ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पर्याप्ति The gaining by the soul of the capacity to develop fully the characteristics of the body into which it incarnates. योनि स्थान मे जीव के प्रवेश होने के पश्चात् अन्तर्मुहर्त मे आहार, शरीर, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास, भाषा एंव मन, इन 6 पर्यात्तियो की पूर्णता होना जो पूर्ण शारीरिक विकास के लिए आधारभूत है।