ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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31.स्याद्वाद चन्द्रिकान्तर्गत प्रथमानुयोग

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स्याद्वाद चन्द्रिकान्तर्गत प्रथमानुयोग

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पूर्वाचार्यों ने जिनवाणी को चार अनुयोगों में विभक्त किया है। वे अनुयोग है, प्रथमानुयोग, करणानुयोग, चरणानुयोग एवं द्रव्यानुयोग। कहा भी है, ‘‘प्रथमं करणं चरणं द्रव्यं नमः‘‘। जिनवाणी की प्रतीक सरस्वती मूर्ति भी चारों अनुयोगों को प्रकाषित करने वाली है। 24 तीर्थंकर, 12 चक्रवर्ती, 9 नारायण, 9 बलभद्र, 9 प्रतिनारायण इन त्रेसठ “ालाका पुरुशों तथा अन्य भी महापुरुशों के चरित्र को वर्णन करने वाला प्रथमानुयोग है। इसमें पाप-पुण्य के फल को बतलाकर प्राथमिक जीवों को मुख्य रूप से धर्म में योजित किया गया है। इसमें विद्याधर, चारण ऋद्धि मुनि व राजवंषों का वर्णन है यह बोधि-समाधि का भण्डार समीचीन ज्ञान है।

लोकालोक का स्वरूप, युग परिवर्तन अर्थात् कालचक्र एवं चार गतियों का दर्पण के समान दिग्दर्षन कराने वाला करणानुयोग है। यह गणित की मुख्यता से वर्णन करता है। साधु एवं श्रावक के चारित्र को प्ररूपित करने वाला समीचीन चरणानुयोग रूप श्रुत है। चारित्र की उत्पत्ति, वृद्धि और रक्षा इसके निरूपण का केन्द्र है। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर निर्जरा, मोक्ष तत्व तथा इनसे सम्बन्धित द्रव्य, अस्तिकाय पदार्थ आदि के स्वरूप का निरूपक द्रव्यानुयोग श्रुतज्ञान है। ये चारों अनुयोग परस्पर सापेक्ष है एक दूसरे में समाविश्ट हैं अविनाभावी हैं पूरक हैं। समीचीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए चारों ही अनुयोगों की सार्थकता है।

स्याद्वाद चन्द्रिका में भी चारों अनुयोगों की सापेक्ष “शैली के दर्षन होते हैं। पूर्व में हमारे प्रस्तुत प्रबंध में करणानुयोग चरणानुयोग और द्रव्यानुयोग के विभिन्न विशयों का वर्णन किया जा चुका है। प्रस्तुत टीका में प्रथमानुयोग भी अपेक्षित रूप में दृश्टिगात होता है। इस “शीर्शक में हम पाठकों को प्रस्तुत टीका के अंतर्गत प्रथमानुयोग पर दृश्टिपात कराना अभीश्ट समझते हैं।

वर्तमान में वीर, महावीर, अतिवीर, सन्मति एवं वद्र्धमान इन नामों से विश्रुत नाथवंषीय, कष्यपगोत्रीय, ननिहाल वैषाली के भूशण, अपने जन्म से कुण्डलपुर को पवित्र करने वाले श्री सिद्धार्थ त्रिषला के नंदन, अहिंसा के अवतार अंतिम चैबीसवें तीर्थंकर महाप्रभु का तीर्थ प्रवर्तित है। भ० महावीर का समुद्भव जैन धर्म के इतिहास का अनुपम एवं स्वर्णिम पृश्ठ है। उनके परम भक्त एवं प्रमुख श्रोता राजा विम्बिसार श्रेणिक और रानी चेलना धर्म प्रभावना के मानदण्ड के रूप में बहु विख्यात हैं। मगध साम्राज्य के सम्राट उपश्रेणिक एक न्याय नीतिज्ञ, जैन धर्मानुयायी प्रजापालक थे। पांच सौ भाइयों में से श्रेणिक अपने साहस, बुद्धिकौषल, योग्यता, निपुणता आदि गुणों के द्वारा सम्राट बना। वह कारणवष अज्ञानता से बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था। उसी समय लिच्छिवी राजवंष मंे प्रसिद्ध जैन धर्मावलम्बी राजा चेटक राज्य करते थे। श्रेणिक ने छल बल पूर्वक अपने पुत्र एवं मंत्री अभय कुमार की मंत्र नीति के द्वारा उसके गुणों पर आसक्त चेटक की पुत्री चेलनी से विवाह किया। चेलनी अति रूपवती बुद्धिमती एवं जैन धर्म परायण थी। राजा श्रेणिक एवं चेलनी में अपने अपने धर्म द्वारा परस्पर प्रभावित कर धर्मान्तरण की प्रतिद्वन्दिता सदैव चलती रहती थी वे दोनों एक दूसरे को येन केन प्रकारेण पराजित करने में संलग्न रहते थे।

