"ऋषभदेव पूजा" के अवतरणों में अंतर

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==<center><font color=#8B008B>'''''भगवान श्री आदिनाथ जिनपूजा'''''</font color></center>==
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<center><font color=#A0522D>'''स्थापना-गीता छंद'''</font color><br />
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<center><font color=#A0522D>'''स्थापना-गीता छंद'''</font>
 
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<font color=#808000>हे आदिब्रह्मा! युगपुरुष! पुरुदेव! युगस्रष्टा तुम्हीं।<br />
+
<font color=#808000>हे आदिब्रह्मा! युगपुरुष! पुरुदेव! युगस्रष्टा तुम्हीं।
युग आदि में इस कर्मभूमी, के प्रभो! कर्ता तुम्हीं।।<br />
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युग आदि में इस कर्मभूमी, के प्रभो! कर्ता तुम्हीं।।
तुम ही प्रजापतिनाथ! मुक्ती के विधाता हो तुम्हीं।<br />
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तुम ही प्रजापतिनाथ! मुक्ती के विधाता हो तुम्हीं।
मैं आपका आह्वान करता, नाथ! अब तिष्ठो यहीं।।१।।</font color><br />
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मैं आपका आह्वान करता, नाथ! अब तिष्ठो यहीं।।१।।</font>
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।'''<br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।'''
'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।'''<br />
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'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।'''
'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।'''</font color><br />
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'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।'''</font>
  
<font color=#A0522D>'''अष्टक-चाल-नंदीश्वर पूजा'''</font color><br />
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<font color=#A0522D>'''अष्टक-चाल-नंदीश्वर पूजा'''</font>
  
<font color=#808000>जिनवच सम शीतल नीर, [[कंचन ]]भृंग भरूँ।<br />
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<font color=#808000>जिनवच सम शीतल नीर, [[कंचन ]]भृंग भरूँ।
जिन चरणांबुज में धार, दे जगद्वंद्व हरूँ।।<br />
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जिन चरणांबुज में धार, दे जगद्वंद्व हरूँ।।
श्री आदिनाथ जिनराज, आदी तीर्थंकर।<br />
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श्री आदिनाथ जिनराज, आदी तीर्थंकर।
मैं  पूजूँ  भक्ति  समेत,  तुमको  क्षेमंकर।।१।।</font color><br />
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मैं  पूजूँ  भक्ति  समेत,  तुमको  क्षेमंकर।।१।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>जिनतनु सम सुरभित गंध, सुवरण पात्र भरूँ।<br />
+
<font color=#808000>जिनतनु सम सुरभित गंध, सुवरण पात्र भरूँ।
जिनचरण सरोरुह चर्च, भव संताप हरूँ।।श्री.।।२।।</font color><br />
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जिनचरण सरोरुह चर्च, भव संताप हरूँ।।श्री.।।२।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>जिन गुणसम उज्ज्वल धौत, अक्षत थाल भरे।<br />
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<font color=#808000>जिन गुणसम उज्ज्वल धौत, अक्षत थाल भरे।
जिन चरण निकट धर पुंज, अक्षय सौख्य भरे।।श्री.।।३।।</font color><br />
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जिन चरण निकट धर पुंज, अक्षय सौख्य भरे।।श्री.।।३।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>जिनयशसम सुरभित श्वेत, कुंद गुलाब लिये।<br />
+
<font color=#808000>
मदनारिजयी जिनपाद, पूजूँ हर्ष हिये।।श्री.।।४।।</font color><br />
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जिनयशसम सुरभित श्वेत, कुंद गुलाब लिये।
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मदनारिजयी जिनपाद, पूजूँ हर्ष हिये।।श्री.।।४।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>
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'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>जिनवचनामृत सम शुद्ध, [[व्यंजन]] थाल भरे।<br />
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<font color=#808000>जिनवचनामृत सम शुद्ध, [[व्यंजन]] थाल भरे।
परमामृत  तृप्त  जिनेन्द्र,  पूजत  भूख  टरे।।श्री.।।५।।</font color><br />
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परमामृत  तृप्त  जिनेन्द्र,  पूजत  भूख  टरे।।श्री.।।५।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>वरभेद ज्ञान सम ज्योति,जगमग दीप लिये।<br />
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<font color=#808000>
जिनपद पूजत ही होत, ज्ञान उद्योत हिये।।श्री.।।६।।</font color><br />
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वरभेद ज्ञान सम ज्योति,जगमग दीप लिये।
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जिनपद पूजत ही होत, ज्ञान उद्योत हिये।।श्री.।।६।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>दशगंध सुगंधित धूप, खेवत कर्म जरे।<br />
+
<font color=#808000>दशगंध सुगंधित धूप, खेवत कर्म जरे।
निज आतम गुण सौगंध्य, दश दिश माहिं भरे।।श्री.।।७।।</font color><br />
+
निज आतम गुण सौगंध्य, दश दिश माहिं भरे।।श्री.।।७।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>जिन ध्वनिसम मधुर रसाल, आम अनार भले।<br />
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<font color=#808000>
जिनपद पूजत तत्काल, फल सर्वोच्च मिले।।श्री.।।८।।</font color><br />
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जिन ध्वनिसम मधुर रसाल, आम अनार भले।
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जिनपद पूजत तत्काल, फल सर्वोच्च मिले।।श्री.।।८।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>ले अष्ट द्रव्य का थाल, अघ्र्य सम चढ़ाऊँ मैं।<br />
+
<font color=#808000>
कैवल्य ‘ज्ञानमति’ हेतु, तुम गुण गाऊँ मैं।।श्री.।।९।।</font color><br />
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ले अष्ट द्रव्य का थाल, अघ्र्य सम चढ़ाऊँ मैं।
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कैवल्य ‘ज्ञानमति’ हेतु, तुम गुण गाऊँ मैं।।श्री.।।९।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#A0522D>'''-सोरठा-'''</font color><br />
+
<font color=#A0522D>'''-सोरठा-'''</font>
  
