ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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4. गुणोत्पादन नामक चौथा अन्तराधिकार

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गुणोत्पादन नामक चौथा अन्तराधिकार

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अथ गुणोत्पादननाम चतुर्थोऽन्तराधिकार:
=
अथ त्रिभि: स्थलै: एकचत्वािंरशत्सूत्रै: नवमीचूलिकायां चतुर्गतिषु गुणोत्पादननामा चतुर्थोऽन्तराधिकार: कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले नरकगते: निर्गत्य कानि कानि गुणोत्पादनानि कुर्वन्ति इति प्रतिपादनपरत्वेन ‘‘अधो सत्तमाए’’ इत्यादि अष्टादशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्मनुष्यौ कानि कानि गुणोत्पादनानि कुर्वन्तीति निरूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खा मणुस्सा’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तत: परं तृतीयस्थले देवा: तत्रगते: च्युता: कानि कानि स्थानानि प्राप्नुवन्ति इति कथनमुख्यत्वेन ‘‘देवगदीए देवा’’ इत्यादिसूत्राष्टादश इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

अधुना सप्तमपृथिवीगतनारकाणां अनुत्पादनगुणप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-अधो सत्तमाए पुढवीए णेरइया णिरयादो णेरइया उवट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२०३।।
एक्कं हि चेव तिरिक्खगदिमागच्छंति।।२०४।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा छण्णो उप्पाएंति-आभिणि-बोहियणाणं णो उप्पाएंति, सुदणाणं णो उप्पाएंति, ओहिणाणं णो उप्पाएंति, सम्मामिच्छत्तं णो उप्पाएंति, सम्मत्तं णो उप्पाएंति, संजमासंजमं णो उप्पाएंति।।२०५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
कश्चिदाह-द्वे सूत्रे पूर्वोक्तत्वा क्ततात् न वक्तव्ये स्त: ?
परिहरति आचार्यदेव:-नैष दोष:, जडमतिशिष्यानुग्रहहेतुत्वात्।
सप्तमपृथिवीत: निर्गता: नारका: नियमेन तिर्यञ्चो भवन्ति, ते च तस्मिन् पर्याये षट्गुणान् नोत्पादयन्ति, मति-श्रुत-अवधिज्ञानानि, सम्यग्मिथ्यात्वं, सम्यक्त्वं संयमासंयमं च।
तीर्थकरादीनां प्रतिषेधोऽत्र किन्न कृत: ?
न, तिर्यक्षु तेषां संभवाभावात्। सर्वस्य प्रतिषेधस्य पूर्वं प्रतिषेध्यवस्तुन: उपलंभात्।
सासादनगुणस्थानस्य प्रतिषेध: किन्न कृत: ?
न, सम्यक्त्वे प्रतिषिद्धे तत्त: सम्यक्त्वात् उत्पद्यमानसासादनसम्यक्त्वगुणस्थानप्रतिषेधस्य अनुक्तसिद्धे:।
षष्ठीपृथिव्या: निर्गता जीवा के गती कान् गुणांश्चोत्पादयन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-छट्ठीए पुढवीए णेरइया णिरयादो णेरइया उवट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति।।२०६।।
दुवे गदीओ आगच्छंंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।२०७।।
तिरिक्ख-मणुस्सेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा मणुसा केइं छ उप्पाएंति-केइं आभिणिबोहियणाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाण-मुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्तमुप्पाएंति, केइं सम्मत्तं उप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति।।२०८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगम:।
सासादनसम्यक्त्वं सम्यक्त्वे प्रविशति इति पृथग्नोक्तं।
शेषं संयमादिकं नोत्पादयन्ति इति कथं ज्ञायते ?
विधेरभावात्। ये गुणा: यस्मिन् स्थाने संभवन्ति, तीर्थकरदेवा: तान् प्रतिपादयन्त्येव इति ज्ञातव्यं।
पंचमीचतुर्थीपृथ्वीत: निर्गतनारका: के गती कान् गुणांश्चोत्पादयन्तीति प्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-पंचमीए पुढवीए णेरइया णेरइयादो णेरइया उव्वट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२०९।।
दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं चेव मणुसगदिं चेव।।२१०।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केइं छ उप्पाएंति।।२११।।
मणुस्सेसु उववण्णल्लया मणुसा केइमट्ठमुप्पाएंति-केइमाभिणि-बोहियणाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केइं मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्तमुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केइं संजममुप्पाएंति।।२१२।।
चउत्थी पुढवीए णेरइया णिरयादो णेरइया उव्वट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२१३।।
दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगइं चेव मणुसगइं चेव।।२१४।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केइं छ उप्पाएंति।।२१५।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुसा केइं दस उप्पाएंति-केइमाभिणि-बोहियणाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केइं मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केइं केवलणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्त-मुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केइं संजम-मुप्पाएंति। णो बलदेवत्तं वासुदेवत्तं णो चक्कवट्टित्तं णो तित्थयरत्तं। केइमंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाण-मंतं परिविजाणंति।।२१६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। पंचम्या: पृथिव्या: निर्गता: केचित् मनुष्या: मुनयो भूत्वा मन:पर्ययज्ञानिनोऽपि भवन्ति तीव्रसंक्लेशपरिणामाभावात्, किन्तु न ते केवलज्ञानिनो भवितुमर्हन्ति।
उक्तं चान्यत्रापि- निर्गता: खलु पञ्चम्या: लभन्ते केचन व्रतम्।
प्रयान्ति न पुनर्मुत्तिं भावसंक्लेशयोगत:।।
चतुथ्र्र्या: उद्वर्तिता: केचित् तिर्यक्षु उत्पन्ना: षडेव उत्पादयन्ति, नाधिकान्-मतिश्रुतावधिसम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वसंयमासंयमान् चेति।
चतुभ्र्या: निर्गता: यदि मनुष्या: भवन्ति तर्हि केचित् दशगुणान् उत्पादयन्ति। अन्यत्र चापि कथितं-
लभन्ते निर्वृत्तिं केचिच्चतुथ्र्या: निर्गता: क्षिते:।
न पुन: प्राप्नुवन्त्येव पवित्रां तीर्थकर्तृताम्।।
इमे अन्तकृत्केवलिनोऽपि भवितुमर्हन्ति।
अष्टकर्मणामंतं विनाशं कुर्वन्तीति अन्तकृत:। अन्तकृतो भूत्वा, ‘सिज्झंति’-सिद्ध्यन्ति निस्तिष्ठन्ति निष्पद्यन्ते स्वरूपेणेत्यर्थ:। ‘बुज्झंति’-त्रिकालगोचरानन्तार्थ-व्यञ्जनपरिणामात्मकाशेषवस्तुतत्त्वं बुद्ध्यन्ति अवगच्छन्तीत्यर्थ:।
केवलज्ञाने समुत्पन्नेऽपि सर्वं न जानातीति कपिलो ब्रूते तन्मतनिराकरणार्थं बुद्ध्यन्ते इत्युच्यते। मोक्षो हि नाम बंधपूर्वक:, बंधश्च न जीवस्यास्ति, अमूर्तत्वान्नित्यत्वाच्चेति। तस्माज्जीवस्य न मोक्ष: इति नैयायिक-वैशेषिक-सांख्य-मीमांसकमतम्। एतन्निराकरणार्थं ‘मुच्चंति’ इति प्रतिपादितम्।
परिणिव्वाणयंति-अशेषबंधमोक्षे सत्यपि न परिनिर्वान्ति, सुखदु:खहेतुशुभाशुभकर्मणां तत्रासत्त्वादिति तार्विकयोर्मतम्। तन्निराकरणार्थं परिनिर्वान्ति अनन्तसुखा भवन्तीत्युच्यते। यत्र सुखं तत्र निश्चयेन दु:खमप्यस्ति दु:खाविनाभावित्वात्सुखस्येति तार्विकयोर्मतं, तन्निराकरणार्थं सर्वदु:खानामन्तं परिविजाणंति इति उच्यते। सर्वदु:खानामंतं पर्यवसानं परिविजानन्ति गच्छन्तीत्यर्थ:। कुत:? दु:खहेतुकर्मणां विनष्टत्वात्, स्वास्थ्यलक्षणस्य सुखस्य जीवस्य स्वाभाविकत्वात् इति।
स्वेषु तिष्ठन्तीति स्वस्था: सिद्धपरमेष्ठिन:, तेषां सुखं स्वास्थ्यलक्षणं। श्रीसमन्तभद्रस्वामिनापि कथितं-
स्वास्थ्यं यदात्यन्तिकमेष पुंसां, स्वार्थो न भोग: परिभंगुरात्मा।
तृषोऽनुषङ्गान्न च तापशान्ति-रितीदमाख्यद् भगवान् सुपार्श्व:१।।
अन्यत्रापि उक्तं- आत्मोत्थमात्मना साध्यमव्याबाधमनुत्तरम्।
अनंतस्वास्थ्यमानंदमतृष्णमपवर्गजम्।।
तथैव च-
आत्मज्ञातृतया ज्ञानं, सम्यक्त्वं चरितं हि स:।
स्वस्थो दर्शनचारित्रमोहाभ्यामनुपप्लुत:१।।

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अब यहाँ गुणोत्पादन नाम का चौथा अन्तराधिकार कहते हैं-

अब यहाँ तीन स्थलों द्वारा इकतालीस सूत्रों से नवमी चूलिका में चारों गतियों में ‘गुणोत्पादन’ नाम का चौथा अन्तराधिकार कहते हैं-उसमें प्रथम स्थल में नरकगति से निकलकर किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने वाले ‘‘अधोसत्तमाए’’ इत्यादि अठारह सूत्र कहेंगे। इसके बाद दूसरे स्थल में तिर्यंच और मनुष्य किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा निरूपण करने वाले ‘तिरिक्खामणुस्सा’ इत्यादि पाँच सूत्र कहेंगे। इसके अनंतर तृतीय स्थल में देव देवगति से च्युत होकर किन-किन स्थानों को प्राप्त करते हैं, ऐसे कथन की मुख्यता से ‘देवगदीए देवा’ इत्यादि अठारह सूत्र कहेंगे। इस प्रकार यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

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अब सातवीं भूमि के नारकियों के अनुत्पादन गुणों का प्रतिपादन करने के लिए तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नीचे सातवीं पृथिवी के नारकी नरक से निकलकर कितनी गतियों में आते हैंं ?।।२०३।।

सातवीं पृथिवी से निकले हुए नारकी जीव केवल एक तिर्यंचगति में आते हैं।।२०४।।

तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच इन छह की उत्पत्ति नहीं करते-आभिनिबोधिक ज्ञान को उत्पन्न नहीं करते, श्रुतज्ञान को उत्पन्न नहीं करते, अवधिज्ञान को उत्पन्न नहीं करते, सम्यग्मिथ्यात्व गुण को उत्पन्न नहीं करते, सम्यक्त्व को उत्पन्न नहीं करते और संयमासंयम को उत्पन्न नहीं करते।।२०५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है।

शंका-कोई कहता है-दोनों सूत्र पूर्वकथित हैं, अत: उन्हें यहाँ नहीं कहना चाहिए ?

समाधान-आचार्यदेव परिहार करते हैं-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहाँ पुनरुक्ति का हेतु जड़मति शिष्यों पर अनुग्रह करना है।

सातवीं पृथिवी से निकले हुए नारकी नियम से तिर्यंच ही होते हैं और वे उस पर्याय में छह गुणों को उत्पन्न नहीं कर पाते है-

१. मतिज्ञान,

२. श्रुतज्ञान,

३. अवधिज्ञान,

४. सम्यग्मिथ्यात्व,

५. सम्यक्त्व और

६. संयमासंयम।

शंका-तीर्थंकरादि का यहाँ प्रतिषेध क्यों नहीं किया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि तीर्थंकरादिकों का तिर्यंचों में होना संभव नहीं है। सर्व प्रतिषेध में पहले प्रतिषेध्य वस्तु की उपलब्धि पाई जाती है।

शंका-तिर्यंचों में सासादन गुणस्थान की प्राप्ति का प्रतिषेध क्यों नहीं किया ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सम्यक्त्व का प्रतिषेध कर देने पर सम्यक्त्व से उत्पन्न होने वाले सासादनसम्यक्त्व गुण के प्रतिषेध की सिद्धि बिना कहे ही हो जाती है।

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अब छठी पृथिवी से निकले हुए जीव किन गतियों को और किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

छठवीं पृथिवी के नारकी नरक से नारकी होते हुए निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२०६।।

छठवीं पृथिवी से निकलने वाले नारकी जीव दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२०७।।

तिर्यंच और मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच व मनुष्य कोई छह उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोर्ई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं और कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं।।२०८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। सासादन सम्यक्त्व सम्यक्त्व में ही गर्भित है अत: उसे पृथक् नहीं कहा है।

शंका-छठी पृथिवी से आकर तिर्यंच और मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले तथा उक्त जीव संयम आदि को उत्पन्न नहीं करते अर्थात् ये तिर्यंच और मनुष्य संयमादि शेष गुणों को उत्पन्न नहीं करते, यह कैसे जाना जाता है ?

