उत्तम क्षमाधर्म

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दशलक्षण धर्म जो आत्मा को उत्तम सुख में धरे वह ‘धर्म’ है अर्थात् जिसके पालन से स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति हो वह धर्म कहा जाता है। जीव दया का पालन करना, परोपकार करना, दान करना, व्रत-उपवास करना ये सभी विविध मतावलम्बियों द्वारा धर्म कहे जाते हैं पर तीर्थंकर भगवन्तों ने धर्म के ये दश लक्षण भी बताये हैं यथा-उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य एवं ब्रह्मचर्य। इन धर्मों को अपने आचरण में उतारने से आत्मा निर्मल बनती है एवं जीव के कल्याण का पथ प्रशस्त होता जाता है। क्रम-क्रम से दश दिन तक एक-एक धर्म के विषय में आप पढ़ेंगे........

उत्तम क्षमा धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) सब कुछ अपराध सहन करके, भावों से पूर्ण क्षमा करिये। यह उत्तम क्षमा जगन्माता, इसकी नितप्रति अर्चा करिये।। दशलक्षण पर्व का प्रारंभ क्षमाधर्म से होता है। ‘क्षमूष्’ धातु सहन करने अर्थ में है उस से यह ‘क्षमा’ शब्द बना है। आचार्यों ने क्रोध को अग्नि की उपमा दी है उसे शांत करने के लिए क्षमा जल ही समर्थ है। जैसे जल का स्वभाव शीतल है वैसे ही आत्मा का स्वभाव शांति है। जैसे अग्नि से संतप्त हुआ जल भी जला देता है वैसे ही क्रोध से संतप्त हुई आत्मा का धर्मरूपी सार जलकर खाक हो जाता है। क्रोध से अंधा हुआ मनुष्य पहले अपने आपको जला लेता है पश्चात् दूसरों को जला सके या नहीं भी। क्षमा के लिए बहुत उदार हृदय चाहिए, चंदन घिसने पर सुगंधि देता है, काटने वाले कुठार को भी सुगंधित करता है और गन्ना पिलने पर रस देता है। उसी प्रकार से सज्जन भी घिसने-पिलने से ही चमकते हैं। क्रोध से कभी शांति नही हो सकती है। कभी बैर से बैर का नाश नही हो सकता है। खून से रंगा हुआ वस्त्र कभी भी खून से साफ नही हो सकता है। अत: सहनशील बनकर सभी के प्रति क्षमा का भाव रखना चाहिए। दूसरों द्वारा हास्य, कटुक, कडुवे शब्दों के बोलने पर भी अपने को शांत रखने का ही प्रयास करना चाहिए।


उत्तम मार्दव धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) मृदुता का भाव कहा मार्दव, यह मानशत्रु मर्दनकारी। यह दर्शन ज्ञान चरित्र तथा, उपचार विनय से सुखकारी।। मद आठ जाति कुल आदि हैं, क्या उनसे सुखी हुआ कोई। रावण का मान मिला रज में, यमनृप ने सब विद्या खोई।। संसार में जाति, कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप, तप, विद्या और धन इस प्रकार के आठ मद/अभिमान देखे जाते हैंं परन्तु इनके विपरीत विनय अर्थात् मार्दव/मृदुता गुण को धारण करने से आत्मा का कल्याण होता है। संसार में प्रत्येक जीव अनादिकाल से नाना योनियों में जन्म लेता रहता है, कोई ऐसी निकृष्ट योनि नहीं है कि जिसमें इस जीव ने जन्म न लिया हो और उत्कृष्ट योनियों में भी राजा, महाराज तो क्या नव ग्रैवेयक तक के अहमिन्द्र पद को भी प्राप्त कर लिया है परन्तु पुनः मिथ्यात्व के निमित्त पंच परावर्तन रूप संसार में भटकता ही रहा है अतः किस चीज का गर्व करना! यह मान कषाय ही जीवों को नीच योनियोें में ले जाने वाली है। अत: जाति, कुल आदि के घमंड को छोड़कर मार्दव धर्म धारण करना चाहिए। उच्च जाति, गोत्र आदि शुक्ल ध्यान के हेतु माने गये हैं। इसलिए मान कषाय को छोड़कर विनय का आश्रय लेकर मार्दव धर्म को हृदय में स्थान देना चाहिए। मार्दव धर्म के प्रसाद से आगे के लिए उच्च गोत्र का आस्रव होता है।


