ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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30. उनकी कृपा से

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उनकी कृपा से

(काव्य अड़तीस से सम्बन्धित कथा)
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एक साधारण सा तुच्छ कुत्ता भी जब उन्माद के वशीभूत होकर नगर भर में उत्पात मचा देता है; उसके भयंकर आंतक से हर घर के दरवाजे बन्द हो जाते हैं औरा बाहर निकलना मानो अपने प्राणों से हाथ धोना होता है, तब यदि ऐसा कोई मदोन्मत्त हाथी निरंकुश होकर उत्पात करना प्रारम्भ कर दे तो फिर किसी जनाकीर्ण नगर को जिस भयावने संकट का सामना करना पड़ता है, वह डरावना दृश्य आज हमें आधुनिक नगरों या शहरों में देखने में प्रायः आता ही नहीं। क्योंकि आज इन जंगली जानवरों की संख्या एक तो वैसे ही प्राकृतिक रूप से घट रही है, दूसरे इनकी जगह युद्धों में आज सहस्त्रों मिलिट्री, अणु और हाईड्रोजन बम आदि ने ले ली है। क्योंकि ऐतिहासिक युग में राजा-महाराजा इनका उपयोग चतुरंगिणी सेनाओं में शत्रुओं को कुचलने के लिये करते थे। शराब पिलाकर उन्हें मदोन्मत्त किया जाता था। फल स्वरूप दोनों दूनी ताकत से वे अपने शत्रुओं को पैरों तले रौंदते थे। कभी-कभी पागल होकर वे अपने ही पक्ष के योद्धाओं का सफाया कर देते थे।... फिर इन्हें वश में करना जरा टेढ़ी खीर होता है। जो बड़े वृक्षों को जड़ समेत उखाड़ कर फैक रहा हो, जिसके चंचल कपोलों से मद चूँ रहा हो, लाशों से जिसने धरती पाट दी हो ऐसे मदोन्मत्त हाथी के सामने जाकर कौन है ऐसा जो अपनी जान हथेली पर रखकर उसे वश में लाने की हिम्मत करे? कौन है ऐसा अपने प्राणों का बैरी?...परन्तु जिस प्रकार सपेरे लोग एक जहरीले काले नाग को भी मंत्र मुग्ध कर लेते हैं-वैसे ही—

श्योतन्मदाविलविलोल-कपोल-मूल-'

मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।'
एरावताभ-मिभ-मुद्धत-मापतन्तं,'

दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम्।।३८।।

का कर्णप्रिय नाद सुनकर एक ऐसे ही पागल उन्मत्त हाथी ने सोमदत्त के सामने अपना आत्म समर्पण कर दिया था। सुखानन्दकुमार वीरपुर नरेश सोमदत्त का एक कलंकी पुत्र था। वह ऐसा कपूत पुत्र था- जिसने दुराचार में पड़कर न केवल अपना ही सत्यानाश किया बल्कि अपने पिता के साम्राज्य को भी तीन-तेरह करके उन्हें दर-दर का भिखारी बना दिया।कपूत पुत्र के कारण सोमदत्त बहुत ही चिन्तित थे- उन्होंने वीरपुर का परित्याग कर दिया और हस्तिनापुर जा पहँचे वहाँ रहकर उन्होंने न केवल अपने ही साम्राज्य को वापिस पाया बल्कि अनिंद्य सुन्दरी राजकुमारी मनोरमा के परिणय के साथ दहेज में विजय नगर का राज्य भी हस्तगत किया; परन्तु यह बस हुआ किसकी अनुकम्पा से?-दयाधाम वद्र्धमान मुनि की दया से ही। जिन्होंने उन्हें महाप्रभावक भक्तामर स्तोत्र का उपरोक्त ३८ वाँ काव्य मंत्र ऋद्धि सहित सिखला दिया था और जो कि उसके दुर्दिनों में आड़े वक्त काम आया।

वास्तव में यह काव्य है भी हाथी के वशीकरण का एक मात्र अस्त्र।जंगली खूंखार और निरंकुश पशु तो इस काव्य की ऋद्धि मंत्र समेत जपने से वश में होते हैं, परन्तु साम्राज्यवाद की लिप्सा में आज जिन नर-पशुओं ने अपनी बर्बरता और खूंखारपन का परिचय दे रखा है। उन्हें भी यह मंत्र अनोखा सबक सिखाने में सफल सिद्ध होगा।