ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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28.ब्रह्मचर्याष्टक प्रश्नोत्तरी

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ब्रह्मचर्याष्टक

प्रश्न ५२८—संसार की वृद्धि किससे होती है ?
उत्तर—मैथुन सेवन से संसार की वृद्धि होती है।

प्रश्न ५२९—मैथुन से संसार की वृद्धि किस प्रकार सम्भव है ?
उत्तर—मैथुन करने से अनेक प्रकार के कीड़ों का विघात होता है, उस विघात से हिंसा होती है, हिंसा से कर्मों का बन्ध होता है और कर्मों के बंधन से इस पंच परावर्तन रूप संसार में घूमना पड़ता है।

प्रश्न ५३०—विद्वानों ने मैथुन को क्या संज्ञा दी है ?
उत्तर—बुद्धिमानों ने इस मैथुन को पशुकर्म कहा है।

प्रश्न ५३१—मैथुन को विद्वानों ने पशुकर्म क्यों कहा है ?
उत्तर—जिस प्रकार पशुओं का काम हित तथा अहितकर रहित होता है उसी प्रकार इस मैथुन में भी मनुष्य बिना इसके गुण—दोष विचारे ही प्रवृत्त हो जाता है इसलिए इसे पशुकर्म संज्ञा दी है।

प्रश्न ५३२—मैथुन कर्म करने वाले को आगे भव में कौन सी गति मिलती है ?
उत्तर—मैथुन कर्म करने वाले को आगे भव में पशुगति ही मिलती है।

प्रश्न ५३३—अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्वों में व्रताचरण करने से क्या फल मिलता है ?
उत्तर—जैन शास्त्रों में अष्टमी, चतुर्दशी पर्वों का बड़ा भारी माहात्म्य माना गया है तथा जिन—जिन भव्य जीवों ने इन पर्वों में यथायोग्य व्रतों का पालन किया है उनको अनेक प्रकार के उत्तमोत्तम फलों की प्राप्ति भी हुई है इसलिए उत्तम फल के अभिलाषी सज्जन पुरुष इन पर्वों में यथायोग्य भलीभाँति व्रतों का आचरण करते हैं।

प्रश्न ५३४—रति की उत्पत्ति किससे होती है ?
उत्तर—रति की उत्पत्ति मोहनीय कर्म की प्रबलता से होती है।

प्रश्न ५३५—चैतन्यस्वरूप आत्मा कब तक प्रकट नहीं होता ?
उत्तर—जब तक इस आत्मा में मोहनीय कर्म की प्रबलता रहती है तब तक वास्तविक चैतन्य स्वरूप आत्मा प्रगट नहीं होता क्योंकि आत्मा का जो वास्तविक चैतन्य स्वरूप है उसका यह मोहनीय कर्म प्रबल वैरी संसार में है।

प्रश्न ५३६—संयम किसे कहते हैं ?
उत्तर—पाँच प्रकार के स्थावर तथा त्रसकायिक जीवों की रक्षा करना संयम है।

प्रश्न ५३७—आचार्यों ने मैथुन को किसकी संज्ञा दी है ?
उत्तर—आचार्यों के अनुसार मैथुन कर्म समस्त संयम रूपी वृक्ष के खण्डन करने में तीक्ष्ण कुठार की धारा के समान है।

प्रश्न ५३८—विषय सुख कैसे हैं ?
उत्तर—विषय सुख विष के समान हैं।

प्रश्न ५३९—अपना हित चाहते वालों को क्या करना चाहिए ?
उत्तर—जो मनुष्य अपना हित चाहते हैं उनको मन की चंचलता को छोड़कर रति के निषेध में प्रयत्न करना चाहिए।

प्रश्न ५४०—पद्मनन्दि पंचिंवशतिका नामक शास्त्र के रचयिता कौन हैं ?
उत्तर—पद्मनन्दि पंचविंशतिका नामक ग्रंथ के रचयिता श्रीमत् पद्मनंदी आचार्य हैं।

प्रश्न ५४१—इस ग्रंथ में कितने अधिकार हैं ?
उत्तर—इस ग्रंथ में २६ अधिकार हैं।

प्रश्न ५४२—यह ग्रंथ हमें क्या शिक्षा प्रदान करता है ?
उत्तर—यह ग्रंथ कुमार्ग से सुमार्ग में ले जाने में निमित्त है तथा वैराग्य को प्रकट करने वाला है।

प्रश्न ५४३—इस ग्रंथ के स्वाध्याय से किसे वैराग्य हुआ ?
उत्तर—इस ग्रंथ के स्वाध्याय से कु. मैना नामक बालिका को वैराग्य हुआ।

प्रश्न ५४४—वैराग्य प्राप्त कु. मैना ने क्या किया ?
उत्तरवैराग्य प्राप्त कु. मैना ने बीसवीं सदी में प्रथम बालब्रह्मचारिणी के रूप में आर्यिका दीक्षा लेकर ज्ञानमती नाम प्राप्त किया और संसार को नया दिशाबोध प्रदान किया।

