ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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29. दिवाली की रात

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दिवाली की रात

(काव्य सैतीस से सम्बन्धित कथा)
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दौलत के बारे में एक कहावत मशहूर है कि जब वह किसी मनुष्य के पास आती है, तो उसकी पीठ पर एक लात मारती है। जिससे उसका सीना तन जाता है; उसमें अकड़ आ जाती है और दौलत जब उसके पास से जाने लगती है तो दूसरी लात उस तनी हुई छाती पर इतने जोर से लगाती है कि झुक जाती है।दौलत की इन्हीं दो लातों के मारे दो मानवीय वर्ग सदैव से चले आये हैं एक बिगड़े रईस! दूसरे अकड़े रईस! ऐसे ही एक बिगड़े रईस अपनी पीली पगड़ी बांधे और तेलियों जैसे वस्त्र पहिने अपने गत वैभव को याद करते तथा जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाते हुए चले जा रहे थे। व्यापार में होने वाले जबरदस्त घाटे ने उनकी कमर तोड़ दी थी। उसी एक चिन्ता में व्यग्र आशा की भूमिका पर पुनः अपना स्वर्णिम महल बनाने का अरमान लेकर आज पहिली बार उन्होंने करोड़पति सेठ सुदत्त जी की देहली पर पैर रखा और विनम्र अभिवादन कर बैठने ही वाले थे कि सुदत्त जी का सौजन्य मय शिष्टाचार यो मुखरित हुआ-

‘‘आइये, सेठ जिनदास जी! विराजिये, बहुत दिनों बाद दर्शन हुये।’’ मुँह से लगे हुए हुक्के की नली को एक तरफ रखकर तथा गाव तकिया का सहरा छोड़कर उन्होंने पान की सुगंधित पीक सोने के पीकदान (उगालदान) में थूकी और पुन: बोले-कहिये, मेरे योग्य सेवा।’’ बिगड़े लखपति जिनदास जी प्रत्युत्तर देते, परन्तु उनका सारा ध्यान तो सोने की पीकदान में ही केन्द्रित हो गया था। विवेक की जगह तो आश्चर्य ने ले ली थी। अस्तु लड़खड़ाती जबान से जिनदास जी बोले-‘‘यो... ही... आ...प... के दर्शनार्थ चला आया।... कुछ देर तक दोनों मौन बैठे रहे। बीच-बीच में ताम्बूल और तम्बाखू की पीक उसी पीकदान में सुदत्त जी करते जाते थे।... यहाँ जिनदास जी के मस्तिष्क में विचार पर विचार आकर टकराते-‘‘लक्ष्मी की उपासना करते-करते मैं तो यहाँ मरा जाता हूँ; उसको प्राप्त करने के लिए खून—पसीना एक करके दुनियाँ भर की दौड़ धूप करता हूँ। फिर भी वह मुझसे रूठ कर दूर भागती है, जब कि यहाँ मोटे गद्दे तकियों पर टिके रहने वाले सेठ जी से थुकवाने में भी उसे लज्जा नहीं आ रही है।...‘‘जिनदास जी की विचार शृङ्खला टूटने वाली न थी, यदि सुदत्त श्रेष्ठि उनके मन के भाव पढ़कर उनका चिन्तन भंग न करते-बोले-‘‘जिनदास जी! संसार का क्रम कुछ उल्टा-पल्टा है, इसलिये हमें उसके साथ व्यवहार भी कुछ उल्टे रूप में करना चाहिये। छाया को आप ज्यों-ज्यों पकड़ने का प्रयत्न करेंगे त्यों-त्यों वह आप से दूर भागेगी। और ज्यों-ज्यों आप की अवहेलना कर उसे दूर भागेंगे त्यों-त्यों वह पैरों में लिपटती फिरेगी।... माया का भी यही हाल है।’’

