ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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5.स्वप्न संकेत

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स्वप्न संकेत

समाहित विषयवस्तु १. स्वप्न संसार-विभिन्न मत।

२. मैनादेवी ने स्वप्न देखे।

३. स्वप्नों का फल-साध्वी जीवन सुन-पिता चिंतित, मैना प्रसन्न।

४. एक दिन मैना ने माता से कहा-मैं विवाह नहीं करूँगी।

५. माता का समझाना।

६. मैना द्वारा दृढ़ संकल्प दुहराना।

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काव्य पद


स्वप्न शास्त्र हमको बतलाता, आगे होने वाला जो।
पहले ही संकेतित होता, जब निद्रा में जाते सो।।
शुभ या अशुभ कौन-सा सपना, इस पर भी हम करें विचार।
तीर्थंकर माता ने देखे, सोलह सपनों का संसार।।१२९।।

हाथी-घोड़ा-सिंह देखना, बतलाता होना यशवान।
श्वेत सर्प से धन मिलता है, गजारोह ऐश्वर्य महान्।।
स्वर्ण-रजत-पात्र में पायस, खाना देता धन भरपूूर।
शिर-दाढ़ी के केश कटाना, कर्म भार करता है दूर।।१३०।।

दाँत-हाथ-कान का कटना, कहता मृत्यु या कि धननाश।
शुष्क वृक्ष दर्शन बतलाता, महादु:ख सम्पूर्ण विनाश।।
कांटों पर सोना यदि देखा, तुम्हें लगेगा झूठा दोष।
शुभ दर्शन कर फूल न जाना, नहीं अशुभ-लख खोना होश।।१३१।।

प्रथम प्रहर में स्वप्न जो देखा, एक वर्ष में देगा फल।
द्वितिय प्रहर का अष्ट माह में, तृतीय प्रहर त्रैमास सकल।।
चतुर्थ प्रहर स्वप्न जो देखा, इसमें लग जाते दश दिन।
सूर्योदय से पूर्व स्वप्न का, फल मिल जाता उस ही क्षण।।१३२।।

यह तो कथन हुआ शास्त्रों का, अब सुन लो अनुभव की बात।
जो विचार गहरे मन बैठा, वह ही दिख जाता है रात।।
अत: रखें मन अपना निर्मल, प्रेम-दया-उपकार करें।
प्रभु सुमरन कर शैया-त्यागें, प्रभु सुमरन कर ग्रहण करें।।१३३।।

दिन जाता है, संध्या आती, संध्या जाती, आती रात।
रात बीत जाती स्वप्नों में, आ जाता है पुन: प्रभात।।
इस प्रकार मानव जीवन का, ओस बिन्दु ज्यों होता अंत।
किन्तु एक क्षण व्यर्थ न खोते, सम्यक्दृष्टी श्रावक-संत।।१३४।।

एक निशा ‘मैनादेवी’ ने, प्रभु सुमरन कर किया शयन।
रजनी बीती सुख-निद्रा में, शेष रही बस अल्प रयन।।
अंत प्रहर ‘मैना’ ने देखे, उत्तम-अद्भुत सपने चार।
प्रातकाल परिवारजनों संग, इन सपनों पर हुआ विचार।।१३५।।

‘‘श्वेत वस्त्र मैं, पूजन थाली, ले मंदिर कर रही गमन।
साथ-साथ चल रहा है मेरे, पूर्ण चंदमा नील गगन।।
मेरे ऊपर, निकट ही मेरे, खूब चाँदनी छिटक रही।
और कहीं अन्यत्र न जाती, ऊपर-ऊपर मटक रही’’।।१३६।।

सपने लख आह्लादित ‘मैना’, प्रातकाल प्रभु किया नमन।
स्नापित हो गई जिनालय, सोत्साह की प्रभु पूजन।।
फिर भाई कैलाश से कहे, जो देखे थे सपने चार।
‘‘साध्वी महा बनेंगी जीजी, दश दिश होगा यश: प्रसार’’।।१३७।।

पूज्य पिताश्री-छोटेलाल जी, चिन्तित स्वर में बोले यों।
घर पिंजड़े को छोड़ के मैना, उड़ जायेगी जल्दी क्यों।।’’
माता-पिता, भाई-भगिनी का, फल विचार चित हुआ उदास।
पर मैना के रोम-रोम से, फूट पड़ा अनुपम उल्लास।।१३८।।

सबकी बात सुनी मैना ने, खुद भी गलत विचार किया।
सपनों भेजा खुला निमंत्रण, मैना ने स्वीकार किया।।
‘‘मानव तन, उत्तम कुल पाया, जिनवाणी की मिली शरण।
मैं तो सफल करूँगी जीवन, करके उत्तम व्रताचरण’’।।१३९।।

विनय भाव से मैना देवी, माता से बोलीं उस रोज।
‘‘विवाह पंक में नहीं फसूंगी, करें पिता ना वर की खोज।।
कर्म विनाशी जिनवर दीक्षा, पंच महाव्रत धारण कर।
आतम का कल्याण करूँगी, गुरुवर के चरणों जाकर’’।।१४०।।

मैना जी का निर्णय सुनकर, माता का दिल टूट गया।
लगा कि जैसे माँ-बेटी के, प्रेम का दामन छूट गया।।
बोलीं ‘‘बेटी सहज न इतना, दीक्षा का धारण करना।
शूलों से भी कठिन कार्य है, पंच महाव्रत आचरना।।१४१।।

नारी जीवन अबला का है, रक्षा बोलो कैसे हो।
अत: रहो घर के ही भीतर, पूर्व परम्परा जैसे हो।।
शादी करके, मेरे जैसी, घर में पूजा-पाठ करो।
दान और स्वाध्याय के द्वारा, अपना जीवन सफल करो।।१४२।।

लेकिन जिसने ठान लिया हो, करना अपना पूर्ण विकास।
वह अबला, प्रबला कर देती, बाधाओं का सत्यानाश।।
और एक दिन पौरुष पाकर, जय कर लेती कर्म किला।
आतम से परमातम बनकर, शोभित होती सिद्धशिला।।१४३।।