ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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7. हिन्दी टीकाकर्त्री की प्रशस्ति

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हिन्दी टीकाकर्त्री की प्रशस्ति

-गणिनी ज्ञानमती
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-शंभु छंद-

श्री शांतिनाथ श्री कुंथुनाथ, श्री अरहनाथ को नित वंदूँ।
तीर्थंकर जन्मभूमि प्रणमूँ, निज गुणमणि से निज को मंडूँ।।
श्री ऋषभदेव आहारदान से, जो युगादि में तीर्थ भला।
मुनि सात शतक की रक्षा से, रक्षाबंधन का पर्व चला।।१।।

षट्खण्डागम के सूत्रों की, सिद्धान्तसुचिन्तामणि टीका।
प्रारंभ किया औ पूर्ण किया, इस तीरथ पर संस्कृत टीका।।
छह सहस आठ सौ इकतालिस, सूत्रों में सोलह ग्रंथ बने।
साढ़े ग्यारह वर्षों में ही यात्रा के मध्य लिखे मैंने।।२।।

पुनरपि आठवीं पुस्तक का मैंने हिन्दी अनुवाद किया।
तदनंतर छठे ग्रंथ का भी हिन्दी भाषा अनुवाद किया।।
इस मध्य राष्ट्रपति का आना, इस तीरथ का इतिहास बना।
त्रय प्रतिमा पंचकल्याणक शुभ, अतिशायी तीन लोक रचना।।३।।

बीसवीं शताब्दी के श्री प्रथमा-चार्य शांतिसागर स्वामी।
चारित्रचक्रवर्ती गुरुवर, जो जगत् पूज्य जग में नामी।
इनके ही शिष्य पायसागर, आचार्य उन्हीं के शिष्य एक।
श्री जयकीर्ति आचार्य हुए, इनको वंदूँ मैं माथ टेक।।४।।

इनके हुए शिष्य देशभूषण, भारत गौरव आचार्य प्रवर।
इनसे दीक्षा क्षुल्लिका लिया, अतिशय संयम को धारण कर।।
अतिशय तीरथ चांदनपुर में, शुभ चैत्र कृष्ण एकम् तिथि में।
सन् त्रेपन में दीक्षा ली है, साढ़े अठरह वर्षायू में।।५।।

सन् उन्निस सौ पचपन में मैं, कुंथलगिरि तीरथ पर जाकर।
आचार्य शांतिसागर गुरु का, देखा सु समाधिमरण सुंदर।।
आचार्यशिरोमणि से मैंने, आर्यिका की दीक्षा मांगी थी।
उनकी आज्ञा से वीरसिंधु आचार्य के संघ में आई थी।।६।।

वैशाख कृष्ण दुतिया तिथि थी, ईसवी सन् उन्निस सौ छप्पन।
है माधोराजपुरा नगरी, जयपुर के पास वहीं शुभतम।।
गुरुवर ने मुझे आर्यिका दीक्षा देकर ‘‘ज्ञानमती’’ कर दी।
तुम अपने नाम का ध्यान रखो, बस इतनी ही तब शिक्षा दी।।७।।

कुछ पूर्व जन्म के संस्कार, माँ सरस्वती का ही प्रसाद।
गुरुवर का वरदहस्त समझो, जो मैंने बहुविध रचे शास्त्र।।
श्री मूलसंघ में कुन्दकुन्द, आम्नाय सरस्वती गच्छ मान्य।
गण बलात्कार है ख्यात उसी में, गुरू शांतिसागराचार्य।।८।।

उनके हुए पट्टाचार्य प्रथम, श्री वीरसागराचार्य वर्य।
उनकी शिष्या मैं ज्ञानमती ‘गणिनी’ हूँ जीवन किया धन्य।।
वैशाख शुक्ल अक्षय तृतिया, भाषानुवाद को पूर्ण किया।
वीराब्द पच्चीस शतक छत्तिस, सन् दो हजार दश धन्य हुआ।।९।।

सिद्धान्त सुचिंतामणि संस्कृत, टीका जग में जयशील रहे।
यह हिन्दी भाषा की टीका, चिरकाल भव्य सुखदायि रहे।।
जगवंद्य रहे हस्तिनापुरी, यह जम्बूद्वीप स्थायि रहे।
शुभ तेरहद्वीप स्थायि रहें, सब जिनमंदिर सुखदायि रहें।।१०।।

-दोहा-
द्वादशांग वाणी नमूँ, षट्खण्डागम वंद्य।
ज्ञानमती कैवल्य कर, पाऊँ परमानंद।।११।।

-अन्त्य वंदना-
तीर्थकृच्चक्रभृत्काम-देवत्रिपदधारिण:।
शांतिकुन्थ्वरतीर्थेशा, भवद्भ्योऽनन्तशो नम:।।१२।।

