ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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4.वैराग्य के अंकुर-२

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वैराग्य के अंकुर-२

समाहित विषयवस्तु

१. एक दिन ग्वालिन घी का घड़ा लेकर आयी।

२. मैना ने घी में मरी चीटियाँ देखकर घी वापस किया।

३. मैना द्वारा आज से बाजार का घी एवं सभी वस्तुएँ त्याग।

४. मैना द्वारा नीरस भोेजन।

५. हम भी मैना से शिक्षा लें।

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काव्य पद


टिकैतनगर तो अवधक्षेत्र के, भूमि भाग में आता है।
द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव भी, अपना असर दिखाता है।।
दीक्षा ले कल्याण किया था, ब्राह्मी-सुंदरि दोनों ने।
फिर क्यों ‘मैना’ देर लगाये, व्रती-आर्यिका होने में।।११८।।

एक दिवस ग्वालिन लायी थी, देशी घी मुख बाँध घड़ा।
ऊपर से तो स्वच्छ-सुगंधित, दिखता था स्वादिष्ट बड़ा।।
किन्तु किया जब मुख उद्घाटन, भरा चीटियों के शव से।
घी की ऐसी देख दुर्दशा, गृह सदस्य सब विस्मित थे।।११९।।

‘मैना’ का तो बुरा हाल था, लख हिंसा मन हुआ विदीर्ण।
भू-तल पर आँसू की लड़ियाँ, मोती-सी हो गयीं विकीर्ण।।
भवसागर संतरण सेतु बन, करना जिसे जीव उद्धार।
वह कैसे भोजन-पानी में, कर सकता हिंसा स्वीकार।।१२०।।

‘मैना’ बोली ‘‘नहीं चाहिये, यह घी वापस ले जाओ।’’
‘इसे छान कर अन्य को दूँगी, कल तुम अच्छा घी पाओ।।’
‘‘अगर कहीं तुम यही छान कर, हमको लाओगी दादी।
तदा हमारे दयाधर्म की, हो जायेगी बर्बादी’’।।१२१।।

‘मैना’ माँ से सविनय बोली’’, त्याग आज से घृत बाजार।
मैं भोजन रूखा कर लूँगी, नहीं चाहिए सरसाहार।।
मात्र नहीं घी, सभी वस्तुयें, त्यागी मैं बाजार बनीं।
घर में ही तैयार सभी हो, शुद्ध-स्वच्छ हों धुली-छनी।।१२२।।

सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म है, दया-अहिंसा-करुणा-प्रेम।
किसी जीव को नहीं सताना, चिन्तन करना सबकी क्षेम।।
भोजन-पानी करे प्रभावित, मन-वाणी-आचार-विचार।
अत: उचित जीवन स्वीकारें, वस्त्रपूत जल, शाकाहार।।१२३।।

वस्तु बजारू खायें न कुछ भी, अशुद्ध-अभक्ष्य-अस्वस्थपना।
नहिं मर्यादित, जीवराशिशव, बिना छना जल, रात्रि बना।।
दूध-दही-मिष्ठान्न-तेल-घृत, पिसे मसाले त्याग करें।
दया हृदय को यही उचित है, दिवा असन स्वीकार करें’’।।१२४।।

बालवयस इतना संवेदन, विवेक-जागृति-संयम-त्याग।
पहले के संस्कार महत्तम, लायी संग ‘मैना’ बड़भाग।।
सुप्त बीज को मात मोहिनी, सिंचित कर वातास दिया।
काललब्धि पा हुये अंकुरित, अब विरक्ति का रूप लिया।१२५।।

‘मैना’ नीरस भोजन करती, मन रहता अति तोष भरा।
सच्चा त्याग यही कहलाता, रहता नहीं विकल्प जरा।।
आकुल-व्याकुल वह होता है, जिस मन होता मोह निवास।
मोह मनुज का प्रबल शत्रु है, कर देता जीवन का नाश।।१२६।।

धन्य-धन्य हैं ‘मैनादेवी’, धन्य-धन्य है उनका त्याग।
जननी-जनक धन्य हैं उनके, जिनसे पोषित रहा विराग।।
धन्य-धन्य हम लोग सभी हों, संयम-त्याग प्रशंसा कर।
और एक दिन दृढ़ प्रतिज्ञ हो, बतलायें उस पर चलकर।।१२७।।

अधिक नहीं तो इतना कर लें, छोड़ें तीन महा मक्कार।
सप्त-व्यसन-रात्रि का भोजन, जल अनछना, माँसाहार।।
अण्डा-मछली-शीत पेय सब, फास्ट फूड न ग्रहण करें।
सच्चे देव-गुरू का पूजन, जिनवाणी का मनन करें।।१२८।।