एक बार राजा श्रेणिक ने अपने बौद्ध गुरुओं की प्रषंसा एवं भूत भविश्यत वर्तमान त्रैकालिक ज्ञाता के रूप में गुणगान करते हुए भोजनार्थ आमंत्रित किया। चेलनी ने भोजन में उपानह (जूता) चर्म के टुकडे़ मिलाकर खिला दिये। वे अज्ञान के कारण न जान सके। वमन में उस अखाद्य, अपवित्र वस्तु के निकलने के कारण उनके अज्ञान का अनावरण हो गया। श्रेणिक को मर्मान्तक पीड़ा हुई और अत्यंत क्रोध उत्पन्न हुआ। उसने बदला लेने के रूप में निग्र्रन्थ जैन साधुओं को अपमानित करने की ठान ली। किसी अवसर पर जैन साधुओं को आहार हेतु प्रतिग्रहीत किया गया। राजा श्रेणिक ने भोजनषाला क्षेत्र में अषुद्ध पदार्थ हड्डियां गड़वा दी थीं। रानी चेलना को पूर्व में संदेह था ही अतः उसने अपनी अंगुलियों के संकेत से गुप्तिधारी साधुओं को अवगत करा दिया। सभी साधु आहार के बिना ही वापस लौट गये। पष्चात राजा श्रेणिक के द्वारा कारण पूछने पर साधु वर्ग के द्वारा संपूर्ण वृत्तांत वर्णन एवं समाधान करने से श्रणिक को कुछ जिज्ञासा भी हुई। किन्तु तीव्र मोह अनुपषम के कारण पराजय का सा अनुभव हुआ और कालान्तर में यषोधर मुनि महाराज के गले में मृत सर्प डालकर घोर उपसर्ग किया। तीन दिन पष्चात् ज्ञात होने पर रानी चेलना ने उनका उपसर्ग दूर किया। महाराज की क्षमा एवं दोनों को समान रूप से आषीर्वाद रूप समता को दृश्टिगत कर श्रेणिक का मिथ्यात्व दूर हो गया। हृदय परिवर्तन के परिणाम स्वरूप वह जैन धर्मानुयायी एवं भगवान महावीर का प्रमुख श्रोता हो गया। उसने जैन धर्म की महती प्रभावना की और सोलह कारण भावनाओं के द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। श्रेणिक इसी भरत क्षेत्र में उत्सर्पिणी में महापù नाम के प्रथम तीर्थंकर होंगे। चेलनी का नाम भी महासतियों में प्रसिद्ध है।