'समाधान-'क्योंकि उनके संयमादि उत्पन्न करने का विधान नहीं किया गया। जो गुण जिस स्थान में संभव हैं, तीर्थंकर भगवान उनका प्रतिपादन करते ही हैं, ऐसा जानना चाहिए।

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अब पाँचवीं और चौथी नरकभूमि से निकलकर जीव किन गतियों को और किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए आठ सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

पाँचवीं पृथिवी के नारकी जीव नरक से नारकी होते हुए निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२०९।।

पाँचवीं पृथिवी से निकलकर नारकी जीव दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२१०।।

तिर्यंचोें में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२११।।

मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य कोई आठ को उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं और कोई संयम उत्पन्न करते हैं।।२१२।।

चौथी पृथिवी के नारकी जीव नरक से नारकी होते हुए निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२१३।।

चौथी पृथिवी से निकलने वाले नारकी जीव दोे गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२१४।।

तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२१५।।

मनुष्यों में होने वाले मनुष्य कोई दश उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं और कोई संयम उत्पन्न करते हैं। वे न बलदेवत्व उत्पन्न करते, न वासुदेवत्व, न चक्रवर्तित्व और न तीर्थकरत्व। कोई अन्तकृत् होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, वे सर्व दु:खों के अन्त होने का अनुभव करते हैं।।२१६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। पाँचवीं पृथिवी से निकलकर मनुष्य हुए कोई जीव मुनि होकर मन:पर्ययज्ञानी भी होते हैं क्योंकि उनके तीव्र संक्लेश परिणामों का अभाव है, किन्तु वे केवलज्ञानी नहीं हो सकते हैं। तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

पाँचवें नरक से निकलकर कोई मनुष्य होकर व्रतोें को प्राप्त कर सकते हैं किन्तु मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि उनके भावों में संक्लेश रहता है।।

चौथी पृथिवी से निकलकर कोई तिर्यंचों में उत्पन्न होकर छह गुणों को उत्पन्न कर सकते हैं, अधिक नहीं, वे छह हैं-मति, श्रुत, अवधिज्ञान, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और संयमासंयम।

चौथी पृथिवी से निकले हुए यदि मनुष्य होते हैं, तो कोई दशों गुणों को भी उत्पन्न कर लेते हैं।

तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

चौथी पृथिवी से निकलकर मनुष्य होकर ये मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु तीर्थंकर नहीं हो सकते हैं।

ये अन्तकृत केवली भी हो सकते हैं।

जो आठ कर्मों का अन्त अर्थात् विनाश करते हैं, वे अन्तकृत् कहलाते हैं। अन्तकृत् होकर सिद्ध होते हैं, निष्ठित होते हैं वे अपने स्वरूप से निष्पन्न होते हैं, ऐसा अर्थ जानना चाहिए। ‘जानते हैं’ अर्थात् त्रिकालगोचर अनन्त अर्थ और व्यंजन पर्यायात्मक अशेष वस्तु तत्त्व को जानते हैं व समझते हैं।

कपिल का कहना है कि केवलज्ञान उत्पन्न होने पर भी सब वस्तु स्वरूप का ज्ञान नहीं होता। अत: उनके मत का निराकरण करने के लिए ‘बुद्ध होते हैं’ यह पद कहा गया है। मोक्ष बन्धपूर्वक ही होता है, किन्तु जीव के तो बंध ही नहीं है, क्योंकि जीव अमूर्त है और नित्य है। अतएव जीव का मोक्ष नहीं होता। ऐसा नैयायिक, वैशेषिक, सांख्य और मीमांसकों का मत है। इसी मत के निराकरणार्थ ‘मुक्त होते हैं’ ऐसा प्रातिपादित किया गया है। परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, इस पद की सार्थकता इस प्रकार है-अशेष बंध का मोक्ष हो जाने पर भी जीव परिनिर्वाण को प्राप्त नहीं होते, क्योंकि उस मुक्त अवस्था में सुख के हेतु शुभ कर्म और दुख के हेतु अशुभ कर्मों का अभाव पाया जाता है, ऐसा दोनों तार्विकों का मत है। इसी तार्विकमत के निराकरणार्थ ‘परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं’ अर्थात् अनन्त सुख का उपभोग करने वाले होते हैं, ऐसा कहा गया है। जहाँ सुख है वहाँ निश्चय से दुख भी है क्योंकि सुख का दुख के साथ अविनाभावी संबंध है, ऐसा दोनों ही तार्विकों का मत है। उसी मत के निराकरणार्थ ‘सर्व दुखों के अन्त होने का अनुभव करते हैं’ ऐसा कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वे जीव समस्त दु:खों के अन्त अर्थात् अवसान को पहुँच जाते हैं, क्योंकि उनके दु:ख के हेतुभूत कर्मों का विनाश हो जाता है और स्वास्थ्यलक्षण सुख जो जीव का स्वाभाविक गुण है, वह प्रकट हो जाता है।

जो अपनी आत्मा में स्थित होते हैं, वे स्वस्थ कहलाते हैं, वे सिद्ध परमेष्ठी ही हैं, उनका सुख ‘स्वास्थ्य लक्षण’ से सहित है।

श्री समंतभद्रस्वामी ने भी कहा है-

पुरुषों का आत्यंतिक स्वास्थ्य है वही स्वार्थ है, वह भोग नहीं है क्योंकि भोग क्षणभंगुर हैं। इनसे तृष्णा की वृद्धि होती है और तृष्णा से ताप की शांति नहीं होती। श्री सुपाश्र्वनाथ भगवान ने ऐसा कहा है।।

क्षत्रचूड़ामणि में भी कहा है-

आत्मा से उत्पन्न हुआ आत्मा के द्वारा साध्य, अव्याबाध, अनुत्तर जो सुख है, वह अनंत स्वास्थ्य कहलाता है, वह आनंदस्वरूप है, तृष्णा से रहित है और मोक्ष में ही होता है।

उसी प्रकार तत्त्वार्थसार में श्री अमृतचंद्रसूरि ने कहा है-

जो जानता है वह आत्मा है। जानता है ज्ञान, इसलिए ज्ञान ही आत्मा है। इसी प्रकार जो सम्यक् श्रद्धान करता है, वह श्रद्धानी या आत्मा कहलाता है। श्रद्धान करता है सम्यग्दर्शन, इसलिए वही श्रद्धानी है, वही आत्मा है। जो उपेक्षित होता है वह आत्मा है। उपेक्षित होता है उपेक्षागुण, इसलिए वही आत्मा है अथवा वह आत्मा ही है। यह अभेदरूप रत्नत्रय का स्वरूप है। ऐसी अभेदरूप स्वस्थ दशा उसी तपस्वी की हो सकती है, जो दर्शनमोहनीय तथा चारित्रमोहनीय के उदयाधीन नहीं रहता है।

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संप्रति तृतीयद्वितीयप्रथमपृथिवीभ्य: निर्गता: कान् कान् गुणानुत्पादयन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रचतुष्कमवतार्यते-

तिसु उवरिमासु पुढवीसु णेरइया णिरयादो णेरइया उव्वट्टिदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२१७।।

दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।२१८।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केइं छ उप्पाएंति।।२१९।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुस्सा केइमेक्कारस उप्पाएंति-केइमाभिणि-बोहिय-णाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइं मणपज्ज-वणाणमुप्पा-एंति, केइमोहिणाण-मुप्पाएंति, केइं केवलणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्त-मुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केइं संजममुप्पाएंति। णो बलदेवत्तं णो वासुदेवत्तमुप्पाएंति, णो चक्कवट्टि-मुप्पाएंति। केइं तित्थयरत्तमुप्पाएंति, केइमंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति।।२२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। उपरि तिसृभ्य: उद्वर्तिता: तिर्यक्षु उत्पन्ना: केचित् मतिश्रुतावधिज्ञानानि सम्यग्मिथ्यात्वसम्यक्त्वसंयमासंयमांश्चोत्पादयन्ति। मनुष्येषु उत्पन्ना: केचित् एकादशगुणान् उत्पादयन्ति। मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञानानि, सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं संयमासंयमं संयमं च तीर्थकरत्वं मोक्षं चापि, किंतु नरकेभ्य: निर्गत्य केचिदपि बलदेववासुदेव चक्रधरत्वानि नोत्पादयन्ति।
एवं प्रथमस्थले नरकेभ्य: निर्गत्य कान् कान् गुणान् उत्पादयन्ति ? इति निरूपणत्वेन अष्टादशसूत्राणि गतानि।
अधुना तिर्यग्मनुष्याभ्यां आगत्य कान् कान् गुणान् उत्पादयन्तीतिप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-तिरिक्खा मणुसा तिरिक्ख-मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२२१।।
चत्तारि गदीओ गच्छंति णिरयगदिं तिरिक्खगदिं मणुसगदिं देवगदिं चेदि।।२२२।।
णिरय-देवेसु उववण्णल्लया णिरय-देवा केइं पंचमुप्पाएंति, केइमाभिणिबोहिय-णाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणा-णमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्तमुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति।।२२३।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा मणुसा केइं छ उप्पाएंति।।२२४।।
मणुसेसु उववण्णल्लया तिरिक्ख-मणुस्सा जहा चउत्थपुढवीए भंगो।।२२५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।
अन्यत्रापि उक्तं- संखेज्जाउवमाणा मणुवा णरतिरियदेवणिरएसुं।
सव्वेसुं जायंते सिद्धगदीओ वि पावंति।।२९४४।।

ते संखातीदाऊ जायंते केइ जाव ईसाणं।
ण हु होंति सलायणरा जम्मम्मि अणंतरे केई।।२९४५।।

यदि कदाचित् तिर्यञ्च: मनुष्या वा नरकेषु स्वर्गेषु वा गच्छन्ति तर्हि तत्र पंचगुणानेवोत्पादयन्ति, न च संयमासंयमं संयमं वा। तत्र चतुर्थगुणस्थानान्त्यमेव।
इमे तिर्यंच: मनुष्या: वा मनुष्येषु उत्पद्य चतुर्थपृथिवीभंगवत् केचित् दश उत्पादयन्ति-मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलज्ञानानि, सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं संयमासंयमं संयमं परिनिर्वाणं चापि। तीर्थकरत्वादिशलाका: पुरुषा: न भवन्ति इति ज्ञातव्यं।
एवं द्वितीयस्थले तिर्यग्मनुष्यगतिभ्यां निर्गत्य कान् कान् गुणान् उत्पादयन्तीतिसूचकत्वेन पंच सूत्राणि गतानि।
अधुना सामान्येन देवगतेश्च्युता: जीवा: के गती कान् गुणांश्चोत्पादयन्ति इति कथनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-देवगदीए देवा देवेहि उव्वट्टिदचुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२२६।
दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेदि।।२२७।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया तिरिक्खा केइं छ उप्पाएंति।।२२८।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुसा केइं सव्वं उप्पाएंति-केइमाभिणि-बोहियणाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केइं मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केइं केवलणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्त-मुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केइं संजमं उप्पाएंति, केइं बलदेवत्तमुप्पाएंति, केइं वासुदेवत्तमुप्पाएंति, केइं चक्कवट्टित्तमुप्पाएंति, केइमंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति।।२२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। अत्र सामान्येन चतुर्णिकायदेवा: विवक्षिता: सन्ति। ये केचन भवनत्रिका: सौधर्मैशानदेवा: वा ते कदाचित् एकेन्द्रियेषु अपि गच्छन्ति तत्रापि वायुकायिक- तेजस्कायिक-साधारणवनस्पतिकायिका: न भवन्ति। विकलत्रया: न भवन्ति। पंचेन्द्रियगर्भजपर्याप्ततिर्यञ्च: भवन्ति कदाचित्। अत: पंचेन्द्रियेष्वेव षडुत्पादयन्ति-त्रीणि ज्ञानानि, सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वंं संयमासंयमं च।
मनुष्येषु सर्वगुणांश्च प्राप्नुवन्ति इति ज्ञातव्यं।
भवनत्रिकदेवदेव्य: सौधर्मैशानदेव्यश्च च्युत्वा के गती कान् गुणांश्च प्राप्नुवन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-भवणवासिय-वाणवेंतर-जोदिसियदेवा देवीओ सोधम्मीसाणकप्प-वासियदेवीओ च देवा देवेहि उवट्टिद-चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२३०।।
दुवे गदीओ आगच्छंति तिरिक्खगदिं मणुसगदिं चेव।।२३१।।
तिरिक्खेसु उववण्णल्लया केइं छ उप्पाएंति।।२३२।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुसा केइं दस उप्पाएंति-केइमाभिणिबोहिय-णाणमुप्पाएंति, केइं सुदणाणमुप्पाएंति, केइमोहिणाणमुप्पाएंति, केइं मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केइं केवलणाणमुप्पाएंति, केइं सम्मामिच्छत्त-मुप्पाएंति, केइं सम्मत्तमुप्पाएंति, केइं संजमासंजममुप्पाएंति, केइं संजमं मुप्पाएंति। णो बलदेवत्तमुप्पाएंति, णो वासुदेवत्तमुप्पाएंति, णो चक्कवट्टित्त-मुप्पाएंति, णो तित्थयरत्तमुप्पाएंति। केइमंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति।।२३३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: स्पष्टोऽस्ति। भवनवासिन: वानव्यन्तरा: ज्योतिर्वासिनो देवा: एषामेव देवानां देव्य:, सौधर्मैशानदेव्यश्च स्व-स्वपर्यायेभ्यश्च्युता: यदि तिर्यक्षु आगच्छंति तर्हि मतिश्रुतावधिज्ञानानि सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं संयमासंयमंचोत्पादयितुं क्षमा: भवन्ति केचिदेव न च सर्वे। यदि मनुष्येषु उत्पद्यन्ते, तर्हि दशगुणानपि प्राप्तुं योग्या: भवन्ति, शलाकापुरुषावस्था: न प्राप्नुवन्ति।
अन्यत्रापि चोक्तं-
शलाकापुरुषा न स्युर्भौमज्योतिष्कभावना:।
अनन्तरभवे तेषां भाज्या भवति निर्वृति:।।१७१।।
तत: परं विकल्प्यन्ते यावद् ग्रैवेयकं सुरा:।
शलाकापुरुषत्वेन निर्वाणगमनेन च।।१७२।।
बौद्धा: मोक्षस्य लक्षणं स्वरूपविनाश: इति भण्यन्ते-तथाहि-
दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो, नैवावनिं गच्छति नान्तरीक्षम्।
दिशन्न कांचिद् विदिशन्न कांचित्, स्नेहक्षयात्केवलमेति शांतिम्।।१।।
जीवस्तथा निर्वृतिमभ्युपेतो, नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न कांचिद् विदिशं न कांचित्, क्लेशक्षयात्केवलमेति शांतिम्।।२।।
एतन्मतनिराकरणार्थं सूत्रे सिज्झंति-सिद्ध्यन्तीति कथितं श्रीभूतबलिसूरिवर्येण।
सौधर्मैशानादि-अपराजितानुत्तरपर्यन्तदेवानामागति-गुणोत्पादनव्यवस्थासूचनाय सूत्रसप्तकमवतार्यते-सोहम्मीसाण जाव सदर-सहस्सारकप्पवासियदेवा जधा देवगदिभंगो।।२३४।।
आणदादि जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवा देवेहि चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२३५।।
एक्कं हि चेव मणुसगदिमागच्छंति।।२३६।।
मणुस्सेसु उववण्णल्लया मणुस्सा केइं सव्वे उप्पाएंति।।२३६।।
अणुदिस जाव अवराइद विमाणवासियदेवा देवेहि चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति?।।२३८।।
एक्कं हि चेव मणुसगदिमागच्छंति।।२३९।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुस्सा तेसिमाभिणिबोहियणाणं सुदणाणं णियमा अत्थि, ओहिणाणं सिया अत्थि, सिया णत्थि। केइं मणपज्ज-वणाणमुप्पाएंति, केवलणाणमुप्पाएंति। सम्मामिच्छत्तं णत्थि, सम्मत्तं णियमा अत्थि। केइं संजमासंजममुप्पाएंति, संजमं णियमा उप्पाएंति। केइं बलदेवत्तमुप्पाएंति, णो वासुदेवत्तमुप्पाएंति। केइं चक्कवट्टित्तमुप्पाएंति, केइं तित्थयरत्तमुप्पाएंति, केइमंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति।।२४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सौधर्मैशानकल्पयो: देवा देवपर्यायेभ्य: च्युत्वा केचित् एकेन्द्रियेषु बादर पृथिवीजलप्रत्येकवनस्पतिकायिकेषु उत्पद्यन्ते, केचित् पंचेन्द्रियतिर्यक्षु गर्भजपर्याप्तककर्मभूमिजेषु उत्पद्यन्ते, केचित् मनुष्या: भवन्ति। तिर्यक्षु उत्पद्य केचित् मतिश्रुतावधिज्ञानानि, सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं संयमासंयमं च षडपि उत्पादयन्ति। मनुष्येषु उत्पद्य सर्वानपि उत्पादयन्ति।
उक्तं चान्यत्रापि- सोहम्मादी देवा भज्जा हु सलागपुरिसणिवहेसुं।
णिस्सेयसगमणेसुं सव्वे वि अणंतरे जम्मे।।६८३।।