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हिन्दी अनुवाद के कार्यकाल में सम्पन्न हुए कार्यकलापों का संक्षिप्त विवरण

भगवान शांतिनाथ की विशाल प्रतिमा निर्माण कराकर जम्बूद्वीप स्थल पर प्रभु की जन्मभूमि में विराजमान कराने का पुरुषार्थ कई एक वर्षों से चल रहा था। सन् १९९६ में मांगीतुंगी चातुर्मास के मध्य कर्नाटक प्रांत में जाकर पाषाण खंड देखने का निर्णय भी हुआ किन्तु कार्यव्यस्ततावश टल गया। अनंतर ब्र.रवीन्द्र कुमार ने जयपुर के दो शिल्पकारों को आर्डर भी दिया किन्तु बड़ा पाषाण नहीं मिल पाया।

इस मध्य प्रयाग में ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली तीर्थ’’, कुण्डलपुर में ‘‘नंद्यावर्त महल तीर्थ’’, हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर ‘‘तेरहद्वीप रचना’’ इनके विशालस्तरीय पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव सम्पन्न हुए। दिल्ली में वृहत् ‘‘चौबीस कल्पद्रुम महामण्डल विधान’’, ‘‘छब्बीस विश्वशांति महावीर विधान’’, ‘‘श्री ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महामहोत्सव’’ आदि अनेक धर्मप्रभावना के कार्यक्रम सम्पन्न हुए। ‘‘श्री ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार’’, ‘‘श्री महावीर ज्योति रथ’’ के भारत भ्रमण भी सम्पन्न हुए।

जनवरी सन् २००५ में ‘श्री पार्श्वनाथ जन्मकल्याणक तृतीय सहस्राब्दि महोत्सव’ का वाराणसी से उद्घाटन व अहिच्छत्र तीर्थ पर ‘भगवान पार्श्वनाथ का महामस्तकाभिषेक’ आदि विशाल कार्यक्रम सम्पन्न हुए। इसके मध्य अप्रैल २००६ में अति विशाल स्तर पर मेरा दीक्षा स्वर्ण जयंती महोत्सव जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में पूरे देश की जैन समाज एवं समस्त दिगम्बर जैन संस्थाओं द्वारा मनाया गया।

अनंतर महान् पुण्य संयोग से यह मंगल दिवस भी आ गया जब ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन अथक पुरुषार्थ से बैंगलोर-कर्नाटक के निकट की खान से वृहत् पाषाण खंड को लाने में सफल हो गये।

वैशाख शुक्ला पूर्णिमा वीर निर्वाण संवत् २५३४, दिनाँक १९ मई २००८ के पावन दिन ‘तेरहद्वीप रचना’ का प्रथम प्रतिष्ठापना दिवस प्रात: तेरहद्वीप के भगवन्तों का महाअभिषेक एवं रथयात्रा के अनंतर इस विशाल पाषाण खंड पर शांतिनाथ प्रतिमा विराजमान कर अभिषेक, पूजन आदि विधि सम्पन्न होकर शिलापूजन विधिपूर्वक श्री शांतिनाथ प्रतिमा उत्कीर्ण हेतु ‘टंकनविधि’ कराई गई एवं तभी से मूर्ति उत्कीर्ण का कार्य प्रारंभ हो गया।

इन समस्त कार्यक्रमों में मेरे साथ-साथ संघस्थ चारित्रश्रमणी आर्यिका अभयमती जी, प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका चन्दनामती जी, आर्यिका संतोषमती जी, पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर जी एवं क्षुल्लिका शांतिमती का सान्निध्य रहा।

मैंने आश्विन शुक्ला द्वितीया, वीर निर्वाण संवत् २५३४, दिनाँक १-१०-२००८ को षट्खण्डागम की छठी पुस्तक की संस्कृत टीका सिद्धान्तचिंतामणि का हिन्दी अनुवाद प्रारंभ किया। इससे पूर्व मेरी शिष्या आर्यिका चन्दनामती द्वारा हिन्दी में अनुवादित षट्खण्डागम सिद्धान्तचिंतामणि टीका के पाँच ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।

हस्तिनापुर तीर्थ पर ‘वर्षायोग’ में शरद्पूर्णिमा महोत्सव में मेरा ७५वाँ जन्मदिन होने से आर्यिका चन्दनामती, क्षुल्लक मोतीसागर आदि ने ‘हीरक जयंती महोत्सव’ मनाने की रूपरेखा बनायी। मैंने अनेक बार मना भी किया किन्तु इन सभी की तथा विद्वानों की प्रबल भावनाएँ रहीं। अत: तीन दिन का कार्यक्रम आयोजित हुआ।