<font color=#808000>सरयूनदी सुनीर, जिनपद पंकज धार दे।<br />
+
<font color=#808000>
शीघ्र हरो भव पीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।।</font color><br />
+
सरयूनदी सुनीर, जिनपद पंकज धार दे।
<font color=#2E8B57>'''शांतये शांतिधारा।'''</font color><br />
+
शीघ्र हरो भव पीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।।</font>
 +
<font color=#2E8B57>'''शांतये शांतिधारा।'''</font>
  
<font color=#808000>बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने।<br />
+
<font color=#808000>
आदीश्वर पादाब्ज, पूजत ही सुख संपदा।।११।।</font color><br />
+
बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने।
<font color=#2E8B57>'''दिव्य पुष्पांजलि:।'''</font color><br />
+
आदीश्वर पादाब्ज, पूजत ही सुख संपदा।।११।।</font>
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<font color=#2E8B57>'''दिव्य पुष्पांजलि:।'''</font>
 
[[चित्र:RedRose.jpg|center|200px]]
 
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<font color=#A0522D>'''पंचकल्याणक अर्घ्य
 
<font color=#A0522D>'''पंचकल्याणक अर्घ्य
'''</font color><br />
+
'''</font>
  
<font color=#A0522D>'''-शंभु छंद-'''</font color><br />
+
<font color=#A0522D>
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'''-शंभु छंद-'''</font>
  
<font color=#808000>यह पुरी अयोध्या इंद्र रचित, चौदहवें कुलकर नाभिराज।<br />
+
<font color=#808000>यह पुरी अयोध्या इंद्र रचित, चौदहवें कुलकर नाभिराज।
माता मरुदेवी के आँगन, बहु रत्न वृष्टि की धनदराज।।<br />
+
माता मरुदेवी के आँगन, बहु रत्न वृष्टि की धनदराज।।
आषाढ़ वदी द्वितीया सर्वारथ, सिद्धी से अहमिंद्र देव।<br />
+
आषाढ़ वदी द्वितीया सर्वारथ, सिद्धी से अहमिंद्र देव।
माता के गर्भ बसे आकर, इंद्रों ने की पितु मात सेव।।</font color><br />
+
माता के गर्भ बसे आकर, इंद्रों ने की पितु मात सेव।।</font>
 