स्याद्वाद चन्द्रिका में आर्यिका ज्ञानमती ने परमार्थ प्रतिक्रमण अधिकार में गाथा क्रमांक 88 की टीका के अंतर्गत त्रिगुप्ति वर्णन में रानी चेलनी और उन गुप्तिधारी अवधिज्ञानी मुनि महाराज को बहुमानपूर्वक स्मरण किया है क्योंकि ऐसे महामुनि श्रेश्ठ रूप में, उत्कृश्ट रूप में कर्म निर्जरा करते हैं माता जी ने इतिहास के इस स्मरणीय पृश्ठ को पाठकों के समक्ष उपयोगी जानकर रखा है। अध्यात्म ग्रंथों में प्रथमानुयोग के किसी अपेक्षित वृतान्त को संकेत मात्र ही देने की परिपाटी है। इसी का अनुगमन इस उपक्रम में (प्रस्तुत टीका में) किया गया है। प्रथमानुयोग के उदाहरण देने के निम्न उद्देष्य ज्ञात होते हैं।

1- धर्म प्रभावना

2- नियम (बोधि), उसके फल समता (समाधि) का उत्कृश्ट रूप से प्रकाषन।

3- सिद्धान्त को उदाहरण द्वारा बोधगम्य कराना। अध्यात्म की पुश्टि।

4- प्राथमिक जीवों का रूचि वद्र्धन।

5- पुण्य पाप का फल निरूपण कर पाप भीरुता एवं संसार भीरुता, धर्म में जिज्ञासा जागरण एवं संवेग का उत्पादन।

प्रस्तुत भरतक्षेत्र में इस विद्यमान अवसर्पिणी काल में कर्म भूमि के प्रारंभ में प्रथम तीर्थंकर भ० ऋशभदेव ने दीक्षा ग्रहण के पष्चात छः मास का उपवास ग्रहण किया पुनः छः मास और चैबीस दिन तक लोगों को आहार विधि ज्ञात न होने के कारण वे चर्या हेतु गमन करने भी आहार लाभ नहीं कर सके। इस समय एक अद्भुत घटना घटित हुई जो तीर्थ प्रवर्तन में बहुत महत्वपूर्ण हे। हस्तिनापुर नरेष श्रेयांस कुमार को पूर्व जन्म में भ० ऋशभदेव के जीव वज्रजंघ की रानी श्रीमती की पर्याय में मुनिदान विधि का ज्ञान जातिस्मरण द्वारा हो गया। उन्होंने नवधा भक्तिपूर्वक दाता के श्रेश्ठ गुणों से युक्त होकर द्रव्य, पात्र, विधि के अनुसार विषेश रूप से प्रथम तीर्थंकर महाप्रभु को इक्षु रस का आहार दिया। वे दानतीर्थ प्रवर्तक कहलाये। धर्म तीर्थ के प्रवर्तक आदिब्रह्मा युगपुरुश भ० ऋशभदेव के साथ ही टीकाकत्र्री ने तद्भव मोक्षगामी गणधर उन दानतीर्थ प्रवर्तक श्रेयांस राजा का जयकार किया है। स्याद्वाद चन्द्रिका में यह सब परिदृष्य माता जी के संकेत मात्र निम्न “ाब्दों से आंखों के समक्ष प्रस्तुत हो जाता है-

‘‘ ते जयन्तु धर्मतीर्थप्रवत्र्तका श्रीपुरूदेवतीर्थकरा यैः प्रकटिताहारप्रत्याख्यानादि मुनिचर्याविधिरद्यावधि साधुभिः परिलाल्यते। येम्यष्चैकवर्शचतुर्विंषतिदिवसपर्यन्तमुपोषितेभ्य इक्षुरसाहारं दत्वा राजा श्रेयांसकुमारो दानतीर्थप्रवर्तको जातः, पष्चात् तेशामेव गणधरो भूत्वा मुक्तिश्रियमवाप्नोत् तेन साद्र्धं सोऽपि जयतात्।’’'

उपरोक्त संक्षिप्त वर्णन से पाठक को पूरा वृत्तांत जानने की अभिलाशा अवष्य उत्पन्न होगी और वह महापुराण आदि ग्रंथों से परिज्ञान कर धर्मानुराग की ओर गतिमान होगा।