आश्विन शु. १३, वीर नि. सं. २५३४, दिनाँक १२-१०-२००८ को दिल्ली प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर में पधारीं। उनके करकमलों से अनेक कार्यक्रम सम्पन्न हुए। सर्वप्रथम उन्होंने ‘प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर प्रवचन हॉल’ का शिलान्यास किया। पुन: मंच पर मेरे द्वारा हिन्दी अनुवाद सहित ऐसे जैनदर्शन के सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ ‘अष्टस्रहस्री’ (सन् १९६९-७० में अनुवादित) भाग-१, २, ३ (पुनप्र्रकाशित संस्करणों) का विमोचन किया। अनंतर-मुख्यमंत्री ने श्री जे.के. जैन (पूर्व सांसद, दिल्ली) को ‘गणिनी ज्ञानमती पुरस्कार’ प्रदान किया एवं जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की भी घोषणा की।

संस्थान के कार्यकर्ताओं द्वारा मुख्यमंत्री जी का भी प्रशस्ति आदि भेंटकर सम्मान किया गया। इसी दिन प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर अवदान सम्मेलन भी सम्पन्न हुआ है।

आश्विन शु. १४, दिनाँक १३-१०-२००८ को ‘तीर्थंकर जन्मभूमि विकास सम्मेलन’ एवं ‘आर्यिका रत्नमती पुरस्कार’ समर्पण आदि अनेक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

आश्विन शु. १५, शरदपूर्णिमा, दिनाँक १४-१०-२००८ को ‘हीरक जयंती एक्सप्रेस’ का उद्घाटन बिहार प्रान्त के विधान सभा के अध्यक्ष ‘श्री उदयनारायण चौधरी’ के करकमलों से सम्पन्न हुआ।

इस एक्सप्रेस में तीर्थंकरों की जन्मभूमि की यात्रा दिखाई गई है एवं एक धार्मिक पिक्चर हॉल भी है।

अनंतर ‘गणिनी ज्ञानमती शोधपीठ’ जिसकी ६-१०-१९९८ में स्थापना हुई थी। उस ‘शोधपीठ’ को मेरठ स्थित ‘शोभित युनिवर्सिटी’ के साथ सम्बद्धता प्रदान करते हुए युनिवर्सिटी के प्रो. चांसलर माननीय श्री वुंâवर शेखर विजेन्द्र जी, वाइस चांसलर माननीय श्री अरुण स्वरूप जी एवं नाइस मैनेजमेंट कॉलेज के डायरेक्टर प्रो. एस.सी. अग्रवाल ने सभा में वक्तव्य दिये।

माननीय विधानसभा अध्यक्ष श्री उदयनारायण चौधरी एवं संस्थान के पदाधिकारियों ने श्री सुरेश जैन-कुलाधिपति तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद को ‘गणिनी ज्ञानमती हीरक जयंती पुरस्कार’ समर्पित किया।

इस महोत्सव में श्री वी. धनंजय कुमार जैन (पूर्व वित्तराज्यमंत्री), बिहार प्रान्त विधान सभा के मुख्य सचेतक श्री श्रवण कुमार जी, डॉ. आर.के. मित्तल (कुलपति-तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद), श्री आर.के. जैन-मुम्बई (अध्यक्ष-तीर्थक्षेत्र कमेटी), श्री निर्मल कुमार सेठी (अध्यक्ष-दिगम्बर जैन महासभा), श्री विजय जैन लुहाड़िया-अहमदाबाद (अध्यक्ष-श्री दिगम्बर जैन महासमिति), गणिनी ज्ञानमती भक्तमण्डल महाराष्ट्र, श्री अजित अजमेरा-धूलियान आदि अनेक प्रतिष्ठित जैन समाज के धुर्य एवं अनेक सरस्वती पुत्र प्राचार्य श्री नरेन्द्र प्रकाश जैन, डॉ. अनुपम जैन आदि आये। सभी ने विनयांजलि अर्पित की। श्री आर.के. जैन ने तो बहुत बड़ी प्रशस्ति भेंटकर अपनी विनयांजलि अर्पित की।

दिनाँक १२, १३ और १४ अक्टूबर को आस्था चैनल के माध्यम से कार्यक्रम का सीधा प्रसारण हुआ है। जिसे भारतवर्ष में एवं विदेश में भी करोड़ों नर-नारियों ने देखा है एवं तीर्थों के प्रति तथा मेरे प्रति भी विनयांजलि अर्पित करके पुण्य संपादन करते हुए चारित्र के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की है।

षट्खण्डागम पुस्तक ४ (सिद्धान्तचिंतामणिटीका के हिन्दी अनुवाद सहित) आदि अनेक ग्रंथों के विमोचन भी सम्पन्न हुए।

