ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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श्री महावीराष्टक स्तोत्र ( हिंदी पद्यानुवाद) ---निशान्त जैन निश्चल

जिनके परम कैवल्य में, चेतन- अचेतन द्रव्य सब, उत्पाद-व्यय अरु ध्रौव्य युत, नित झलकते हैं मुकुर सम, जो जगतदृष्टा दिवाकर सम, मुक्तिमार्ग प्रकट करें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

जिनके कमल सम हैं नयन दो, लालिमा से रहित हैं,

करते प्रकट अंतर-बहिर, क्रोधादि से नहीं सहित हैं, है मूर्ति जिनकी शांतिमय, अति विमल जो मुद्रा धरें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बने।

नमित इन्द्रों के मुकुट, मणियों के प्रभासमूह से, शोभायमान चरण युगल लगते हैं जिनके कमल से, संसार ज्वाला शांत करने हेतु जल सम जो बहें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

मुदित मन से चला जिनकी अर्चना के भाव से, तत्क्षण हुआ संपन्न मेंढक, स्वर्ग सुख भण्डार से, आश्चर्य क्यों यदि भक्तजन नित मोक्षलक्ष्मी वरण करें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

तप्त कंचन प्रभा सम, तन रहित ज्ञान शरीर युत, हैं विविध रुपी, एक भी हैं, अजन्मे सिद्धार्थ सूत, हैं बाह्य अंतर लक्ष्मी युत, तदपि विरागी जो बने, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

जिनकी वचनगंगा विविध नय युत लहर से निर्मला, ज्ञान जल से नित्य नहलाती जनों को सर्वदा, जो हंस सम विद्वतजनों से, निरंतर परिचय करें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

जिसने हराया कामयोद्धा, तीन लोक जयी महा, अल्पायु में भी आत्मबल से वेग को निर्बल किया, जो निराकुलता शांतिमय आनंद राज्य प्रकट करें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

जो वैद्य हैं नित मोहरोगी जनों के उपचार को, मंगलमयी निःस्वार्थ बन्धु, विदित महिमा लोक को, उत्तमगुणी जो शरण आगत साधुओं के भय हरें, वे महावीर प्रभु हमारे, नयनपथगामी बनें।

भागेन्दुकृत जो महावीराष्टक स्तोत्र पढ़ें-सुनें, भक्तिमय वे भक्तिपूर्वक, परमगति निश्चय लहें।।

                                              --निशान्त जैन निश्चल