ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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26.तात्पर्यार्थ में “शान्तरस एवं मार्गदर्षन

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तात्पर्यार्थ में “शान्तरस एवं मार्गदर्षन

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जिनागम के स्वाध्याय का लक्ष्य वस्तुतत्वविचार, वैराग्य एवं आत्मविषुद्धि है। वह भावविषुद्धि पर आधारित है। जब मन शान्त हो जाता है तब आत्मानुभव रूप शान्तरस का आस्वाद प्राप्त होता है, कहा भी है-

वस्तु विचारत ध्यावतैं मन पावै विश्राम।
रस स्वादत सुख ऊपजै अनुभव याको नाम।।

इसी आत्मानुभव रूप अमृत रस की खोज में साधक सतत प्रयत्नषील रहता है। मोक्षमार्ग का सारभूत तत्व भी आत्मानुभव ही है, शान्तरस का आस्वादन ही है। पंडितप्रवर बनारसीदास ने कहा है-

अनुभव चिन्तामणि रतन अनुभव है रस कूप।
अनुभव मारग मोक्ष को, अनुभव मोक्ष सरूप।।

जब अनुभव प्राप्त होता है तब अन्य किसी में भी रूचि नहीं रहती। समस्त इन्द्रिय विशय नीरस हो जाते हैं, उनमें आनन्द नहीं रहता। सांसारिक कथायें, संसर्ग और लोकलीलायें समाप्त हो जाती हैं। पौद्गलिक पदार्थों में पे्रम नहीं रहता। रागद्वेश से उत्पन्न चपलता नहीं रहती, मन शान्त हो जाता है। ज्ञानानन्द रूप अमृत अंतरंग मन में उच्छलित होता है। अत्यंत आध्यात्मिक उत्साह होता है। आत्र्त - रौद्र ध्यान की समाप्ति होकर धर्म और शुक्ल ध्यान प्रकट होता है। इसी अनुभव को परम उपादेय माना गया है। वस्तुतः इसी अनुभव रूप शान्तरस में ही मोक्षप्राप्ति हेतु शक्ति है।

स्याद्वाद चन्द्रिका में प्रस्तुत शान्त रस का स्वरूप एवं उपादेयता का निरूपण किया है। नियमसार स्वयं में एक आध्यात्मिक चेतना केन्द्र है। उस चेतना का प्रकाषन प्रायः संपूर्ण गंरथ में कुन्दकुन्द स्वामी द्वारा किया गया है जिसका वर्णन हम पूर्व में कर चुके हैं तथापि वैराग्यपूर्ण शान्तरस एवं आत्मानन्द रस की विषेश अनुभूति अपेक्षित समझकर यहां हम टीका के अन्य स्थलों के अतिरिक्त तात्पर्य भावार्थ में भी प्रकटित शात रस का कुछ विवेचन करेंगे। इससे स्याद्वाद चन्द्रिका की महत्ता के प्रकाषन में सहयोग मिलेगा।

प्रस्तुत टीका का अभिपे्रत लक्ष्य यथार्थ अवबोध (ज्ञान) द्वारा शान्त रस की प्राप्ति है। इसी हेतु सारार्थ में करणीय, अकरणीय विवेक द्वारा त्याग ग्रहण योग्य उपादान भी प्ररूपित किये गये हैं। उसी के लिए मार्ग निर्दिश्ट किया गया है।

नियमसार गाथा क्रमांक 99 के अंतर्गत आचार्य कुन्दकुन्द देव ने पर पदार्थों से निर्ममत्व धारण कर अपनी आत्मा को ही अवलम्बन बनाने की पे्ररणा की है। प्रस्तुत गाथा में अन्तर्भूत पदों पर ध्यान देना योग्य है। गाथा निम्न प्रकार है-

ममत्तिं परिवज्जामि णिम्ममत्तिं उवट्ठिदो।
आलंबणं च मे आदा, अवसेसं च वोस्सरे।। 99।।

इसमें णिम्ममत्ति उवट्ठिदो आदि पदों की व्याख्या रूप में टीकाकत्र्री माता जी कहती हैं-

‘‘पुनः निर्ममत्वं उपस्थितोऽस्मि बाह्यपदार्थेभ्यो निर्ममो भूत्वा शुद्धबुद्धनित्यनिरंजन- निर्विकारपरमानन्दस्वरूपे निजात्मनि ममत्वं विदधामि। किंचायं जीवः अनादिकालात् स्वात्मनो निर्ममो भूत्वा “शारीरधनुकुटुम्बादिपरवस्तुनि ममत्वं करोति। एतद्विपरीताभिप्रायमेव मिथ्यात्वं यत् जन्मजरामरणरोगषोकादिदुःखकारणमेव। तर्हि किं कर्तव्यं? ममात्मा आलबनं च न अन्यत्किमपि हस्तावलम्बनं ददाति। अतएव अवषेशं सर्वं चाहं व्युत्सृजामि। विधिवत् अभिप्रायपूर्वकं त्यागं करोमि।’’