आनतादि नवग्रैवेयकपर्यंता: विमानवासिदेवा: देवपर्यायेभ्य: च्युत्वा मनुष्या: एव भवन्ति। केचित् सर्वान् गुणानपि उत्पादयन्ति।
अनुदिशविमानादारभ्य अपराजितानुत्तरवासिदेवा: मनुष्यपर्यायं एव प्राप्नुवन्ति ते नियमेन सम्यग्दृष्टय: सन्ति।
कश्चिदाह-मतिश्रुतज्ञाने इव अवधिज्ञानं एषां अनुदिशादिभ्य: च्युतानां मनुष्यपर्यायेषु आगतानां कथं न भवति ?
परिहरति आचार्यवर्य:-नैष दोष:, अननुगामिनोऽवधिज्ञानस्य अनुगमाभावात्। न च तत्र सर्वेषामवधि-ज्ञानमनुगामी चैव अननुगामिनोऽपि अवधिज्ञानस्य तत्र संभवात्। सूत्रे ‘देवा’ पदेन देवभावात् अर्थ: गृहीतव्य: ‘देवेहिंतो’ पदेन देवनिकायात् च ज्ञातव्य:।
इमे अहमिन्द्रा: देवपर्यायेभ्य: च्युता: वासुदेवपदं न लभंते शेषपदानि लब्धुमर्हन्ति।
उक्तं च- तीर्थेशरामचक्रित्वे निर्वाणगमनेन च।
च्युता: सन्तो विकल्प्यन्तेऽनुदिशानुत्तरामरा:।।१७३।।

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अब तीसरी, दूसरी और पहली पृथिवी से निकलकर जीव किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए नव सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

ऊपर की तीन पृथिवियों के नारकी जीव नरक से नारकी होते हुए निकलकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२१७।।

ऊपर की तीन पृथिवियों से निकलने वाले नारकी जीव दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२१८।।

ऊपर की तीन पृथिवियों से निकलकर तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२१९।।

ऊपर की तीन पृथिवियों से निकलकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य कोई ग्यारह उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं और कोई संयम उत्पन्न करते हैं। किन्तु वे जीव न बलदेवत्व उत्पन्न करते, न वासुदेवत्व उत्पन्न करते, और न चक्रवर्तित्व उत्पन्न करते हैं। कोई तीर्थकरत्व उत्पन्न करते हैं, कोई अन्तकृत् होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, वे सर्व दु:खों के अन्त होने का अनुभव करते हैं।।२२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। ऊपर की तीन पृथिवियों से निकलकर तिर्यंचों में उत्पन्न हुए कोई जीव मति, श्रुत, अवधिज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और संयमासंयम को उत्पन्न करते हैं। मनुष्यों में उत्पन्न हुए कोई जीव ग्यारहों गुणों को उत्पन्न कर लेते हैं-मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय, केवलज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, संयमासंयम, संयम, तीर्थकरत्व और मोक्ष, इन ग्यारह स्थानों को भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु नरक से निकलकर कोई भी बलभद्र, नारायण और चक्रवर्ती नहीं हो सकते हैं। इस प्रकार प्रथम स्थल में नरक से निकलकर किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा निरूपण करते हुए अठारह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तिर्यंच और मनुष्यों से आकर किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा प्रतिपादन करने के लिए पाँच सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच व मनुष्य, तिर्यंच व मनुष्यपर्यायों से मरण करके, कितनी गतियों में जाते हैं ?।।२२१।।

तिर्यंच व मनुष्य मरण करके चारों गतियों में जाते हैं-नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति।२२२।।

तिर्यंच व मनुष्य मरण करके नरक व देवों मेें उत्पन्न होने वाले नारकी व देव कोई पाँच उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं और कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।२२३।।

तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच मनुष्य कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२२४।।

मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच व मनुष्य चतुर्थ पृथिवी से निकलकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले जीवों के समान गुण उत्पन्न करते हैं।।२२५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में भी कहा है- संख्यात आयुप्रमाण वाले मनुष्य मनुष्य, तिर्यंच, देव और नारकियों से सबमें उत्पन्न होते हैं तथा सिद्धगति को भी प्राप्त करते हैं।

असंख्यातयुष्क मनुष्यों में से कितने ही ईशान स्वर्ग तक उत्पन्न होते हैं। किन्तु अनन्तर जन्म में शलाकापुरुष कोई भी मनुष्य नहीं होते हैं।

यदि कदाचित् ये तिर्यंच या मनुष्य नरकों में अथवा स्वर्गों में जाते हैं, तो वहाँ पाँच गुणों को ही उत्पन्न करते हैं, संयमासंयम अथवा संयम को प्राप्त नहीं कर सकते हैं क्योंकि वहाँ नरक में और स्वर्ग में चौथे गुणस्थान तक होते हैं। ये तिर्यंच अथवा मनुष्य मनुष्यों में उत्पन्न होकर चौथी पृथ्वी के भेद के समान कोई दश गुणों को उत्पन्न कर लेते हैं-मति, श्रुत, अवधि, मन:पर्यय और केवलज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, संयमासंयम, संयम और निर्वाण को भी प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु ये तीर्थंकर आदि शलाका पुरुष नहीं होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंच और मनुष्यगति से आकर किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, इस विषय के प्रतिपादन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सामान्य से देवगति से च्युत होकर जीव किन गतियों को और किन-किन गुणों को उत्पन्न करते हैं, ऐसा कथन करने के लिए चार सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव देवपर्यायों सहित उद्वर्तित और च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२२६।।

देवगति से निकले हुए जीव दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२२७।।

देवगति से निकलकर तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२२८।।

देवगति से निकलकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य कोई सर्वगुणों को उत्पन्न करते हैं, कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं, कोई संयम उत्पन्न करते हैं, कोई बलदेवत्व उत्पन्न करते हैं, कोई वासुदेवत्व उत्पन्न करते हैं, कोई चक्रवर्तित्व उत्पन्न करते हैं, कोई तीर्थकरत्व उत्पन्न करते हैं, कोई अन्तकृत् होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, सर्व दुखों के अन्त का अनुभव करते हैं।।२२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सरल है। यहाँ ‘सामान्य’ शब्द से चारों प्रकार के देव विवक्षित हैं। जो कोई भवनत्रिक या सौधर्म स्वर्ग-ईशान स्वर्ग के देव हैं, वे कदाचित् देवगति से निकलकर एकेन्द्रियों में भी उत्पन्न हो सकते हैं, वहाँ भी ये वायुकायिक, अग्निकायिक और साधारण वनस्पतिकायिक नहीं हो सकते हैं। विकलत्रय भी नहीं होते हैं। ये तिर्यंच हुए तो कदाचित् पंचेन्द्रिय, गर्भज, पर्याप्त तिर्यंच ही होते हैं, इसलिए पंचेन्द्रियों में भी छह गुणों को ही उत्पन्न करते हैं, तीन ज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और संयमासंयम इनको ही प्राप्त कर सकते हैं और मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं तो सभी गुणों को प्राप्त कर सकते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

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भवनत्रिक देव-देवियाँ और सौधर्म-ईशान स्वर्ग की देवियाँ वहाँ से च्युत होकर किन गतियों को और कौन-कौन से गुणों को उत्पन्न करते हैं, इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए चार सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

भवनवासी, वानव्यन्तर व ज्योतिषी देव और देवियाँ, सौधर्म और ईशान कल्पवासी देवियाँ, ये देव देवपर्यायों से उद्वर्तित और च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२३०।।

उक्त भवनवासी आदि देव और देवियाँ दो गतियों में आते हैं-तिर्यंचगति और मनुष्यगति।।२३१।।

उक्त भवनवासी आदि देव-देवियाँ तिर्यंचों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच होकर कोई छह उत्पन्न करते हैं।।२३२।।

उक्त भवनवासी आदि देव-देवियाँ मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले तिर्यंच होकर दश उत्पन्न करते हैं-कोई आभिनिबोधिक ज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई श्रुतज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई अवधिज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यग्मिथ्यात्व उत्पन्न करते हैं, कोई सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं और कोई संयम उत्पन्न करते हैं। किन्तु वे न बलदेवत्व उत्पन्न करते, न वासुदेवत्व उत्पन्न करते, न चक्रवर्तित्व उत्पन्न करते और न तीर्थकरत्व उत्पन्न करते हैं। कोई अन्तकृत होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, सर्व दु:खों के अन्त होने का अनुभव करते हैं।।२३३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ स्पष्ट है। भवनवासी, वानव्यंतर, ज्योतिर्वासी देव और इनकी देवियाँ तथा सौधर्म-ईशान स्वर्ग की देवियाँ ये अपनी-अपनी पर्यायों से च्युत होकर यदि तिर्यंचों में आते हैं, तो उनमें से कोई-कोई जीव मति, श्रुत, अवधिज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और संयमासंयम को भी उत्पन्न करने में समर्थ हो सकते हैं, सभी जीव नहीं। यदि मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं, तो दशों गुणों को भी प्राप्त करने योग्य होते हैं, किन्तु शलाका पुरुषों के पद को नहीं प्राप्त कर सकते हैं। अन्यत्र-तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

व्यन्तर, ज्योतिष्क तथा भवनवासी देवों में से मरकर आने वाले जीव शलाकापुरुष नहीं हो सकते हैं, परन्तु तद्भव मुक्त हो सकते हैं। इसके ऊपर जितने ग्रैवेयकपर्यंत के देव हैं वे शलाकापुरुष भी हो सकते हैं तथा निर्वाण भी प्राप्त कर सकते हैं।।१७१-१७२।।

बौद्ध मोक्ष का लक्षण स्वरूप का विनाश कहते हैं। देखिए-

‘‘जिस प्रकार दीपक जब बुझता है, तब वह न तो पृथिवी की ओर जाता है न आकाश की ओर, न किसी दिशा को जाता है, न विदिशा को, किन्तु तैल के क्षय होने से केवल शान्त हो जाता है, उसी प्रकार निर्वृत्ति को प्राप्त जीव न पृथिवी की ओर जाता है न आकाश की ओर, न किसी दिशा को जाता है न विदिशा को, किन्तु क्लेश के क्षय हो जाने से केवल शान्ति को प्राप्त होता है।।१-२।।

इस मत का निराकरण करने के लिए सूत्र में ‘‘सिज्झंति’-सिद्ध होते हैं, ऐसा कथन श्री भूतबलि आचार्यदेव ने किया है।

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अब सौधर्म-ईशान आदि से अपराजित नाम के अनुत्तर पर्यंत के देवों की आगति और गुणों के उत्पादन की व्यवस्था को सूचित करने के लिए सात सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

सौधर्म-ईशान से लेकर शतार-सहस्रार तक के देवों की गति सामान्य देवगति के समान है।।२३४।।

आनत आदि से लगाकर नव ग्रैवेयकविमानवासी देव देवपर्यायों से च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२३५।।

उपर्युक्त आनतादि नव ग्रैवेयकविमानवासी देव केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।२३६।।

आनतादि नव ग्रैवेयकविमानवासी उपर्युक्त देव च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्य कोई सर्वगुण उत्पन्न करते हैं।।२३७।।

अनुदिश से लेकर अपराजित विमानवासी देव देवपर्यायों से च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२३८।।

अनुदिशादि उपर्युक्त विमानवासी देव च्युत होकर केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।२३९।।

अनुदिशादि विमानों के देव च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों के आभिनिबोधिक ज्ञान और श्रुतज्ञान नियम से होता है। अवधिज्ञान होता भी है और नहीं भी होता है। कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं, कोई केवलज्ञान उत्पन्न करते हैं। उनके सम्यग्मिथ्यात्व नहीं होता, किन्तु सम्यक्त्व नियम से होता है। कोई संयमासंयम को उत्पन्न करते हैं, संयम को नियम से उत्पन्न करते हैं। कोई बलदेवत्व उत्पन्न करते हैं, किन्तु वासुदेवत्व उत्पन्न नहीं करते। कोई चक्रवर्तित्व उत्पन्न करते हैं, कोई तीर्थकरत्व उत्पन्न करते हैं, कोई अन्तकृत् होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, सर्व दु:खों के अंत होने का अनुभव करते हैं।।२४०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सौधर्म-ईशान कल्प के देव देवपर्याय से च्युत होकर कोई-कोई एकेन्द्रिय बादर पृथ्वी, जल और वनस्पतिकायिकों में उत्पन्न होते हैं। कोई पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में, कर्मभूमियों में, गर्भज, पर्याप्तक होते हैं। कोई मनुष्य होते हैं। इनमें तिर्यंचों में उत्पन्न होकर कोई मति, श्रुत, अवधिज्ञान, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और संयमासंयम इन छह गुणों को उत्पन्न कर लेते हैं। मनुष्यों में उत्पन्न होकर सभी गुणों को उत्पन्न कर सकते हैं।

तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में भी कहा है-

सब सौधर्मादिक देव अगले जन्म में शलाकापुरुषों के समूह में और मुक्तिगमन के विषय में विकल्पनीय हैं।।

आनत आदि नव ग्रैवेयक तक के वैमानिक देव देवपर्याय से च्युत होकर मनुष्य ही होते हैं। इनमें से कोई सभी गुणों को उत्पन्न कर सकते हैं।

अनुदिश विमान से लेकर अपराजित नाम के अनुत्तर तक के अहमिन्द्र देव मनुष्य पर्याय ही प्राप्त करते हैं, वे नियम से सम्यग्दृष्टि होते हैं।

शंका-कोई कहता है-अनुदिशादि विमानों से च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले जीवों के मतिज्ञान और श्रुतज्ञान के समान अवधिज्ञान भी नियम से क्यों नहीं होता ?

