ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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36. कर्म के फेरे

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कर्म के फेरे

(काव्य पैतालीस से सम्बन्धित कथा)
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‘‘क्यों भाई! तुम कौन हो? क्या नाम है तुम्हारा?’’ ‘‘मैं उज्जयनी नरेश नृपशेखर का इकलौता पु़त्र युवराज हंसराज हूँ।’’ ‘‘फिर तुम्हारा यहाँ नागपुर आना कैसा हुआ?’’ ‘‘दुर्भाग्य का सताया हुआ कहीं भी जा सकता है राजन्! दैवाधीन श्मनुष्य का उसके आने हाथ में क्या है ? उदयागत कर्मों की प्रबल—पवन जिसे जिस दिशा में भी उड़ा ले जाये, विवश होकर उसे कहाँ जाना ही पड़ता है। यही काल मेरा भी समझिये।’’ ‘‘वत्स ! तुम्हारी वार्तालाप की शैली से तो प्रकट होता है, कि तुम वास्तव में कोई युवराज हो, परन्तु क्या इतना और बतलाने का कष्ट करोगे कि एक अनाथ की भाँति तुम इस वृक्ष के नीचे पड़े हुए क्यों कराह रहे हो?क्या तुम्हें कोई बीमारी है? सारा का सारा शरीर भी तुम्हारा पाण्डुवर्ण दिखाई दे रहा है।’’

‘‘हाँ, महाराज! आपका अनुमान ठीक है। मैं वात-पित्त और कफ की विषमताओं से प्रपीड़ित हूँ। अन्नादि ग्रहण न करने पर भी यह पेट गरीब के ब्याज की भाँति दिन दूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा है।राज्यवैद्य ने असका निदान ‘जलोदर’ किया था।पर उपचार के नाम पर अपनी असमर्थता प्रकट कर दी।’’ ‘‘घुटनों में पीड़ा होती है, मानों गठियावात के लक्षण भी प्रकट होने लगे हों! कफ, खांसी को तो आप प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं कि आप से बात करना भी कठिन हो गया। जहाँ तहाँ ये कोढ़ के धब्बे भी दिखाई देने लगे हैं। इतना ही नहीं, उस कोढ़ में भी यह खाज हो रही है। जैसे तैसे मौत की घड़ियां गिन रहा हूँ। पर वह निगोड़ी आती ही नहीं। वह तो न जाने किस स्वस्थ और सुन्दर युवक की तलाश में है। आप ही देखिये न कि क्षणिक संसार की विनाश लीला के सारे दृश्य मेरे शरीर के परदे पर ही दिखाये जा रहे हैं। मैं चाहता हूँ, कि बस मृत्यु के पर्दे का पटापेक्ष हो और मेरे जीवन-नाटक का यह वीभत्स दृश्य शीघ्र ही समाप्त हो।’’...कहते -कहते युवराज हंसराज की आँखों से सावन की झड़ी लग गई।उसका कंठ रुँध गया और वह आगे एक शब्द भी न बोल सका। अपने साथियों सहित भ्रमण को आये हुए वहाँ के राजा मानगिरि युवराज की यह करुण कहानी सुनकर एवं उसकी यह नारकीय दारुण पीड़ा देखकर अविचलित न रह सके। यद्यपि वे कठोरता और निष्ठुरता के साक्षात् अवतार थे।

राजकुमारी कलावती दुलहिन के रूप में सुसज्जित विवाह मंडप के मध्य में खड़ी है और युवराज हंस भी उसी वेष में दूल्हा बन कर खड़ा हुआ है-गठ-बन्धन की क्रिया की जा चुकी है-भाँवरे पड़ने भर की देर है। पंडित पुरोहित, विप्र, मंत्री आदि बार-बार राजा को रोक रहे हैं, मना कर रहे है कि क्यों आप अपनी एकलौती लाड़ली कोमलाङ्गी कन्या का अमूल्य जीवन अपने ही हाथों विनिष्ट करने पर तुले हुये हैं? क्यों एक सड़ी गली मुर्दा लाश से इस रूपवती बाला के सुकुमार यौवन को बांध रहे हैं? ऐसे करने से नरक में भी जगह न मिलेगी।...पर राजा मानगिरि तो ऐसे आपे से बाहर हैं कि किसी की सुनते ही नहीं। आँखे उनकी अंगार की तरह लाल-लाल हो रही हैं। दंभ और अहम् का कोई ठिकाना नहीं है। उनका तो विश्वास है कि जब यह लड़की हमारा दिया हुआ खाती है, हमारे आश्रित रहकर यह इतनी बड़ी हुई है तो फिर क्यों कर कर्म-कर्म चिल्लाती है? बार-बार उनकी दुहाई देती है।कर्म के आगे वह मेरा अस्तित्व भी नहीं मानती। मेरे उपकार की कोई कद्र भी नहीं करती।देखें इसका ये कर्म कब तक साथ देते हैं। कर्मों का सताया हुआ युवराज ही इसका सर्व श्रेष्ठ योग्य वर है। विवाह में उल्लास का नहीं, मातम सा करुण वातावरण छाया हुआ था। माता की ममता दीवार से सिर फोड़ रही थी। परन्तु उस मदान्ध क्रोधी को कुछ नहीं सूझता था। भारतीय नारी कलावती कैसे अपने पति के विरोध मे एक भी शब्द कह सकती थी? पतिव्रत्य धर्म की सुशिक्षा तो यहाँ की नारियों को जन्मघुट्टी के साथ ही मिली है।वह बेचारी तो धीरता पूर्वक अपने कर्मों का यह तमाशा देखती रही। भावी सुदिन की आशाओं के सहारे उसने अपने को बांधकर विष का यह कडुवा घूँट पी लिया।पर चूँ तक न की। और इस प्रकार राजकुमारी कलावती एवं हंसराज का जीवन एक परिणय सूत्र में बंध गया।

जिस दिन युवराज हंसराज को कलावती पाणिग्रहण में प्राप्त हुई उसी दिन से उसका प्रत्येक दिन सोने का और प्रत्येक रात मानों चांदी की बनती गई। जिस प्रकार विपत्तियाँ कभी अकेली नहीं आतीं वैसे ही सौभाग्य भी जब आता है तो वह अपने साथ स्वर्गलोक का पूरा वैभव लाता है।निमित्त मिलते जाते हैं-कार्य होता जाता है। बात यह हुई है कि एक दिन उपर्युंक्त दोनों दम्पत्ति को एक परम निग्र्रंन्थ दिगम्बर मुनिश्री द्वारा महाप्रभावक श्री भक्तामर स्तोत्र का ४५वाँ श्लोक का निमित्त मिल गया।उसके ७ दिन तक निरन्तर अखण्ड जाप्य से युवराज हंस की वह घिनौनी काया वंâचन काया हो गई। और युवक कामदेव को लज्जित करने लगा।

मुनिराज ने बतलाया कि कुमार की यह दयनीय हालत उसकी विमाता कमला द्वारा दी गई दिनाई के कारण हुई है। यह अच्छा हुआ कि युवराज ने वह राजमहल तत्काल ही छोड़ दिया अन्यथा जीवन-दान देने का यह परम सौभाग्य मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होता। वास्तव में मनुष्य को कदापि एक पत्नी के स्वर्गवासी हो जाने पर अपना पुर्नविवाह नहीं करना चाहिये, क्योंकि उसके ऐसे ही अनेकों भयकंर दुष्परिणाम देखे और सुने जाते हैं।