ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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32. अंतिम उद्गार

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अंतिम उद्गार

(२९०)

श्री रामचंद्र जी का जीवन, वैसे तो बड़ा प्रभावी है।
लेकिन सीता की त्यागमयी, जीवन गाथा ही काफी है।।
वैसे तो इस रामायण पर, सीता का नाम लिखा जाता।

तब इतना दुख सहने वाली,सीता पर न्याय किया जाता।।
(२९१)

हर युग में पुरुष प्रधान रहा, इतिहास उठाकर यदि देखें।
वरना क्या हक था रामचंद्र को, अग्नि परीक्षायें लेते ।।
असहाय अवस्था के क्षण में, जंगल में ऐसे छोड़ दिया।

हम ही क्या सारी नारी के, मन को उनने झंझोड़ दिया।।
(२९२)

यदि सीता कालग्रसित होती, तो दोष रामप्रभु का होता।
दुर्गति होती उस नारी की, लवकुश का जन्म नहीं होता।।
इसलिए आज ना कोई राम, ना सीता जैसी नारी है।

पुरुषों ने क्रीड़ा की खातिर, द्रोपदी जुएँ में हारी है।।
(२९३)

नारी की सहनशीलता ने, पुरुषों को दिया बढ़ावा है।
है नारी पुरुषों के समान, ये धोखा और छलावा है।।
सतयुग से कलियुग तक नारी, दुख ही तो सहती आयी है।

बस इसीलिए तो धरती ने, माता की उपाधि पायी है।।
(२९४)

पर कहने से कुछ लाभ नहीं, ये बड़ी जटिल परिभाषा है।
आगे का क्या इतिहास बने,मन समझ नहीं कुछ पाता है।।
इस वर्तमान की नारी ने, पुरुषों से होड़ लगाई है।

लेकिन घर बाहर की चक्की में, खुद ही पिसती आई है।।
(२९५)

इस क्षमा त्याग से जीवन में, सबको ही मिली भलाई है।
सीताजी ने यह राह चुनी, धरती में नहीं समाई है।।
मां सीता रामप्रभू के गुण, जितने भी लिखें बहुत कम हैं।

ना इतना ज्ञान मिला मुझको,और नहीं लेखनी सक्षम है।।
(२९६)

फिर भी थोड़ा प्रयास करके,ये काव्य भक्तिवश लिख डाले।
जिससे शायद हम कर्मों का, बोझा थोड़ा हलका कर लें।।
जिन सीता माता के पथ पर, है चली हमारी माता है।

‘‘त्रिशला’’ को भी शक्ति दें ‘‘मां’’, मन यही भावना भाता है।।