ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

28. सीता ने मुनिरामचन्द्र को विचलित करने का प्रयास किया

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
सीता ने मुनिरामचन्द्र को विचलित करने का प्रयास किया

(२७०)

कई वर्षों तक श्री रामचंद्र, मुनि वन में सुनो विहार किया।
फिर कोटिशिला पर जाकर के, निजयोगलीन हो ध्यान किया।।
सीता ने जाकर स्वर्गों में, निज अवधिज्ञान से ये जाना।

श्री रामचंद्र हैं ध्यानरूढ़, तब उनका मन भी ना माना।।
(२७१)

सोचा यदि विचलित कर दूँ मैं, तो मोक्ष नहीं ये जायेंगे।
और यहाँ स्वर्ग में आ करके, ये मेरे मित्र बन जायेंगे।।
यह सोच दिखाए हावभाव, नैना कटाक्ष कर बार चले।

हर अंग—प्रत्यंग दिखाकर के, मुस्कानों के उपहार चले।।
(२७२)

कितनी ही नृत्य क्रियाओं से,तिरिया चरित्र सब दिखा थकीं।
पर रामचंद्र के प्रियमन में, वे नहीं वासना जगा सकीं।।
जिसका प्रहरी चारित्र बने, उसकी कब जग में हार हुई।

जो भी टकराई शक्ति आ, वो आखिर में लाचार हुई।।