ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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प्रथामाचार्य श्री शांतिसागर महाराज की 62 वीं पुण्यतिथि (भाद्रपद शुक्ला दुतिया) 23 अगस्त को मुंबई के जैनम हाल में पूज्य गणिनी ज्ञानमती माता जी के सानिध्य में मनायी जाएगी जैन धर्मावलंबी अपने-अपने नगरों में विशेष रूप से इस पुण्यतिथि को मनाकर सातिशय पुण्य का बंध करें|
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इस मंत्र की जाप्य दो दिन 22 और 23 तारीख को करे |

सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं साधुसमाधि भावनायै नमः"

27. प्रभुता से प्रभु दूर

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प्रभुता से प्रभु दूर

(काव्य चौतीस व पैंतीस से सम्बन्धित कथा)

प्रभुत्व एक महाशक्ति है, जिसके आवरण में व्यक्ति स्वयं को अति उच्च मान बैठता है।राजा भीमसेन बनारस के महाराजाधिराज थे। आस पास के क्षेत्रों में स्थित अन्य छोटे-छोटे जागीरदार उनका लोहा मानते थे तथा खुशामंदी-चापलूस उनको हमेशा चारों ओर से घेरे रहते थे। राजा भीमसेन ने धर्म के विविध सम्प्रदायों का अध्ययन किया था और उनका यही निजी मत था कि वे ऐसा धर्म स्थापित करें जिसमें समस्त धर्मों का सत्व शामिल हो। कई विद्वानों ने इस कार्य को अपने हाथ में लिया किन्तु धर्म की यह खिचड़ी वे पका न सके। अन्तोगत्वा भीमसेन ने ही धर्म के सिद्धान्तों का संकलन किया तथा उनके द्वारा स्थापित धर्म का पालन प्रत्येक नागरिक को आवश्यक कर दिया गया। मंदिर, मठ और मस्जिद को छोड़कर राजमहल के पास वाले ‘‘नवीन धर्म-संस्थापक-देवालय’’ में जाना जब अनिवार्य हो गया तब कई धर्म प्रेमी राज्य छोड़कर अन्यत्र जा बसे तथा कई शक्तिशाली व्यक्ति शासन के विरूद्ध गुप्त षडयंत्र रचाने लगे।जब राजा भीमसेन ने कुपित होकर मन्दिरों और मस्जिदों को तुड़वा कर उनकी नीव पर अपने देवालय स्थापित करनावाना आरम्भ कर दिया

नवीन धर्मोत्साही इन पैगम्बर महोदय को छह मास के भीतर ही कुष्ट रोग हो गया। उनका बलिष्ठ सुन्दर सांचे में ढला शरीर अत्यन्त दुर्बल और घिनावना हो गया था। कान्ति कपूर की भाँति विलीन हो गई थी। अस्थि, चर्म, मांस सब सूख गये थे। पटरानी सुदर्शना उनको देखकर डरती थी। भीमसेन की उपस्थिति उसे दुखित करती थी। प्रेमपूर्वक वार्तालाप करने वाली अन्य सभी रानियाँ भी उनकी छाया से बचने लगीं। भीमसेन की प्रत्येक आज्ञा प्रजा को ईश्वर की आज्ञा के समान मानना पड़ती थी किन्तु इस दुरावस्था में सभी कर्मचारी उनकी अवज्ञा कर रहे थे।नगर निवासी जो धर्म विच्छेदन पर मन ही मन गालियाँ दिया करते थे अब खुश होकर कहते थे कि धर्म पर आघात करने वालों को प्रत्यक्ष फल मिलता है।

जगह-जगह वीर-वाणी का प्रचार करते हुए मुनिश्री बुद्धकीर्ति जी महराज वाराणसी नगरी में आये। राजा भीमसेन उन्हें देखकर मुनिश्री के पादारविन्दों पर लेट गए और अपनी बदकिस्मती-कमनसीबी का कच्चा चिट्ठा कह सुनाया। विवेकी परम सन्तोषी मुनिश्री बुद्धिकीर्ति जी महाराज अपनी दिव्यदृष्टि से कुछ क्षण सोचते रहे-फिर बोले— ‘‘किसी भी धर्म की निन्दा करना एक महान् दुष्कार्य है, जिसको करने वाला महापाप का भागी होता है। मद से चूर हाथी नागरिकों को हानि पहँुचाता है, किन्तु इसका ध्यान उसे शक्ति हीन अवस्था में आता है यौवन के भार से उन्मत्त युवक अपनी संचित शक्ति का दुरुपयोग करते हैं किन्तु इसका पश्चाताप उन्हें वृद्धावस्था में होता है। ‘‘राजन्! उसी प्रकार आपने भी सत्ता के मद में आकर धर्मों पर आघात प्रतिघात किया किन्तु इसके दुष्परिणाम पर अब आप दुखित हो रहे हैं।’’ राजा भीमसेन ने कभी स्वयं की निन्दा न सुनी थी और वे विश्वास भी नहीं करते थे। कि धर्म निन्दा के फल स्वरूप उन्हें अचानक यह बीमारी हुई है। रष्ट होकर बोले-‘‘महाराज! मैं कारण नहीं पूँछ रहा हूँ।सिर्प यदि इसका कोई सफल उपचार हो तो बतलाइये?’’ बुद्धिकीर्ति मुनिराज को सहसा कुछ याद न आया अतएव साम्यभाव से कहा-कि कल बतलाऊँगा। राजा भीमसेन ने लगातार तीन दिन बड़ी कठिन तपस्या की। मुनिराज द्वारा सिखलाये गये महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र के ३४ और ३५वें काव्यों का अखंड पाठ किया, और उनके मंत्रों की साधना में ऐसा लवलीन हुआ कि स्वयं जैन शासन की अधिष्ठात्री चव्रेश्वरी देवी ने प्रकट होकर कहा-उठो वत्स! तुम्हारी मनोकामना सफल होगी। भगवान् आदिनाथ का अभिषेक कर गन्धोदक से शरीर पवित्र करो- कह कर देवी अन्तर्धान हो गई।

दूसरे दिन सभी रानियाँ ने राजा भीमसेन के सुन्दर शरीर की आरती उतारी और मंगल गीतों से राज-भवन के कोने को गुँजा दिया।