उत्तम आर्जव धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) ऋजु भाव कहा आर्जव उत्तम, मन वच औ काय सरल रखना। इन कुटिल किए माया होती, तिर्यंचगती के दुख भरना।। मन में जो बात होवे उस ही को वचन से प्रगट करना (न कि मन में कुछ दूसरा होवे तथा वचन से कुछ दूसरा ही बोले) इसको आचार्यआर्जव धर्मकहते हैं तथा मीठी बात बनाकर दूसरों को ठगना इसको अधर्म कहते हैं। आर्जव धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा अधर्म नरक को ले जाने वाला होता है इसलिए आर्जव धर्म के पालन करने वाले भव्यजीवों को किसी के साथ माया से बर्ताव नहीं करना चाहिए। मायावी पुरुष के व्रत और तप सब निरर्थक हैं। जहाँ पर कुटिल परिणाम का त्याग कर दिया जाता है, वहीं पर आर्जव धर्म प्रगट होता है। ऋजु अर्थात् सरलता का भाव आर्जव है। अर्थात् मन-वचन-काय को कुटिल नहीं करना, इस मायाचारी से अनंतों कष्टों को देने वाली तिर्यंच योनि मिलती है। गुणनिधि नामक मुनिराज दुर्गगिरि पर्वत पर चार माह योग में लीन हो गये। सुर-असुरों ने उनकी स्तुति की। वे चारण ऋऋिधारी थे अतः योग समाप्त होने पर वे आकाश मार्ग से चले गये। उसी समय मृदुमति मुनि आकर गाँव में आहार हेतु गये। सो नगर वासियों ने ‘ये वे ही मुनि हैं’ ऐसा जानकर उनकी विशेष भक्ति की तथा कहा भी कि ‘आप वे ही महाराज हो जो पर्वत पर ध्यान कर रहे थे’। भोजन के स्वाद मे आसक्त होकर मृदुमति ने यह नहीं कहा कि मैं वह नहीं हूँ। उसने सोचा कि यदि मैं यह बता दूँ कि मैं वह नहीं हूँ तो लोग मेरी भक्ति कम करेंगे अतः उन्होंने मायाचारी से अपने को पुजवाया। अतः वे अंत में स्वर्ग में जाकर वहाँ के सुख को भोग कर पुनः इस माया के पाप से मरकर ‘त्रिलोक मंडन’ नाम के हाथी हो गये। यह माया हमेशा आत्म वंचना ही करती है। अतः मायाचारी का त्याग करके सरल परिणामों द्वारा अपनी आत्मा की उन्नति और ऊध्र्वगति करनी चाहिए।

उत्तम सत्य धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) प्रिय हित मित मधुर वचन सुन्दर, सबमें विश्वास प्रगट करते। ये उत्तम सत्य वचन जग में, अप्रिय जन को भी वश करते।। विश्वासघात है पाप महा, नहिं कभी भूूलकर करना तुम। जैसा तुम अपने प्रति चाहो, वैसा सबके प्रति करना तुम।। जो मनुष्य सत्य वचन बोलता है उसके समस्त व्रत विद्यमान रहते हैं अर्थात् सत्य व्रत के पालन करने से ही वह समस्त व्रतों का पालन करने वाला हो जाता है और वह सत्यवादी सज्जन पुरुष तीन लोक की पूज्यनीय सरस्वती को भी सिद्ध कर लेता है, इसके अलावा सत्यवादी मनुष्य परभव में जाकर