‘‘पुनः बाह्य पदाथों से निर्मम होकर शुद्ध, बुद्ध नित्य, निरंजन, निर्विकार परमानन्द स्वरूप अपनी आत्मा में ममत्व करता हूं। क्योंकि अनादि काल से यह जीव अपनी आत्मा से निर्मम होकर शरीर, धन, कुटुम्ब आदि परवस्तु में ममत्व कर रहा है। यह विपरीत अभिप्राय ही मिथ्यात्व है। क्योंकि जन्म, जरा, मरण, रोग, आदि दुःखों का कारण है। तो फिर क्या करना चाहिए?

समाधान - मेरी आत्मा ही अवलम्बन है इससे अतिरिक्त अन्य कोई मुझे हाथ का अवलम्बन देने वाला नहीं है। इसीलिए आत्मा से अतिरिक्त अन्य सभी का मैं विधिवत् अभिप्रायपूर्वक त्याग करता हूँ।’’

अतः साधुओं के लिए अपने पद के योग्य समस्त वस्तुओं का त्याग कर योग्य पदार्थ संयमोपकरण पीछी, ज्ञानोपकरण शस्त्र, शोच-उपकरण कमंडलु एवं चतुर्विध संघ में भी निर्ममत्व का अभ्यास करना चाहिए।

मोक्षमार्ग में प्रयोजनभूत जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्व हैं इनमें संवर और निर्जरा तत्व मोक्ष हेतु उपादेयभूत हैं (मोक्ष तो परम उपादेय ही है)। निष्चय नय की दृश्टि में संवर और निर्जरा आत्मरूपभूत ही है। नियमसार की गाथा क्रमांक 100 में निरूपित किया गया है कि दर्षन, ज्ञान, चारित्र, प्रत्याख्यान, संवर और योग में मेरी आत्मा का अस्तित्व है। स्याद्वाद चन्द्रिका कत्र्री ने प्र्रस्तुत गाथा के भावार्थ में इन समस्त उपादेयभूत तत्वों में स्थिति ही आत्मा के लिए “शरण है, इस भाव की व्यक्ति हेतु निम्न “शब्दावली का प्रयोग किया है, पाठकों की सुगमता हेतु उसका हिन्दी अनुवाद मात्र यहां दिया जा रहा है-

ज्ञान - दर्षन - चारित्र - प्रत्याख्यान - संवर और योग ये सभी आत्मा में रहते हैं इनसे अतिरिक्त जो कुछ भी है वह सब त्याज्य है। ऐसा जानकर जब तक ये सब जब तक अपनी आत्मा में प्रकट न हो जावें तब तक परमात्मा की “शरण लेनी चाहिए। पुनः निस्पृह मुनि होकर ज्ञान, दर्षन, चारित्र, प्रत्याख्यान, संवर और योग की “ारण लेकर ज्ञान दर्षन आदि स्वभाव परमानंद एक लक्षण वाली ऐसी अपनी आत्मा की “शरण लेनी चाहिए।’’

यहां यह विषेश ज्ञातव्य है कि मूल ग्रंथकर्ता ने ज्ञान, संवर आदि को आधार प्ररूपित कर आत्मा को आधेय रूप में स्थापित किया है। टीकागत भावार्थ में आत्मा को आधार और इन उपादेय तत्वों को आधेय रूप में प्रकट किया गया है। यह विवक्षा भेद है। विवक्षा भेद से गुण में गुणी तथा गुणी में गुण दोनों रूपों को स्वीकार किया जाता है। जैसे लोक में स्वर्ण में पीलापन और पीलापन में स्वर्ण दोनों कथन अपेक्षा से सिद्ध हैं। गुण और गुणी में भेद और अभेद दोनों स्वीकृत है। दोनों में मूल वस्तु अखंड एवं एक है। दोनों का आधार आधेय भाव अविरुद्ध है। उपादेयभूत, तत्वों में आत्मस्थिति को माता जी ने “शरण रूप में व्यक्त किया है एवं प्रारम्भिक अवस्था में परमात्मा को, उपरिम पदवी में अपनी आत्मा को “शरण प्ररूपित किया है। उद्देष्य तो परिणामों में विषुद्धि, विरागता एवं “शान्तरस के जागरण का ही है।

