाथ के बाद दो सौ पचास वर्ष बीत जाने पर श्री महावीर स्वामी उत्पन्न हुए थे। इनकी आयु भी इसी में शामिल१ थी२।

तीर्थंकर के वर्ण-पद्मप्रभ, वासुपूज्य का रक्तवर्ण, चन्द्रप्रभ और पुष्पदंत का श्वेतवर्ण, सुपार्श्व और पार्श्व का हरितवर्ण, नेमिनाथ और मुनिसुव्रत का नीलवर्ण एवं शेष सोलह तीर्थंकर का स्वर्ण वर्ण है।

बालयति-वासुपूज्य, मल्लिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और वद्र्धमान ये पाँच तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी रहे हैं। शेष उन्नीस तीर्थंकर विवाहित होकर राज्य करके दीक्षित हुए हैं।

वंश-वीर प्रभु नाथवंशी, पार्श्वजिन उग्रवंशी, मुनिसुव्रत और नेमिनाथ हरिवंशी, धर्मनाथ, कुन्थुनाथ और अरनाथ कुरुवंशी और शेष सत्तरह तीर्थंकर इक्ष्वाकुवंश में हुए हैं।

रत्नवृष्टि-समस्त तीर्थंकरों की आदि पारणाओं और वर्धमान स्वामी की सभी पारणाओं में नियम से रत्नवृष्टि हुआ करती थी। वह रत्नवृष्टि उत्कृष्टता से साढ़े बारह करोड़ और जघन्यरूप से साढ़े बारह लाख होती थी। इनमें से कितने ही दाता तो तपश्चरण कर उसी जन्म से मोक्ष चले गये और कितने ही जिनेन्द्र भगवान के मोक्ष जाने के बाद तीसरे भव में मोक्ष गये हैं।

केवलज्ञान उत्पत्ति के समय उपवास-ऋषभदेव, मल्लिनाथ और पार्श्वनाथ को तेला के बाद, वासुपूज्य को एक उपवास के बाद और शेष तीर्थंकरों को बेला के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति हुई है।

केवलज्ञान उत्पत्ति के स्थान-ऋषभनाथ को पूर्वताल नगर के शकटमुख वन में, नेमिनाथ को गिरनार पर्वत पर, पार्श्वनाथ को आश्रम के समीप (अहिच्छत्र में), भगवान महावीर को ऋजुकूला नदी के तट पर और शेष तीर्थंकरों को अपने-अपने नगर के उद्यानों में ही केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है। प्रत्येक तीर्थंकरों ने जिस वृक्ष के नीचे दीक्षा ली है उसी वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान हुआ है, ऐसा उल्लेख है।

मुक्तिप्राप्ति के आसन-ऋषभनाथ, वासुपूज्य और नेमिनाथ पर्यंक आसन से तथा शेष तीर्थंकर कायोत्सर्ग आसन से स्थित हो मोक्ष गए हैं। योग निरोध काल-ऋषभदेव ने मुक्ति के पूर्व चौदह दिन तक योग निरोध किया। महावीर स्वामी ने दो दिन और शेष तीर्थंकरों ने एक-एक मास तक योग निरोध किया है।

वीर भगवान के निर्वाण होने के पश्चात् तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष काल के व्यतीत होने पर ‘दुषमा' नामक पंचम काल प्रवेश करता है। अनुबद्ध केवली-जिस दिन महावीर भगवान सिद्ध हुए, उसी दिन गौतम गणधर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। गौतम स्वामी के मुक्ति जाने के दिन श्री सुधर्म स्वामी केवली हुए और इनके मोक्ष जाने के दिन जंबूस्वामी केवली हुए। जंबूस्वामी के सिद्ध होने पर फिर कोई अनुबद्ध केवली नहीं हुए। गौतम स्वामी से लेकर जंबूस्वामी तक काल ६२ वर्ष प्रमाण है।

