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34. जैन जीवन शैली (रात्रि भोजन का त्याग)

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जैन जीवन शैली (रात्रि भोजन का त्याग)

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रात्रि को अनगिनत सूक्ष्म एवं स्थूल जीवों का सद्भाव वातावरण में हो जाता है। दिन में सूर्य—प्रकाश होने के कारण उनका सद्भाव नहीं पाया जाता। इसका कारण सूर्य प्रकाश में पायी जाने वाली अल्ट्रावायलेट नाम की अदृश्य किरणें हैं। सूर्य के प्रकाश में उक्त अदृश्य और गर्म किरणें निकलती रहती हैं। उनके प्रभाव से सूक्ष्म जीव दिन में यहाँ-वहाँ छिप जाते हैं तथा नये जीवों की उत्पत्ति नहीं होती। रात्रि होते ही वे उत्पन्न होने लगते हैं। सूर्य—प्रकाश के अतिरिक्त प्रकाश के किसी अन्य स्रोत में उक्त किरणें नहीं पायी जाती। यही कारण है कि वर्षा ऋतु में दिन में लाइट जलाने पर कीड़े नहीं आते जबकि रात्रि में उसी लाइट के प्रकाश में अनेक जीव दृष्टिगोचर होते हैं, जो भोज्य सामग्री के साथ मिल मरण को प्राप्त होते हैं, जो त्रस जीव की हिंसा का कारण है, साथ ही पेटसम्बन्धी बीमारी का कारण है अत: रात्रिभोजन त्यागने योग्य है।

दो इन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तक के जीवों को त्रसजीव कहते हैं।
इनमें से कुछ जीव आँखों से दिखाई देते हैं, कुछ नहीं भी।