नियमसार के सूत्र क्रमांक 1021 (अनुश्टप छंद में) को समयसार और मूलाचारमें भी आ० कुन्दकुन्द स्वामी ने प्रयुक्त किया है जिसका आषय यह है कि एक “शष्वत और ज्ञान दर्षन लक्षण वाला आत्मा ही मेरा है संयोग लक्षण वाले सभी भाव मेरे से बाह्य हैं। इस विय में टीकाकत्र्री ने यह स्पश्ट किया है कि श्री कुन्दकुन्द की आत्मा और “शरीर की भेद भावना को दृढ़ करने में अत्यधिक रूचि थी। उन्होंने आचार्य पद्मनन्दी कृत पंचविंषतिका के यतिभावनाश्टक का एक “लोक उद्धृत कर इसी विषेश भेदज्ञान पर बल दिया है जहां समस्त प्रकार की उपसर्ग, परीशह में भी योगी का मन शान्त एवं स्थिर रहता है। भेद भावना के प्ररूपक उक्त सूत्र के सदैव स्मरण की पे्ररणा टीकाकत्र्री माँ ने की है उनका वचन है कि प्रतिदिन प्रतिक्षण इस गाथा का चिंतन एवं अभ्यास करना चाहिए जब तक कि मन की प्रवृत्ति ध्यान में एकलीनता को न प्राप्त हो जावे। यही शान्ति का मार्ग है।

गाथा सं० 104 एक प्रसिद्ध सूत्र है जिसमें मूल ग्रंथकर्ता आचार्य देव ने सब जीवों को समता, मैत्री, निस्पृहता तथा परमसमाधि का उपदेष दिया है। इसकी टीका सम्यग्दृश्टि जीवों के लिए अत्यंत रूचिकर और वैराग्य परक रूप में अनेक उद्धरण देकर ज्ञानमती माता जी ने लिखी है। अंत में तात्पर्य रूप में दो संक्षिप्त पद उन्होंने प्रयुक्त किये हैं। अत्यंत प्रिय एवं उपयोगी जानकर यहां पाठकों के सम्मुख रख रहा हूँ। यहां यह विवेचन है कि कौन सी आषा व्याज्य है और कौन सी आषा ग्रहणीय है, दृश्टव्य है-

‘‘ इति हेतोः स्वार्थसिद्धिः एवमाषामादाय परमवैराग्यभावपरिणतोऽहं परवस्तुभ्य आषां त्यजामि।’’

इस हेतु से (अपना स्वरूप ज्ञानमय होने के कारण) मैं अपने प्रयोजन की सिद्धि की आषा को लेकर परम वैराग्य भाव से परिणत होता हुआ पर वस्तुओं की आषा को छोड़ता हूँ।

‘‘ इत्थं ज्ञात्वा परमसमरसभावो विधातव्यः।’’

ऐसा (उद्धृत “लोक का भाव) जानकर परम समरस भाव रखना चाहिए। समदृश्टि, सम्यग्दृश्टि के दो शाक्तियां होती हैं, ज्ञान एवं वैराग्य। उभय “शक्तियों के विकास को शात रस का प्रस्फुटन कहा जा सकता है। इसी शान्त रस के द्वारा वह पर का त्याग एवं निज में स्थिति करता है। शान्ति रूपी दर्पण में ही आत्म साक्षात्कार या प्रतिविम्बन होता है। इन्हीं सभी रूपों पर स्याद्वाद चन्द्रिका में सम्यक् प्रकाष डाला गया है।

किसी भी टीका में “शब्दार्थ, पदार्थ, अन्वयार्थ, वाक्यार्थ और तात्पर्यार्थ या भावार्थ की समश्टि के दर्षन होते हैं तथा नयार्थ, मतार्थ और आगमार्थ द्वारा रचना का रहस्य उद्घाटित किया जाता है। लेखक का जो भी वाच्य हो उसके वाचक “शब्दों के विन्यास के उक्त रूपों से टीका संपूर्ण एवं समृद्ध होती है। अपेक्षित रस का प्रस्फुटन भावार्थ पर जाकर पूर्ण विराम लेता है। पाठक को भावार्थ से ही अभीश्ट रस की अनुभूति होती है। रसानुभूति ही ग्रंथ - पारायण का उद्देष्य होता है।

नियमसार रूप अध्यात्म के महासमुद्र का अवगाहन करने हेतु स्याद्वाद चन्द्रिका में गाथाओं का भावार्थ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे शान्ति एवं आनन्द का परिपाक, पूर्ण अनुभव श्रोता को संभावित है। यहां “शब्दालंकार से सुसज्जित निम्न स्थल दर्षनीय है-