समाधान-आचार्य देव परिहार करते हैं - यह कोई दोष नहीं, क्योंकि, अननुगामी अवधिज्ञान के अनुगम का अभाव है और अनुदिशादि विमानों में सभी का अवधिज्ञान अनुगामी ही होता है ऐसा नहीं है, क्योंकि वहाँ अननुगामी अवधिज्ञान का भी होना संभव है।

सूत्र में जो ‘देवा’ शब्द आया है, उसका अभिप्राय है ‘देवभाव से’ और जो ‘देवेहिंतो’ शब्द आया है, उसका अभिप्राय है ‘देवनिकाय से’। शेष सूत्रार्थ सुगम है।

ये अहमिन्द्र देवपर्यायों से च्युत होकर वासुदेवपद को-नारायण पद को नहीं प्राप्त करते हैं, शेष पदों को प्राप्त करने के योग्य हो सकते हैं

कहा भी है तत्त्वार्थसार ग्रंथ में-

ग्रैवेयक के ऊपर अनुदिश एवं अनुत्तर विमानवासी जो देव हैं, वे जब मरकर मनुष्य हो जाते हैं, तब उसी भव से निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं और तीर्थंकर, राम (बलभद्र) तथा चक्रवर्ती तक भी हो सकते हैं।

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संप्रति सर्वार्थसिद्धिदेवानामागति-गुणोत्पादनव्यवस्थासूचनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा देवेहि चुदसमाणा कदि गदीओ आगच्छंति ?।।२४१।।

एक्कं हि चेव मणुसगदिमागच्छंति।।२४२।।
मणुसेसु उववण्णल्लया मणुसा तेसिमाभिणिबोहियणाणं सुदणाणं ओहिणाणं च णियमा अत्थि, केइं मणपज्जवणाणमुप्पाएंति, केवलणाणं णियमा उप्पाएंति। सम्मामिच्छत्तं णत्थि सम्मत्तं णियमा अत्थि। केइं संजमासंजममुप्पाएंति। संजमं णियमा उप्पाएंति। केइं बलदेवत्तमुप्पाएंति, णो वासुदेवत्तमुप्पाएंति। केइं चक्कवट्टित्तमुप्पाएंति, केइं तित्थयरत्तमुप्पाएंति। सव्वे ते णियमा अंतयडा होदूण सिज्झंति बुज्झंति मुच्चंति परिणिव्वाणयंति सव्व्दुक्खाणमंतं परिविजाणंति।।२४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। सर्वार्थसिद्धिविमानात् च्युता: अहमिन्द्रचरा: शलाकापुरुषेषु नारायणा: प्रतिनारायणाश्च न भवन्ति।
किमर्थं तेषां नारायणत्वं प्रतिनारायणत्वं वा पदं न भवेत् ?
न भवति, तयो: मिथ्यात्वाविनाभावि-निदानावश्यंभावित्वात्।
एषां सर्वार्थसिद्धिविमानच्युतानामहमिन्द्रचरमानवानां अवधिज्ञानं नियमात् अस्तीति कथम् ?
नैष दोष:, तेषामननुगामि-हीयमान-प्रतिपात्यवधिज्ञानानामभावात्।
अवधिज्ञानस्य कतिभेदा: सन्ति ?
वर्धमानो हीयमान: अवस्थित: अनवस्थित: अनुगामी अननुगामी अप्रतिपाती प्रतिपातीत्येतेऽष्टौ भेदा: देशावधेर्भवन्ति१।
इमे सर्वार्थसिद्धिविमानवासिनो देवा: नियमात् एकभवावतारिण:।
उक्तं चान्यत्रापि- भाज्यास्तीर्थेशचक्रित्वे च्युता: सर्वार्थसिद्धित:।
विकल्पा रामभावेऽपि सिद्ध्यन्ति नियमात्पुन:।।१७४।।
अन्येऽपि च केचिदिन्द्रादय: एकभवावतारिण: प्रोक्ता जिनागमे।
त एवोच्यन्ते- दक्षिणेन्द्रास्तथा लोकपाला लौकान्तिका: शची
शक्रश्च नियमाच्चुत्वा सर्वे ते यान्ति निर्वृतिम्।।१७५।।

तीर्थकरऋषभदेव-चक्रवर्तिभरत-कामदेवबाहुबलि-गणधरवृषभसेन-अनन्तवीर्य-अनन्तविजयादय: पुराणपुरुषा: सर्वार्थसिद्धिविमानाच्च्युत्वा तीर्थकरादिपदं संप्राप्य निर्वाणपदं संप्राप्ता:।
श्री वङ्कानाभिचक्रवर्तिना स्वपितु: श्रीवङ्कासेनतीर्थकरपादमूले जैनेश्वरीदीक्षां गृहीत्वा तस्यैव भगवत: समीपे षोडशकारणभावनां भावयित्वा उपशमश्रेणिमारुह्य सर्वार्थसिद्धिमवाप।
उक्तं च महापुराणे श्रीजिनसेनाचार्यदेवेन-
ततोऽसौ भावयामास भावितात्मा सुधीरधी:। स्वगुरोर्निकटे तीर्थकृत्त्वस्यांगानि षोडश।।६८।।
ततोऽमूर्भावना: सम्यग् भावयन् मुनिसत्तम:। स बबंध महत्पुण्यं त्रैलोक्यक्षोभकारणम्।।७९।।
अनन्तरं- विशुद्धभावन: सम्यग् विशुद्ध्यन् स्वविशुद्धिभि:।
तदोपशमकश्रेणीमारूरोह मुनीश्वर:।।८९।।
कृत्स्नस्य मोहनीयस्य प्रशमादुपपादितम्।
तदौपशमिकं प्रापच्चारित्रं सुविशुद्धिकम्।।९१।।
सोऽन्तर्मुहूर्तात् भूयोऽपि स्वस्थानस्थोऽभवद् यति:।
नोध्र्वं मुहूर्तात् तत्रास्ति निसर्गात् स्थितिरात्मन:।।९२।।
पुनरपि- द्वितीयवारमारुह्य श्रेणीमुपशमादिकाम्।
पृथक्त्वध्यानमापूर्य समािंध परमं श्रित:।।११०।।
उपशान्तगुणस्थाने कृतप्राणविसर्जन:।
सर्वार्थसिद्धिमासाद्य संप्रापत् सोऽहमिन्द्रताम्।।१११।।
अयमहमिन्द्र: कदा तीर्थकरो बभूव ?
तृतीयकालशेषेऽसावशीतिश्चतुरुत्तरा।
पूर्वलक्षास्त्रिवर्गाष्टमासपक्षयुतास्तदा।।
अवतीर्य युगाद्यन्ते ह्यखिलार्थविमानत:।
आषाढासितपक्षस्य द्वितीयायां सुरोत्तम:।।
उत्तराषाढनक्षत्रे देव्या गर्भं समाश्रित:।
स्थितो यथा विबाधोऽसौ मौक्तिकं शुक्तिसंपुटे।।
ज्ञात्वा तदा स्वचिन्हेन सर्वेऽप्यागु: सुरेश्वरा:।
पुरुं (पुरं) प्रदक्षिणीकृत्य तद्गुरूंंश्च ववन्दिरे।।
अनन्तरं भगवत: ऋषभदेवस्य राज्ञ्या यशस्वत्या भरत: प्रासूयत।
उक्तं च- तत: सर्वार्थसिद्धिस्थो योऽसौ व्याघ्रचर: सुर:।
सुबाहुरहमिन्द्रोऽत: च्युत्वा तद्गर्भमावसत्।।१२८।।
अथ क्रमाद् यशस्वत्यां जाता: स्रस्टुरिमे सुता:।
अवतीर्य दिवो मूध्र्न: तेऽहमिन्द्रा: पुरोहिता:।।१।।
इत्येकान्नशतं पुत्रा बभूवुर्वृषभेशिन:।
भरतस्यानुजन्मानश्चरमांगा महौजस:।।४।।
सुनन्दायां महाबाहु: अहमिन्द्रो दिवोऽग्रत:।
च्युत्वा बाहुबलीत्यासीत् कुमारोऽमरसन्निभ:१।।६।।
इमे पूर्वभवे सर्वार्थसिद्धिविमाने अहमिन्द्रा: आसन्।
तथैव प्रोक्तं- तेऽप्यष्टौ भ्रातरस्तस्य धनदेवोऽप्यनल्पधी:।
जातास्तत्सदृशा: एव देवा: पुण्यानुभावत:।।१६०।।
इति तत्राहमिन्द्रास्ते सुखं मोक्षसुखोपमम्।
भुञ्जाना निष्प्रवीचारा: चिरमासन् प्रमोदिन:।।१६१।।
पूर्वोक्तसप्रवीचारसुखानन्तगुणात्मकं।
सुखमव्याहतं तेषां शुभकर्मोदयोद्भवं।।१६२।।

संसारिणां जीवानां सर्वश्रेष्ठं सुखं सर्वार्थसिद्धौ सर्वाधिकं दु:खं च सप्तमीपृथिवीगतनारकाणां।
उक्तं श्रीजिनसेनाचार्येण-
सुकृतफलमुदारं विद्धि सर्वार्थसिद्धौ, दुरितफलमुदग्रं सप्तमीनारकाणाम्।
शमदमयमयोगैरग्रिमं पुण्यभाजां, अशमदमयमानां कर्मणा दुष्कृतेन।।२२०।।

सिज्झंति-समाप्तसकलकार्यत्वात् प्राप्तात्मस्वरूपा: भवन्ति, कृतकृत्या नित्या: निरंजना: सन्ति।
उक्तं च- ‘सिद्धि: स्वात्मोपलब्धि:’ प्रगुणगुण गणाच्छादिदोषापहारात्।
योग्योपादानयुक्त्या दृषद इह यथा हेमभावोपलब्धि:।
अथवा सिद्धा: सेत्स्यन्ति सिद्ध्यन्ति इति सिद्धपरमेष्ठिन: ते ध्यानकाले एव कृतकृत्यतया तिष्ठन्ति। पद्भ्यां किञ्चित् क्वचिदपि चलनं गमनं शेषो नास्ति अतस्ते पादौ स्थिरीकृत्य तस्थु:, काराभ्यां किञ्चिदपि करणार्थं शेषो नास्ति ततस्ते वामहस्तस्योपरि दक्षिणहस्तं निक्षिप्य अथवा जिनमुद्रायां उद्भीभूय करौ लम्बयित्वा तस्थु:, सर्वस्मिन् लोकाकाशे विश्वे किमपि अवलोकयितुं शेषो नास्ति अतस्ते नासाग्रदृष्टयो बभूवु:।
उक्तं च पद्मनन्दिपंचविंशतिकायां-
कायोत्सर्गायतांगो जयति जिनपतिर्नाभिसूनुर्महात्मा, मध्यान्हे यस्य भास्वानुपरि परिगतो राजति स्मोग्रमूर्ति:। चव्रं कर्मेन्धनानामतिबहु दहतो दूरमौदास्यवात-स्फूर्जत्सद्ध्यानवन्हेरिव रुचिततर: प्रोद्गतो विस्फुलिंग:।।१।। नो किञ्चित्करकार्यमस्ति गमनप्राप्यं न किंचित् दृशो-ईश्यं यस्य न कर्णयो: किमपि हि श्रोतव्यमप्यस्ति न। तेनालम्बितपाणिरुज्झितगतिर्नासाग्रदृष्टी रह:, संप्राप्तोऽतिनिराकुलो विजयते ध्यानैकतानो जिन:।।२।।
बुज्झंति-अनवगतार्थाभावात् अज्ञानकणस्यापि अभावाद् वा, सिद्धानां बुद्ध्यभावप्रतिपाद-कदुर्णयनिवारणार्थं वा, आत्मानं चैव जानाति सिद्धो न बाह्यार्थमिति दुर्णयनिवारणार्थं वा बुध्यन्ति इति उक्तम्।
अस्मिन् विषये किञ्चित् मीमांस्यते-
अस्य लोकाकाशस्य सदृशा: यदि अनन्ता अपि लोकाकाशा: भवेयु: तह्र्यपि ते केवलिन: सिद्धपरमेष्ठिन: सर्वानपि ज्ञातुं क्षमा सन्ति।
उकं च- श्रीमते वर्धमानाय नमो नमितविद्विषे।
यज्ज्ञानान्तर्गतं भूत्वा त्रैलोक्यं गोष्पदायते।।
केचिद् वदन्ति-नवानामात्मगुणानां बुद्धिसुखदु:खेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसंस्काराणां निर्मूलोच्छेदोऽपवर्ग इति।
तदपि न श्रेय:-ज्ञानावरणाभावे सति ज्ञानस्य परिपूर्णत्वात् केवलज्ञानत्वात् वा। ये केचित् कथयन्ति केवलिनो भगवन्त: केवलमात्मानमेव जानन्ति, केचित् ब्रुवन्ति केवलं बाह्यार्थमेव तेषां समाधानं क्रियते नयापेक्षया श्रीकुन्दकुन्ददेवेन नियमसारप्राभृतग्रंथे-

जाणदि पस्सदि सव्वं ववहारणयेण केवली भगवं।
केवलणाणी जाणदि पस्सदि णियमेण अप्पाणं।।१५९।।


सव्वं-अलोकाकाशसहितमधोमध्योध्र्वलोकविभक्तलोकाकाशं त्रैलोक्यं भूतभाविवर्तमानरूपं त्रैकाल्यं सर्वं चराचरवस्तुसमूहं च।
उकं च श्रीगौतमस्वामिनापि-
य: सर्वाणि चराचराणि विधिवद् द्रव्याणि तेषां गुणान्।
पर्यायानपि भूतभाविभवत: सर्वान् सदा सर्वदा।।
जानीते युगपत्प्रतिक्षणमत: सर्वज्ञ इत्युच्यते।
सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते वीराय तस्मै नम:।।१।।


अथ गाथायां व्यवहारनयो भेदकारक एव गृहीतव्यो न च पराश्रित:। किंच, केवलिनां ज्ञानं पराश्रितं नास्ति, प्रत्युत तज्ज्ञाने सर्वं प्रतिबिम्बीभवति दर्पणवत्। न ते भगवन्त ईहापूर्ववंकं जानन्ति, मोहाभावात्।

पुनरपि एकान्तवादिनां निराकरणं क्रियते श्रीकुन्दकुन्ददेवेन- अप्पसरूवं पेच्छदि, लोयालोयं ण केवली भगवं।
जइ कोइ भणइ एवं, तस्स य किं दूसणं होइ।।१६६।।
मुत्तममुत्तं दव्वं चेयणमियरं सगं च सव्वं च।
पेच्छंतस्स दु णाणं पच्चक्खमणिंदियं होइ।।१६७।।
पुव्वुत्तसयलदव्वं णाणागुणपज्जएण संजुत्तं।
जो ण य पेच्छइ सम्मं परोक्खदिट्ठी हवे तस्स।।१६८।।
लोयालोयं जाणइ अप्पाणं णेव केवली भगवं।
जइ कोइ भणइ एवं तस्स य किं दूसणं होई।।१६९।।
णाणं जीवसरूवं तम्हा जाणेइ अप्पगं अप्पा।
अप्पाणं णवि जाणदि अप्पादो होदि वदिरित्तं।।१७०।।


प्रत्येकं आत्मनामनन्तगुणेषु एकं ज्ञानमेव सर्वं विज्ञातुं सक्षमं सर्वश्रेष्ठमनघ्र्यं वर्तते। ये महातपोधना: स्वस्य ज्ञानोपयोगेन हितमहितं च विज्ञाय हितकार्ये प्रवर्तन्ते, त एव वीतरागनिर्विकल्पस्वसंवेदनज्ञानबलेन परमाल्हादमये स्वशुद्धात्मनि तिष्ठन्त: सन्त: केवलज्ञानसूर्यमुत्पादयन्ति।
मुच्चंति-अमूर्तस्य मूर्तै: अमूर्तै: वा बंधो नास्तीति मोक्षाभावमिथ्यात्वदुर्णयनिवारणार्थं मुच्यन्ते इति कथितमत्र।
किंच ‘जीवंगाणं अणाइसंबंधो।’ कणयोवले मलं वा।।
इति गाथाकथितनियमेन सर्वेऽपि संसारिण: अनादिकालात् कर्मभि: संश्लिष्टा: अशुद्धा: मूर्तिका: एव न चामूर्तिका: कथंचित् शुद्धनिश्चयनयेन एव अमूर्ता: सन्ति न चाशुद्धनयेन।