[[चित्र:by795.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by795.jpg|right|100px|]]
 
[[चित्र:by795.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by795.jpg|right|100px|]]
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णाद्वितीयायां श्रीआदिनाथजिनगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णाद्वितीयायां श्रीआदिनाथजिनगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>श्री ह्री धृति आदि देवियों ने, माता की सेवा भक्ती की।<br />
+
<font color=#808000>
नाना विध गूढ़ प्रश्न करके, माता की अतिशय तृप्ती की।।<br />
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श्री ह्री धृति आदि देवियों ने, माता की सेवा भक्ती की।
शुभ चैत्र वदी नवमी जन्में, प्रभु त्रिभुवन में अति हर्ष हुआ।<br />
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नाना विध गूढ़ प्रश्न करके, माता की अतिशय तृप्ती की।।
इन्द्रों ने आ प्रभु को लेकर, मेरू पर अतिशय न्हवन किया।।</font color><br />
+
शुभ चैत्र वदी नवमी जन्में, प्रभु त्रिभुवन में अति हर्ष हुआ।
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इन्द्रों ने आ प्रभु को लेकर, मेरू पर अतिशय न्हवन किया।।</font>
 
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[[चित्र:by796.jpg|left|100px|]]  [[चित्र:by796.jpg|right|100px|]]
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णानवम्यां श्रीआदिनाथजिनजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णानवम्यां श्रीआदिनाथजिनजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>पुरुदेव निलांजना नृत्य देख, वैराग्यभाव मन में लाये।<br />
+
<font color=#808000>पुरुदेव निलांजना नृत्य देख, वैराग्यभाव मन में लाये।
लौकांतिक सुर स्तुति करते, सुर सुदर्शना पालकि लाये।।<br />
+
लौकांतिक सुर स्तुति करते, सुर सुदर्शना पालकि लाये।।
नक्षत्र उत्तराषाढ़ चैत वदि, नवमी प्रभु सिद्धार्थ वन में।<br />
+
नक्षत्र उत्तराषाढ़ चैत वदि, नवमी प्रभु सिद्धार्थ वन में।
छह मास योग ले दीक्षा ली, मैं अर्घ्यं चढ़ाऊँ प्रभु पद में।।</font color><br />
+
छह मास योग ले दीक्षा ली, मैं अर्घ्यं चढ़ाऊँ प्रभु पद में।।</font>
 
[[चित्र:by798.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by798.jpg|right|100px|]]
 
[[चित्र:by798.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by798.jpg|right|100px|]]
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णनवम्यां श्रीआदिनाथजिनदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>
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'''ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णनवम्यां श्रीआदिनाथजिनदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>छह मास योग के बाद प्रभू, मुनिचर्या बतलाने निकले।<br />
+
<font color=#808000>छह मास योग के बाद प्रभू, मुनिचर्या बतलाने निकले।
गजपुर में अक्षयतृतिया को, आहार दिया श्रेयांस मिले।।<br />
+
गजपुर में अक्षयतृतिया को, आहार दिया श्रेयांस मिले।।
इक सहस वर्ष तप तपने से, केवलज्ञानी होकर चमके।<br />
+
इक सहस वर्ष तप तपने से, केवलज्ञानी होकर चमके।
दिव्यध्वनि से जग संबोधा, फाल्गुन वदि एकादशि तिथि के।।</font color><br />
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दिव्यध्वनि से जग संबोधा, फाल्गुन वदि एकादशि तिथि के।।</font>
 
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णाएकादश्यां श्रीआदिनाथजिनकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णाएकादश्यां श्रीआदिनाथजिनकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#808000>बारह विध सभा बनी सुंदर, मुनि आर्या सुरनर पशुगण थे।<br />
+
<font color=#808000>
प्रभु समवसरण में वृषभसेन, आदिक चौरासी गणधर थे।।<br />
+
बारह विध सभा बनी सुंदर, मुनि आर्या सुरनर पशुगण थे।
तीजे युग में त्रय वर्ष सार्ध, अरु मासशेष अष्टापद से।<br />
+
प्रभु समवसरण में वृषभसेन, आदिक चौरासी गणधर थे।।
चौदह दिन योग निरुद्ध माघ, वदि चौदश के प्रभु मुक्ति बसे।।</font color><br />
+
तीजे युग में त्रय वर्ष सार्ध, अरु मासशेष अष्टापद से।
 +
चौदह दिन योग निरुद्ध माघ, वदि चौदश के प्रभु मुक्ति बसे।।</font>
 