शरदर्पूिणमा के दिन मुझे प्राय: आर्यिका रत्नमती माताजी (गृहस्थाश्रम की मेरी माँ मोहिनी) का स्मरण अवश्य हो जाता है।

जिन्होंने सन् १९३४ में शरदपूर्णिमा को मुझे जन्म दिया। दुग्धपान के साथ-साथ धर्मरूपी अमृत पिलाया। ९-१० वर्ष की उम्र से ही ‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’ ग्रंथ, दर्शन कथा, शीलकथा आदि पढ़ने की प्रेरणा दी।

जब बालिकाओं की उम्र सखियों के साथ गुड़िया-गुड्डा खेलने की थी, उस उम्र में मैं सीता जी, राजुल जी आदि के बारहमासे ‘‘कहां गये चक्री जिन जीता’’ आदि अनेक बारह भावनाएँ तथा वैराग्य पद अनेक सवैये आदि ऐसे सैकड़ों पाठ वंâठाग्र कर सरस्वती माता की गोद में खेलती थी तथा मेरी जननी को भी यही अच्छा लगता था।

जब सन् १९५२ में बाराबंकी में आश्विन शु. १४ को मैंने आचार्यश्री देशभूषण जी महाराज की केशलोंच सभा में अपने केशलोंच प्रारंभ कर दिये। उस समय जैन समाज द्वारा रोके जाने पर तथा अत्यधिक विरोध के अवसर पर आचार्य महाराज ने भी कह दिया कि जब तक इसके माँ या पिता मुझे स्वीकृति नहीं दे देंगे, मैं दीक्षा नहीं दे सकता।

उस दिन अर्धरात्रि तक तो मैं मंदिर जी में भगवान के पास सत्याग्रह लेकर बैठी रही, पुन: माँ की प्रेरणा से उन्हीं के साथ पिता की बुआ के घर गई। शेष रात्रि भर माँ-बेटी का संवाद चलता रहा। अंत में माँ मोहिनी ने एक कागज पर पेंसिल से अश्रुधारा के साथ ही यह लिखा कि ‘‘हे महाराज जी! आप मेरी पुत्री को दीक्षा दे दीजिए। मुझे विश्वास हैं कि ये दृढ़ रहेगी, मेरी पूर्ण सहमति व आज्ञा है’’। और माँ ने प्रात: महाराज जी के करकमलों में यह पत्र दे दिया।

पत्र लिखते समय माँ ने मुझसे एक वचन लिया था वह यह कि ‘‘बेटी! मैं आज तुम्हें संसारसमुद्र से पार होने के लिए आज्ञा दे रही हूँ, एक दिन तुम भी मुझे संसारसमुद्र से निकाल लेना।’’

पत्र पाकर आचार्यश्री ने प्रसन्नता व्यक्त की। उसी समय मैंने माँ और मामा आदि के सामने ही आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत, सप्तम प्रतिमा एवं गृहत्याग व्रत ले लिया। तभी माँ बोली-आज इसका शरदपूर्णिमा का जन्मदिन है। सुनते ही मैंने अपने जन्म को पूर्ण सार्थक माना। अत: यह शरदपूर्णिमा मेरे लिए जन्म दिवस से भी अधिक महत्वपूर्ण है-त्याग दिवस-संयम दिवस है।

अनंतर छह मास बाद ही चैत्र कृष्णा प्रतिपदा को सन् १९५३ में मैंने महावीर जी में क्षुल्लिका दीक्षा प्राप्त की।

क्रमश: सन् १९५५ में चारित्रचक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के दर्शन कर उनकी सल्लेखना देखकर ‘पूर्व में उनकी आज्ञा प्राप्त की थीं उसी के अनुसार राजस्थान-जयपुर में आकर वैशाख कृ. द्वितीया को (सन् १९५६) में प्रथम आचार्य श्री के प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागर जी के करकमलों से आर्यिका दीक्षा प्राप्त की।

अनंतर सन् १९६१ में माँ मोहिनी जी आचार्यश्री शिवसागर जी के दर्शन करने लाडनूँ आई थीं। वहीं मेरे पास उनकी पुत्री कु. मनोवती रुक गई। इनके लिए उनका उपकार ही विशेष है। आज ये कु. मनोवती आर्यिका अभयमती के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्होंने सन् १९६४ में मुझसे क्षुल्लिका दीक्षा एवं सन् १९६९ में आचार्यश्री धर्मसागर जी से आर्यिका दीक्षा प्राप्त की है।