उकं च- वण्णरसपंच गंधा दो फासा अट्ठ णिच्छया जीवे।
णो संति अमुत्ति तदो ववहारा मुत्ति बंधादो।।७।।


अतो अमी: संसारिण: मूर्तपुद्गलकर्मभि: सहिता: मूर्ता: एव पुनरपि रागद्वेषादिभावै: पुद्गलकर्माणि: गृण्हन्ति। यदा सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपव्यवहारनिश्चयरत्नत्रयबलेन मिथ्यात्वाविरतिकषाययोगान् बंधहेतून् निहत्य स्वात्मानं लभन्ते तदा शुद्धा: सिद्धा: अमूर्ता भवन्ति न च तत: प्राक् संसारावस्थायाम्।
परिणिव्वाणयंति-अशरीरस्य आत्मन: इन्द्रियाणामभावात् विषयसेवनं नास्ति ततस्तेषां सुखं नास्ति इति कथयतां दुर्णयनिवारणार्थं परिनिर्वान्ति इति पदं सूत्रे कथितं।
त्रैलोक्यत्रैकाल्यजीवानां पुञ्जीभूतसर्वसुखापेक्षयापि अनन्तगुणाधिकं सौख्यं सिद्धानां विद्यते।
उकं च त्रिलोकसारग्रन्थे-

चक्किकुरुफणिसुरेंदे-सहमिंदे जं सुहं तिकालभवं।
तत्तो अणंतगुणिदं सिद्धाणं खणसुहं होदि।।५६०।।


चक्रवत्त्र्यपेक्षया कुरुषु जातानां उत्तमभोगभूमिजीवानां सुखमनन्तगुणितं, ततोऽपेक्षया धरणेन्द्राणां सुखमनन्तगुणं, एवं सुरेन्द्रेषु अहमिन्द्रेषु च पूर्वपूर्वस्मात् उत्तरोत्तरेषामनन्तगुणितं यत्सुखं त्रिकालभवं तत: सर्वेभ्य: सिद्धानां क्षणोत्थं सुखमनन्तगुणितं भवति।
एतत्सुखमतीन्द्रियं आत्मोत्थं न च इन्द्रियजं परवस्तुजातं। किंच कर्मपरवशं सान्तं दु:खैरन्तरितोदयं सुखं सांसारिकं तत् क्षणिकं आकुलतासहितं दु:खमेवेति।
उक्तं च- दु:खं किञ्चित् सुखं किञ्चित् चित्ते भाति जडात्मन:।
संसारे तु पुनर्नित्यं सर्वं दु:खं विवेकिन:।।


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अब सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्रों की आगति और गुणों के उत्पादन की व्यवस्था को सूचित करने के लिए तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव देवपर्यायों से च्युत होकर कितनी गतियों में आते हैं ?।।२४१।।

सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देव च्युत होकर केवल एक मनुष्यगति में ही आते हैं।।२४२।।

सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर मनुष्यों में उत्पन्न होने वाले मनुष्यों के आभिनिबोधिक ज्ञान, श्रुतज्ञान और अवधिज्ञान नियम से होता है। कोई मन:पर्ययज्ञान उत्पन्न करते हैं। केवलज्ञान वे नियम से उत्पन्न करते हैं। उनके सम्यग्मिथ्यात्व नहीं होता, किन्तु सम्यक्त्व नियम से होता है। कोई संयमासंयम उत्पन्न करते हैं, किन्तु संयम नियम से उत्पन्न करते हैं। कोई बलदेवत्व उत्पन्न करते हैं, किन्तु वासुदेवत्व उत्पन्न नहीं करते। कोई चक्रवर्तित्व उत्पन्न करते हैं, कोई तीर्थकरत्व उत्पन्न करते हैं। वे सब नियम से अन्तकृत होकर सिद्ध होते हैं, बुद्ध होते हैं, मुक्त होते हैं, परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं और सर्व दु:खों के अन्त होने का अनुभव करते हैं।।२४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सरल है। सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत हुए अहमिन्द्रचर शलाका पुरुषों में नारायण और प्रतिनारायण नहीं होते हैं।

शंका-सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर मनुष्य होने वाले जीवों के वासुदेवत्व क्यों नहीं होते ?

समाधान-नहीं होते, क्योंकि वासुदेवत्व की उत्पत्ति में उससे पूर्व मिथ्यात्व के अविनाभावी निदान का होना अवश्यंभावी है।

शंका-इन सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत हुए अहमिन्द्र मनुष्यों में उनके अवधिज्ञान नियम से होता है, सो कैसे ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि उनके अननुगामी, हीयमान व प्रतिपाती अवधिज्ञानों का अभाव है।

शंका-अवधिज्ञान के कितने भेद हैं ?

समाधान-वर्धमान, हीयमान, अवस्थित, अनवस्थित, अनुगामी, अननुगामी, अप्रतिपाती और प्रतिपाती ये आठ भेद देशावधिज्ञान के होते हैं।

ये सर्वार्थसिद्धि विमानवासी अहमिन्द्रदेव नियम से एक भवावतारी हैं।

तत्त्वार्थसार में भी कहा है-

सर्वार्थसिद्धि से आये हुए देव तीर्थंकर एवं चक्रवर्ती हो सकते हैं, बलराम भी हो सकते हैं, परन्तु उसी मनुष्य भव से वे मोक्ष को अवश्य पाते हैं।।१७४।।

अन्य भी कोई-कोई इन्द्र आदि जिनागम में एक भवावतारी कहे हैं।

इसे ही कहते हैं-दक्षिण दिशा के स्वर्गनिवासी इन्द्र, लोकपाल, सर्व लौकान्तिक देव, शची इन्द्राणी तथा सौधर्म इन्द्र-ये सभी मरकर मनुष्यभव धारण कर मुक्त ही होते हैं। उस मनुष्यभव से आगे उन्हें फिर भव धारण नहीं करना पड़ता है।

तीर्थंकर ऋषभदेव, चक्रवर्ती भरत, कामदेव बाहुबली, गणधर वृषभसेन, अनंतवीर्य, अनन्तविजय आदि पुराणपुरुष सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर तीर्थंकर आदि पद को प्राप्त करके निर्वाणपद प्राप्त कर चुके हैं।

श्री वङ्कानाभि चक्रवर्ती अपने पिता श्री वङ्कासेन तीर्थंकर के पादमूल में जैनेश्वरी दीक्षा लेकर उन्हीं तीर्थंकर भगवान की सन्निधि में सोलहकारण भावनाओं को भाकर उपशम श्रेणी में आरोहण करके सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र हुए हैं।

श्री जिनसेनाचार्यदेव ने महापुराण में कहा है-

तदनन्तर आत्मा के स्वरूप का चिन्तवन करने वाले धीर-वीर वङ्कानाभि मुनिराज ने अपने पिता वङ्कासेन तीर्थंकर के निकट उन सोलह भावनाओं का चिन्तवन किया, जो कि तीर्थंकर पद प्राप्त होने में कारण है। तदनन्तर इन भावनाओं का उत्तम रीति से चिन्तन करते हुए उन श्रेष्ठ मुनिराज ने तीन लोक में क्षोभ उत्पन्न करने वाली तीर्थंकर नामक महापुण्य प्रकृति का बंध किया।।६८-६९।।

अनन्तर- विशुद्ध भावनाओं को धारण करने वाले वङ्कानाभि मुनिराज जब अपने विशुद्ध परिणामों से उत्तरोत्तर विशुद्ध हो रहे थे तब वे उपशम श्रेणी पर आरूढ़ हुए। सम्पूर्ण मोहनीय कर्म का उपशम हो जाने से वहाँ उन्हें अतिशय विशुद्ध औपशमिक चारित्र प्राप्त हुआ। अन्तर्मुहूर्त के बाद वे मुनि फिर भी स्वस्थानअप्रमत्त नामक सातवें गुणस्थान में स्थित हो गये अर्थात् ग्यारहवें गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त ठहरकर वहाँ से च्युत हो उसी गुणस्थान में आ पहुँचे जहाँ से कि आगे बढ़ना शुरू किया था। उसका खास कारण यह है कि ग्यारहवें गुणस्थान में आत्मा की स्वाभाविक स्थिति अन्तर्मुहूर्त से आगे है ही नहीं। वे द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर आरूढ़ हुए और पृथक्त्वविर्तक नामक शुक्लध्यान को पूर्णकर उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त हुए। अन्त में उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में प्राण छोड़कर सर्वार्थसिद्धि पहुँचे और वहाँ अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुए।।८९-९१-९२-११०-१११।।

ये अहमिन्द्र कब तीर्थंकर हुए ? सो ही दिखाते हैं-

जब अवसर्पिणी काल के तीसरे सुषमदु:षम नामक काल में चौरासी लाख पूर्व, तीन वर्ष, आठ माह और एक पक्ष बाकी रह गया था तब आषाढ़ कृष्णा द्वितीया के दिन उत्तराषाढ़ नक्षत्र में वङ्कानाभि अहमिन्द्र देवायु का अन्त होने पर सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण हुआ और वहाँ सीप के सम्पुट में मोती की तरह सब बाधाओं से निर्मुक्त होकर स्थित हो गया। उस समय समस्त इन्द्र अपने-अपने यहाँ होने वाले चिन्होें से भगवान के गर्भावतार का समय जानकर वहाँ आये और सभी ने नगर की प्रदक्षिणा देकर भगवान के माता-पिता को नमस्कार किया।

अनंतर भगवान ऋषभदेव की रानी यशस्वती के भरतपुत्र का जन्म हुआ। कहा भी है-

तदनन्तर राजा अतिगृद्ध का जीव जो पहले व्याघ्र था, फिर देव हुआ, फिर सुबाहु हुआ और फिर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ था, वहाँ से च्युत होकर यशस्वती महादेवी के गर्भ में आकर निवास करने लगा।।१२८।।

अथानन्तर पहले जिन का वर्णन किया जा चुका है, ऐसे वे सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र स्वर्ग से अवतीर्ण होकर क्रम से भगवान वृषभदेव की यशस्वती देवी के विजय, वैजयंत आदि पुत्र उत्पन्न हुए। इस प्रकार भगवान वृषभदेव की यशस्वती महादेवी से भरत के पीछे जन्म लेने वाले निन्यानवे पुत्र हुए, वे सभी पुत्र चरमशरीरी तथा बड़े प्रतापी थे। आनन्द पुरोहित का जीव जो पहले महाबाहु था और फिर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ था, वह वहाँ से च्युत होकर भगवान वृषभदेव की द्वितीय पत्नी सुनन्दा के देव के समान बाहुबली नाम का पुत्र हुआ।।१-४-६।।

ये सभी पूर्वभव में सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र थे।

यही बात महापुराण में कही है-

वङ्कानाभि के वे विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित, बाहु, सुबाहु, पीठ और महापीठ नाम के आठों भाई तथा विशाल बुद्धि का धारक धनदेव ये नौ जीव भी अपने पुण्य के प्रभाव से उसी सर्वार्थसिद्धि में वङ्कानाभि के समान ही अहमिन्द्र हुए। इस प्रकार उस सर्वार्थसिद्धि में वे अहमिन्द्र मोक्षतुल्य सुख का अनुभव करते हुए प्रवीचार (मैथुन) के बिना ही चिरकाल तक सुखी रहते थे। उन अहमिन्द्रों के शुभ कर्म के उदय से जो निर्बाध सुख प्राप्त होता है, वह पहले कहे हुए प्रवीचारसहित सुख से अनन्त गुना होता है।।१६०-१६१-१६२।।

संसारी जीवों में सर्वश्रेष्ठ सुख सर्वार्थसिद्धि में है और सबसे अधिक दु:ख सातवें नरक में रहने वाले नारकी जीवों में होता है।

श्री जिनसेनाचार्य देव ने कहा भी है-

पुण्यकर्मों का उत्कृष्ट फल सर्वार्थसिद्धि में और पापकर्मों का उत्कृष्ट फल सप्तम पृथिवी के नारकियों के जानना चाहिए। पुण्य का उत्कृष्ट फल परिणामों को शान्त रखने, इन्द्रियों का दमन करने और निर्दोष चारित्र पालन करने से पुण्यात्मा जीवों को प्राप्त होता है और पाप का उत्कृष्ट फल परिणामों को शान्त नहीं रखने, इन्द्रियों का दमन नहीं करने तथा निर्दोष चारित्र पालन नहीं करने से पापी जीवों को प्राप्त होता है।

‘सिज्झंति’-सकल कार्यों को समाप्त-पूर्ण कर लेने से जिन्होंने आत्मस्वरूप को प्राप्त कर लिया है, जो कृतकृत्य, नित्य, निरंजन हो चुके हैं।

श्री पूज्यपादस्वामी ने सिद्धभक्ति में कहा है-अपनी आत्मा की उपलब्धि-प्राप्ति हो जाना, इसी का नाम ‘सिद्धि’ है, जो कि प्रकृष्ट गुणसमूह को आच्छादित करने वाले जो दोष हैं, उनके नष्ट हो जाने से होती है। जैसे कि योग्य उपादान और युक्ति-निमित्त के मिल जाने से पाषाण-स्वर्ण पाषाण से स्वर्ण की उपलब्धि-प्राप्ति होती है।

अथवा जो अतीत काल में सिद्ध हुए हैं, भविष्यत्काल में होवेंगे और वर्तमानकाल में हो रहे हैं, वे सिद्ध परमेष्ठी कहलाते हैं, वे ध्यान के काल में ही कृतकृत्यरूप से रहते हैं। दोनों पैरों से कहीं पर भी कुछ भी चलना, गमन करना शेष नहीं रहा, इसलिए वे पैरों को स्थिर करके खड़े हैं, दोनों हाथों से किंचित् मात्र कार्य करना शेष नहीं रहा, इसलिए वे बायें हाथ के ऊपर दाहिना हाथ रखकर अथवा जिनमुद्रा से खड़े होकर दोनों हाथ लटकाकर खड़े हैं, सम्पूर्ण लोकाकाश में-विश्व में कुछ भी देखना शेष नहीं रहा, इसलिए वे नासा के अग्रभाग पर दृष्टि रखकर खड़े हुए हैं।