[[चित्र:by799.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by799.jpg|100px|right|]]
 
[[चित्र:by799.jpg|left|100px|]] [[चित्र:by799.jpg|100px|right|]]
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं माघकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीआदिनाथजिनमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं माघकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीआदिनाथजिनमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#A0522D>'''-पूर्णार्घ (दोहा)-'''</font color><br />
+
<font color=#A0522D>'''-पूर्णार्घ (दोहा)-'''</font>
  
<font color=#808000>चिन्मय चिन्तामणि प्रभो! ऋषभदेव भगवान।<br />
+
<font color=#808000>चिन्मय चिन्तामणि प्रभो! ऋषभदेव भगवान।
पूर्ण अर्घ लेकर जजूँ, मिले सिद्ध स्थान।।६।।</font color><br />
+
पूर्ण अर्घ लेकर जजूँ, मिले सिद्ध स्थान।।६।।</font>
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथपंचकल्याणकाय पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथपंचकल्याणकाय पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
  
<font color=#2E8B57>'''शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।'''</font color><br />
+
<font color=#2E8B57>
<font color=#A0522D>'''जाप्य-</font color><font color=#2E8B57>ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवजिनेन्द्राय नम:।'''</font color><br />
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'''शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।'''</font>
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<font color=#A0522D>
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'''जाप्य-</font><font color=#2E8B57>ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवजिनेन्द्राय नम:।'''</font>
 
[[चित्र:Jaap.JPG|50px|left]] [[चित्र:Jaap.JPG|50px|right]]
 
[[चित्र:Jaap.JPG|50px|left]] [[चित्र:Jaap.JPG|50px|right]]
<font color=#A0522D>'''जयमाला'''</font color><br />
+
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'''जयमाला'''</font>
  
<font color=#A0522D>'''-दोहा-'''</font color><br />
+
<font color=#A0522D>'''-दोहा-'''</font>
  
<font color=#808000>तीर्थंकर गुण रत्न को, गिनत न पावें पार।<br />
+
<font color=#808000>तीर्थंकर गुण रत्न को, गिनत न पावें पार।
तीन  रत्न  के  हेतु  मैं,  नमूँ  अनंतों  बार।।१।।</font color><br />
+
तीन  रत्न  के  हेतु  मैं,  नमूँ  अनंतों  बार।।१।।</font>
  
<font color=#A0522D>'''-शंभु छंद-'''</font color><br />
+
<font color=#A0522D>'''-शंभु छंद-'''</font>
  
<font color=blue>श्री वृषभसेन आदिक चौरासी, गणधर मुनि चौरासि सहस।<br />
+
<font color=blue>
ब्राह्मी गणिनी त्रय लाख पचास, हजार आर्यिका व्रतसंयुत।।<br />
+
श्री वृषभसेन आदिक चौरासी, गणधर मुनि चौरासि सहस।
त्रय लाख सुश्रावक पाँच लाख, श्राविका प्रभू का चउ संघ था।<br />
+
ब्राह्मी गणिनी त्रय लाख पचास, हजार आर्यिका व्रतसंयुत।।
आयू चौरासी लाख पूर्व, वत्सर व पाँच सौ धनु तनु था।।२।।</font color><br />
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त्रय लाख सुश्रावक पाँच लाख, श्राविका प्रभू का चउ संघ था।
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आयू चौरासी लाख पूर्व, वत्सर व पाँच सौ धनु तनु था।।२।।</font>
  
<font color=#A0522D>'''-अनंग शेखर छंद-'''</font color><br />
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'''-अनंग शेखर छंद-'''</font>
  