भागती फिरती थी लक्ष्मी जब तलब रखते थे हम।
वे-तलब उससे हुए वह बेकरार आने को है।।

बड़े-बड़े चक्रवर्तियों और तीर्थंकरों ने महा मोह माया को लात मार कर, वैभव से मुख मोड़कर त्याग वृत्ति धारण की तो समवशरण जैसा अकथनीय-अतुलनीय वैभव भी उनके श्रीचरणों में लौटने लगा। देखिये न! इन समदर्शी अभयचन्द्र महामुनिराज ने अपनी विभूति को ठुकराकर जब से वीतराग वृत्ति धारण की तभी तो विपुल वैभव के स्वामी राजा महाराजा उनके श्री चरणों में अपना मस्तक रखकर अपने को कृतार्थ मानते हैं। मनुष्य की अपनी वास्तविक निधि तो स्वयं उसके अपने पास है।आत्म-विस्मृत होकर न जाने क्यों उसने पर पदार्थ जड़ में अपनी मान्यता स्थिर कर ली है। तीनों लोकों का स्वामी होकर भी न जाने यह जीवात्मा ज्यों आज दर का भिखारी बन गया है? सेठ सुदत्त के मुख से चेतना को छू लेने वाला व्याख्यान जब जिनदास जी ने सुना तो उनकी विवेक की आँखे खुल गई; और वे वहाँ से उठकर जाने ही वाले थे कि रूपयों और मोहरों से भरी एक थैली सुदत्त श्रेष्ठि ने उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा-‘‘लीजिए, इस रकम से पुन: व्यापार प्रारम्भ कीजिए।लाभ-हानि की चिन्ता न कर आप तो काम करने में जुट जाइये। मुझे इस रकम की अधिक चिन्ता नहीं, वह तो कभी भी मिलती रहेगी।’’ सुदत्त श्रेष्ठि के सौजन्य की मन ही मन सराहना करते हुए जिनदास ने धन्यवाद देकर वह थैली सहर्ष ग्रहण कर ली और वहाँ से अपने निवास स्थल की ओर चल पड़े।

अपनी राह से जिनदास जा रहे थे कि अकस्मात् सड़क पर सारी मुहरें और रूपयें विखर गए। खन-खन की आवाज से अपार जन समूह एकत्रित हो गया और बात की बात में मुहरें और कल्दार उनके हाथों में चले गए जिनको कि वे बदे थे। आप सोचेंगे कि आखिर हुआ क्या?क्या थैली में छेद हो गया था?... हाँ थैली में तो नहीं; किस्मत में छेद अवश्य हो गया था। इतना ही इस दुर्घटना के बारे में कहना पर्याप्त होगा। वैसे तो कहने को लोगों को यह कहते भी सुना गया कि यदि केले का छिलका सड़क पर न डाला जाता तो बेचारे सेठ जिनदास जी की यह हालत काहे को होती? सो केले के छिलके का तो निमित्त था। मूल में तो उनके भाग्य में ही मुनाफा न था। अस्तु अब संपत्ति के इस असह्य वियोग से जिनदत्त के परिणाम आकुलित नहीं हुए क्योंकि वे माया प्राप्ति के अपूर्व रहस्य को समझ गए थे कि वह अगर बदी होगी तो जावेगी कहाँ? अपना काम भर किये जाना चाहिये। ऐसा सोचकर वे सीधे उसी नगर में स्थित श्री अभयचन्द मुनिराज के चरणों में गिरे और उनके उपदेशानुसार उन्होंने दीपावली के दिन महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र के ३७ वें काव्य की उसके मंत्र सहित साधना की, फल स्वरूप जैनशासन की अधिष्ठात्री ‘‘लक्ष्मीदेवी’’ ने प्रकट होकर एक रत्न-मुद्रिका भेंट की। अमावस्या की रात्रि को झिलमिल झिलमिल करते असंख्य दीपों की जगमगाहट में सेठ जिनदत्त जी का भवन इतना दैदीप्यान हो रहा था...कि कौशाम्बी नगरी में उससे होड़ लेने वाला मकान मानो है ही नहीं।