श्री पद्मनंदि आचार्यदेव ने पद्मनंदिपंचविंशतिका ग्रंथ में कहा है-

दोपहर के समय जिस आदीश्वर भगवान के ऊपर रहा हुआ तेजस्वी सूर्य ज्ञानावरणादि कर्मरूपी र्इंधन को पलभर में भस्म करने वाली तथा वैराग्यरूपी पवन से जलाई हुई, ध्यानरूपी अग्नि से उत्पन्न हुवे मनोहर फुलिंगा के समान जान पड़ता है, ऐसे कायोत्सर्गसहित विस्तीर्ण शरीर के धारी तथा अष्टकर्मों के जीतने वाले उत्तम पुरुषों के स्वामी महात्मा श्रीनाभिराजा के पुत्र श्रीऋषभदेव भगवान सदा जयवन्त हैं। भगवान को हाथ से करने योग्य कोई कार्य नहीं रहा है इसलिए तो उन्होंने हाथों को नीचे लटका दिया है तथा जाने के लायक कोई स्थान नहीं रहा है इसलिए वे निश्चल खड़े हुवे हैं और देखने योग्य कोई पदार्थ नहीं रहा है इसलिए भगवान ने नाक के ऊपर अपनी दृष्टि दे रखी है तथा एकान्तवास इसलिए किया है कि भगवान को पास में रहकर कोई बात सुनने के लिए नहीं रही है इसलिए इस प्रकार अत्यंत निराकुल तथा ध्यानरस में लीन भगवान सदा लोक में जयवन्त हैं।।१-२।।

बुज्झंति-अनवगत पदार्थों के अभाव से अथवा अज्ञान के कणमात्र के भी अभाव से, अथवा सिद्धों के बुद्धि-अभाव को उत्पन्न करने वाले दुर्नय के निवारणार्थ, अथवा सिद्ध केवल आत्मा को जानता है बाह्यार्थ को नहीं जानता, ऐसे दुर्नय के निवारणार्थ सूत्र में ‘बुज्झंति’ अर्थात् ‘बुद्ध होते हैं’ यह पद कहा गया है।

इस विषय में किंचित् मीमांसा-विचार करते हैं-

इस लोकाकाश के सदृश यदि अनंत भी लोकाकाश हो जावें, तो भी केवलज्ञानी सिद्ध भगवान सभी को जानने में सक्षम हैं।

कहा भी है-जिन्होंने विद्विष-शत्रुओं को भी नमित किया है, ऐसे श्रीअंतरंग, बहिरंगलक्ष्मी से विभूषित श्री वर्धमान भगवान को नमस्कार होवे कि जिनके ज्ञान के अन्तर्गत होकर ये तीनों लोक गोष्पद-गाय के खुर के स्थान के समान प्रतिभासित होते हैं।

कोई कहते हैं-बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार इन नव गुणों का निर्मूल नाश हो जाना ही अपवर्ग-मोक्ष है। यह भी श्रेयस्कर नहीं है, क्योंकि ज्ञानावरण का अभाव हो जाने पर ज्ञान की परिपूर्णता हो जाती है अथवा वह केवलज्ञान हो जाता है अत: ज्ञान गुण का विनाश नहीं होता है।

जो कोई कहते हैं कि केवली भगवान केवल आत्मा को ही जानते हैं, कोई कहते हैं कि वे केवल बाह्य पदार्थ को ही जानते हैं उनके समाधान के लिए श्री कुन्दकुन्ददेव ने नियमसार प्राभृत ग्रंथ में नयों की अपेक्षा से कहा है-

व्यवहारनय से केवली भगवान् सर्वजगत् को जानते और देखते हैं, (केवलणाणी णियमेण अप्पाणं जाणदि पस्सदि) किन्तु केवलज्ञानी निश्चयनय से आत्मा को ही जानते देखते हैं।।

टीका-सकल विमल केवलज्ञान दर्शनस्वरूप कार्य समयसार रूप से परिणत हुए सकल परमात्मा केवली भगवन् अधो, मध्य, ऊध्र्वलोक इन तीन लोकरूप लोकाकाश को और अलोकाकाश को तथा भूत भविष्यत् वर्तमान इन तीनों कालों की सम्पूर्ण चर-अचर वस्तुओं को जानते और देखते हैं। श्री गौतमस्वामी ने भी कहा है-

जो विधिवत् सम्पूर्ण चर-अचर द्रव्यों को उनके सम्पूर्ण गुणों को भूत-वर्तमान-भविष्यत्कालीन सभी पर्यायों को सदा सब प्रकार से एक साथ और प्रतिक्षण जानते हैं, इसीलिए वे ‘सर्वज्ञ’ कहलाते हैं, ऐसे महान वीर जिनेश्वर सर्वज्ञदेव के लिए मेरा नमस्कार होवे।

इस उपर्युक्त नियमसार प्राभृत की गाथा में व्यवहारनय भेदकारक ही ग्रहण करना चाहिए, न कि पराश्रित, क्योंकि केवली भगवान का ज्ञान पराश्रित नहीं है, प्रत्युत उस ज्ञान में सम्पूर्ण विश्व दर्पण में प्रतिबिम्बित के समान ही झलकते हैं और वे भगवान इच्छापूर्वक भी नहीं जानते हैं, क्योंकि उनके मोहकर्म का अभाव हो गया है।

पुनरपि श्री कुन्दकुन्ददेव एकांतवादियों का निराकरण करते हैं-

केवली भगवान् आत्मा के स्वरूप को ही देखते हैं, लोक-अलोक को नहीं। यदि कोई ऐसा कहता है, उसके कथन में क्या दूषण आता है ? सो ही कहते हैं-मूर्तिक, अमूर्तिक, चेतन और अचेतन तथा स्व और अन्य सर्व द्रव्य इन सबको देखने वाले का ही ज्ञान प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय होता है। नाना गुण पर्यायों से संयुक्त पूर्वोक्त सकल द्रव्यों को जो अच्छी तरह नहीं देखते, उनके परोक्ष दर्शन होता है।

केवली भगवान लोक-अलोक को जानते हैं, न कि आत्मा को। यदि कोई ऐसा कहता है, तो उसे क्या दूषण आता है ? सो ही दिखाते हैं-ज्ञान जीव का स्वरूप है इसलिए आत्मा आत्मा को जानता है। यदि वह ज्ञान आत्मा को नहीं जानता है, तो वह आत्मा से भिन्न हो जावेगा।।१६६-१६७-१६८-१६९-१७०।।

प्रत्येक आत्मा में अनंत गुण हैं, उनमें से एक ज्ञान ही सर्व जानने में समर्थ, सर्वश्रेष्ठ और महामूल्यवान् है। जो महातपोधन अपने ज्ञानोपयोग से हित और अहित को जानकर हित कार्य में प्रवृत्त होते हैं, वे ही वीतराग निर्विकल्प स्वसंवेदन ज्ञान के बल से परमाल्हादमय अपनी शुद्ध आत्मा में स्थित रहते हुए केवलज्ञान सूर्य को उत्पन्न कर लेते हैं।

‘मुंचंति’-‘अमूर्त का मूर्त अथवा अमूर्तों के साथ बंध नहीं होता’ ऐसा मोक्ष के अभावसंबंधी मिथ्यात्वरूपी दुर्नय के निवारणार्थ ‘मुच्चंति’ अर्थात् ‘मुक्त होते हैं’ यह पद कहा गया है।

दूसरी बात यह है कि जीव और शरीर का अनादि संबंध है, जैसे कि स्वर्ण पाषाण मेें मल। इस गाथा में कथित नियम के अनुसार सभी संसारी जीव अनादिकाल से कर्मों से संश्लिष्ट-संबंधित, अशुद्ध, मूर्तिक ही हैं न कि अमूर्तिक, हाँ कथंचित्-शुद्ध निश्चयनय से ही संसारी जीव अमूर्तिक है, न कि अशुद्धनय से, ऐसा जानना।

द्रव्यसंग्रह में कहा है-

पाँच वर्ण, पाँच रस, दो गंध और आठ स्पर्श निश्चयनय से ये जीव में नहीं हैं अत: यह अमूर्तिक है और कर्मबंध के होने से यह व्यवहारनय से मूर्तिक है।।७।।

अत: ये सभी संसारी जीव मूर्तिक पुद्गलकर्मों से सहित मूर्तिक ही हैं, पुन: रागद्वेष आदि भावों से पुद्गलकर्मों को ग्रहण करते हैं। जब ये सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्रस्वरूप व्यवहार-निश्चय रत्नत्रय के बल से मिथ्यात्व, विषय, कषाय और योग जो कि बंध के हेतु हैं उनका नाश करके अपनी आत्मा को प्राप्त कर लेते हैं, तब वे शुद्ध, सिद्ध, अमूर्तिक हो जाते हैं न कि उससे पहले संसार अवस्था में अमूर्तिक हैं।

‘परिणिव्वाणयंति’-जिसके शरीर नहीं है, उसके इन्द्रियों का भी अभाव होने से विषयसेवन नहीं हो सकता, अतएव मुक्त जीवों के सुख नहीं है’, ऐसा कहने वालों के दुर्नय के निवारणार्थ ‘परिणिव्वाणयंति’ अर्थात् परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, ऐसा कहा गया है।

तीन लोक और तीन काल के जीवों के एकत्रित किये सम्पूर्ण सुख की अपेक्षा भी अनन्तगुणे अधिक सिद्धों का सुख है। त्रिलोकसार ग्रंथ में कहा भी है-

चक्रवर्ती, भोगभूमि, धरणेन्द्र, देवेन्द्र और अहमिन्द्रों का सुख क्रमश: एक-दूसरे से अनंतगुणा है। इन सबके त्रिकालवर्ती सुखों से सिद्धों का एक क्षण का भी सुख अनंतगुणा है।।५६०।।

विशेषार्थ-संसार मे चक्रवर्ती के सुख से भोगभूमि स्थित जीवों का सुख अनन्तगुणा है। इनसे धरणेन्द्र का सुख अनंतगुणा है। धरणेन्द्र से देवेन्द्र का सुख अनन्तगुणा है और देवेन्द्र से अहमिन्द्रों का सुख अनंतगुणा है। इन सबके त्रिकालवर्ती सुख से भी सिद्धों का एक क्षण का सुख अनन्तगुणा है अर्थात् उनके सुख की तुलना नहीं है।

उपर्युक्त उपदेश मात्र कथनस्वरूप है, कारण कि सिद्ध परमेष्ठी का सुख अतीन्द्रिय, स्वाधीन और निराकुल (अव्यावाध) है तथा संसारी जीवों का सुख इन्द्रियजनित, पराधीन और आकुलतामय है अत: तीनों लोकों में कोई भी उपमा ऐसी नहीं है, जिसके सदृश सिद्ध जीवों का सुख कहा जा सके। उनका सुख वचनागोचर है।

सिद्धों का सुख अतीन्द्रिय, आत्मा से उत्पन्न है न कि इंद्रियजन्य या परवस्तु से उत्पन्न संसार का सुख कर्म के आधीन, अन्तसहित दु:खों से मिश्रित, क्षणिक, आकुलतासहित ही है।

पद्मनंदिपंचविंशतिका में भी कहा है-

संसार में कुछ दु:ख है, कुछ सुख है ऐसा अज्ञानीजनों के चित्त में प्रतिभास होता है किन्तु विवेकीजनों को तो संसार में नित्य ही सर्व दु:ख ही दु:ख है, ऐसा विश्वास रहता है।।

[सम्पादन]
अतोऽतीन्द्रियसुखस्य लक्षणं कथ्यते-

सिद्धानां सुखमात्मोत्थं अव्याबाधमकर्मजम्।

परमाल्हादरूपं तद् अनौपम्यमनुत्तरम्।।२१६।।
सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति-सति सुखे दु:खेणापि भवितव्यं, अन्यथा सुखानुपपत्ते: इति कथयतां दुर्णयनिवारणार्थं सर्वदु:खाणामन्तं परिविजानन्ति अनुभवन्तीति कथितम्। किंच सुखं आत्मन: स्वभावोऽस्ति अत: सिद्धानां सुखं स्वाभाविकं निष्प्रतिपक्षं वर्तते स्वभावज्ञानवत्।

उक्तं च- केवलमिंदियरहियं असहायं तं सहावणाणं त्ति।
सण्णाणियरवियप्पे विहावणाणं हवे दुविहं।।११।।

 
एतादृशं सुखमपि स्वाभाविकमस्ति।
उक्तं च श्रीकुन्दकुन्ददेवेन-

आउस्स खयेण पुणो णिण्णासो होइ सेसपयडीणं।
पच्छा पावइ सिग्घं लोयग्गं समयमेत्तेण।।१७६।।
जाइजरमरणरहियं परमं कम्मट्ठवज्जियं सुद्धं।
णाणाइचउसहावं अक्खयमविणासमच्छेयं।।१७७।।

‘‘णाणाइचउसहावं अक्खयमविणासमच्छेयं-ज्ञानदर्शनसुखवीर्याश्चत्वार: स्वभावगुणा: यत्र तत्, कल्पान्तकालेऽपि क्षयरहितमक्षयं विनाशरहितमविनाशं छेत्तुमयोग्यमच्छेद्यं तत् निर्वाणं लोकाग्रं प्राप्नोति।’’
सर्वार्थसिद्धिविमानात् प्रच्युत्य अहमिन्द्रा: यं यं गुणमुत्पादयन्ति तेषां गुणानां कथनमत्र प्रोक्तं संक्षेपेण, इमे महापुरुषा: नियमेन परमानन्दमयं निर्वाणधाम प्राप्नुवन्ति, एतस्मात् एतदेव पदं सर्वश्रेष्ठमिति ज्ञातव्यम्।
इदं सर्वार्थसिद्धिविमानं द्रव्यभावाभ्यां निग्र्रन्था महासाधव एव लभन्ते न चान्ये तन्निश्चयव्यवहार-रत्नत्रयसमन्वितं निग्र्रन्थं निर्वाणमार्गं श्रीगौतमस्वामिगणधरदेवोऽपि प्रशंसति। तथाहि-
‘‘इच्छामि भंते! इमं णिग्गंथं पावयणं अणुत्तरं केवलियं पडिपुण्णं णेगाइयं सामाइयं संसुद्धं सल्लघट्टाणं सल्लघत्ताणं सिद्धिमग्गं सेढिमग्गं खंतिमग्गं मुत्तिमग्गं पमुत्तिमग्गं मोक्खमग्गं पमोक्खमग्गं णिज्जाणमग्गं णिव्वाणमग्गं सव्वदुक्खपरिहाणिमग्गं सुचरियपरिणिव्वाणमग्गं अवित्तहं अवि संति पवयणं उत्तमं तं सद्दहामि तं पत्तियामि तं रोचेमि तं फासेमि इदोत्तरं अण्णं णत्थि ण भूदं ण भवं ण भविस्सदि३।’’
एवमनन्ततीर्थकरैरनाद्यनिधनरत्नत्रयस्वरूपमार्ग एवोपदिष्ट:,विदेहक्षेत्रेष्वसावेव मार्गोऽद्यावध्यविच्छिन्न-प्रवाहेणागतोऽस्त्यग्रेऽपि अनन्तकालेऽयमेव चलिष्यति। अत्रापि भरतक्षेत्रे युगादौ श्रीऋषभदेवेनादिब्रह्मणा प्रारब्ध:। अयमेवाधुना दुष्षमकाले इदं वीरप्रभुशाासनमविच्छिन्नमेवास्ति। मध्ये सप्ततीर्थकराणामन्तराले सप्तवारानयं मार्गो व्युच्छिन्न: किन्तु वीरजिनशासने नास्ति व्युच्छेद:।