श्रुतकेवली-नंदी, नंदिमित्र, अपराजित, गोवद्र्धन और भद्रबाहु ये पाँच द्वादशांग ज्ञान के धारी श्रुतकेवली हुए हैं। इनका काल १०० वर्ष प्रमाण है। अंतिम श्रुतकेवली भद्रबाहु से दीक्षित, मुकुटधरोें में अंतिम चन्द्रगुप्त सम्राट ने जिन दीक्षा ली थी, इसके बाद मुकुटबद्ध राजा मुनि नहीं हुए। दशपूर्वी-विशाखाचार्य, प्रोष्ठिल, क्षत्रिय, जय, नागसेन, सिद्धार्थ, धृतिषेण, विजय, बुद्धिल, गंगदेव और धर्मसेन ये ग्यारह आचार्य ग्यारह अंग और दश पूर्व के धारी ‘दशपूर्वी' कहलाये। इनका काल १८३ वर्ष है।

ग्यारह अंगधारी-नक्षत्राचार्य, जयपाल, पांडु, धु्रवसेन और कंसार्य ये पाँच मुनि ग्यारह अंगधारी हुए हैं। इनका काल २२० वर्ष है।

आचारांग धारी-सुभद्राचार्य , यशोभद्र, यशोबाहु और लोहार्य ये चार आचार्य एक आचारांग मात्र के धारी हुए हैं। इनका काल ११८ वर्ष है। गौतम स्वामी से लेकर लोहाचार्य तक ६३±१००±१८३±२२०± ११८·६८३ वर्ष में अंगधारी हुए हैं। इनके बाद इस भरत क्षेत्र में भी आचार्य अंग-पूर्व के धारक नहींं हुए हैं। उनके अंशों के जानने वाले अवश्य हुए हैं।

जो श्रुततीर्थ, धर्म की प्रवृत्ति में कारण है वह श्रुतपरंपरा बीस हजार तीन सौ सत्तरह (२०३१७) वर्षों तक यहाँ चलती रहेगी, अनंतर पंचम काल के अंत मेंं व्युच्छेद को प्राप्त हो जावेगी। इतने मात्र समय में प्राय: चातुर्वण्र्य संघ जन्मे लेता रहेगा।१ अर्थात् उपर्युक्त ६८३±२०३१७·२१००० वर्ष तक धर्मतीर्थ परंपरा अव्युच्छिन्न रहेगी। तात्पर्य यह हुआ कि पंचम काल के अंत तक धर्म व चतुर्विध संघ विद्यमान रहेगा।

राज्य परंपरा-वीर प्रभु के निर्वाण के बाद ‘पालक' नामक अवन्ति सुत का राज्याभिषेक हुआ। पालक का ६० वर्ष , विजय वंशियों का १५५ वर्ष, मुरुंडवंशियों का ४०, पुण्यमित्र का ३०, वसुमित्र-अग्निमित्र का ६०, गंधर्व का १००, नरवाहन का ४०, भृत्य-आंध्रों का २४२, गुप्तवंशियों का २३१ वर्ष प्रमाण राज्यकाल रहा है पश्चात् इंद्र का सुत कल्की उत्पन्न हुआ, इसका नाम चतुर्मुख, आयु ७० वर्ष और राज्यकाल ४२ वर्ष रहा। श्री वीरप्रभु के सिद्ध होने के बाद छह सौ पाँच वर्ष और पाँच माह व्यतीत होने पर ‘विक्रम' नामक शक राजा हुए हैं। उनके बाद तीन सौ चौरानवे वर्ष, सात माह व्यतीत होने पर प्रथम कल्की हुआ है।

आचारांगधरों के २७५ वर्ष पश्चात् कल्की राजा को पट्ट बाँधा गया। ६८३±२७५±४२·१००० वर्ष। उस कल्की ने श्रमण साधु से प्रथम ग्रास को शुल्क रूप में माँगा, तब मुनि ‘यह अंतरायों का काल है ऐसा समझकर निराहार चले गये, उस समय उनमें से किसी एक को अवधिज्ञान उत्पन्न हो गया, तब कोई असुरदेव ने अवधिज्ञान से मुनिगणों के उपसर्ग को जानकर, उसे धर्मद्रोही मानकर उस कल्की को मार डाला पुन: अजितंजय नाम के उसके पुत्र ने ‘मेरी रक्षा करो' ऐसा कहकर उस देव के चरणों में नमस्कार किया और उस देव ने ‘धर्मपूर्वक राज्य करो' ऐसा कहकर उसकी रक्षा की और वह जैनधर्मी बन गया।