‘‘ये रत्नत्रयनिलयाः चिन्ताविलया धर्मालया जिनमुद्राधरा मुनयः सर्वदोशविषुद्- ध्यर्थमात्मनः शुद्ध्यर्थं व्यवहारालोचनाविनाभाविनिष्चयालोचनां कर्तुमीहन्ते त एव पुण्यषालिनः स्वपरभेदबोधमालिनो निष्चयेन शुद्धोपयोगिनो भूत्वा सत्वरमेव स्वात्मोपलब्धिं सिद्धि प्राप्स्यन्तीति ज्ञात्वा प्रमादमपसार्य त्वयापि दषविधदोशविरहितामालोचनां कृत्वा निजात्मषुद्धिः कर्तव्या।
यह टीकांष अति सुंदर पद-संहति के रूप में है। इसका अर्थ है, जो मुनि रत्नत्रय के निलय समान है, सर्व चिंताओं का विलय कर चुके हैं और धर्म के आलय, स्थान है वे जिनमुद्राधारी निग्र्रन्थ दिगम्बर मुनि सर्व दोशों की विषुद्धि और आत्मा की “शुद्धि के लिए व्यवहार आलोचना से अविनाभावी ऐसी निष्चय आलोचना को करना चाहते हैं वे ही पुण्यषाली, स्वपर भेदविज्ञान के स्वामी महामुनि निष्चय से “शुद्धोपयोगी होकर शीघ्र ही अपने आत्मा के स्वरूप की उपलब्धि रूप सिद्धि को प्राप्त कर लेंगे, ऐसा जानकर प्रमाद को दूर कर तुम्हें भी दषविध दोशों से रहित आलोचना करके निज आत्मा की
“शुद्धि करना चाहिए।’’

प्रस्तुत भावार्थ पर दृश्टिपात करने से ज्ञात होता है कि इसमें मानो संपूर्ण नियमसार को एक ही स्थल पर टीकाकत्र्री ने दर्षा दिया हो। नियम “शब्द का वाच्य रत्नत्रय नियमसार के प्रारंभ में ही कुन्दकुन्द देव ने बतलाया है एवं नियम और नियम के फल को प्रदर्षित कर उसके निरूपण की प्रतिज्ञा की है। प्रस्तुत भावार्थ में रत्नत्रयनिलया “शब्द से ‘सार नियम’ का आधार यतीष्वरों को परिगणित किया गया है। वे नियम के प्रभाव से समस्त चिंताओं का अभाव कर संपूर्ण शंन्ति-स्वरूप, ध्यान- अध्ययन धर्मायतन रूप होकर अर्थात् निग्र्रन्थ होकर व्यवहार धर्म से साध्य शुद्धोपयोग रूप निष्चय धर्म को प्राप्त कर नियम के फल अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यह प्रक्रिया ही नियम और उसके फल मोक्ष का साधन करने वाली है। टीकागत उपरोक्त सारांष में नियमसार के समस्त 12 अधिकारों का सार समाया हुआ है। इस भावार्थ से निम्न बिन्दु स्पश्ट सिद्ध होते हैं, जो नियमसार के वण्र्य विशय हैं-

1- नियम अथवा रत्नत्रय के धारक निग्र्रन्थ जिनमुद्राधारक यति (नियमसार ग्रंथ के निरूपणानुसार) होते हैं। मोक्षमार्ग में यही भेश मान्य है।

2- व्यवहार रत्नत्रय से साध्य ही निष्चय रत्नत्रय होता है। यह नियमसार के व्यवहार चारित्राधिकार एवं निष्चय प्रतिक्रमण आदि अधिकारों से स्पश्ट ही है।

3- समस्त चिंताओं का विलय परिग्रह के त्याग से ही संभव है।

4- आलोचना एवं प्रतिक्रमण के द्वारा ही सर्वदोशों का परिहार, आत्मषुद्धि संभव है इसी हेतु नियमसारप्राभृत में ये अधिकार समाविश्ट किए गये हैं। समयसार के शुद्ध निष्चय नय की दृश्टि से कथित प्रतिक्रमण के विशकुम्भ रूप निरूपण को सर्वथा ग्रहण नहीं करना चाहिए।

5- शुद्धोपयोगी मुनि ही होते हैं गृहस्थ नहीं तथा शुद्धोपयोगी मुनि को ही आत्म स्वरूप की उपलब्धि होती है। मात्र शुभोपयोग में संतुश्ट को नहीं।

6- स्वपरभेद विज्ञान से ही शुद्धोपयोग संभव है।

7- साधु को भी प्रमाद का परिहार करके ही शुद्धोपयोग की प्राप्ति होती है।

8- जिनमुद्राधारी मुनि ही पुण्यषाली हैं। अपने को अव्रत सम्यग्दृश्टि भ्रम से मानकर पुण्यषाली मानना ठीक नहीं है। सर्वथा पुण्य को हेय मानना भी मिथ्या मान्यता है।

9- आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान आदि साधु के आवष्यक हैं भले ही वे वचनात्मक एवं व्यवहार रूप हैं। वे आत्मषुद्धि के साधन हैं। इन आवष्यकों में प्रमाद करने वाले साधु भी स्वपरभेद विज्ञान के अभाव में अवनति को प्राप्त होते हैं।

नियमसार के समस्त अध्यायों में यही विशय वर्णित है। उसी के संक्षिप्त फलितार्थ रूप में टीकागत तात्पर्यार्थ प्रकट किया गया है। ‘‘निजात्मषुद्धि कर्तव्या’’ इस कथन से टीकाकत्र्री ने भावविषुद्धि को ही मुख्य ध्येय निरूपित किया है। गाथा क्रमांक 112 की टीका में निम्न वाक्य सम्मिलित हैं उससे भी यही स्पश्ट होता है-

‘‘ततो भावविषुद्धयर्थं मनोमर्कटः वषीकर्तव्यः।’’

इसलिए भाव विषुद्धि हेतु मनरूपी बन्दर को वष में करना चाहिए। अध्यात्म शास्त्रों में भेद विज्ञान की महती चर्चा है। इससे ही मोक्ष प्राप्ति होती तथा इसके अभाव में ही कर्मबन्ध होता है।1 स्याद्वाद चन्द्रिका में भी भेद विज्ञान को अति महत्व दिया गया है। बिना भेद विज्ञान के साधु भावलिंगी नहीं होता। टीकाकत्र्री ने गाथा 116 की टीका के अंतर्गत कथन किया है कि हित की प्राप्ति, अहित का परिहार इनके गुणदोश को विचार करने की क्षमता को संज्ञा कहते हैं इस संज्ञा से युक्त भाव मन को या चित्त को ज्ञान कहते हैं। जब यह ज्ञान हित के ग्रहण, निज आत्मा के ग्रहण और अहित एवं परद्रव्यों के त्याग में प्रयुक्त होता है तो यह सर्वोत्कृश्ट रूप में भेद विज्ञान कहलाता है केवल शाब्दिक या चिंतन रूप नहीं। जब यह मुनि को प्रकट होता है तब उनके संपूर्ण दोशों को दूर करने के लिए निष्चय प्रायष्चित्त कहलाता है। यह भेद विज्ञान ही साक्षात् मोक्ष का कारण है। इसी के बल से परमसमाधि रूप शान्ति प्राप्ति के द्वारा सिद्धि सुख मिलता है।

श्रमण के ‘डावष्यकों में स्वाध्याय का बहुत महत्व है। यह बाह्य और अंतरंग दो प्रकार का है। वचनात्मक द्रव्यश्रुत का अध्ययन, जिसके वाचना, पृच्छना, आम्नाय, अनुपे्रक्षा और उपदेष ये पांच भेद हैं, बाह्य स्वाध्याय है। जिनवचन के मन्तव्य को मन में चिंतन कर उसी भावश्रुत रूप परिणमित होना अंतरंग स्वाध्याय है। स्वाध्याय को अंतरंग तपों में स्थान दिया गया है। इसे सर्वश्रेश्ठ तप संज्ञा भी दी गई है। यह कर्म निर्जरा का प्रधान कारण है। ‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ लेखिका ने भी शस्त्रोक्त प्रमाणों से गाथा 118 की टीका के अंतर्गत निरूपित किया है कि स्वाध्याय के समान न तप हुआ है न होगा। स्वाध्याय से पांचों इन्द्रियों के विशय रूक जाते हैं। तीनों गुप्तियां हो जाती हैं, मन एकाग्र हो जाता है। जो मुनि उपयोग लगाकर विनय से स्वाध्याय करते हैं उन्हें ये लाभ होते हैं। ज्ञातव्य है कि नियमसार का पात्र मुनि है। अतः स्थान स्थान पर मुनि या साधु, श्रमण आदि का प्रयोग हुआ है। इसमें मुनि के ही व्यवहार और निष्चय रत्नत्रय का निरूपण है। प्रस्तुत गाथा की टीका में निम्न वाक्य ध्यान देने योग्य है।

‘‘एशु द्वादषविधतपस्सु वर्तमान काले स्वाध्याय एव परमोतपः गीयते।’’

अर्थ - इन बारह प्रकार के तपों में (अनषन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रस परित्याग, विविक्त “शय्यासन, कालक्लेष, प्रायष्चित, विनय, वैय्यावृत्ति, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग एवं ध्यान में) वर्तमान काल में स्वाध्याय ही परम तप कहा गया है।

