ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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33.प्रषस्ति प्रकाषन

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प्रषस्ति प्रकाषन

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वर्तमान भरत क्षेत्र आर्यखण्ड अर्थात् भारत वर्श में उत्तर प्रदेष राज्यांतर्गत सात षिखरबंद विषाल जिनालयों से “शोभित मैनपुरी नाम का जिला मुख्यालय नगर है। यह पूर्व में विषाल राज्य था। यहां के प्रसिद्ध महाराजा तेजसिंह चैहान ने सन् 1857 में स्वाधीनता संग्राम में अग्रिम पंक्तिस्थ होकर संघर्श किया था। ऐसे ही महापुरुशों के त्याग के फलस्वरूप ही देष ने अंगे्रजी “शासन से मुक्ति प्राप्त की है। वर्तमान में भारत वर्श गणराज्य में श्री के० आर० नारायणन राश्ट्रपति एवं श्री अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री के पद के माध्यम राश्ट्र की सेवा में रत हैं।

मैं बाल्यावस्था से ही संस्कृत प्राकृत भाशा एवं जैन धार्मिक स्वाध्याय के प्रति रुचिवान रहा हूँ। मुझ अल्पज्ञानी षिवचरन लाल जैन ने पू० 105 गणिनी आर्यिका ज्ञानमती की पे्ररणा और आषीर्वाद एवं पंडित बाबूलाल जमादार जी के संबोधनों से सामाजिक ज्ञान प्रभावना के क्षेत्र में प्रवेष किया था। अ० भा० दि० जैन “ाास्त्रि परिशद् के सदस्य होने के नाते लेखन, वाचन, प्रवचन, षिविर आदि के द्वारा देष में ज्ञानप्रसार एवं एकान्त के निरसन का मुझे अवसर प्राप्त हुआ।

पू० ज्ञानमती माता जी की संघस्थ प्रज्ञाश्रमणी पू० चन्दनामती माता जी का पिछले बरस ग्रीश्मकाल सन् 1998 में आदेषात्मक सुझाव प्राप्त हुआ कि मैं अपने जीवन में एक गौरवमय कार्य कर जाऊँ। वह कार्य था पू० आर्यिका ज्ञानमती माता जी द्वारा नियमसार पर रचित ‘स्याद्वाद चन्द्रिका’ ग्रंथ पर विवेचन। उन्होंने साहस भी दिलाया कि इस दुस्तर कार्य को मैं सम्पन्न कर सकता हूं। उन्होंने इस हेतु आषीर्वाद भी दिया। मैंने उनके सुझाव को आदेष के रूप में स्वीकार किया। आयु की साठ वर्शीय वृद्धता, स्वास्थ्य की अपेक्षाकृत न्यूनता की स्थिति में यह कार्य 3 बरस समयावधि का अपेक्षक मुझे ज्ञात हुआ था किन्तु पू० आर्यिका ज्ञानमती के अदृष्य ज्ञान गौरव और उपदेषों के संबल तथा पू० चंदनामती माता जी के सक्रिय आषीश से यह दुरूह कार्य मैंने 1 जुलाई ई० सन् 1998 से प्रारंभ आज ज्येश्ठ (द्वितीय) कृश्णा एकादषी दिन बृहस्पतिवार तदनुसार दि० 10 जून 1999 को पूरा

किया है। 1 बरस से भी कम समय में टीका का पूरा वाचन, नोट्स, “शोध कार्य करके लेखन की पूर्णता मुझ अल्पषक्ति के लिए मैं उपलब्धि मानता हूँ। आर्यिका चंदनामती जी के मध्य मध्य में स्मरण संकेतों का भी प्रमाद परिहार में महनीय योगदान रहा है।