पू० माता जी ने प्रस्तुत टीकाकृति में रचयिता आचार्यों के नामोल्लेख के साथ 62 ग्रंथों के जो उद्धरण दिये हैं उनसे उन आचार्यों के व्यक्तित्व और कृतित्व विशयक जिज्ञासा भी पाठक को अवष्य होगी। आचार्य परम्परा भी एकदृश्ट्या प्रथमानुयोग अथवा इतिहास का विशय है इसकी जानकारी होने से धर्मरुचि उत्पन्न होने में सहायता प्राप्त होगी।

प्रथमानुयोग के अंतर्गत भ० ऋशभदेव के पुत्र भ० बाहुबलि की गणना उनके ध्यानातिषय के कारण उत्कृश्ट “शीर्श महापुरुशों में की जाती हे। उनके विद्यमान विम्ब जो संपूर्ण भारत के देवालयों में विराजमान हैं, इस बात के प्रमाण हैं। स्याद्वाद चन्द्रिका में टीकाकत्र्री ने उनका वर्णन नमस्कार वाक्य में निम्न प्रकार किया है-

‘‘यस्य चरणयोरहिभिः वल्मीकं निर्मितं, वृष्चिकसर्पादयष्च कायस्योपरि आरोहणावरोहणैः क्रीडांचक्रु्रः, आसंवत्सरं प्रतिमायोगमास्थाय निद्रातन्द्राक्षुत्पिपासा- दिविजयिने तस्मै श्री बाहुबलिस्वामिने नमः।’’ '

जिनके चरणों में सर्पों ने वल्मीक बना लिये थे, बिच्छू सर्पादिक जिनके “शरीर पर चढ़ते उतरते हुए क्रीड़ा किया करते थे। एक बरस पर्यन्त प्रतिमायोग को धारण किए हुए निद्रा, तन्द्रा, भूख, प्यास आदि के विजयी उन श्री बाहुबलि स्वामी को मेरा नमस्कार होवे।’’

भगवान ऋशभदेव के पुत्र भरत एवं बाहुबलि इतिहास प्रसिद्ध महापुरुश हुए हैं तत्संबंधी स्मरणीय आख्यान का उद्घाटन ज्ञानमती माता जी ने स्याद्वाद चन्द्रिका के “शुद्ध निष्चय प्रायष्चित्त अधिकार के अंतर्गत किया है। ज्ञातव्य है कि जम्बू द्वीप की प्रतिकृति के निर्माण हेतु माता जी ने श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में विंध्यगिरि पर्वत पर स्थित 58 फीट उन्तुंग विषाल गोम्मटेष्वर बाहुबलि की प्रतिमा के समक्ष भावना की थी एवं संकल्प लिया था। वह संकल्प भी प्रथमानुयोग में भ० ऋशभदेव की प्रथम पारणा विधि, भ० “शातिनाथ, कुन्थुनाथ एवं अरनाथ तीर्थंकर महाप्रभुओं के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान इन चार कल्याणकों से विभूशित और श्रीकृश्ण, पाण्डव महापुरुशों के कथानक से सुप्रसिद्ध हस्तिनापुर तीर्थ पर रचना के रूप में साकार हुआ।

प्रथम कामदेव भ० बाहुबलि द्वारा चक्रवर्ती भरत की पराजय होने पर बाहुबलि को आत्मग्लानि एवं वैराग्य हो गया। उन्होंने संघर्श एवं युद्ध के मूल कारण परिग्रह का त्याग कर मोक्ष प्राप्ति हेतु निग्र्रंथ दिगम्बर दीक्षा ग्रहण एक बरस तक निराहार रहकर एक ही स्थान पर अंगुश्ठों के बल कायोत्सर्ग मुद्रा में दुद्र्धर तपष्चरण एवं आत्मध्यान किया था। पुनः भरत के आगमन एवं प्रणाम के निमित्त से निष्षल्य होकर उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया था। आर्यिका ज्ञानमती जी ने प्रस्तुत टीकाकृति में जो संकेत मात्र संक्षिप्त प्रकाष एतद्विशयक प्रकाष डाला है उससे उन दिव्यात्मा का जीवन दर्षन एवं भ० ऋशभदेव तथा भरत चक्रवर्ती का पावन चरित्र अनायास ही रूपायित हो जाता है। भगवान बाहुबलि की गणना सौंदर्य एवं “शाक्ति के साथ ही अध्यात्म के षिखर पुरूशों में की जाती है। इस अध्यात्म ग्रंथ में ध्यान प्रकरण में उनका स्मरण वस्तुतः टीकाकत्र्री की अपनी विषेशता है।