ऐसा हजार-हजार वर्ष में एक-एक कल्की और पाँच सौ-पाँच सौ वर्षों के पश्चात् उनके बीच-बीच में एक-एक उपकल्की होते हैं। प्रत्येक कल्की के समय पंचमकालवर्ती एक-एक साधु को अवधिज्ञान प्राप्त होता है और उस समय चातुर्वण्र्य संघ अल्प हो जाते हैं।

पंचमकाल के अंत समय जलमंथन नामा अंतिम कल्की होगा, उस समय ‘वीरांगज' नाम के मुनि, ‘सर्वश्री आर्यिका, अग्निल श्रावक और पंगुश्री श्राविका होंगी। अंतिम कल्की मुनिराज के आहार का प्रथम ग्रास शुल्क रूप में माँगेगा, तब मुनि उसे देकर अंतराय करके वापस जाकर अवधिज्ञान को प्राप्त करके आर्यिका, श्रावक और श्राविका को बुलाकर कहेंगे कि अब पंचमकाल का अंत आ चुका है, हमारी और तुम्हारी तीन दिन की आयु शेष है। चारों सल्लेखना से मरण करके सौधर्म स्वर्ग जाएँगे और कुमार देव द्वारा मार दिये जाने पर वह कल्की नरक जायेगा। प्रात:काल धर्म का नाश, मध्यान्ह में राजा का नाश और सूर्यास्त समय अग्नि का अभाव हो जावेगा।

छठा काल-पश्चात् तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष के बीत जाने पर महाविषम दुषमा-दुषमा नाम का छठा काल प्रविष्ट होगा। उस समय मनुष्यों की ऊँचाई तीन हाथ से एक हाथ तक, आयु बीस से सोलह वर्ष तक होगी। वे कंदमूल, फल, मत्स्य माँसादि खायेंगे, नंगे वनों में विचरेंगे। अंधे, गूंगे, बधिर, कुरूप आदि होंगे। नरक और तिर्यञ्चगति से आयेंगे और इन्हीं दो गतियों में जायेंगे।

उनचास दिन कम इक्कीस हजार वर्ष के बीतने पर संवर्तक नामक वायु से महाप्रलय होगा। उस समय बहत्तर युगल और भी संख्यात जीवों को देव विद्याधर दया से विजयार्ध की गुफा आदि में सुरक्षित रखेंगे। यहाँ ४९ दिन तक बर्फ, क्षार, विष, अग्नि आदि की वर्षा से सब पर्वत आदि समाप्त होकर एक योजन तक पृथ्वी जल जावेगी।

अनंतर उत्सर्पिणी काल प्रवेश करेगा, तब जल, दूध, घृत और अमृत की वर्षा होकर पृथ्वी अच्छी हो जावेगी। ये युगल जीव गुफाओं से निकलेंगे। धीरे-धीरे आयु, ऊँचाई, बल आदि बढ़ते-बढ़ते इक्कीस हजार वर्ष समाप्त होकर द्वितीय काल प्रवेश करेगा। इसके हजार वर्ष शेष रहने पर अर्थात् बीस हजार वर्ष बीत जाने पर कुलकरों की उत्पत्ति होगी पुन: अंतिम कुलकर से श्रेणिक का जीव ‘महापद्म' नाम का तीर्थंकर होगा, तब से पुन: धर्म की परंपरा चलेगी।

इस प्रकार भरतक्षेत्र में यह काल परिवर्तन चलता रहता है।

यहाँ तक भगवान अजितनाथ से लेकर अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर तक तेईस तीर्थंकरों का वर्णन करने वाला द्वितीय अधिकार पूर्ण हुआ।