इसी प्रकार सन् १९६८ में ये एवं पिता छोटेलाल जी सुपुत्र रवीन्द्र के साथ में लेकर प्रतापगढ़ (राज.) में आये थे। पिता छोटेलाल से छिपाकर माँ की अनुमति लेकर मैंने रवीन्द्र कुमार को दो वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत दिला दिया। पुन: सन् १९७२ में मेरी प्रेरणा से आचार्य श्री धर्मसागर महाराज के करकमलों से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। उसके बाद मुझसे सप्तम प्रतिमा एवं गृहत्याग व्रत ग्रहण किया है। आज कर्मयोगी ब्र.रवीन्द्र कुमार अनेक जैन संस्थाओं के अध्यक्ष-कर्मठ कार्यकर्ता प्रसिद्ध हैं।

सन् १९६९ में माँ मोहिनी ने ‘श्री छोटेलाल जी’ की अंत समय पत्र से मेरी प्रेरणा प्राप्तकर अच्छी तरह धर्म संबोधन करते हुए २५ दिसम्बर को समाधिमरण कराया है। किसी भी पुत्र-पुत्रियों को उनके अंंतिम समय में रोने नहीं दिया है। यह भी उनका एक आदर्श ही रहा है।

सन् १९७१ में जब वे आहार देने अपने पुत्र-पुत्री, बहुओं के साथ अजमेर चातुर्मास में आर्इं थीं। तब मैंने इन्हें दीक्षा के लिए प्रेरित किया। तब वे बोली-अभी कु. माधुरी व त्रिशला की शादी हो जावे, तब मैं अपने कर्तव्यों से निश्चिन्त होऊँगी। मैंने कहा देखो! मैंने कु. माधुरी को भाद्रपद शु. १० के दिन अभी आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया है। (कु. माधुरी सन् १९६९ अक्टूबर में मेरे पास प्रथम बार दर्शन करने आई थी तभी ११ वर्ष की उम्र में मेरी प्रेरणा से ५ वर्ष का ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था। तभी से धार्मिक अध्ययन करती हुई मेरे पास रह रही हैंं और क्रम-क्रम से दो प्रतिमा, सात प्रतिमा एवं गृहत्याग व्रत लेकर सन् १९८९ में श्रावण श्ुा. ११, दिनाँक १३ अगस्त को मुझसे आर्यिका दीक्षा लेकर चन्दनामती के रूप में रत्नत्रय आराधना में तत्पर हैं।) वे आश्चर्यचकित होकर बोलीं-ये तेरहवर्ष की बालिका ब्रह्मचर्य व्रत क्या समझेगी?

मैंने कहा कि ‘‘शादी नहीं करना’’ बस इतना समझती है। इत्यादि सुनकर तथा कुछ चिंतन कर उन्होंने आर्यिका दीक्षा हेतु आचार्यश्री धर्मसागर जी के समक्ष श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की। चर्चा फैलते ही उनके पुत्र-पुत्रवधुएं, पुत्रियाँ एवं दामाद आदि सब आ गये। विरोध का स्वर बहुत ही बढ़ गया।

तब आचार्यश्री बोले-

मोहिनी जी! आप कैसे दीक्षा लेंगी। ये सब कहते हैं कि हम इन्हें उठाकर ले जायेंगे। तब वे बोलीं-

गुरुदेव! ये मुझसे हैं या मैं इनसे? मैं पूर्ण दृढ़ हूँ.....। उनके ये शब्द आचार्यश्री धर्मसागर जी कई बार कहकर मुस्कराते रहते थे। उनकी वहाँ अजमेर में मगसिर कृष्णा तृतीया को (सन् १९७१) में आर्यिका दीक्षा हुई एवं उनको ‘आर्यिका रत्नमती’ ‘रत्नों की खान’ यह सार्थक नाम प्राप्त हुआ।

अपने पिता सुखपालदास से प्राप्त संस्कार एवं ‘पद्मनंदिपंचविंशतिका’ ग्रंथ का स्वाध्याय उनके जीवन में तो सार्थक हुआ ही है। वह मेरे लिए तो वरदान बना है।

आज शरदपूर्णिमा के दिन ‘हीरक जयंती महोत्सव’ के समय उन जन्मदात्री-जननी के असीम उपकार का स्मरण हो आता है। मैं तो अपने सभी भक्त-श्रावक-श्राविकाओं को यही प्रेरणा देती हूँ कि आप सभी पिता सुखपालदास१ के समान कन्याओं को दहेज में ऐसे-ऐसे ग्रंथ देवें और श्राविकाएँ माता मोहिनी के उदाहरण को अपनाएँ। अपने पुत्र-पुत्रियों को धर्ममार्ग में प्रेरित करें, मोक्षमार्ग में बढ़ने से न रोके, सहयोगिनी बनें पुन: अंत में आर्यिका व्रत ग्रहण कर मानव पर्याय को सार्थक करें।