यहां स्वाध्याय का तात्पर्य द्रव्यश्रुत के स्वाध्याय से विषेशकर है। आ० पुश्पदंत, भूतबली से पूर्व तो लिपिबद्ध आगम था ही नहीं। चूंकि इस समय लिपिबद्ध श्रुत विद्यमान है और उद्देष्य भावविषुद्धि एवं ज्ञानवद्र्धन का है तो वर्तमान काल में अवष्य ही द्रव्यश्रुत का स्वाध्याय करना ही परम तप है। इसी के अवलम्बन से महती कर्म निर्जरा होती है। इस काल में हीन संहनन के कारण कायक्लेषादि, आतापनयोगादि प्रचण्ड तप संभव नहीं है उत्कृश्ट ध्यान, शुद्धोपयोग, शुक्लध्यान भी संभव नहीं है, अतः द्रव्यश्रुत का स्वाध्याय ही परम औशधि है। भावश्रुतज्ञान की सिद्धि द्रव्यश्रुत के अवलंबन से ही होती है इससे उपयोग आत्मसम्मुख होता है। इसी गाथा की टीका के अंतर्गत माता जी ने एतद्विशयक ही निम्न तात्पर्य प्रस्तुत किया है, अवलोकनीय है-

‘‘बाह्यतपोऽनुश्ठातृभिस्तपस्विभिः स्वाध्यायतपोमाहात्म्यमवबुद्ध्य स्वस्मिन् केवलज्ञानज्योतिः- प्रकटीकरणार्थं ततः प्राग्भावश्रुतज्ञानसिद्ध्यर्थं सततं द्रव्यश्रुताभ्यासो विधातव्यः।’’

तात्पर्य यह है कि बाह्य तप के अनुश्ठान करने वाले तपस्वियों को स्वाध्याय का माहात्म्य जानकर अपनी केवल ज्ञानज्योति प्रकट करने के लिए और उसके पूर्व भावश्रुत की सिद्धि के लिए सतत ही द्रव्यश्रुत का अभ्यास करते रहना चाहिए।

गाथा 121 की टीका करते हुए माता जी ने यह भाव व्यक्त किया है कि जो अंतर्बाह्य जल्प से रहित होकर मौनावलम्बी होकर शुद्ध ज्ञानदर्षन स्वभाव निज आत्मा का ध्यान करते हैं उनके वचनबल ऋद्धि प्रकट हो जाती है। जिसके निमित्त से वे अंतर्मुहूर्त में ही संपूर्ण द्वादषांग का पठन करते हुए थकित नहीं होते। अतः यदि ध्यान की सामथ्र्य है तो द्रव्यश्रुत का पठन तो चिंतन रूप ही हो जाता है फिर शास्त्र आदि का निमित्त अपेक्षित नहीं है। तपस्या द्वारा ज्ञानावरण का विषेश क्षयोपषम होने से संपूर्ण द्वादषांग कण्ठस्थ हो जाता है। उपयोग लगन पर अंतर्मुहूर्त में ही पूरा पारायण हो जाता है। अतः साधुओं को आत्मध्यान शाक्ति को जागृत करना चाहिए।

नियमसार गाथा 127 में उल्लिखित है कि जिसकी आत्मा संयम, नियम तथा तप में लगी हुई है उसी के स्थायी सामायिक होती है। मूलाचार में आ० कुन्दकुन्द देव ने सम्यक्त्व, ज्ञान, संयम और तप के साथ प्रषस्त समागम को सामायिक कहा है। ये दोनों प्रकारान्तर से एक ही हैं। रत्नत्रय और चार आराधना रूप परिणतिमय सामायिक को ज्ञानमती माता जी ने स्थायी रखने हेतु पे्ररणा की है जो गाथा 127 के सारांष के रूप में है।

‘‘एतत्सामायिकस्य स्थायिकरणोपायं ज्ञात्वा भवद्भिरपि सततं तस्य भावना विधातव्या, तावत्, यावत् तन्न स्वस्मिन् स्थिरीभूयात्।’’

प्रस्तुत सामायिक के स्थायी करने के उपाय को जानकर आपको भी सतत् तब तक उसकी भावना करते रहना चाहिए जब तक वह अपनी आत्मा में स्थिर नहीं हो जावे इसी समता भाव की जागृति हेतु उन्होंने परम समाधि अधिकार की गाथाओं के तात्पर्य रूप कथन किया है जो साधक के लिए अत्यंत मार्गदर्षक है। स्थायी सामायिक की प्राप्ति सातवें अप्रमत्त गुणस्थान में होती है, उसी के लिए “शत्रु, मित्र, तृण, कंचन, महल, “मषान, दुःख-सुख, राग-द्वेश अभाव रूप समता धारण करने रूप व्यावहारिक समत्व तो सदैव ही रखना चाहिए। निष्चय सामायिक को ध्यान कहा गया है। ध्यान सिद्धि, साधुओं को तो संभव है गृहस्थों को नहीं। इसकी स्पश्ट घोशणा आगमानुसार स्याद्वाद चन्द्रिका में की गई है। यह पृश्ठ 376 पर दृश्टव्य है।