उक्तं च- हुण्डावसप्पिणिस्स य दोसेणं सत्त होंति विच्छेदा।
दिक्खाहिमुहाभावे अत्थमिदो धम्मरविदेवो।।१२८०।।

अयं मार्गो मयास्मिन् भवे न प्राप्स्यते तृतीयभवे नियमेन प्राप्नुयात् एतदेव याच्यतेऽधुना। यद्यपि वयमार्यिका: गणिन्यश्च पंचमगुणस्थानवर्तिन्यस्तथापि एकादशप्रतिमाधारिक्षुल्लवैलकापेक्षयोत्कृष्टा उपचारमहाव्रतिका: संयतिका: स्म:। मुनिरिव सर्वान् अष्टाविंशतिमूलगुणान् समाचारांश्च प्रतिपालयाम:। एकादशांगश्रुतस्याध्ययनेऽपि आर्यिकाणामधिकारोऽस्ति।

उक्तं च मूलाचारे- एसो अज्जाणं पि अ सामाचारो जहाक्खिओ पुव्वं।
सव्वम्हि अहोरत्ते विभासिदव्वो जधा जोग्गं।।१८७।।
सुत्तं गणधरकहिदं तहेव पत्तेयबुद्धिकधिदं च।
सुदकेवलिणा कधिदं अभिण्णदसपुव्विकधिदं च।।२७७।।
तं पढिदुमसज्झाये णो कप्पदि विरद इत्थिवग्गस्स।
एत्तो अण्णो गंधो कप्पदि पढिदुं असज्झाये।।२७८।।

टीकायामपि-‘‘तत्सूत्रं पठितुमस्वाध्याये न कल्प्यते न युज्यते विरतवर्गस्य संयतसमूहस्य स्त्रीवर्गस्य चार्यिकावर्गस्य च। इतोऽस्मादन्यो ग्रन्थ: कल्प्यते पठितुमस्वाध्यायेऽन्यत्पुन: सूत्रं कालशुद्ध्यभावेऽपि युत्तं पठितुमिति।’’
अनेन स्पष्टं भवति यत् आर्यिका: स्वाध्यायकाले सूत्रग्रन्थमपि पठितुमर्हन्ति। पुराणग्रन्थेऽपि श्रूयते।
तथाहि-‘‘एकादशांगभृज्जाता सार्यिकापि सुलोचना।’’
एषां ग्रन्थानामाधारणैव मया षट्खण्डागमसिद्धांतग्रन्थस्य स्वाध्यायं कृत्वा सिद्धान्तचिंतामणिनामधेया-टीकालेखनस्य प्रयासो विहित:।
अहो! क्वायं सिद्धान्तग्रंथ: षट्खण्डागमनामधेयो महाग्रन्थराज: ? क्व च श्रीधरसेनाचार्य: श्रुतपारंगतो महानाचार्य: अस्य द्वादशांगांशस्य ज्ञाता ? क्व च अस्य भगवत: शिष्यौ पुष्पदन्तभूतबलिनामानौ सरस्वतीपुत्रौ इव श्रुतधराचार्यौ ? क्व चाहं अल्पज्ञा नाम्नैव ज्ञानमत्यार्यिका ? तथापि ममैतत् टीकालेखनकार्यं विद्वद्वर्गेषु श्लाघ्यमेव। किंच मया अस्यां टीकायां स्वबुद्ध्या किमपि न लिखितं केवलं धवलाटीकाधारेण नानाग्रन्थाधारेणैव, तर्हि अपि अस्यां यत् किमपि स्खलनं भवेत् तत् मम प्रमादेन अज्ञानेन वा भवितुं शक्येत तत् मदपेक्षयाधिकज्ञानिनो विद्वांसो मुनय: आर्यिका: ईष्र्यासूयादिभावमन्तरेण मह्यं सूचयन्तु शोधयन्तु वा न च दोषान् प्रसारयन्तु।
अस्यां टीकायां मया केवलं सरलं विषयं गृहीत्वा स्वस्यां सिद्धान्तज्ञानलब्ध्यै वृद्ध्यै च सिद्धान्तचिंतामणिनाम्ना टीका रचिता न च विद्वत्सु विद्वत्ताप्रदर्शनाय न च ख्यातिलाभपूजापेक्षया वा, अस्या: टीकाया: नाम अन्वर्थकमेव भूयादिति भावनया च। इयं टीका मह्यं चिन्तामणिरत्नमिव चिन्तितफलदाने सक्षमा भूयात् मम चिन्तितफलं द्वादशांगश्रुतज्ञानं एव यत्तु केवलज्ञानस्य बीजभूतं कथ्यते।
उक्तं च- बोधि: समाधि: परिणामशुद्धि:। स्वात्मोपलब्धि: शिवसौख्यसिद्धि:।।
‘‘चिन्तामणिं चिन्तितिवस्तुदाने। त्वां वंद्यमानस्य ममास्तु देवि।’’
श्रीतीर्थकरपरमदेवस्य श्रुतस्कंधमयरम्योद्याने प्रविश्य हीरकमणिमुक्तामाणिक्यादिरत्नानि इव काठिन्यात् सिद्धान्तन्यायव्याकरणगणितादिविषयान् मुक्त्वा गुणस्थानमार्गणादिषु सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालांतर-भावाल्पबहुत्वजीवस्थानचूलिकादीनि अतीव सुंदरविविधवर्णविचित्रकुसुमानि चित्वा चित्वा इयं सिद्धान्तचिंतामणिनामधेया स्रक् गुम्फिता मया। अद्य श्रीऋषभदेवकेवलज्ञानदिवसे केवलज्ञानावाप्तये इयं स्रक् तस्यैव श्रीआदिब्रह्मण: चरणपंकेरुहयो: भक्त्या मया समप्र्यते।
अस्या: टीकामयीस्रज: पुष्पाणि श्रीभगवत: चरणकमलं स्पृष्ट्वा सुरभितानि जातानि सर्वजगति सुरभिं विकिरेयु: नात्यद्भुतमस्मिन्निति।
एवं तृतीयस्थले देवगतिप्रच्युतानां गुणोत्पादनकथनमुख्यत्वेन अष्टादशसूत्राणि गतानि।
संप्रति षष्ठग्रन्थस्य सूत्राणां विवरणं क्रियते-
अस्यां जीवस्थानचूलिकायां प्रथमायां प्रकृतिसमुत्कीर्तनचूलिकायां षट्चत्वािंरशत्सूत्राणि, द्वितीयायां स्थानसमुत्कीर्तनचूलिकायां सप्तदशाधिकशतसूत्राणि, तृतीयायां चूलिकायां प्रथममहादण्डके द्वे सूत्रे, चतुथ्र्यां चूलिकायां द्वितीयमहादण्डकनामधेयायां द्वे सूत्रे, पंचम्यां चूलिकायां तृतीयमहादण्डकनामधेयायां द्वे सूत्रे, षष्ठ्यां चूलिकायां उत्कृष्टस्थितिबंधाख्यायां चतुश्चत्वािंरशत्सूत्राणि, सप्तम्यां चूलिकायां जघन्यस्थितिबंधाख्यायां त्रिचत्वािंरशत्सूत्राणि, अष्टम्यां सम्यक्त्वोत्पत्तिनामचूलिकायां षोडशसूत्राणि, नवम्यां चूलिकायां गत्यागतिनामधेयायां त्रिचत्वािंरशदधिकद्विशतसूत्राणि एवं सर्वाणि मिलित्वा पंचदशोत्तर-पंचशतसूत्रै: जीवस्थानचूलिकानाम ग्रन्थ: परिपूर्यते मया सरस्वतीमातु: कृपाप्रसादेन।
तीर्थंकरदीक्षावृक्षाणां स्तुति:

लौकान्तिकसुरै: स्तुत्य-तीर्थकर्तृजिनेशिनाम्।
दीक्षावनद्रुमस्थान-पावनानि नुमोऽधुना।।१।।

दीक्षावृक्षस्य नामानि-वट-सप्तच्छद-सर्ज-असन-महिला-छसा-शिरीष-नाग-सर्ज-प्लक्ष-तिंदुक-पाटल-जंबू-अश्वत्थ-कपित्थ-नंदिक-तिलक-आम्र-अशोक-चंपक-बकुल-वांसिक-धव-शाला: इमे दीक्षावृक्षा: अपि तीर्थकरदेवनिष्क्रमणकल्याणकनिमित्तेन पूज्या अभवन्।
श्रीऋषभदेवादिचतुर्विंशतितीर्थकरदेवै: यत्र प्रयागसाकेतादिनगरीणां सिद्धार्थादिवनेषु वटवृक्षादितलेषु दैगम्बरीदीक्षा गृहीता, तत्स्थलवनवृक्षादयोऽपि सुरादिभि: वंद्या: संजाता:। तांश्चतुर्विंशतितीर्थकरभगवत: नमस्कृत्य संप्रति स्वार्यिकादीक्षाभूमि-‘माधोराजपुुरा’ नाम ग्रामे उपविश्य तीर्थकरदीक्षाकल्याणकभूमी: स्मारं स्मारं वन्दित्वा मनसि निधायापि भक्तिभावेन अत्र नूतनतीर्थ रचनाशिलान्यासदिवसे तीर्थंकरदीक्षावनानि वृक्षाश्च मयापि स्तूयन्ते भक्तिभावेन, भाविकाले तद्भवमोक्षगामि-महाव्रतदीक्षाप्राप्त्यर्थं। अस्मिन् विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यं चारित्रचक्रवर्तिश्रीशांतिसागरं नुत्वा तत्प्रथमपट्टाधीशाय दीक्षागुरवे श्रीवीरसागरसूरये कोटिश: नमोस्तु।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीवीरसेनाचार्यविरचित धवलाटीकाप्रमुखानेकग्रन्थाधारेण रचितायां
विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: श्रीचारित्रचक्रवर्तिशान्तिसागरस्तस्य
प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या जम्बूद्वीपरचना-प्रेरिकागणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां नवमीचूलिकानामायं द्वितीयो महाधिकार: समाप्त:।

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इसीलिए आचार्यों ने अतीन्द्रिय सुख का लक्षण किया है-

सिद्ध भगवन्तों का सुख आत्मा से उत्पन्न होता है, बाधारहित-अव्याबाध है, कर्मों से उत्पन्न न होने से अकर्मज है, परमाल्हादरूप है, अनुपम है-उपमारहित है और अनुत्तर है।।२१६।।

‘सव्वदुक्खाणमंतं परिविजाणंति’-‘जहाँ सुख है, तहाँ दुख भी होना चाहिए, नहीं तो सुख की उपपत्ति नहीं बन सकती’ ऐसा कहने वालों के दुर्नय के निवारणार्थ ‘सर्व दु:खों के अन्त होने का अनुभव करते हैं’, ऐसा कहा गया है।

क्योंकि सुख यह आत्मा का स्वभाव है, इसलिए सिद्धों का सुख स्वाभाविक है, प्रतिपक्ष से रहित है, स्वभावज्ञान के समान, ऐसा जानना।

कहा भी है-जो केवल, इंद्रियरहित और असहाय है वह स्वभावज्ञान है। संज्ञान और मिथ्याज्ञान के भेद से दो प्रकार का विभावज्ञान होता है।।११।।

अर्थात् जो केवल-एक, अतीन्द्रिय और परसहाय की अपेक्षा से रहित है वह केवलज्ञान स्वभावज्ञान है।

ऐसा सुख भी स्वाभाविक सुख है।

श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा भी है-

आयु का क्षय हो जाने पर पुन: शेष प्रकृतियों का नाश हो जाता है। अनंतर शीघ्र ही समयमात्र में वे भगवान लोकाग्र को प्राप्त कर लेते हैं।।१७६।।

जन्म जरा मरण से रहित, परम, आठ कर्म से वर्जित, शुद्ध ज्ञान दर्शन सुखवीर्य स्वभाव वाला, अक्षय, अविनाशी, अच्छेद्य, अव्याबाध, अतीन्द्रिय, अनुपम, पुण्यपाप से रहित, पुनरागमन से रहित, नित्य, अचल और आलंबनरहित ऐसा सुख उन सिद्धों को प्राप्त हो जाता है।।१७७।।

ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य ये चार स्वभावगुण जहाँ हैं वह स्थान कल्पान्तकाल में भी क्षय नहीं होता, अक्षय है, विनाशरहित होने से अविनाशी है, छेदन के योग्य न होने से अच्छेद्य है ऐसे निर्वाण को-लोक के अग्रभाग को सिद्ध भगवान प्राप्त कर लेते हैं।

सर्वार्थसिद्धि विमान से च्युत होकर अहमिन्द्र जिन-जिन गुणों को उत्पन्न करते हैं, उन गुणों का कथन यहाँ संक्षेप में कहा गया है। ये महापुरुष तो नियम से परमानंदमय निर्वाणधाम को प्राप्त करते हैं इन सभी में से तो यह एक ही पद सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा जानना चाहिए।

इस सर्वार्थसिद्धि विमान को द्रव्य और भाव से निग्र्रन्थ ऐसे महासाधु ही प्राप्त करते हैं, न कि अन्य कोई सामान्य साधु।

वह निश्चय और व्यवहार रत्नत्रय से समन्वित निग्र्रंथलिंग ही निर्वाणमार्ग है, ऐसा श्री गौतम स्वामी गणधरदेव भी प्रशंसा करते हैं। जैसा कि- हे भगवन्! इस निर्र्ग्रन्थ लिंग की इच्छा करता हूँ। यह बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से रहित मोक्ष की प्राप्ति का कारण निर्र्ग्रन्थ लिंग आगम में मोक्ष का मार्ग है इस रूप से प्रतिपादन किया गया है, अनुत्तर है अर्थात् इस निर्ग्रन्थ लिंग से भिन्न दूसरा और कोई उत्कृष्ट मोक्ष का मार्ग नहीं है, केवली संबंधी है, परिपूर्ण है, नैकायिक है, सामायिक रूप है, संशुद्ध है, शल्य घट्टक जीवों के शल्य का घातक है, सिद्धि का मार्ग है, श्रेणी का मार्ग है, शान्ति का मार्ग है, मुक्ति का मार्ग है, प्रकृष्ट मुक्ति का मार्ग है, मोक्ष का मार्ग है, प्रकृष्ट मोक्ष का मार्ग है, नियति का मार्ग है, निर्वाण का मार्ग है, सब दु:खों के परिहानि का मार्ग है, निरतिचार शोभन चारित्र के धारकों के परिनिर्वाण का मार्ग है, अवितथ है, प्रवचनस्वरूप है, उत्तम है, इस प्रकार का निर्र्ग्रन्थ लिंग उसका मोक्षार्थी आश्रय ग्रहण करते हैं अर्थात् उसे स्वीकार करते हैं मैं उसका श्रद्धान करता हूँ, प्रतीति करता हूँ, रुचि करता हूँ, स्पर्श करता हूँ, इस निर्ग्रन्थ लिंग से उत्कृष्ट लिंग न वर्तमान काल में है न अतीत काल में था और न भविष्यत् काल मेें होगा।

