ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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25pxदीपावली के उपलक्ष में

दीपावली पूजन

१. जन्म, वैराग्य और दीक्षा -

भगवान महावीर सब ओर से भव्यों को सम्बोध कर पावापुरी पहुँचे और वहाँ ‘‘मनोहर उद्यान’’ नाम के वन में विराजमान हो गये। जब चतुर्थकाल में तीन वर्ष साढ़े आठ माह बाकी थे, तब स्वाति नक्षत्र में कार्तिक अमावस्या के दिन प्रातःकाल (उषाकाल) के समय अघातिया कर्मों का नाश कर भगवान कर्म बन्धन से मुक्त होकर मोक्षधाम को प्राप्त हो गये। इन्द्रादि देवों ने आकर उनके शरीर की पूजा की। उस समय देवों ने बहुत भारी देदीप्यमान दीपकों की पंक्ति से पावापुरी को सब तरफ से प्रकाशयुक्त कर दिया। उस समय से लेकर आज तक लोग प्रतिवर्ष दीपमालिका द्वारा भगवान महावीर की पूजा करने लगे।उसी दिन सायंकाल में श्री गौतमस्वामी को केवलज्ञान प्रगट हो गया, तब देवों ने आकर गंधकुटी की रचना करके गौतमस्वामी की एवं केवलज्ञान की पूजा की। इसी उपलक्ष्य में लोग सायंकाल में दीपकों को जलाकर पुनः नयी बही आदि का मुहूर्त करते हुए गणेश और लक्ष्मी की पूजा करने लगे हैं। वास्तव में ‘‘गणानां ईशः गणेशः· गणधरः’’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार बारह गणों के अधिपति गौतम गणधर ही गणेश हैं ये विघ्नों के नाशक हैं और उनके केवलज्ञान विभूति की पूजा ही महालक्ष्मी की पूजा है। ....पूरा पढ़े

25pxजैन साधू एवं साध्वियां

जन्मकाल और बाल्यावस्था
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गौरवशाली प्रकाशपुंज आचार्य कुन्दकुन्द,स्वामी समंतभद्र, विद्यानंदी, जिनसेन इत्यादि आचार्यों की जन्मभूमि तथा उपदेश से पवित्र कर्नाटक प्रदेश में आचार्यश्री १०८ शांतिसागर महाराज का जन्म हुआ। बेलगाँव जिले में भोज ग्राम के भीमगौंडा पाटील की धर्मपत्नी सत्यवती थीं। सन् १८७२ में आषाढ़ कृष्णा षष्ठी के दिन माता सत्यवती ने अपने पीहर येळगुळ में पुत्र को जन्म दिया। इस पुत्र का नाम ‘सातगौंडा’ रखा गया। ये ही आगे प्रथमाचार्य शांतिसागर जी हुए हैं। ‘आचार्य शांतिसागर जी के माता-पिता भोजग्राम निवासी थे, लेकिन आचार्य शांतिसागर जी का जन्म येळगुळ ग्राम में नाना के घर हुआ। इसलिए दक्षिण में कुछ लोग येळगुळ को जन्मस्थान मान लेते हैं तथा कुछ लोग भोजग्राम को जन्मस्थान मान लेते हैं। किन्तु आज भी देखा जाता है कि यदि किसी बालक का जन्म ननिहाल, अन्य शहर या हास्पीटल में हुआ होवे, तो भी जन्मभूमि पैतृक स्थान को ही माना जाता है। इस दृष्टि से भोजग्राम को ही आचार्य श्री का जन्मस्थान मानना ठीक है।’ बाल्यावस्था में भगवान की भक्तिपूजा करना, त्यागीगणों को आहारदान देना, उनकी वैयावृत्य करना, दीन-दुखियों को सहायता पहुँचाना आदि कार्यों में उनकी विशेष रुचि थी। छोटे-बड़े व्यसनों से दूर पिताजी ने सोलह वर्ष तक दिन में एक ही बार भोजन करने का व्रत लिया था। आचार्यश्री का बाल-जीवन इस प्रकार से सदाचार सम्पन्न माता-पिता की छत्र-छाया में व्यतीत हुआ। पूरा पढे...

25px क्या आप जानते हैं?

पुण्य और धर्म के स्वामी कौन-कौन हैं

पूयादिसु वयसहियं पुण्णं हि जिणेहि सासणे भणियं।
मोहक्खोह विहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो।।८१।।

पूजा आदि क्रियाओं में पुण्य होता है। श्रावक सम्यग्दर्शन और अणुव्रतों से सहित जिनपूजा, दान आदि क्रियाओं को करके सातिशय पुण्य संचित कर लेता है ऐसा उपासकाध्ययन नाम के अंग में जिनेन्द्रदेव द्वारा वर्णित है। टीकाकार कहते हैं-सर्वज्ञ वीतराग देव की पूजा आदि निदानबंध से रहित है तो वह तीर्थंकर नाम कर्म के बंध का भी कारण हो सकती है। अत: गृहस्थ का पूजादि से संचित पुण्य स्वर्ग के सुखों का कारण है पुन: परम्परा से मोक्ष का भी कारण है तथा मोह और क्षोभ से रहित शुद्ध, बुद्धैक आत्मा का चिच्चमत्कार लक्षण, चिदानंद रूप परिणाम धर्म कहलाता है वह साक्षात् मोक्ष का कारण है। यहाँ पर पुत्र, स्त्री, धन आदि में ‘यह मेरा है’ ऐसे भाव को मोह कहा है और परीषह उपसर्ग के आ जाने पर चित्त का चंचल हो जाना क्षोभ कहलाता है। निर्विकल्प समाधि में स्थित महामुनि का शुद्धोपयोग रूप स्थिर परिणाम ही धर्म है। टीकाकार कहते हैं यह धर्मरूप परिणाम ‘‘गृहस्थानां न भवति पंचसूनासहितत्वात्’’ गृहस्थों के संभव नहीं है क्योंकि वे पंचसूना-आरंभ आदि से सहित हैं। अत: आज के गृहस्थ को जिनपूजा आदि कार्यों में ही अपनी बुद्धि लगानी चाहिए।

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25px बन्धु प्रकल्प एवं अन्य भाषाओं में

आज का दिन - ६ दिसम्बर २०१६ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक ६ दिसम्बर,२०१६
तिथी-मार्गशीर्ष शुक्ल ७
दिन-मंगलवार
वीर निर्वाण संवत- २५४३
विक्रम संवत- २०७३

सूर्योदय ०६.५९
सूर्यास्त १७.२०

रवि योग ११.२० तक

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