श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजा बनते हैं तथा इन्द्रादि फल को प्राप्त करते हैं और सबसे उत्कृष्ट मोक्षरूपी फल को भी प्राप्त कर लेते हैं तथा शिष्ट मनुष्य इनको बड़ी प्रतिष्ठा से देखते हैं और वे सज्जन कहे जाते हैं इत्यादि नाना प्रकार वेâ उत्तम फल उनको मिलते हैं जो कि सर्वथा अवर्णनीय है इसलिए सज्जनों को अवश्य ही सत्य बोलना चाहिए। हे भव्य! दूसरों को बाधा-पीड़ा करने वाले वचन कभी मत बोलो, यदि वह वचन सत्य भी हो तो भी गर्वरहित हो उसे छोड़ दो। सत् अर्थात् समीचीन और प्रशस्त वचन सत्य कहलाते हैं। ये वचन अमृत से भरे हुये हैं। मिथ्या अपलाप करने वाले और धर्मशून्य वचन सदा छोड़ो। गर्हित, निंदित, हिंसा, चुगली, अप्रिय, कठोर, गाली-गलौच, क्रोध, बैर आदि के वचन, सावद्य (पाप) के वचन और आगम विरुद्ध वचन इन सबको छोड़ो। सत्य, प्रिय, हितकर और सुंदर वचन सर्वसिद्धि को देने वाले हैं। इस लोक में विश्वासघात के समान महापाप कोई नहीं है। असत्यवादी लोग अपने गुरु, मित्र और बंधुओं के साथ भी विश्वासघात करके दुर्गति में चले जाते हैं। विंâतु सत्य बोलने वाले लोगों को वचन सिद्धि हो जाया करती है। इसलिए हमेशा सत्य धर्म का पालन करना चाहिए।

उत्तम शौच धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) शुचि का जो भाव शौच वो ही, मन से सब लोभ दूर करना। निर्लोभ भावना से नित ही, सब जग को स्वप्न सदृश गिनना।। जिस प्रकार अत्यन्त घृणित मद्य से भरा हुआ घड़ा यदि बहुत बार शुद्ध जल से धोया भी जावे तो वह शुद्ध नहीं हो सकता, उस ही प्रकार जो मनुष्य बाह्य में गंगा, पुष्कर आदि तीर्थों में स्नान करने वाला है किन्तु उसका अन्तःकरण नाना प्रकार के क्रोधादि कषायों से मलिन है, तो वह कदापि उत्कृष्ट शुद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिए मनुष्य को सबसे प्रथम अपने अन्तःकरण को शुद्ध करना चाहिए क्योंकि जब तक अन्त:करण शुद्ध नहीं होगा, तब तक सर्व बाह्य क्रिया व्यर्थ है अत: लोभ का त्याग कर शौच धर्म का पालन करना गृहस्थ के लिए भी संभव है तथा स्नानादि करना बाह्य शुद्धि है वह भी गृहस्थ के लिए अनिवार्य है। शुद्धि के मुख्य रूप से दो भेद हैं- बाह्य और आभ्यंतर। जल आदि से बाह्य शरीर आदि के मल का नाश होता है और लोभ कषाय के त्याग से अंतरंग की पवित्रता होती है। संसार में निर्धन धन को प्राप्त न करके दुःखी होते हैं और धनी लोग भी तृप्त न होकर दुःखी रहते हैं। बड़े कष्ट की बात है कि संसार में सभी दुःखी हैं बस एक मुनि ही सुखी हैं। आशारूपी गड्ढा इतना विशाल है कि उसमें सम्पूर्ण विश्व अणु के समान प्रतीत होता है फिर बताओ यदि सब को इस विश्व का बंटवारा करके दिया जाये तो किसके पल्ले कितना पड़ेगा? लोभ से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। इस परिग्रह में आसक्त हुए मनुष्य पता नहीं कौन-कौन से पाप कर बैठते हैं। ‘जो ग्रहण करने की इच्छा करने वाले हैं वे नीचे गिरते हैं और जो निःस्पृह रहते हैं वे ऊँचे उठते हैं।’ देखो! तराजू के दो पलड़ों में से एक में कुछ भार होता है वह नीचे जाता है और हल्का पलड़ा ऊपर उठ जाता है, इन सब उदाहरणों को समझकर लोभ का त्याग कर अपनी आत्मा को शौच धर्म के द्वारा पवित्र-शुद्ध बनाना चाहिए।

