ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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28. सुरसुन्दरी से शिवसुन्दरी

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सुरसुन्दरी से शिवसुन्दरी

(काव्य छत्तीस से सम्बन्धित कथा)
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गगनचुम्बी अट्टालिका की सातवीं मंजिल पर राजकुमारी सुरसुन्दरी अपनी सखियों के साथ बैठी अठखेलियाँ कर रही थी। बीच-बीच में होने वाले हास-परिहास और अट्टहास से राह चलने वाले राहगीरों की पैनी नजरें अपने आप ऊपर उठ जाती और यद्यपि वे अपने गन्तव्य की ओर आगे कदम बढ़ाते, तथापि उनकी आँखे बरबस पीछे की हटकर स्थिर रहना चाहती हैं। आकर्षण-मोह एवं प्रलोभन ने ही तो इस जीवात्मा के गन्तव्य स्थान-मोक्ष और उध्र्वगमन स्वभाव अर्थात् प्रगति-पथ पर आगे बढ़ने की सत्प्रेरणा को अपनी संकुचित गली में पंâसा कर पथभ्रष्ट कर रखा है।

पर्वत की ऊँची चोटी पर बैठे हुए व्यक्ति को धरती पर रेंगने वाले सभी जीव जन्तु क्षुद्र दिखाई देते हैं, और अपना ‘अहम्’ विराट्। परन्तु उस मूढ़ को पता नहीं कि सारी दुनियाँ को वह क्षुद्र दिखाई देता होगा? क्वचित् कदाचित् यदि वह चोटी पर से गिर पड़े तो उसके अस्तित्व का ही लोप हो जावे! नामोनिशान भी न मिले। वह यह नहीं सोचता कि धरती वाले कदाचित गिरें भी तो उन्हें कितनी क्षति उठानी पड़ेगी? धरती पर चलने वाले इन गगनचुम्बी अट्टालिका वालों से कहीं लाख गुने अच्छे है...।

गुलाबी लावण्य से भरपूर और जवानी के उफनते मद में चूर राजकुमारी के पैर तो वैसे ही भूतल-तल पर न पड़ते थे और आज तो फिर वह अपनी सखी सहेलियों और हमजोलियों का केन्द्र बिन्दु बनी हुई अट्टालिका की सातवीं मंजिल पर बैठी हुई इठला रही थी।...जानबूझकर उस मन्दाधा ने पान की पीक वहाँ से विचरते हुए आत्मलीन-आध्यात्मिक निग्र्रन्थ दिगम्बर साधु पर थूक दी...! पर उनका क्या बिगड़ा? नैतिक पतन तो हुआ सुरसुन्दरी का ही न? जब नैतिक पतन हुआ तो भौतिक पतन के होने में क्या सन्देह ? लाड़-प्यार दुलार और राजसी वैभव में पलीपुसी राजकुमारियों में अपनी सुन्दरता की वजह से नजाकत किसी न किसी रूप में विद्यमान रहती है। नाज नखरों में पनपीं हुर्इं ये बालिकाएँ क्या समझें वीतरागता के मूल्य को? भोग से योग का क्या सम्बन्ध?

पानी का बुलबुला कब तक अपनी पर्याय पर गर्व करेगा? सौन्दर्य की हाट कितने दिन चलेगी? पुद्गल परमाणुओं से बना हुआ यह घृणित नाशवान औदारिक शरीर कितने दिन कीमती तेल-पुâलेल, स्नो पाऊडर और खुशबूदार लेवण्डरों से अपनी कान्ति को बनाये रख सकेगा? बुढ़ापे की मार से कमर झुक जायेगी। पर सुरसुन्दरी की भरी पूरी जवानी में ही बुढ़ापे का यह मजा देने में दैव ने विलम्ब नहीं किया। ‘‘इस हाथ दे उस हाथ ले’’। कल की उसकी काली करतूत-उसका दुष्कर्म, आज दुर्भाग्य बनकर उसके आड़े आ ही गया! भाग्य या कर्म क्या है? कल की गलती या सही का परिणाम। आगे पुरुषार्थ क्या करना है! कल की गलती से आज सचेत और विवेकी रहना। परन्तु आज का आदमी इतना प्रत्यक्षवादी, भौतिक और वर्तमान में ही भूला-पूâला रहने वाला हो गया है कि उसे अपने उस परोक्ष भावी जीवन की खबर नहीं कि उसका अगला कदम अब पतन के ऐसे गड्ढे में गिरने वाला है-जहाँ से उद्धार होना नितान्त कठिन ही नहीं वरन् असंभव भी है। वस्तुत: सब कुछ प्रत्यक्ष यानी वर्तमान, परोक्ष यानी भविष्य (होनहार) पर ही टिका हुआ है।जैनधर्म के कर्म सिद्धान्त का यह रहस्य कितना स्पष्ट है, कितना खुलासा है।

कल की रूपवती सुरसुन्दरी आज रुग्ण और कुरूपा थी। दुनियाँ उसके शरीर को देखकर जितना अधिक नाक भौं सिकोड़ती उतना ही अधिक उसका नाम उसकी मखौल उड़ाने के लिए उस पर अट्टहास करता था। दूसरों पर हँसने वाली आज स्वयं हँसी का पात्र बनी हुई थी। दूसरे पर पान पीक थूकने वाली पर आज दुनिया थूक रही है-धिक्कार रही है। कर्मों का नाटक यही तो है। रोग है, तो इलाज भी हैं।बन्धन है तो मुक्ति भी हैं। आवश्यकता है, तो केवल प्रयत्न करने की। पटना नरेश धारिवाहन ने अपनी इकलौती बेटी के इस दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने हेतु कुछ भी उठा नहीं रखा था। समय आने पर संयोग मिल ही जाता है। कर्मरोग से मुक्ति पाने में संयोग (निमित्त) क्या हो सकता है? ‘भेत्तारं कर्म भूभृताम्’ निग्र्रन्थ नि:स्पृही स्वपर कल्याणकारी मुनियों के सिवाय और कौन हो सकता है? राजा धारिवाहन का साक्षात्कार जब एक जैन तपस्वी से हुआ तो उन्होंने एक घड़ा जलभर कर मंगवाया और महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र का ३६ वाँ काव्य ऋद्धि- मंत्र सहित पढ़ा और राजा को देते हुए कहा-

यह किसी जलाशय में डालना, प्रतिदिन उसी जलाशय में स्नान करने से राजकुमारी आज से ३६ दिन के बाद अपने सुरसुन्दरी नाम को पुन: सार्थक करेगी। परन्तु यह मंत्रित जल मैं तुम्हें इस शर्त पर दे सकता हूँ कि यह अब तुम्हारी ममता न रहकर स्वयं क्षमता एवं समता की भवतारिका आर्जिका बनेगी- इसकी होनहार इस सुरसुन्दरी बनाकर ही चुप न रहेगी वरन् इसकी निकट भव्यता तो इसे ‘शिव-सुन्दरी’ ही बनाने को आमन्त्रण दे रही है। राजा ने मुनिश्री के चरणों में आत्मसमर्पण करते हुए कहा-महाराज! ऐसा ही होगा! और फिर हुआ भी वैसा ही अक्षरश:!!