‘‘ये केचित् आरम्भपरिग्रहासक्ता गृहस्था असिमसिकृश्यादिक्रियासु प्रवत्र्तन्ते तेशां ध्यानसिद्धिर्सामायिक नाम्ना कथं सम्भवेत्।’’

जो कोई आरंभ-परिग्रह में आसक्त हुए गृहस्थ असि, मसि, कृशि आदि क्रियाओं में प्रवृत्ति कर रहे हैं उनके निष्चय सामायिक नामक ध्यान की सिद्धि कैसे संभव है ? (कदापि नहीं) भगवान महावीर के वर्तमान तीर्थकाल में आ० कुन्दकुन्द स्वामी अध्यात्म के निष्चय नयप्रधान उपदेष के प्रमुख आचार्य हैं। उन्होंने ग्रंथ रचना श्रमणों को लक्ष्य में रखकर की है उनका निष्चय नय निरूपण ऐकान्तिक नहीं है, व्यवहार की सापेक्षता रखने वाला ही है। जिनवाणी भी उभयनय संयुक्त ही है। नियमसार में परमभक्ति अधिकार में स्वयं कुन्दकुन्दाचार्य ने निष्चय प्रधान गाथाओं के साथ व्यवहार की उपादेयता सूचित करने वाली गाथाओं की रचना भी की है। गाथा सं० 135 निम्न प्रकार हैं-

मोक्खगयं पुरिसाणं गुणभेदं जाणिउण तेसिं पि।
जो कुणदि परमभत्तिं ववहारणयेण परिकहियं।।135।।

मोक्ष को प्राप्त हुए पुरूशों के गुणभेद को जानकर उनकी भी जो परम भक्ति करते हैं उनके व्यवहार नय से कथित भक्ति होती है। आ० कुन्दकुन्द ने दसों प्रकार की भक्ति को निर्वाण भक्ति और योग भक्ति में गर्भित किया है ज्ञानमती माता जी ने वर्णन किया है कि किस भक्ति में कौन कौन सी भक्तियां गर्भित की जा सकती हैं। यह सब व्यवहार परक कथन है। व्यवहार और निष्चय योग भक्ति के विशय में माता जी ने स्वयं साधु की स्थिति को स्पश्ट किया है जो कि सभी के लिए मार्गदर्षक है। पृ० 409 पर अवलोकन करें-

‘‘परमयोगभक्त्यैव योगनिरोधसामथ्र्यं समुत्पद्यते तथा च व्यवहारयोगिभक्त्या योगभक्तिः साध्या भवतीति ज्ञात्वा योगनिरुद्धास्तीर्थंकरा निजमनोयोगे परमभक्त्या मया निधीयन्ते।’’

आषय यह है कि परमयोगभक्ति से ही योगनिरोध की सामथ्र्य उत्पन्न होती है और योगिभक्ति से योगभक्ति साध्य होती है ऐसा जानकर योग निरोध करने वाले तीर्थंकरों को मैं अपने मनोयोग में परम भक्ति से स्थापित करता हू।

जिनषासन में कर्मों की निर्जरा हेतु ध्यान को सर्वोत्कृश्ट स्थान प्राप्त है ध्यान से ही मुनित्व का यथार्थपना है। जब साधु बाह्य प्रवृत्तियों से मन को हटाकर आत्मतत्व में एकाग्र होकर समस्त चिंताओं का निरोध करता है तो यही रूप धर्मध्यान व “शक्लध्यान कहलाता है। इसी को ध्यानाग्नि कहते हैं जिससे कर्म रूपी ईंधन “शीघ्र भस्म हो जाता है। जीव आत्मा से परमात्मा हो जाता है। नियमसार गाथा क्रमांक 151 के अंतर्गत कुन्दकुन्द स्वामी के ‘‘ध्यानयुक्त श्रमण अंतरात्मा है और ध्यान से रहित बहिरात्मा है’ इसी प्रकार के भाव को दृश्टिगत कर प्रस्तुत टीका ग्रंथ में टीकाकत्र्री ने इसका स्पश्टीकरण कर श्रमणों को ध्यानस्थ होने हेतु निम्न वाक्यों का सृजन किया है-

