ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तपोभावनायै नमः"

25.परमार्थविंशति प्रश्नोत्तरी

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परमार्थविंशति प्रश्नोत्तरी

प्रश्न ४९०—पंचमकाल का नाम क्या है ?
उत्तर—दु:षम काल।

प्रश्न ४९१—पंचमकाल में कैसा संहनन होता है ?
उत्तर—पंचमकाल में हीन संहनन होता है।

प्रश्न ४९२—क्या इस संहनन से परीषहों को सहन किया जा सकता है ?
उत्तर—नहीं, इस संहनन से परीषहों को सहन नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न ४९३—उत्तम संहनन किस काल में होता है ?
उत्तर—उत्तम संहनन चतुर्थ काल में होता है।

प्रश्न ४९४—आत्मा तथा कर्म का सम्बन्ध कैसा है ?
उत्तर—आत्मा तथा कर्म का सम्बन्ध जल और दूध के समान अभिन्न है।

प्रश्न ४९५—मनुष्यों को कष्ट किसके सम्बन्ध से होते हैं ?
उत्तरमनुष्यों को जो कुछ कष्ट होते हैं वे पर के सम्बन्ध से ही होते हैं।

प्रश्न ४९६—मोक्षाभिलाषी मुनि किससे सम्बन्ध रखते हैं ?
उत्तर—मोक्षाभिलाषी मुनि संसार में किसी के साथ सम्बन्ध नहीं रखते केवल आत्मस्वरूप का चिंतन करते हैं।

प्रश्न ४९७—श्रीगुरु के वचन कैसे हैं ?
उत्तर—श्रीगुरु के वचन सदा आनन्द स्थान को देने वाले हैं।

प्रश्न ४९८—सुख—दुख आदिक कार्य किसके हैं ?
उत्तर—सुख—दुख आदिक कार्य कर्मों के हैं।

प्रश्न ४९९—आत्मा का कर्मों से कैसा सम्बन्ध है ?
उत्तर—आत्मा कर्मों से सर्वथा भिन्न है।

प्रश्न ५००—प्राणी कब तक देव, शास्त्र और गुरु को मानता है ?
उत्तर—जब तक प्राणी व्यवहार मार्ग में स्थित है तब तक भक्तिवश हो देव, शास्त्र तथा गुरु को मानता है।

प्रश्न ५०१—शुद्ध निश्चय मार्ग का अवलम्ब करने पर क्या होता है ?
उत्तर—शुद्ध निश्चय मार्ग का अवलम्ब करते समय हमारा आत्मा ही उत्कृष्ट तत्त्व है क्योंकि उस समय एकत्व की भावना से प्राप्त हुई बुद्धि की प्रौढ़ता से देवादि का कुछ भी भेद प्रतीत नहीं होता।

प्रश्न ५०२—परीषह आदि के जय से क्या होता है ?
उत्तर—परीषह आदि के जय से मोक्ष होता है।

प्रश्न ५०३—आत्मा कितना बलवान है ?
उत्तर—आत्मा सर्वशक्तिशाली प्रभु है।

प्रश्न ५०४—संसार में रहकर भी संयमी की स्थिति कैसी है ?
उत्तर—चाहे कमल का पत्ता कितने भी अगाध पानी में क्यों न पड़ा हो तो भी वह जरा भी पानी से लिप्त नहीं होता उसी प्रकार जिस संयमी का मन कर्मों के उपशम से, कर्मों के सर्वथा क्षय से अथवा गुरु के उत्तम उपदेश से आत्मा के एकत्व सम्बन्धी निर्मल ज्ञान का धारक है और समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित है और जिसका चित्त सदा आत्मसंबंधी एकत्व भावना से सहित है वह संयमी यद्यपि संसार में भी मौजूद है तथापि समस्त प्रकार के पापों से अलिप्त है।

प्रश्न ५०५—इच्छा किससे उत्पन्न होती है ?
उत्तर—इच्छा मोह से उत्पन्न होती है।

प्रश्न ५०६—क्या मुनि मोक्ष के विषय में इच्छा कर सकता है ?
उत्तरजो मुनि शुद्ध निश्चयनय के आश्रय करने वाले हैं और मोक्ष के अभिलाषी हैं वे कदापि किसी पदार्थ में जरा भी इच्छा नहीं करते हैं।

प्रश्न ५०७—आनन्द स्वरूप परमात्मा का विचार आने पर प्राणी कैसी प्रतीति करता है ?

उत्तर—आनन्द स्वरूप परमात्मा का विचार आने पर रस प्रिय नहीं रहते, गोष्ठी में कथा का जो कौतूहल रहता है वह नष्ट हो जाता है, विषय किनारा कर जाते हैं, शरीर में प्रीति नहीं रहती है, वाणी मौन को धारण कर लेती है, किसी प्रकार का दोष भी नहीं रहता और दोषों के साथ मन भी सर्वथा नष्ट हो जाता है।