पुराण शास्त्रों में घोर उपसर्ग सहन करने तथा आत्मध्यान से विचलित न होने वाले 10 अंतःकृत केवलियों का वर्णन है जो अंतः कृद्दषांग नामक अंग से निःसृत है। इन प्रखर भेदविज्ञानी महापुरूशों में सुकौषल मुनि का चरित्र अत्यंत पे्ररणास्पद है। नियमसार में आ० कुन्दकुन्द ने परमसमाधि को निरूपित किया है। विपरीत परिस्थितियां तथा घोर उपसर्ग, परीशह आने पर “शारीर के छिदने, भिदने, कटने, नश्ट होने, प्राणान्त भी होने पर जो आत्मस्वभाव से विचलित नहीं हुए और जिन्होंने “शुक्लध्यान के बल से अत्यंत अल्प समय में कर्म निर्जरा करके केवलज्ञान प्राप्ति के पष्चात् तत्काल मोक्ष प्राप्त किया, उनमें से माता जी ने उपलक्षण रूप में, प्रतीक रूप में सुकौषल स्वामी के चरित्र को संक्षेप मात्र इस अध्याय के अंतर्गत टीका करते हुए अत्यंत श्रद्धा के साथ प्रस्तुत किया है जो हमें दुःख व आपत्ति के अवसर उपस्थित होने पर धैर्य एवं अडिगता की पे्ररणा देता है।

अयोध्या के राजा कीर्तिधर ने भोगों से विरक्त होकर नवजात षिषु सुकौषल का राज्यतिलक करके जैनेष्वरी दीक्षा लेकर तपस्या की। सुकौषल को महारानी सहदेवी के मुनिविरोधी हृदय भावना एवं आचरण से वैराग्य हो गया और अपने पिता के पास जाकर अविवाहित रूप और भरी जवानी में श्रमणत्व अंगीकार किया। सहदेवी मरणकर व्याघ्री हुई उसने अत्यंत क्रोध से मुनि सुकौषल पर आक्रमण किया और उनके “शरीर का भक्षण किया। मुनि सुकौषल स्वामी तनिक भी ध्यान से विचलित नहीं हुए। इस परम तपस्या, परम समाधि रूप वीतरागता के फलस्वरूप घोर उपसर्ग सहकर अंतःकृत केवली होकर निर्वाण की प्राप्ति की।

ज्ञानमती जी के द्वारा सुकौषल स्वामी को आदर्ष रूप में स्मृत किया गया है। स्याद्वाद चन्द्रिका टीका में गाथा क्रमांक 128 के अंतर्गत उनके “शब्द निम्न रूप में अवलोकनीय हैं-

‘‘येन सह यस्मिन् वस्तुनि वा रागोऽस्ति कामपि प्रतिकूलतामासाद्य तेन सह सर्वत्र वा द्वेशः समुत्पद्यते सुकौषलमुनेर्जननी सहदेवीवत्। तस्या स्वपुत्रसुकौषलं प्रति अधिकं स्नेह आसीत्। तेन दीक्षायां गृहीतायां सत्यां सा आत्र्तध्यानेन मृत्वा व्याघ्री भूत्वा तमेवाभक्षयत्।’’'

