ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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3.टिकैतनगर में प्रथम चातुर्मास-सन् १९५३

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टिकैतनगर में प्रथम चातुर्मास-सन् १९५३

समाहित विषयवस्तु

१. आचार्य संघ का टिकैतनगर में मंगल प्रवेश।

२. क्षुल्लिका वीरमती जी का प्रथम नगरागमन।

३. क्षुल्लिका वीरमती की निरंतर स्वाध्याय में संलग्नता।

४. क्षुल्लिका जी की आँखों में पीड़ा-माता मोहिनी द्वारा उपचार।

५. दादी द्वारा रुपये रखने का आग्रह-वीरमती द्वारा मना करना।

६. आचार्य संघ का विहार।

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काव्य पद

चाँदनपुर श्री महावीर के, चरणों शीश नमा, कर जोर।

आचार्यश्री देशभूषण का, संघ चला लखनऊ की ओर।।
नगर-ग्राम बहु पावन करते, लखनऊ नगर किया आबाद।
फिर विहार कर पहुँचे गुुरुवर, टिकैतनगर ढिंग दरियाबाद।।२२२।।

टिकैतनगर में हलचल मच गयी, दीवाली मन भरी उमंग।
चलो-चलो सब दर्शन करने, दरियाबाद विराजित संघ।।
पुण्य उदय आया हम सबका, हुआ हमारे अघ का नाश।
करें निवेदन श्रीगुरुवर से, टिकैतनगर हो चातुर्मास।।२२३।।

भक्ति-उमंग लिये हृदिसागर, दौड़ी आयी सकल समाज।
श्रीफल अर्पित कर श्री चरणों, बोली अर्ज सुनो महाराज।।
हम चातक हैं अति ही प्यासे, और आप पर्जन्य महान्।
टिकैतनगर ही आप पधारें, पूरै हम सबके अरमान।।२२४।।

क्षुल्लिका माता वीरमती के, चरणों अर्पित की अरदास।
करें निवेदन, आचार्यश्री से, टिकैतनगर हो चातुर्मास।।
गुरु होते हैं बड़े पारखी, हम तो घर आ जाते कह।
कौन है सच्चा, कौन है झूठा, वे पा लेते मन की तह।।२२५।।

छोटे-बड़े सभी ने मिलकर, बारम्बार प्रयास किया।
टिके रहे शिर गुरुवर चरणों, गुरुमन सा स्वीकार किया।।
फलस्वरूप आचार्यश्री का, टिकैतनगर में पहुँचा संघ।
इस प्रकार हो गया उपस्थित, टिकैतनगर में धर्म प्रसंग।।२२६।।

टिकैतनगर की गली-गली को, सबने खूब सजाया था।
आबालवृद्ध नर-नारी का, चेहरा खिल मुस्काया था।।
द्वार-द्वार पर बनीं अल्पना, तोरणद्वार लगाये थे।
बहुत कहें क्या भक्त गगन से, पुष्प तोड़कर लाये थे।।२२७।।

परम पूज्य आचार्य संघ का, जब मंगलमय हुआ प्रवेश।
पदप्रक्षालन, करी आरती, जनता जैनाजैन अशेष।।
बहुविधि वाद्य चल रहे आगे, बीचों-बीच चल रहा संघ।
हुई धर्ममय नगरी सारी, रँगे धर्म में सकल प्रसंग।।२२८।।

बालयोगिनी, वयसुकुमारी, पूज्य क्षुल्लिका वीरमती।
आकर्षण का केन्द्र सभी की, नगर पधारी बालसती।।
छोटेलाल की यही लाड़ली, मात मोहिनी की प्यारी।
अवध की शोभा, नगर की गौरव, धर्मक्षेत्र की निधि न्यारी।।२२९।।

आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को, हुआ स्थापित चातुर्मास।
पूर्णयोग से जो करते हैं, उनके होते सफल प्रयास।।
आचार्यश्री वत्सलरत्नाकर, दयानिधी, करुणा भंडार।
बहुभाषाविद्, ज्ञानमहोदधि, उनसे हुआ महद् उपकार।।२३०।।