स्याद्वाद चन्द्रिका विस्तृत अर्थ को अपने गर्भ में समेटे हुए है। इसमें अनेकों अपेक्षित विशय आगम विशयक विद्यमान हैं। मैंने तो मात्र 33 विशयों की अनुक्रमणिका के अंतर्गत विचार व्यक्त किये हैं। अल्पज्ञता एवं प्रमाद के कारण त्रुटियां संभव हैं विज्ञजन क्षमा करें एवं भूल सुधार कर लेवें। आगम तो अगम ही है।

वर्तमान में भगवान महावीर के तीर्थकाल में गौतम गणधर आ० कुन्दकुन्द देव प्रभृति आचार्य परम्परा में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य “शांतिसागर जी महाराज, जिन्होंने लोप की ओर अग्रसर निर्ग्रन्थ श्रमण परम्परा को पुनरुज्जीवित किया था, के पष्चात् आचार्य उपाध्याय साधुगण एवं आर्यिका, क्षुल्लक क्षुल्लिका के रूप में लगभग 500 व्रती पिच्छिकाधारी विहार कर स्वपरकल्याण में संलग्न है मैं उन सबको हार्दिक यथापदवी विनय करता हूँ। पुनष्च पू० गणिनी 105 आर्यिका ज्ञानमती माता जी जिन्होंने लगभग 200 ग्रंथों की रचना से जिन वाङ्न्मय के भंडार को पूरित किया तथा संघस्थ पू० चारित्र चन्द्रिका आर्यिका चंदनामती माता जी को वन्दामि समर्पित कर मनसा, वाचा, कर्मणा नमन करता हूँ। संघस्थ पू० 105 क्षुल्लक श्री मोती सागर जी को सविनय इच्छामि एवं समस्त संघ को यथेश्ट विनय। पंचम काल के अंत तक आर्यखण्ड में चतुर्विघ संघ जयषील रहे। पू० माता जी एवं उनके संघ की रत्नत्रय हेतु कुषल क्षेम की कामना। पू० आ० ज्ञानमती जी एवं चंदनामती आयुश्मान, स्वस्थ रहकर दीर्घकाल तक जिनधर्म की प्रभावना करती रहें यह वीर प्रभु से प्रार्थना है। पुनः भावना है कि स्याद्वाद चन्द्रिका ओर उसको प्रकाषित करने वाली सार्थक संज्ञा को प्राप्त यह स्याद्वाद चन्द्रिका ज्ञानमती प्रतिविम्बिका मेरी कृति चिरकाल तक विद्यमान रहे।

मेरे प्रस्तुत कार्य में मेरी पत्नी श्रीमती निर्मला, पुत्र श्री प्रषान्त एवं पुत्रवधू श्रीमती अर्चना का महनीय योगदान है। विषेश रूप से पत्नी का आभारी हूं जिन्होंने पर्याप्त समय इस कार्य में सहायतार्थ दिया है। समस्त परिवार के उपकार का स्मरण करता हूँ। पुनष्च टीका में मुझ अल्पज्ञानी से अनेकों त्रुटियाँ हुई होगीं। विज्ञजन एतदर्थ मुझे क्षमा करें तथा भूल सुधार करने की कृपा करें। समाज इसका उपयोग करें, लाभ उठावें यह भावना है।

मैंने अपने स्वयं के कल्याण के लिए यह कृति लिखी है। भगवान जिनेन्द्र प्रभु से प्रार्थना है कि ऐसा बल मुझे प्रदान करें कि मैं भी मोह पर क्रम से विजय प्राप्त कर आत्मकल्याण पथ पर बढूं। यही जीवन की सार्थकता है।

एकान्तवादीन् नैयायिकादीन्

स्याद्वादसिद्धान्तबलेन जित्वा।
यो धर्मरक्षामकरोत् स सन्मते
मिथ्यान्धकारं दूरं कुरुश्व।।
“शुभं भूयात् भद्रं भूयात्।

इत्यलम्।
जिनवाणी सेवक'
शिवचरन लाल जैन'
सीताराम मार्केट, मैनपुरी - (205001) उ० प्र०'
दूरभाश :- दुकान - 240980'
निवास - 236152'