जिसके साथ अथवा जिस वस्तु में राग है किसी भी प्रतिकूलता को प्राप्त करके उसी के साथ, या वस्तु के साथ द्वेश उत्पन्न हो जाता है, सुकौषल मुनि की माता सहदेवी के समान। उस सहदेवी का अपने पुत्र सुकौषल के प्रति बहुत ही स्नेह था पुनः उस पुत्र के दीक्षा ले लेने पर वह आत्र्तध्यान से भरकर व्याघ्री होकर उस पुत्र को खाने लगी।

यहां टीकाकत्र्री ने वस्तु में इश्ट अनिश्ट का भाव न करने की पे्ररणा दी है। समता भाव का उदाहरण देकर अध्यात्म को पुश्ट किया है। प्रथमानुयोग अन्य कुछ नहीं, अध्यात्म के विशयभूत, द्रव्यानुयोग, करणानुयोग और चरणानुयोा का ही प्रतिविम्बन है जिसके रूप में तीनों अनुयोग साकार होकर अपने उद्देष्य को सफल करते दृश्टिगत होते हैं। चारों अनुयोगों की सार्थकता ही तत्वज्ञान को निश्पक्ष करती है। इसके अभाव में “शुश्क अध्यात्म तो विपरीत कार्य भी करने लगता है, नरक-निगोद का कारण भी होता है।

स्याद्वाद चन्द्रिका में वर्तमान में प्रसिद्ध चारित्र चक्रवर्ती आ० “शाति सागर महाराज को भी बहुमान तथा गुणस्मरण द्वारा नमस्कार किया गया है। इतिहास के उन संबंधी पावन पृश्ठ को वर्तमान में विद्यमान अनेक लोगों ने अपनी आंखों से देखा है। विच्छिन्न होती हुई आर्श परम्परा को अपनी मुनिचर्या के द्वारा पुनः प्रकट करने वाले, समता के धनी आ० “शांति सागर महाराज ने कर्नाटक के भोजग्राम में जन्म लेकर श्रेश्ठ चारित्र पालन करते हुए दक्षिण से उत्तर तक प्रथम आचार्य के रूप में षिश्यप्रषिश्यों को दीक्षित एवं षिक्षित करते हुए जिनधर्म की महती प्रभावना की है। उन्होंने उपवास, कायक्लेष और तपष्चरण, उपसर्ग और परीशहों में स्थिरता, श्रावक तथा मुनिधर्म का विस्तार, तीर्थरक्षा, चतुर्विध संघ का स्थितिकरण, जैन समाज को सम्यक् दिषा बोध व मिथ्यात्वादि कुरीतियों का निवारण करके इन अत्यंत कर्मठ मुनि ने जीवंत धर्म रूप से कुन्थलगिरि पर समाधि सहित “शारीर त्याग किया। उनका अंतिम उपदेष ‘‘संयम धारण करने में भय मत करो’’ आज भी हम सबके लिए मुख्य पे्ररणाश्रोत है। माता जी के “शब्दों को भी प्रस्तुत करना चाहूंगा-

‘‘नमोऽस्तु चारित्रचक्रवर्तीकलिकालदोशदूरकरणदक्षपरमसमाधिभावनापरिणताया- नेकषिश्यप्रषिश्यजनकाय आर्शपरम्पराविच्छिन्नकराय श्री “शांतिसागरसूरिवर्याय मे स्वसमाधिसिद्ध्यर्थमेव।’’

कलिकाल के दोश दूर करने में कुषल परमसमाधि भावना से परिणत, अनेक षिश्य-प्रषिश्यों के जनक, आर्श परम्परा को अविच्छिन्न करने वाले, चारित्र चक्रवर्ती ऐसे आचार्य वर्य श्री शांतिसागर सूर्य वर्य को मेरी अपनी समाधि की सिद्धि के लिए नमोऽस्तु होवे।