आ जाते हैं संत जहाँ पर, छा जाता है वहीं बसंत।
मुद्रा-चर्या देख संत की, आ जाता पापों का अंत।।
अमृत प्रवचन सुनकर उनके, खिल जाता जीवन उद्यान।
शुभाशीष से मिल जाता है, मनवांछित उत्तम वरदान।।२३१।।

श्री क्षुल्लिका वीरमती जी, रखतीं मौन अधिकतम काल।
वे हर पल चखती रहती थीं, श्री जैनागम ग्रंथ रसाल।।
समंतभद्र आचार्यश्री रचित, रत्नकरण्ड श्रावकाचार।
अर्थ-उच्चारण सुष्ठु कर लिया, गुरुवर की आज्ञा शिरधार।।२३२।।

नेमिचंद्र आचार्यश्री रचित, गोम्मटसार ग्रंथ है नाम।
जीवकाण्ड सात सौ गाथा, अमरकोष रट लिया तमाम।।
भगवती आराधन, परमात्मप्रकाश का, कई बार स्वाध्याय किया।
कातंत्र रूपमाला व्याकरण को, पढ़कर ज्ञान का लाभ लिया।।२३३।।

सतत अनवरत अध्ययन कारण, शिर भारीपन, आँखें श्रान्त।
माँ मोहिनि निज दूध का फाहा, रखकर पीड़ा करती शांत।।
टिकैतनगर के चातुर्मास का, वीरमती अति लाभ लिया।
मौन मंत्र पढ़, ज्ञानामृत का, निश-दिन तन्मय पान किया।।२३४।।

वैयावृत-आहारदान के, मिले सभी को अवसर पूर्ण।
व्रत-संयम धारण के द्वारा, किये सभी ने कल्मष चूर्ण।।
धार्मिक चर्चा-चर्या बीते, चतुर्मास के दिवस सकल।
और एक दिन समयवृक्ष पर, लग आया विदाई का फल।।२३५।।

रोज-रोज मरहम लगने से, व्रण भर होती पीड़ा शांत।
छोटेलाल-मोहिनीदेवी, के मन की मिट गई अशांति।।
धर्ममयी चर्या को लखकर, कर वैयावृत, दे आहार।
विरह के छाले ठीक हो गये, मनस्तुष्टि पाई परिवार।।२३६।।

मोह महातम, बहूरूपिया, आया रूप दादी का धर।
माताजी ये रुपया ले लो, रख दिखलाये अपने कर।।
मैंने तो सब त्याग कर दिया, मंदिर में कर देना दान।
अरे! किताब मँगा तुम लेना, नहीं नहीं, अनुचित, अज्ञान।।२३७।।

हो निराश वे चली गर्इं जब, सोचा माता वीरमती।
भटक रहे अज्ञानी प्राणी, मोह अँधेरा घोर अती।।
दो कौड़ी का है वह साधु, जो रखता कौड़ी की आस।
वह श्रावक है दो कौड़ी का, नहीं है कौड़ी जिसके पास।।२३८।।

जैसे जल बहता ही रहता, जल-जीवन का यही प्रमाण।
साधु एक ठौर न रहता, सत्य साधुता की पहचान।।
चातुर्मास हुआ निष्ठापित, आचार्य संघ का हुआ गमन।
संघ साथ प्रस्थान कर दिया, वीरमती धर समता मन।।२३९।।

बहुत दूर तक गये भक्तगण, संघसाथ भर अश्रु नयन।
पर निर्मोही साधुसंघ को, रोक न पाये हुआ गमन।।
नमन किया, आशीष प्राप्त कर, वापस आयी सकल समाज।
अप्रमत्त रह धर्म को पालें, सबने करी प्रतिज्ञा आज।।२४०।।

मौन साधना मूल मंत्र है, बिना मौन के व्रत-तप व्यर्थ।
राग द्वेष कृश होयं मौन से, मौन मुक्ति औषध अव्यर्थ।।
शक्ति अपव्यय रुक जाता है, शांति चित्त में आती है।
सामायिक-स्वाध्याय के लिए, समय बचत हो जाती है।।२४१।।