प्रश्न ५४५—यह ग्रंथ उन्हें किस प्रकार प्राप्त हुआ ?
उत्तर—यह ग्रंथ उन्हें अपनी गृहस्थावस्था की माता श्रीमती मोहिनी देवी से प्राप्त हुआ।

प्रश्न ५४६—मोहिनी देवी को यह ग्रंथ कैसे मिला ?
उत्तर—श्रीमती मोहिनी देवी को यह ग्रंथ उनके पिता ने विवाह के समय स्वाध्यायार्थ दहेज के रूप में दिया था जिसने उनका और उनके पूरे परिवार का जीवन बदल दिया।

प्रश्न ५४७—मोहिनी देवी को उस ग्रंथ के स्वाध्याय का क्या फल मिला ?
उत्तर—उस ग्रंथ के स्वाध्याय से श्रीमती मोहिनी ने इस संसार की असारता को जानकर गृहबंधन में रहते हुए भी ‘जल तें भिन्न कमल’ के समान सदा वैराग्य भाव का चिन्तन किया, पुन: उनकी पुत्री मैना के गृहिंपजरे से निकलकर मोक्षमार्ग में लगते समय सहयोगी बनीं और पुत्री से आगे स्वयं को भी गृहबन्धन से निकालने का आग्रह किया, पुन: इनके तीन पुत्र—पुत्री और त्यागमार्ग पर निकले, उसमें कु. मनोवती को भी इन्होंने त्यागमार्ग पर निकलने में सहयोग दिया। आगे कु. माधुरी एवं रवीन्द्र कुमार के भी त्यागमार्ग पर निकलने पर चूँकि उस समय वह स्वयं त्याग की ओर उन्मुख थीं, अपनी मौन स्वीकृति प्रदान की। सन् १९७१ में पति की सुन्दर समाधि बनाने में सहयोग कर आगे स्वयं र्आियका दीक्षा ग्रहण की।

प्रश्न ५४८—माता मोहिनी के त्याग मार्ग पर निकले अन्य पुत्र—पुत्रियों में वर्तमान में सभी कहा हैं ?
उत्तर—कु. मनोवती ने पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से क्षुल्लिका दीक्षा एवं पूज्य आचार्य श्री धर्मसागरजी महाराज से आर्यिका दीक्षा प्राप्त कर ‘अभयमती माताजी’ के रूप में जिनधर्म की महती प्रभावना की, उनका सुन्दर समाधिमरण सन् २०१२ में जम्बूद्वीप हस्तिनापुर में परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के चरण सानिध्य में हुआ। कु. माधुरी पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से ब्रह्मचर्य व्रत लेकर आगे सन् १९८९ में आर्यिका दीक्षा प्राप्त कर चंदनामती माताजी के रूप में पूज्य माताजी के चरण सानिध्य में ही साधनारत हैं, तथा ब्र. रवीन्द्र जी आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य लेकर वर्तमान में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी से दशवीं प्रतिमा के व्रत धारण कर स्वस्ति श्री पीठाधीश रवीन्द्रर्कीित स्वामीजी के रूप में जिनधर्म की महती प्रभावना कर रहे हैं।

प्रश्न ५४९—माता मोहिनी ने किनसे दीक्षा ग्रहण की और उनका दीक्षित ना क्या था ?
उत्तर—माता मोहिनी ने परम पूज्य आचार्य श्री धर्मसागर महाराज से अजमेर (राज.) में सन् १९७१ में आर्यिका दीक्षा ग्रहण की और ‘आर्यिका रत्नमती’ इस सार्थक नाम को प्राप्त किया।

प्रश्न ५५०—दीक्षा के पश्चात् वे किनके संघ में रहीं तथा वर्तमान में पू. आर्यिका श्री रत्नमती माताजी किनके संघ्ज्ञ में विद्यमान हैं ?
उत्तर—आर्यिका दीक्षा के पश्चात् वे परम पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के पास १३ वर्षों तक रहीं पुन: सन् १९८५ में हस्तिनापुर में पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के चरण सानिध्य में उनकी सुन्दर समाधि हुई है।

प्रश्न ५५१—परम पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी के जीवन से हमें क्या शिक्षा ग्रहण करना चाहिए ?
उत्तरपूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी (श्रीमती को हिन्दी देवी) के जीवन से हमें यही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि हमें बचपन से ही अपने पुत्र—पुत्रियों को धार्मिक संस्कारों से संस्कारित करना चाहिए, आगे किसी भी बालक—बालिका को त्यागमार्ग में आने से न रोककर उसकी अनुमोदना और सहयोग ही करना चाहिए, अपने पुत्र—पुत्रियों के विवाह के अवसर पर उन्हें एक ग्रंथ अवश्य स्वाध्यार्थ देना चाहिए तथा स्वयं भी वैराग्य भाव को भाते हुए एक एक दिन अपने जीवन रूपी मन्दिर पर कलशारोहण करते हुए जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर अपने मानव जीवन को सफल करना चाहिए।