यह ‘हीरक जयंती महोत्सव’ मेरा नहीं प्रत्युत् ज्ञानस्वरूप-सरस्वती का है और त्यागस्वरूप चारित्र का ही है।

हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर वर्षायोग पूर्ण करके कार्तिक शुक्ला द्वितीया (३० अक्टूबर २००८) को सरधना (मेरठ) उ.प्र. के लिए मैंने संघस्थ आर्यिका चन्दनामती को साथ लेकर मंगल विहार किया। वहाँ सरधना में लश्करगंज स्थित ‘श्री दिगम्बर जैन वीर मंदिर’ के ५० वर्षों की पूर्णता पर स्वर्ण जयंती महोत्सव के मंगल अवसर पर आष्टान्हिक पर्व में कार्तिक शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत (दिनाँक ६ नवम्बर से १३ नवम्बर तक) विश्वशांति महावीर मण्डल विधान का भव्य आयोजन सम्पन्न हुआ। इसी मध्य १२ नवम्बर को जिनमंदिर की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में मंदिर के मूलनायक भगवान का मस्तकाभिषेक हुआ एवं विशेष मंगल आरती आदि की गई। पुन: मार्गशीर्ष कृष्णा प्रतिपदा (१४ नवम्बर) को रथयात्रा सम्पन्न हुई एवं उसी दिन मैंने वहाँ से हस्तिनापुर की ओर विहार कर दिया और जम्बूद्वीप स्थल पर मगसिर कृष्णा सप्तमी (१९ नवम्बर) को पहुँच गई।

इधर जम्बूद्वीप स्थल पर राष्ट्रपति को लाने का प्रयास चल रहा था, सो १८ नवम्बर को ही मार्ग में उनके आने की पौष कृ. १०, दिनाँक २१ दिसम्बर २००८ की तिथि निश्चित हो गई। उत्साहपूर्ण वातावरण में विशाल पांडाल बनाया गया।

भारत देश के गणतंत्र शासन की प्रथम महिला राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटील का उत्तरप्रदेश में हस्तिनापुर तीर्थ पर प्रथम आगमन हुआ है। उस समय का दृश्य अद्भुत था, जब कि जम्बूद्वीप स्थल पर चार हेलीकाप्टर उतरे हैं। श्रीमती प्रतिभा पाटील राष्ट्रपति के साथ उनके पति ‘श्री देवीसिंह शेखावत’ भी पधारे थे। इस कार्य में विशेष प्रयासरत श्री जे.के. जैन, पूर्व सांसद की अध्यक्षता में सभी कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

राष्ट्रपति जी ने सर्वप्रथम मंच पर आकर भगवान पाश्र्वनाथ के २८८५वें जन्मकल्याणक महोत्सव के उपलक्ष्य में भगवान पाश्र्वनाथ के सुंदर धातु निर्मित सर्वार्थसिद्धि महल में पालने में विराजमान श्री पाश्र्वप्रभु के सामने रत्नवृष्टि की, पुन: पालना झुलाया। अनंतर सभा के मध्य ‘विश्वशांति अहिंसा सम्मेलन’ का दीप प्रज्ज्वलन कर उद्घाटन किया। राष्ट्रपति जी ने अपने भाषण में ‘‘अहिंसा और विश्वशांति एक-दूसरे के पूरक हैं’ ऐसा कहा। मैंने अपने प्रवचन में इस वर्ष को ‘‘शांति वर्ष’’ के नाम से घोषित किया। पुन: राष्ट्रपति जी ने मेरे साथ तेरहद्वीप रचना के दर्शन किए। यह पवित्र दिवस जम्बूद्वीप स्थल का स्वर्णिम इतिहास बना। अगले दिन पौष कृष्णा एकादशी(२२ दिसम्बर) को प्रभु पाश्र्वनाथ का सुमेरु पर्वत की पांडुकशिला पर जन्माभिषेक, रथयात्रा आदि धार्मिक कार्यक्रम सम्पन्न हुए।

इसी दिन से लेकर पूरे वर्ष भर भारत की जैन समाज के द्वारा सभी नगर-नगर में, शहर-शहर में विश्वशांति हेतु करोड़ों जाप्यानुष्ठान हुए हैं एवं हजारों-हजारों शांति विधान आदि अनेक विधान अनुष्ठान सम्पन्न हुए हैं। जम्बूद्वीप स्थल पर सोलह बार सोलह-सोलह दिन के शांति विधान सम्पन्न हुए हैं। साथ ही प्रतिदिन विश्वशांति मंत्र, विश्वशांति चालीसा एवं अनेकों विधान, अनुष्ठान किये गये हैं।