इस प्रकार अनंत तीर्थंकर भगवन्तों ने इस अनादि-अनिधन रत्नत्रयस्वरूप मार्ग ही कहा है, विदेह क्षेत्रों में यही मार्ग आज तक भी अविच्छिन्न प्रवाहरूप से चला आ रहा है और आगे भी अनंतकाल तक यही मार्ग चलता रहेगा। यहाँ भी भरतक्षेत्र में युग की आदि में आदिब्रह्मा श्री ऋषभदेव ने इस मार्ग को प्रारंभ किया था। यही मार्ग इस समय इस दु:षमकाल में श्री वीरप्रभु के शासन के रूप में अविच्छिन्न ही है।

मध्य में सात तीर्थंकरों के अन्तराल में सात बार यह मार्ग व्युच्छिन्न हुआ है, किन्तु वीरप्रभु के शासन में इस मार्ग का- जैनधर्म का व्युच्छेद नहीं है।

श्री यतिवृषभसूरि ने तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ में कहा है-

हुण्डावसर्पिणी के दोष से यहाँ सात धर्म के विच्छेद होेते हैं। उस समय दीक्षा के अभिमुख होने वालों का अभाव होने पर धर्मरूपी सूर्यदेव अस्तमित हो गया था।।१२८०।।

यह मार्ग-निग्र्रन्थमार्ग मुझे इस भव में प्राप्त नहीं होगा, तृतीय भव में नियम से प्राप्त हो, इस समय मेरे द्वारा यह याचना की जा रही है-मैं ऐसी याचना करती हूँ। यद्यपि मैं आर्यिका हूँ, गणिनी हूँ, आर्यिकाओं में प्रधान हूँ, पंचम गुणस्थानवर्ती हूँ, फिर भी ग्यारह प्रतिमाधारी क्षुल्लक, ऐलक की अपेक्षा उत्कृष्ट हूँ, उपचार से महाव्रतिका हूँ, संयतिका हूँ। मुनि के समान अट्ठाईस मूलगुणों का और समाचार विधि का पालन करती हूूँ।

एकादश अंगरूप श्रुत के अध्ययन करने का भी आर्यिकाओं को अधिकार है।

मूलाचार में कहा भी है-

गाथार्थ-पूर्व में जैसा कहा गया है वैसा ही यह समाचार आर्यिकाओं को भी सम्पूर्ण अहोरात्र में यथायोग्य करना चाहिए।।१८७।।

आचारवृत्ति टीका में-पूर्व में जैसा समाचार प्रतिपादित किया है, आर्यिकाओं को भी सम्पूर्ण कालरूप दिन और रात्रि में यथायोग्य-अपने अनुरूप अर्थात् वृक्षमूल, आतापन आदि योगों से रहित वही सम्पूर्ण समाचार विधि आचरित करनी चाहिए।

भावार्थ-इस गाथा से यह स्पष्ट हो जाता है कि आर्यिकाओं के लिए वे ही अट्ठाईस मूलगुण और वे ही प्रत्याख्यान, संस्तरग्रहण आदि तथा वे ही औघिक पदविभागिक समाचार माने गये हैं, जो कि यहाँ तक चार अध्यायों में मुनियों के लिए वर्णित हैंं। मात्र ‘यथायोग्य’ पद से टीकाकार ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें वृक्षमूल, आतापन, अभ्रावकाश और प्रतिमायोग आदि उत्तर योगों के करने का अधिकार नहीं है और यही कारण है कि आर्यिकाओं के लिए पृथक् दीक्षाविधि या पृथक् विधि-विधान का ग्रन्थ नहीं है।

गाथार्थ-गणधर देव द्वारा कथित, प्रत्येक बुद्धि ऋद्धिधारी द्वारा कथित, श्रुतकेवली द्वारा कथित और अभिन्न दशपूर्वी ऋषियों द्वारा कथित को सूत्र कहते हैं।।२७७।।

गाथार्थ-अस्वाध्याय काल में मुनिवर्ग और आर्यिकाओं को इन सूत्रग्रंथ का पढ़ना ठीक नहीं है। इनसे भिन्न अन्य ग्रंथ को अस्वाध्याय काल में पढ़ सकते हैं।।२७८।।

आचारवृत्ति टीका में-विरतवर्ग अर्थात् संयतसमूह को और स्त्रीवर्ग अर्थात् आर्यिकाओं को अस्वाध्यायकाल में-पूर्वोक्त कालशुद्धि आदि से रहित काल में इन सूत्र ग्रंथों का स्वाध्याय करना युक्त नहीं है किन्तु इन सूत्रग्रंथों से अतिरिक्त अन्य ग्रंथों को कालशुद्धि आदि के अभाव में भी पढ़ा जा सकता है, ऐसा समझना।

इस कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि आर्यिकाएँ स्वाध्यायकाल में सूत्रग्रंथ भी पढ़ सकती हैं।

पुराण ग्रंथ में भी कहा है-

आर्यिका सुलोचना भी ग्यारह अंग की पाठी हो गर्इं।

इन ग्रंथों के आधार से ही मैंने षट्खण्डागम सिद्धान्त ग्रंथ का स्वाध्याय करके ‘सिद्धान्तचिंतामणि’ नाम की टीका लिखने का प्रयास किया है। अहो! आश्चर्य है कि-कहाँ तो यह ‘षट्खण्डागम’ नाम का महाग्रंथराज सिद्धान्तग्रंथ ? कहाँ तो श्री धरसेनाचार्य गुरुदेव इस बारहवें अंग के अंश के ज्ञाता, महान श्रुतपारंगत आचार्यदेव ? कहाँ इन भगवान आचार्यदेव के शिष्य श्री पुष्पदंत-भूतबली आचार्य जो कि सरस्वती पुत्र के समान श्रुतधर आचार्य हुए हैं ? और कहाँ मैं अल्पज्ञा नाममात्र से ‘ज्ञानमती’ आर्यिका ?

फिर भी मेरा यह टीका लेखनकार्य विद्वान वर्गों में प्रशंसनीय ही है। दूसरी बात यह है कि मैंने इस टीका में अपनी बुद्धि से कुछ भी नहीं लिखा है, केवल ‘धवलाटीका’ के आधार से और अनेक ग्रंथों के आधार से ही लिखा है। तो भी इस टीका में जो कुछ भी स्खलन हुआ हो, वह मेरे प्रमाद से अथवा अज्ञान से ही होना शक्य-संभव है, जो मेरे से भी अधिक ज्ञानी विद्वान्, मुनिगण या आर्यिकाएँ हों, वे ईष्र्या, असूया आदि भावों के बिना मुझे सूचित करें अथवा संशोधन करें, मेरे दोषों का प्रसारण न करें।

इस टीका में मैंने सरल विषय को ग्रहण कर अपने में सिद्धान्त ज्ञान की उपलब्धि के लिए और उसकी वृद्धि के लिए ‘‘सिद्धान्तचिंतामणि’’ नाम की यह टीका रची है न कि विद्वानों में विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए या ख्याति, लाभ, पूजा की अपेक्षा से ही तथा इस टीका का नाम सार्थक होवे, ऐसी भावना से ही लिखी है। यह टीका मुझे चिंतामणिरत्न के समान ही चिंतित फल को देने में समर्थ होवे, मेरा चिंतितफल द्वादशांग श्रुतज्ञान ही है, जो कि केवलज्ञान का बीज कहा जाता है।

कहा भी है-हे सरस्वती देवि! आप चिंतित वस्तु के देने में चिंतामणि के समान है-चिंतामणि ही हैं, आपकी वंदना करते हुए मुझे बोधि-रत्नत्रय की प्राप्ति हो, समाधि की प्राप्ति हो, परिणामों की शुद्धि हो, अपनी आत्मा की उपलब्धि हो और मोक्ष सुख की सिद्धि होवे।।

श्री तीर्थंकर परमदेव के श्रुतस्कंधमय रम्य-सुंदर उद्यान में प्रवेश करके हीरा, मणि, मोती, माणिक आदि रत्नों के समान अत्यंत कठिन होने से सिद्धान्त, न्याय, व्याकरण, गणित आदि विषयों को छोड़कर गुणस्थान-मार्गणा आदि में सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व एवं जीवस्थान चूलिका आदि अतीव सुन्दर-सुन्दर नाना प्रकार के वर्णरूप विचित्र पुष्पों को चुन-चुनकर यह ‘सिद्धान्तचिंतामणि’ नाम वाली माला मैंने गूँथी है। आज श्री ऋषभदेव के केवलज्ञान दिवस-फाल्गुन कृष्णा ग्यारस तिथि में केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए यह माला उन्हीं आदिब्रह्मा श्री ऋषभदेव के श्रीचरणकमलों में भक्तिपूर्वक मेरे द्वारा समर्पित की जाती है।

इस टीकामयी माला के पुष्प श्री तीर्थंकर भगवान के चरण कमलों का स्पर्श करके सुरभित हो गये हैं, ये सुगंधित पुष्प सारे जगत में सुगंधि फैलावें, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में देवगति से च्युत हुए जीवों के गुणों को उत्पादन करने के कथन की मुख्यता से अठारह सूत्र पूर्ण हुए।

अब इस छठे ग्रंथ के सूत्रों का विवरण करते हैं-

इस जीवस्थान चूलिका नाम के ग्रंथ में प्रथम ‘प्रकृतिसमुत्कीर्तन’ नाम की चूलिका में छ्यालीस सूत्र कहे गये हैं। द्वितीय ‘स्थानसमुत्कीर्तन’ नाम की चूलिका में एक सौ सत्रह सूत्र हैं। तृतीय चूलिका ‘प्रथम महादण्डक’ नाम से है, उसमें दो सूत्र हैं। चौथी चूलिका ‘द्वितीय महादण्डक’ नाम में दो सूत्र हैं। पाँचवीं चूलिका ‘‘तृतीय महादण्डक’’ नाम की है उसमें भी दो सूत्र हैं। छठी चूलिका ‘उत्कृष्ट स्थितिबंध’ नाम की है, इसमें चवालीस सूत्र हैं। सातवीं चूलिका ‘जघन्य स्थितिबंध’ नाम से है, इसमें तेतालीस सूत्र हैं। आठवीं चूलिका ‘सम्यक्त्वोत्पत्ति’ नाम की है इसमें सोलह सूत्र हैं और नवमीं चूलिका ‘गत्यागति नाम’ से है, इसमें दो सौ तेतालीस सूत्र हैं। इस प्रकार सब मिलकर ‘पाँच सौ पन्द्रह’ सूत्रों से ‘यह जीवस्थान चूलिका’ नाम का ग्रंथ सरस्वती माता की कृपा प्रसाद से मेरे द्वारा पूर्ण किया जा रहा है।

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तीर्थंकरों के दीक्षावृक्षों की स्तुति

लौकांतिक देवों द्वारा स्तुति को प्राप्त तीर्थंकर भगवन्तों के दीक्षावन और दीक्षावृक्ष स्थान पावन-पवित्र हैं, इस समय हम उन्हें नमस्कार करते हैं।।१।।

तीर्थंकरों के क्रम से दीक्षावृक्ष के नाम-वट (बड़वृक्ष), सप्तच्छद, सर्ज (सालवृक्ष), असन (पीतसाल), महिला (प्रियंगु), छसा, शिरीष (सिरस), नाग, सर्ज (साल), प्लक्ष (पीपल), तिंदुक, पाटल, जामुन, अश्वत्थ (पीपल), कपित्थ (कैथा), नंदी, तिलक, आम, अशोक, चंपा, वकुल, वांस, धव (देवदारु) और साल ये दीक्षा वृक्ष भी तीर्थंकर भगवान के दीक्षाकल्याणक के निमित्त से पूज्य हो गये हैं।

शास्त्रों में दीक्षावृक्ष एवं केवलज्ञान वृक्ष एक ही माने हैं। अन्यत्र में इनके नाम निम्न प्रकार हैं-

१. वट,

२. सप्तपर्ण (चितवन),

३. शाल (साल-साखू),

४. सरल (चीड़),

५. प्रियंगु,

६. प्रियंगु,

७. शिरीष (सिरस),

८. नाग (नागकेसर),

९. बहेड़ा,

१०. विल्व (बेल),

११. तेंदू,

१२. कदंब,

१३. जामुन,

१४. पीपल,

१५. कैथा,

१६. नंदी (तून),

१७. तिलक,

१८. आम्र,

१९. अशोक,

२०. चंपा,

२१. वकुल (मौलश्री),

२२. बांस,

२३. देवदारु,

२४. साल।

भावार्थ-जिनवृक्षों के नीचे तीर्थंकरप्रभु ने दीक्षा ली है। उन्हीं वृक्षों के नीचे उनके केवलज्ञान का वर्णन आया है। जिनके नीचे दीक्षा ली या केवलज्ञान प्राप्त किया वे ही वृक्ष पूज्य हुए हैं, न कि उन नाम वाले अन्यवृक्ष। जैसे कि जिस पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया है, वे ही पर्वत पूज्य हैं न कि अन्य पर्वत। जिस जल से भगवान का अभिषेक होता है, वही जल पूज्य गंधोदक कहलाता है न कि अन्य सभी जल। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए।

श्री ऋषभदेव आदि चौबीस तीर्थंकरों ने जहाँ प्रयाग, अयोध्या आदि नगरियों के सिद्धार्थ आदि वनों में-उद्यानों में वटवृक्ष आदि के नीचे दैगम्बरी दीक्षा ग्रहण की है, वे स्थल-वन, वृक्ष आदि भी देवों द्वारा वंदित हुए हैं। उन चौबीस तीर्थंकर भगवन्तों को नमस्कार करके इस समय आज मैं अपनी आर्यिका दीक्षा की भूमि ‘‘माधोराजपुरा’’ नाम के ग्राम में बैठकर तीर्थंकरों की दीक्षाकल्याणक भूमियों का स्मरण कर-करके, उनकी वंदना करके एवं भक्तिभाव से उन्हें मन में धारण कर आज नूतन तीर्थ रचना के शिलान्यास दिवस तीर्थंकरों के दीक्षावन और दीक्षावृक्षों की मैं भावीकाल में तद्भव मोक्षगामी-उसी भव में मोक्ष प्राप्त कराने वाली ऐसी महाव्रत दीक्षा की प्राप्ति के लिए भक्तिपूर्वक स्तुति करती हूँ।

इस बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज को नमस्कार करके उनके प्रथम पट्टाधीश दीक्षागुरुदेव श्री वीरसागर आचार्य को मेरा कोटि-कोटि नमोस्तु होवे। इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदंत-भूतबली प्रणीत षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में छठे ग्रंथ में श्री वीरसेनाचार्य विरचित धवलाटीका प्रमुख अनेक ग्रंथों के आधार से रचित, बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य श्री चारित्रचक्रवर्ती शांतिसागर जी महाराज, उनके प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागराचार्य, उनकी शिष्या जम्बूद्वीप रचना की प्रेरिका, मुझ गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में नवमी चूलिका नाम का यह दूसरा महाधिकार पूर्ण हुआ।