ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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57. श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थ

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श्री पिसनहारी मढ़िया तीर्थ

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पीसनहारी पीस—पीस कर बना गई एक मढ़िया।
इस मढ़िया में नंदीश्वर की रचना इतनी बढ़िया।।

जबलपुर में नागपुर—जबलपुर मार्ग पर ‘श्री पिसनहारी मढ़िया जी’ अतिशय क्षेत्र आज जैन जगत् की आस्था, श्रद्धा व आराधना की कर्म निर्जराकारी पुण्य भूमि के रूप में समूचे देश में श्रद्धास्पद है। गढ़ा के समीप निवास करने वाली वृद्धा माँ जिसने चक्की पीस—पीसकर पिसाई की बचत राशि के धन से इसे बनवाया था। इसलिए इसके शिखर पर वृद्धा की चक्की के पाट लगाये गए हैं। कहते हैं—विश्व के किसी भी मंदिर के शिखर में श्रम का ऐसा शौर्य और सम्मान नहीं पाया जाता है। इसकी रचना भूभाग से लगभग ३०० फीट ऊँचाई पर श्यामल चट्टानी पर्वत शृंखलाओं के मध्य ६५० वर्ष पूर्व गौड़ राज्य काल में हुई थी। राजा पेशवा भी इस क्षेत्र के दर्शन करने आते थे। कालान्तर में क्षुल्ल्क श्री १०५ गणेशप्रसादजी वर्णी महाराज ने और इन तीन दशकों से जैन जगत् के श्रद्धा के मेरुदण्ड परम तपस्वी आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने पर्वतीय चट्टानों को अपनी शिक्षा—स्वाध्याय—संयम—साधना से इस क्षेत्र को देश के भव्य तीर्थराजों की संज्ञा में सुविख्यात कर दिया है।