ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तपोभावनायै नमः"

30. जैन उपास्य और उपासक

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जैन उपास्य और उपासक

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‘जयति इति जिन:’ जिन्होंने अपनी इन्द्रियाँ, मन और कषायों (विकारी भावों) को जीत लिया है, वे जिन कहलाते हैं और जो जिन की उपासना, पूजा, अर्चा करते हैं, उनके द्वारा बतलाए मार्ग का अनुपालन करते हैं, वे जैन कहलाते हैं। जैनों के उपास्य देवता निर्ग्रंथ अर्थात् समस्त वस्त्राभूषणों से रहित बालकवत् निर्विकार होते हैं। सम्पूर्ण कर्मों के नष्ट होने पर वे ही शरीररहित, निराकार परमात्मा बन जाते हैं। साक्षात् तीर्थंकरों के अभाव में उनकी प्रतिकृति, प्रतिमा की स्थापना कर पूजन—पाठ करने की परम्परा जैन धर्मावलम्बियों की ही देन है। जैन उपासकों को श्रावक शब्द से सम्बोधित किया जाता है। श्रद्धावान, विवेकवान, क्रियावान होना श्रावक का लक्षण है। मद्य, मधु, माँस तथा उनसे बनी वस्तुओं का त्याग, जीव—दया का पालन, पानी छानकर पीना, प्रतिदिन जिनेन्द्रदेव के दर्शन करना, रात्रि में भोजन नहीं करना इत्यादि जैन उपासक की चर्या के अनिवार्य अंग हैं।