‘‘जो कोई मुनि ख्याति, लाभ, पूजा आदि की इच्छा रखते हुए सभी लोगों को खुष करने वाली प्रवृत्ति के इच्छुक होकर आत्मा की उपेक्षा करके ध्यान का अभ्यास नहीं करते हैं, वे द्रव्यलिंगी बहिरात्मा ही होते हैं। अतः साधुओं को यथाषक्ति प्रतिदिन ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।’’

उपरोक्त प्रकार ही साधुओं के लिए ज्ञान और ध्यान का संकेतन ज्ञानमती माँ ने प्रस्तुति में किया है। ज्ञान जीव का विषेश गुण है जो अन्य सभी गुणों में व्याप्त है। आ० कुन्दकुन्द स्वामी ने इसी ज्ञानयुक्त ज्ञायक भाव के ही तीन भेद समयसार जी में किए हैं, दर्षन-ज्ञान-चारित्र। ये तीनों ही ज्ञानरूप हैं। आचार्य अमृतचन्द्र जी ने आत्मख्याति टीका में तीनों को ज्ञान की “शाक्ति रूप कहा है। स्याद्वाद चन्द्रिका में भी श्रमणों के लिए ज्ञान पर बड़ा बल दिया गया है। गाथा क्रमांक 157 का विस्तार करते हुए लेखिका ने कहा है कि जो दिगम्बर मुनि पीछी, कमण्डलु और “शस्त्र आदि उपकरणों से, षिश्यपरिकर सहित चतुर्विध संघ से एवं रत्नत्रय के साधनभूत निज शरीर से भी ममत्व का त्याग कर स्वपर भेदविज्ञान के द्वारा निज परमानन्द लक्षण परमतत्व ज्ञानामृत रूप ज्ञाननिधि को प्राप्त कर लेते हैं वे स्वयं ज्ञानस्वरूप हो जाते हैं। यह अपूर्व ज्ञाननिधि चैदह रत्न और नवनिधि तथा चक्रवर्ती के भंडार से भी महान कोश है। इस ज्ञाननिधि को प्राप्त करने वाले तपोधन ही परमसमाधि रूप अतीव गूढ़ स्थान में स्थित होकर परम आल्हाद रूप अमृत को पीते हुए परम तृप्त हो जाते हैं। इसी अर्थ की पुश्टि हेतु उन्होंने आ० कुन्दकुन्द के प्रवचनसार की गाथा 239 को भी प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्तुत टीका ग्रंथ में वैराग्य एवं शात रस का निर्झर झरता हुआ पाठकों के अंतर्मन को लोकसम्भावी क्लेषों से मुक्ति दिलाकर “शतलता प्रदान करता है। यह परम्परा से मोक्षप्राप्ति में सहायक सिद्ध हो सकता है। इस टीका में प्रस्तुत तात्पर्य वाक्य तो अक्षय अनुपम शान्ति के भंडार हैं। बस आवष्यकता है उनका पारायण कर तद्नुरूप अपने मन-वाणी-षरीर की प्रक्रिया को आत्मकेन्द्रित करने की। यतः मूलग्रंथकर्ता आ० कुन्दकुन्द स्वयं ज्ञान-वैराग्य एवं उसके फल शान्ति के धनी थे और टीकाकत्र्री भी अंतरंग से विशय कशायों, भोगां से विरक्त तपस्विनी है, अतः स्वाभाविक रूप से ऐसी संत परम्परा का यह ज्ञानपीयूशपिण्ड अवष्य ही शान्ति प्रदायक होगा। नियमसार में सार नियम सम्यग्दर्षन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र के घनरूप समुदाय का जो स्वरूप वर्णित है यथार्थ में उसी का प्रकटीकरण, विस्तारीकरण रूप पल्लवित व्याख्यान तद्नुरूप आध्यात्मिक विशयानुगामी होकर ही इस कृति में प्रकट हुआ है। विशयान्तर कुछ है ऐसा नहीं लगता। सबका तात्पर्य तो रत्नत्रय (नियम) का प्रकाषन ही है। ज्ञान के साथ भक्ति का समावेष भी इस टीका में किया गया है। यद्यपि यह मूल अध्यात्म से कुछ पृथकः या विशयान्तर सा भी ज्ञात हो सकता है परन्तु वह भी सम्यग्दर्षन का अंगभूत ही है अथवा यह सम्यग्दर्षन एवं लक्षण का वाच्य है तथा व्यवहार चारित्र एवं व्यवहार दषभक्ति में इसका अंतर्भाव है। वह ज्ञानमय एवं शातरस का पिटारा ही कहा जावेगा। भगवद्भक्ति में तो विशय कशायों से विराम एवं शात होकर ही सम्यक् प्रवृत्ति होती है। आगे हम भक्ति प्रकाषन की चर्चा करेंगे; वहां इस विशय पर सम्यक् प्रकाष डाला जावेगा।