उत्तम संयम धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) आचार्य कहते हैं कि प्रथम तो इस संसाररूपी गहनवन में भ्रमण करते हुए प्राणियों का मनुष्य होना ही अत्यन्त कठिन है, कदाचित् पुण्ययोग से मनुष्य जन्म मिल जावे, तो उत्तम जाति मिलना बहुत मुश्किल है, यदि उत्तम जाति भी मिल जावे तो अर्हंत भगवान के वचनों का सुनना अत्यन्त दुर्लभ है, यदि उसे सुनने का सौभाग्य भी प्राप्त हो जावे तो संसार में अधिक जीवन नहीं मिलता, अधिक जीवन मिल जावे तो सम्यग्दर्शन व सम्यग्ज्ञान की प्राप्ति कठिन है, यदि किसी पुण्य से वह भी मिल जावे तो उस संयम धर्म के बिना वे स्वर्ग तथा मोक्ष फल को देने वाले नहीं हो सकते, इसलिए सबकी अपेक्षा संयम अति प्रशंसनीय है अत: ऐसे संयम की संयमियों को अवश्य रक्षा करना चाहिए। गृहस्थ त्रसहिंसा का त्याग करके एकदेश संयम पालन करता है। संयम के प्राणी संयम और इंद्रिय संयम की अपेक्षा दो भेद हैं। पाँच स्थावर और त्रस ऐसे षट्काय जीवों की रक्षा करना प्राणी संयम है और पाँच इन्द्रिय तथा मन का जय करना इंद्रिय संयम है। इस प्रकार से वह संयम पूर्णतया मुनियों के ही होता है विंâतु गृहस्थ भी एक देश रूप से संयम का पालन करते हैं चूँकि उनकी छह आवश्यक क्रियाओं में संयम भी एक क्रिया है। कुछ न कुछ नियम का लेना एक संयम है। गृहस्थाश्रम में रहते हुये भी प्रत्येक कार्य को सावधानीपूर्वक करना संयम है। सावधानीपूर्वक चलना, फिरना, उठना बैठना भी संयम है। इस प्रकार संयम का महत्त्व समझकर संयम धर्म को धारण करना चाहिए। समय आरे के समान आयु के क्षणों को काटता चला जा रहा है अतः जल्दी करना चाहिए।

उत्तम तप धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) संसार में कषाय तथा विषयरूपी योद्धा यद्यपि अत्यन्त दुर्जय हैं किन्तु जिस मुनि के पास तपरूपी प्रबल सुभट मौजूद है, उसका वे कुछ भी नहीं कर सकते तथा वे मुनि उपद्रव रहित सुख से मोक्ष चले जाते हैं इसलिए मोक्षाभिलाषी मुनियों को तप सबसे प्रिय समझना चाहिए। वह तप मूल में बाह्य-आभ्यन्तर के भेद से दो प्रकार का है और अनशनादि छह बाह्य प्रकार तथा प्रायश्चित, विनय आदि छह अभ्यन्तर रीति से बारह प्रकार का है। अनेक प्रकार के व्रतादि धारणकर तपश्चरण श्रावक भी करते हैं। श्री पूज्यपाद स्वामी कहते हैं ‘जिससे जीव का उपकार होता है उससे शरीर का अपकार होता है और जिससे शरीर का उपकार होता है उससे जीव का अपकार होता है।’ तथा श्री कुन्दकुन्द देव भी कहते हैं कि ‘‘जो सुखिया जीवन में तत्त्व की भावना भाते हैं उनका ज्ञान दुःख आने पर नष्ट हो जाता है अतः दुःख को बुलाकर आत्म तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए।’’ सम्पूर्ण इच्छाओं का निरोध करके मैं सम्यव्â तप को तपकर ध्यानरूपी अग्नि में कर्म र्इंधन को डालकर शुद्ध हो जाऊँगा, ऐसी भावना से ही कर्म नष्ट होते हैं। देखो तीर्थंंकर को निर्वाण जाना निश्चित है, दीक्षा लेते ही मनःपर्यय ज्ञान हो जाता है फिर भी वे तप करते हैं, ऐसा जानकर तप करना चाहिए। वास्तव में जो शरीर से आत्मा को भिन्न समझते हैं वे अध्यात्म प्रेमी ही शरीर से निःस्पृह होकर तप कर सकते हैं। शरीर से निर्मम होने के लिए तप का अभ्यास अतीव उपयोगी है। प्रमाद छोड़कर अभ्यास करने से सर्वकार्य सिद्ध हो जाते हैं अतः तपधर्म हमेशा ग्राह्य है।

उत्तम त्याग धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) ग्रन्थों में त्याग के चार भेद किये हैं-आहारदान, औषधिदान, शास्त्रदान और अभयदान। राजा वङ्काजंघ ने रानी श्रीमती के साथ वन में युगल मुनि को आहार दान दिया था जिसके फलस्वरूप वे वृषभ तीर्थंकर हुए हैं तथा उनकी रानी श्रीमती भी उसी के प्रभाव से आगे राजा श्रेयांस होकर दान तीर्थ के प्रवर्तक हुए हैं। श्री कृष्ण ने एक मुनि को औषधिदान दिया था जिससे वे भविष्य में पुण्य के स्थान ऐसे तीर्थंकर होवेंगे। सच्चे शास्त्र के दान से एक ग्वाला अगले भव में कौंडेश मुनि होकर महान् श्रुतज्ञानी हुआ। वसतिका के दान के प्रभाव से सूकर ने स्वर्ग को प्राप्त कर लिया । मैं भी रत्नत्रय का दान अपने को देकर सर्वगुणों से परिपूर्ण स्वात्म तत्त्व को शीघ्र ही प्राप्त कर लेऊँ और उसी में लीन हो जाऊँ। ऐसी भावना प्रत्येक व्यक्ति को भाते रहना चाहिए। दान की महिमा अचिन्त्य ही है। आज के युग में भी जो अपने को महामुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका आदि साधुवर्ग दिखते हैं उनके प्रति असीम भक्ति रखकर पूजा, दान, भक्ति आदि करके अपने मनुष्य जीवन को सफल कर लेना चाहिए। साधुओं को नमस्कार करने से उच्च गोत्र प्राप्त होता है उनको दान देने से भोग मिलते हैं। उनकी उपासना से पूजा प्राप्त होती है, सम्मान होता है, उनकी भक्ति से सुन्दर रूप और उनकी स्तुति करने से कीर्ति होती है। दान से ही संसार में गौरव प्राप्त होता है। देखो! देने वाले मेघ ऊपर रहते हैं और संग्रह करने वाले समुद्र नीचे रहते हैं। बड़े कष्ट से कमाई गई सम्पत्ति को यदि आप अपने साथ ले जाना चाहते हैं तो खूब दान दीजिये। यह असंख्य गुणा होकर फलेगी किन्तु खाई गई अथवा गाड़कर रखी गई संपत्ति व्यर्थ ही है। परोपकार में खर्चा गया धन ही परलोक में नवनिधि ऋद्धि के रूप में फलता है। इस प्रकार से त्यागधर्म के महत्व को समझकर यथाशक्ति दान देना चाहिए।

उत्तम आविंâचन धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) नहिं विंâचित भी मेरा जग में, यह ही आविंâचन भाव कहा। बस एक अकेला आत्मा ही, यह गुण अनन्त का पुंज अहा।। अणुमात्र वस्तु को निज समझें, वे नरक निगोद निवास करें। जो तन से भी ममता टारें, वे लोक शिखर पर वास करें।। ‘न में किञ्चन अकिञ्चनः’ मेरा कुछ भी नहीं है अतः मैं अकिञ्चन हूँ। फिर भी मेरी आत्मा अनंतगुणों से परिपूर्ण है। मैं सदा परद्रव्य से भिन्न हूँ और तीन लोक का अधिपति महान् हूँं। यह आत्मा अणुमात्र भी परवस्तु को जब तक अपनी