माघ कृष्णा पंचमी (१५ जनवरी २००९) के शुभ दिन श्री कुंथुनाथ की प्रतिमा निर्माण हेतु शिलापूजनपूर्वक टंकनविधि सम्पन्न हुई। पुन: वैशाख कृष्णा दशमी (२० अप्रैल २००९), सोमवार को श्री अरनाथ तीर्थंकर की प्रतिमा निर्माण हेतु शिलापूजनपूर्वक टंकनविधि कराई गई।

इस मध्य तीनों तीर्थंकर भगवन्तों की प्रतिमाओं को कुशल शिल्पियों ने गढ़कर मूर्ति का रूप-भगवान का रूप प्रदान कर दिया और वह शुभ महामंगल घड़ियाँ आ गर्इं कि जब इन तीर्थंकर भगवन्तों को यथास्थान कमलासन पर व्रेन से विराजित-खड़े किया गया।

भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा की स्थापना माघ कृ. षष्ठी को, भगवान कुंथुनाथ की प्रतिमा सप्तमी को एवं भगवान अरहनाथ की प्रतिमा अष्टमी को क्रमश: (५-६-७ जनवरी २०१० को) यथास्थान कमलासन पर विराजमान हो गर्इं। उन क्षणों का दृश्य और आनंद अभूतपूर्व ही रहा है। तीनलोक रचना-अनेक वर्षों की मेरी भावना के अनुसार तीन लोक रचना बनाई गई। यह छप्पन फुट ऊँची, नीचे २८ फुट चौड़ी, मध्य में चार फुट की त्रसनाली, ऊपर बढ़ते हुए २० फुट पुन: ११ फुट है। इसकी मोटाई २८ फुट है। इसमें नीचे निगोद, सात नरक, मध्यलोक में पाँच मेरु, ज्योतिर्लाेक, ऊध्र्वलोक में १६ स्वर्ग, नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश, पाँच अनुत्तर और सबसे ऊपर सिद्धशिला है। अधोलोक में खरभाग, पंकभाग में भवनवासी के १० मंदिर, व्यंतर देवों के ८ भेदों के आठ मंदिर व उनके चैत्यवृक्षों में जिनप्रतिमाएं विराजमान हैं। ऐसे ही स्वर्गों में भी जिनमंदिर में प्रतिमाएं व चैत्यवृक्षों में प्रतिमाएं विराजमान है।

ऐतिहासिक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव-तीन तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ-कुंथुनाथ-अरहनाथ ये सोलहवें-सत्रहवें और अठारहवें तीर्थंकर हैं। क्रम से ये पाँचवें, छठे और सातवें चक्रवर्ती तथा क्रम से बारहवें, तेरहवें और चौदहवें कामदेव पद के धारक हुए हैं ऐसे ये तीनों भगवान तीन-तीन पद के धारक हुए हैं।

इन तीनों भगवन्तों का एवं तीन लोक रचना में विराजमान होने वाली चार सौ अड़तालीस प्रतिमाओं का तथा और भी प्रतिमाओं का प्रतिष्ठा महोत्सव प्रारंभ हुआ। विधिनायक भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा थी।

फाल्गुन कृष्णा त्रयोदशी (दिनाँक ११-२-२०१०) के दिन प्रतिष्ठा का झण्डारोहण किया गया। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदा को गर्भकल्याणक (१४ फरवरी, रविवार), फाल्गुन शु. द्वितीय प्रतिपदा (१५ फरवरी, सोमवार) को जन्मकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हुआ।

फाल्गुन शु. द्वितीया (१६-२-२०१०) को दिग्विजय जुलूस-यह इस प्रतिष्ठा में एक विशेष आकर्षण रहा है। क्योंकि तीनों तीर्थंकर चक्रवर्ती थे अत: तीनों भगवन्तों की षट्खण्ड दिग्विजय यात्रा का दृश्य-इसमें तीर्थंकरों के रथ के आगे-आगे धर्मचक्र चल रहा था। पुन: तीर्थंकरों की राज्यसभा का दृश्य दिखाया गया।

अनंतर भगवान का दीक्षाकल्याणक महोत्सव सम्पन्न हुआ। फाल्गुन शु. तृतीया, बुधवार (दिनाँक १७ फरवरी) को प्रात: भगवान शांतिनाथ का आहार का दृश्य पुन: मध्यान्ह में ज्ञानकल्याणक महोत्सव एवं समवसरण रचना बनाई गई।

