ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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23. रूपकुण्डली

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रूपकुण्डली

(काव्य अट्ठाईस से सम्बन्धित कथा)
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यौवन का झोंका कभी-कभी स्वयं को बहा ले जाता है।विरले ही व्यक्ति इसमें प्रवेश करके सकुशल लौट पाते हैं।यौवन के मद में उन्मत्त होकर हस्ती अपनी हस्ती बतलाने के ध्येय से उल्टी मंजिल की ओर दौड़ लगाता है। यौवन के मद में मदहोश पुष्प-वृन्द जब खिलखिलाकर हँसते हैं, तो दूसरे ही दिन उन्हें बिखर-बिखर कर अपने पैरों की धूलि पर मँुह के बल गिरना पड़ता है। युवावस्था वह खिली हुई कलिका है जिस पर भ्रमर मंडराते हैं, पराग चूसते हैं और उसको अद्र्ध निस्तेज बनाकर चल देते हैं। रूपकुंडली राजा पृथ्वीपाल की अनन्य सुन्दरी राजकन्या थी। रूप और यौवन के दो-दो प्यालों के सन्निकट होते हुए भी वह उनसे संघर्ष कर रही थी। यह संभव है कि कामदेव ने अपने समर्थ शरीर से अप्सराओं को आकर्षित किया हो, किन्तु रूपमती रूपकुंडली के समक्ष उसे लज्जित होना ही पड़ता।चन्द्रमा के सदृश कान्ति युक्त, मृगनैनी और गजगामिनी रूपकुण्डली स्वर्गलोक की अप्सरा सी दिखाई देती थी। उसके निर्मल कान्ति युक्त दन्त समूह जब सहसा खिलखिला कर हँसते थे तब निकटवर्ती व्यक्तियों को यही प्रतीत होता था कि बिजली अद्र्ध तेज से चमक रही है। उसकी-क्षीण जर्जर कटि सम्पूर्ण शरीर को कामलता के सदृश घोषित कर रही थी। इस अनिंद्य अनन्य रूप में छिपी हुई किसी भी षोडसी को अपने ऊपर गर्व हो सकता है। रूपकुण्डली भी इसका अपवाद न बन सकी अपनी सहेलियों को वह हीन समझकर अपने अनुपम रूप का दम्भ बतलाती इठलाती हुई जाकर सायंकाल को गिरि-शिखर पर जा बिराजती, अलसाये हुए नेत्रों से बसंत की बहार निहारती और कभी-कभी उस युवा तुर्वभ्रमर मण्डल की ओर पर्यटन के बहाने आ निकलते थे।

शुभाषितेन गीतेन, युवतीनां च लीलया।
यस्य न द्रवते चित्तम् सवैर्मुक्तोऽथवा पशु:।।

रूपकुण्डली दासियों सहित अपनी बगिया में टहल रही थी।सामने से नग्न दिगम्बर मुनिराज आ निकले। यौवन के मद में चूर दासियों ने स्वामिनी की आज्ञा से निर्मोही मुनी को छेड़ दिया। मुनिश्री ने उपसर्ग समझ कर कोई आपत्ति न की, न भावों में कोई विकार आने दिया। रूपकुण्डली ने आगे आकर मुनिराज की निन्दा की तथा उनके धूल-धूसरित-कुरूप शरीर और नग्न भेष पर शोक प्रकट किया।अन्त में रूपगर्विता रूपकुण्ड़ली ने शिला खण्ड पर स्थित समाधिस्थ मुनि के शरीर को रंग-बिरंगे रंगों से चित्रित किया तथा उन्हें एक खासा व्यंग सजीव चित्र (कार्टून) बनाकर छोड़ दिया। और हँसी मजाक उड़ाती अपनी दासियों समेत वह राजभवन की ओर बढ़ गई।

मुनिराज ने उपसर्ग की समाप्ति पर अपना ध्यान भंग किया। बिना किसी सन्ताप और द्वेष के जंगल की ओर जाने लगे।बिल्कुल छोटे-छोटे अबोध बच्चे विचित्र रंग के व्यक्ति को देखकर अपनी -अपनी माँ की गोद में भय के कारण जा छुपे थे, और नगर के विनोदी बालक उनके पीछे-पीछे हँसते हुए जा रहे।मुनिराज तो अपनी आत्मा की निधि संजोय साम्यभाव से चार हाथ जमीन शोधते हुए गमन कर रहे थे। उन्हें न तो रूपवुंâडली का उपहास बुरा लगा था और न पीछे चलते हुए बच्चों की ओर ही उनका ध्यान था। रूपकुण्डली अभी घर पहुँची ही थी कि एक वीतराग साधु पुरुष की निन्दा के महान् पाप के कारण उसका सुन्दर शरीर उदम्बर कोढ़ से ग्रसित हो गया। अब नगर का साधारण कुरूप युवक भी उसकी ओर देखकर घृणा से मुँह पेâर लेता था।सखियाँ चिढ़ाकर कहती-कामदेव को मात पर श्मात देती रहना रूपकुण्डली!’’ और उपवन में पर्यटन को आने वाले युवा तुर्व कह रहे थे-

बड़ा शोर सुनते थे, हाथी की दुम का। देखा तो पीछे रस्सी बंधी थी।। बड़े-बड़े हकीम और राजवैद्य रूपकुण्डली के उदम्बर कोढ़ को जब अच्छा न कर सके तब वह उन्हीं मुनिराज के चरण कमलों पर गिर कर बोली- ‘‘महाराज!दया के सागर! मुझ सेविका को रूप-दान दीजिये,रूप के मद में मदान्ध मुझ पापिनी ने आपकी निन्दा का घोर पापर्जन किया है। उस महान् पाप से छुड़ाइये!’’ महामुनिराज को मालूम ही नहीं था कि उनके कारण किसी को तकलीफ हुई है।धैर्य देते हुए-कहा ‘‘देव! महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र के २८वें श्लोक का बारम्बार स्मरण करने मात्र से इस भयंकर रोग से मुक्ति मिल सकती है।’’

कुरूपकुण्डली समदर्शी मुनिराज से जैनधर्म का उपदेश श्रवण कर बहुत आनन्दित हुई और वह मुनिश्री को नमस्कार करके अपने घर लौट आई। कुरूपकुण्डली ने लगातार तीन दिन और तीन रात भक्तातर का अखंड पाठ किया और २८ वे श्लोक के मंत्र की साधना की। फलस्वरूप उसका सारा शरीर पुन: कुन्दन सा चमक उठा। राजमहलों तक जब यह खबर पहँुची तो राजा पृथ्वीपाल सपत्नीक अपनी पुत्री रूपकुण्डली के समीप पहुँचे और उसे पहिले की अवस्था में देख आनन्द विभोर हो उठे। राजा ने इस खुशी में जैनधर्म की प्रभावना हेतु जैनमन्दिर का निर्माण कराकर उसमें अति मनोज्ञ भगवान आदिनाथ की आदमकद प्रतिमा को प्रतिष्ठित कराया! कुछ काल बाद राजा पृथ्वीपाल ने अपनी रूपवती पुत्री रूपकुण्डली का ब्याह गुणशेखर के साथ कर देना चाहा किन्तु वह नाशवान् शरीर का सही सदुपयोग समझ चुकी थी, और इसीलिए उसने आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत पालन करके आर्यिका की जिन्दगी बिताने का कठोर संकल्प कर लिया।