इस वर्णन से माता जी ने प्रकट किया है कि अपनी समाधि, समता, जागरण अथवा सल्लेखना के लिए समाधि धारण करने वाले धर्मायतन गुरूओं को विनय, प्रणाम और स्मृति केन्द्र रखना आवष्यक है। उनको लक्ष्य में रखने से ही ममता निवारण होकर मोक्ष के लक्ष्य की सिद्धि संभव है। आ० समन्तभद्र देव ने लिखा है-

प्रथमानुयोगमर्थाख्यानं चरितं पुराणमपि पुण्यं।
बोधिसमाधिनिधानं बोधति बोधः समीचीनः।।

इसके अनुसार यह विदित होता है कि महापुरुशों के सामूहिक आख्यान अर्थात इतिहास वृत रूप पुराण एवं एक विषिश्ट महापुरुश के कथानक रूप चरित्र सत्य एवं सार्थक है, बोधि (रत्नत्रय की प्राप्ति) और समाधि के भंडार है तथा सम्यग्ज्ञान है। इन्हें प्रथमानुयोग की संज्ञा है।

वर्तमान अवसर्पिणी के श्री वृशभदेव से वद्र्धमान तक चैबीसों तीर्थंकरों ने समान रूप से दीक्षा के समय योगभक्ति का आश्रय लिया था किसी अन्य योगी की भक्ति नहीं की थी। वे स्वयंबुद्ध होने के कारण स्वयं ही दीक्षित हो गये थे। वर्तमान पर्याय में उन्हें किसी गुरू के द्वारा प्रव्रजित होने की आवष्यकता नहीं थी। यह वर्णन पुराणों के अध्ययन से सार्थक सिद्ध होता है। इसका उदाहरण देते हुए आर्यिका ज्ञानमती ने यह निरूपित किया है कि तीर्थंकरों के अतिरिक्त अन्य व्यक्ति गुरूओं के द्वारा ही दीक्षा ग्रहण करें। स्वयं प्रतिमा आदि के समक्ष अर्थात गुरू के बिना नहीं। यह वर्णन गाथा क्रमांक 140 की टीका में पठनीय है। आषय यह है कि साधु को स्वच्छंदता से बचना चाहिए। आचारषास्त्रों में यही निरूपण है। किसी अपवाद को उदाहरण नहीं बनाना चाहिए। पुनष्च यह भी ज्ञातव्य है कि बिना गुरु के गुरुभक्ति (आचार्य भक्ति), प्रायष्चित्त, प्रत्याख्यान आदि संभव नहीं है।

आर्यिका ज्ञानमती जी ने नियमसार के कत्र्ता कुन्दकुन्दचार्य देव का भी स्मरण करते हुए उनके गुणों का व्याख्यान कर उनके द्वारा उपदिश्ट मार्ग पर चलने की पे्ररणा दी है। गाथा 144 की टीका में यह अवलोकनीय है। इतिहास जोकि प्रथमानुयोग का मुख्य कथ्य है, वस्तुतः षिक्षा ग्रहण के लिए होता है। वह बड़ा महत्वपूर्ण है। यदि इतिहास को वाङ्न्मय में से निकाल दें तो अवषिश्ट ही क्या रहेगा। कहा भी है-

‘‘न धर्मो धार्मिकैर्विना।’’