आर्यिका दीक्षा-इसी पावन बेला में कई वर्षों से भावना संजोये ऐसी संघस्थ ब्र. कु. आस्था, ब्र. कु. चन्द्रिका एवं ब्र. कमला जी इनको मैंने मध्यान्ह में दीक्षाएं प्रदान कीं। कु. आस्था को आर्यिका सुव्रतमती, कु. चन्द्रिका को आर्यिका सुदृढ़मती एवं ब्र. कमला जी को क्षुल्लिका सम्यक्त्वमती नाम से घोषित किया।

मुनि एवं क्षुल्लक दीक्षा-फाल्गुन शुक्ला चतुर्थी (१८ फरवरी) को भगवान के समवसरण में दिव्यध्वनि सभा दिखाई गई तथा पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में ससंघ उपस्थित मुनि श्री अमितसागर जी महाराज ने अपने संघस्थ क्षुल्लक अघ्र्यसागर को मुनि दीक्षा प्रदान की व ब्र. नमन जैन को क्षुल्लक अनुमानसागर बनाया।

महामस्तकाभिषेक महोत्सव-फाल्गुन शुक्ला पंचमी, शुक्रवार (दिनाँक १९-२-२०१०) को प्रात: मोक्षकल्याणक क्रिया सम्पन्न हुई। पुन: तीनों तीर्थंकर भगवन्तों की ३१-३१ फुट उत्तुंग विशाल प्रतिमाओं का महामस्तकाभिषेक प्रारंभ हुआ। इसी प्रकार फाल्गुन शुक्ला षष्ठी एवं सप्तमी को भी (२०-२१ फरवरी को) महामस्तकाभिषेक महोत्सव किया गया। इन तीनों दिनों के महामस्तकाभिषेक का आस्था चैनल पर सीधा प्रसारण दिखाया गया, जिसे कि भारत के जैन-जैनेतर लोगों ने ही नहीं, प्रत्युत विश्व के लोगों ने देखा है और महान पुण्य संचित किया है। इस प्रकार यह पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हस्तिनापुर में जम्बूद्वीप स्थल पर अभूतपूर्व हुई है।

इस मंगल महोत्सव में मुनि श्री पंचकल्याणकसागर, मुनि श्री विमलेशसागर (स्व. आचार्यश्री भरतसागर जी महाराज के शिष्य) आदि मुनि श्री नि:शंक भूषण, मुनि श्री चिन्मयसागर आदि मुनिगण एवं आर्यिका- क्षुल्लक आदि भी सम्मिलित हुए हैं।

अनुवादपूर्णता-इन पवित्र दिनों में एवं पवित्र तीर्थ हस्तिनापुर में मेरा हिन्दी अनुवाद कार्य चलता रहा है।

वैशाख शुक्ला तृतीया-अक्षय तृतीया को जो कि युग की आदि में भगवान श्री ऋषभदेव के प्रथम आहार दिवस के रूप में प्रसिद्ध है, इस मंगल तिथि के दिन (१६-५-२०१०) वीर निर्वाण संवत् पच्चीस सौ छत्तीस (२५३६) में मैंने यह हिन्दी भाषा अनुवाद पूर्ण किया है।

इस समय में मेरे (गणिनी ज्ञानमती के) संघ में ५ आर्यिकाएँ, १ क्षुल्लक जी, २ क्षुल्लिका माता ऐसे कुल ९ पिच्छीधारी हैं एवं २ ब्रह्मचारी (ब्र. कर्मयोगी रवीन्द्र जी एवं ब्र. राजेश जी), ११ ब्रह्मचारिणी बहनें (ब्र. कु. बीना, कु. सारिका, कु. इन्दु, कु. स्वाति, कु. अलका, कु. प्रीति, कु. मंजू, कु. दीपा, ब्र. बाला, ब्र. कुसुम, ब्र. सरला) हैं।

इस हस्तिनापुर में कमलमंदिर के कल्पवृक्ष स्वरूप भगवान महावीर स्वामी को नमस्कार करके मैं जम्बूद्वीप, तेरहद्वीप, तीनलोक रचना की सभी जिनप्रतिमाओं को कोटि-कोटि वंदन करते हुए विशाल प्रतिमा के रूप में विराजमान श्री शांतिनाथ, श्री कुंथुनाथ, श्री अरहनाथ के चरणकमलों की वंदना करती हूँ एवं यही प्रार्थना करती हूँ कि मेरा अहोरात्र अभीक्ष्णज्ञानोपयोग में लगा रहे। समीचीन ज्ञान के बल से एवं अपनी आर्यिकाचर्या से स्वात्मचिंतन के साथ-साथ प्रतिक्षण जिनेन्द्रदेव का नाम हृदय में विद्यमान रहे।

दोहा- जब तक जग में रवि-शशी, जैनधर्म विज्ञान।

षट्खण्डागम ग्रन्थ यह, तब तक दे सज्ज्ञान।।१।।

।।वर्धतां जिनशासनम्।।