मानता रहता है तब तक संसार में भ्रमण करता रहता है और जब काय से भी निर्मम हो जाता है तब लोक के अग्र भाग में विराजमान हो जाता है। जमदग्नि मुनि ने मिथ्यातापसी होकर स्त्री आदि का परिग्रह स्वीकार कर लिया, अतः वह संसार समुद्र में डूब गया। सच है, दीर्घ भार लेकर मनुष्य ऊपर वैâसे गमन कर सकता है? शरीर से भी निःस्पृह हुये साधु पिच्छी, कमंडलु और शास्त्र को ग्रहण करते हैं फिर भी अपनी आत्मा में एकाग्र होते हुये आतापन आदि योगों में स्थित हो जाते हैं। हे भगवन् ! आपके प्रसाद से शीघ्र ही मुझ में ऐसी शक्ति उत्पन्न हो जावे कि मैं पर्वत पर, कन्दराओं में और दुर्ग आदि प्रदेशों मे अपनी आत्मा का ध्यान करते हुये सिद्धि पद को प्राप्त कर लेऊँ। ऐसी भावना सदा भाते रहना चाहिए। जो भव्य जीव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त होकर गृह का त्याग कर देते हैं वे ही महासाधु अविंâचन कहलाते हैं। पुनः अपनी रत्नत्रय निधि को संभालकर तीन लोक के नाथ हो जाते हैं। आचार्य कहते हैं, इस भोग वासना की निंद्यबुद्धि को धिक्कार हो कि जहाँ स्त्री, पुत्र आदि परिग्रह रखकर भी मूढ़ लोग अपने को तपस्वी मान लेते हैं। क्या वे इस परिग्रह के भार को लेकर संसार समुद्र को पार कर सकते हैं? नहीं। ऐसा समझकर निग्र्रंथ दिगम्बर मुद्रा को ही मोक्षमार्ग मानना चाहिए और इस आविंâचन्य धर्म की उपासना करके अपने आत्मगुणों को विकसित करना चाहिए।

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) यह ब्रह्मस्वरूप कही आत्मा, इसमें चर्या ब्रह्मचर्य कहा। गुरुकुल में वास रहे नित ही, वह भी है ब्रह्मचर्य सुखदा।। सब नारी को माता भगिनी, पुत्रीवत् समझें पुरुष सही। महिलाएँ पुरुषों को भाई, पितु पुत्र सदृश समझें नित ही।। दुर्धर और उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य व्रत को धारण करना चाहिए और विषयों की आशा का त्याग कर देना चाहिए। यह प्राणी स्त्री सुख में रत होकर मनरूपी हाथी से मदोन्मत्त हो रहा है, इसलिए हे भव्यों! स्थिर होकर उस ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा करो। यह कामदेव चित्तरूपी भूमि में उत्पन्न होता है, उससे पीड़ित होकर वह जीव न करने योग्य कार्य को भी कर डालता है। वह स्त्रियों के निंद्य शरीर का सेवन करता है और मूढ़ होता हुआ अपनी तथा पराई स्त्री में भेद नहीं करता है। जो हीन पुरुष ब्रह्मचर्य व्रत का भंग करता है वह नरक में पड़ता है और वहाँ महान् दुःखों को भोगता है। यह जानकर मन-वचन-काय में अनुराग रहित होकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करो। इस व्रत से जीव संसार के तीर को प्राप्त कर लेता है। इस ब्रह्मचर्य व्रत के बिना व्रत और तप सब असार (निष्फल) हैं। ब्रह्मचर्य व्रत के बिना जितने भी कायक्लेश तप किये जाते हैं वे सब निष्फल हैं, ऐसा श्री जिनेन्द्र देव कहते हैं। बाहर में स्पर्शन इन्द्रियजन्य सुख से अपनी रक्षा करो और अभ्यंतर में परमब्रह्म स्वरूप का अवलोकन करो। इस उपाय से मोक्षरूपी घर की प्राप्ति होती है। इस प्रकर ‘रइधू कवि’ बहुत ही विनय के साथ कहते हैं। ‘‘अनुभूत स्त्री का स्मरण, उनकी कथाओं का श्रवण और उनसे संसक्त शयन, आसन आदि इन सबका त्याग करना ब्रह्मचर्यहै अथवा स्वतंत्र वृत्ति का त्याग करने के लिए गुरुओं के पास रहना सो ब्रह्मचर्य है।’’ ‘आत्मा ही ब्रह्म है उस ब्रह्मस्वरूप आत्मा में चर्या करना सो ब्रह्मचर्य है अथवा गुरु के संघ में रहना भी ब्रह्मचर्य है। इस विधचर्या को करने वाला उत्तम ब्रह्मचारी कहलाता है। जिस प्रकार से एक (१) अंक को रखे बिना असंख्य बिन्दु भी रखते जाइये किन्तु क्या कुछ संख्या बन सकती है? नहीं, उसी प्रकार से एक ब्रह्मचर्य के बिना अन्य व्रतों का फल वैâसे मिल सकता है अर्थात् नहीं मिल सकता। सीता के शील के माहात्म्य से अग्नि भी जल का सरोवर हो गयी थी। मैं भी सर्व विकल्पों को छोड़कर अपने ब्रह्मस्वरूप आत्मा में रमण करके ज्ञानवती लक्ष्मी को प्राप्त करके पुनः निश्चिंत हो तीन लोक का स्वामी हो जाऊँगा, ऐसी भावना सतत करनी चाहिए।

क्षमावणी पर्व (गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के प्रवचनांश........) पर्यूषण पर्व का प्रारम्भ भी क्षमाधर्म से होता है और समापन भी क्षमावणी पर्व से किया जाता है। दश दिन धर्मोें की पूजा करके, जाप्य करके जो परिणाम निर्मल किये जाते हैं और दश धर्मों का उपदेश श्रवण कर जो आत्म शोधन होता है, उसी के फलस्वरूप सभी श्रावक-श्राविकायें किसी भी निमित्त परस्पर में होने वाली मनो मलिनता को दूर कर आपस में क्षमा कराते हैं। क्योंकि यह क्रोध कषाय प्रत्यक्ष में ही अग्नि के समान भयंकर है। क्रोध आते ही मनुष्य का चेहरा लाल हो जाता है, ओंठ काँपने लगते हैं, मुखमुद्रा विकृत और भयंकर हो जाती है। विंâतु प्रसन्नता में मुखमुद्रा सौम्य, सुन्दर दिखती है। चेहरे पर शांति दिखती है। वास्तव में शांत भाव का आश्रय लेने वाले महामुनियों को देखकर जन्मजात बैरी ऐसे व्रूâर पशुगण भी व्रूâरता छोड़ देते हैं। यथा- हरिणी सिंह के बच्चे को पुत्र की बुद्धि से स्पर्श करती है, गाय व्याघ्र के बच्चे को दूध पिलाती है, बिल्ली हंसों के बच्चों को प्रीति से लालन करती है एवं मयूरी सर्पों को प्यार करने लगती है। इस प्रकार से जन्मजात भी बैर को व्रूâर जंतुगण छोड़ देते हैं। कब? जबकि वे पापों को शांत करने वाले मोहरहित और समताभाव में परिणत ऐसे योगियों का आश्रय पा लेते हैं, अर्थात् ऐसे महामुनियों के प्रभाव से हिंसक पशु अपनी द्वेष भावना छोड़कर आपस में प्रीति करने लगते हैं। ऐसी शांत भावना का अभ्यास इस क्षमा के अवलंबन से ही होता है। क्रोध कषाय को दूर कर इस क्षमाभाव को हृदय में धारण करने के लिए क्षमाशील साधु पुरुषों का आदर्श जीवन देखना चाहिए। आचार्य शांति सागर जी आदि साधुओं ने इस युग में भी उपसर्ग करने वालों पर क्षमा भाव धारण करके सदैव प्राचीन आदर्श प्रस्तुत किया है। बहुत से श्रावक भी क्षमा करके-कराके अपने में अपूर्व आनंद का अनुभव करते हैं। अतः हृदय से क्षमा करना तथा दूसरों से क्षमा कराना ही क्षमावणी पर्व है।