जब धार्मिक के बिना धर्म का अस्तित्व नहीं है, गुणी के बिना गुण नहीं है तो इतिहास के बिना, प्रथमानुयोग के बिना वाङ्न्मय भी नहीं है। पू० माता जी ने गाथा क्रमांक 158 के अंतर्गत भरत और बाहुबलि के वर्तमान एवं पूर्व जन्मों के व्यवहार चारित्र पर दृश्टिपात कराया है। मर्यादा पुरूशोत्तम श्री रामचंद्र जी एवं सीता मां के चरित्र का मुख्य लक्ष्यषील भारतवर्श के सदाचार रूप धर्म की आत्मा है जिसका धारक बनने में इस देष का जन सामान्य गर्व का अनुभव करता है। इसी को सम्मान देते हुए आचार्य रविपेण ने पद्मपुराण तथा अन्यों ने भी राम के जीवन वृत्तों को लिपिबद्ध किया है। पद्मपुराण को प्रथमानुयोग का प्रतीक ग्रंथ ही माना जाता है। भ० मुनिसुव्रतनाथ के नाम के प्रभाव से ही मानो राम, लक्ष्मण और सीता मां “शीलव्रत रूप हो गये थे। स्याद्वाद चन्द्रिका में उनका समादृत रूप से उल्लेख किया गया है। आर्यिका वरधर्मा (वा पृथ्वीमती) के श्रद्धेय रूप का भी उल्लेख पू० टीकाकत्र्री ने किया है। उन्हीं से सीता ने आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर आत्म कल्याण किया था। इससे हमें यह षिक्षा मिलती है कि राम सीता के चारित्र मार्ग का अनुसरण कर सदैव गृहस्थ को व्रतियों का वैष्यावृत्ति करना चाहिए।

वर्तमान में भ० महावीर स्वामी का तीर्थकाल चल रहा है। उनके अहिंसा, अनेकान्त और अपरिग्रह सिद्धान्तों पर चलकर अगणित जीव आत्मकल्याण कर रहे हैं। उनके पावन निर्वाणोत्सव की स्मृति में लोग श्रद्धासहित दीपावली पर्व मनाते हैं। आर्यिका ज्ञानमती ने प्रस्तुत टीका में श्री वद्र्धमान स्वामी विशयक यह आख्यान प्रस्तुत किया है उन्हीं के “शब्द विलोकनीय है-

अद्य कार्तिक कृश्णा .................. गणधरदेवपादपूजां च कुर्वन्ति।’’

अनुवाद- आज कार्तिक कृश्णा अमावस्या की इस उशा बेला में पावापुरी के सरोवर के मध्य से भगवान महावीर स्वामी ने “ अघाति कर्मों का निर्मूलन करके निर्वाण पद को प्राप्त किया था। ऐसा ही श्री पूज्यपाद स्वामी ने कहा है-

पावापुरी के बाहर उन्नत भूमि प्रदेष में अनेक खिले हुए कमलों से सहित सरोवर है उसके मध्य स्थित हुए भगवान वद्र्धमान जिनेन्द्र देव ने कर्मों का नाष कर निर्वाण को प्राप्त किया।’’ निर्वाण को प्राप्त हुए आज इन भगवान को दो हजार पांच सौ दस बरस हुए हैं। उन प्रभु की निर्वाण पूजा को करके देवेन्द्रों ने प्रज्वलित दीपमालिकाओं से पावापुरी को प्रकाष युक्त कर दिया था तब से लेकर आज तक इस आर्यखण्ड की वसुंधरा पर सभी संप्रदाय के लोग आज के दिन दीपावली की रात्रि में दीपों को जलाकर सर्वोत्तम पर्व मनाते हैं जैन लोग प्रभात के उशाकाल में भगवान महावीर स्वामी की पूजा करके निर्वाण लाडू के नाम से बड़ा सा लाडू चढ़ाकर निर्वाण कल्याणक महोत्सव करते हैं पुनः सांयकाल में दीपों की पंक्तियां जलाकर श्री गौतम गणधरदेव की केवलज्ञान लक्ष्मी की और गणधरदेव के चरण कमलों की पूजा करते हैं।’’

उपरोक्त कथन का आषय यह है कि स्याद्वाद चन्द्रिका में प्रथमानुयोग का समावेष कर टीकाकत्र्री ने ग्रंथ के उपदेष को प्रथम जीवों के लिए भी रुचिकर, ग्रहणीय एवं श्रद्धास्पद बना दिया है। “शुभ अषुभ कर्म फल को जानकर सभी जीव बुराई से बचकर भलाई में संलग्न हों तथा परम्परा से कर्मों का नाषकर स्वषुद्धात्म पद प्राप्त करें यही लेखिका माता जी का मंतव्य है।