<font color=blue>जयो जिनेन्द्र! आपके महान दिव्य ज्ञान में,<br />
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त्रिलोक और त्रिकाल एक साथ भासते रहे।<br />
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जयो जिनेन्द्र! आपके महान दिव्य ज्ञान में,
जयो जिनेन्द्र! आपका अपूर्व तेज देखके,<br />
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त्रिलोक और त्रिकाल एक साथ भासते रहे।
असंख्य सूर्य और चंद्रमा भि लाजते रहे।।<br />
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जयो जिनेन्द्र! आपका अपूर्व तेज देखके,
जयो जिनेन्द्र! आपकी ध्वनी अनच्छरी खिरे,<br />
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असंख्य सूर्य और चंद्रमा भि लाजते रहे।।
तथापि संख्य भाषियों को बोध है करा रही।<br />
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जयो जिनेन्द्र! आपकी ध्वनी अनच्छरी खिरे,
जयो जिनेन्द्र! आपका अचिन्त्य ये महात्म्य देख,<br />
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तथापि संख्य भाषियों को बोध है करा रही।
सुभक्ति से प्रजा समस्त आप आप आ रही।।३।।<br />
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जयो जिनेन्द्र! आपका अचिन्त्य ये महात्म्य देख,
जिनेश! आपकी सभा असंख्य जीव से भरी,<br />
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सुभक्ति से प्रजा समस्त आप आप आ रही।।३।।
अनंत वैभवों समेत भव्य चित्त मोहती।<br />
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जिनेश! आपकी सभा असंख्य जीव से भरी,
जिनेश! आपके समीप साधु वृंद औ गणीन्द्र,<br />
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अनंत वैभवों समेत भव्य चित्त मोहती।
केवली मुनीन्द्र और आर्यिकायें शोभतीं।।<br />
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जिनेश! आपके समीप साधु वृंद औ गणीन्द्र,
सुरेन्द्र देवियों की टोलियाँ असंख्य आ रही,<br />
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केवली मुनीन्द्र और आर्यिकायें शोभतीं।।
खगेश्वरों की पक्तियाँ अनेक गीत गा रहीं।<br />
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सुरेन्द्र देवियों की टोलियाँ असंख्य आ रही,
सुभूमि गोचरी मनुष्य नारियाँ तमाम हैं,<br />
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खगेश्वरों की पक्तियाँ अनेक गीत गा रहीं।
पशू तथैव पक्षियों कि टोलियाँ भी आ रहीं।।४।।<br />
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सुभूमि गोचरी मनुष्य नारियाँ तमाम हैं,
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पशू तथैव पक्षियों कि टोलियाँ भी आ रहीं।।४।।
 
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सुबारहों सभा स्वकीय ही स्वकीय में रहें,<br />
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सुबारहों सभा स्वकीय ही स्वकीय में रहें,
असंख्य भव्य बैठ के जिनेश देशना सुनें।<br />
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असंख्य भव्य बैठ के जिनेश देशना सुनें।
सुतत्त्व सात नौ पदार्थ पाँच अस्तिकाय और,<br />
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सुतत्त्व सात नौ पदार्थ पाँच अस्तिकाय और,
द्रव्य छह स्वरूप को भले प्रकार से गुनें।।<br />
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द्रव्य छह स्वरूप को भले प्रकार से गुनें।।
निजात्म तत्त्व को संभाल तीन रत्न से निहाल,<br />
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निजात्म तत्त्व को संभाल तीन रत्न से निहाल,
बार-बार भक्ति से मुनीश हाथ जोड़ते।<br />
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बार-बार भक्ति से मुनीश हाथ जोड़ते।
अनंत सौख्य में निमित्त आपको विचार के,<br />
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अनंत सौख्य में निमित्त आपको विचार के,
अनंत दु:ख हेतु जान कर्मबंध तोड़ते।।५।।<br />
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अनंत दु:ख हेतु जान कर्मबंध तोड़ते।।५।।
स्वमोह बेल को उखाड़ मृत्युमल्ल को पछाड़,<br />
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स्वमोह बेल को उखाड़ मृत्युमल्ल को पछाड़,
मुक्ति अंगना निमित्त लोक शीश जा बसें।<br />
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मुक्ति अंगना निमित्त लोक शीश जा बसें।
प्रसाद से हि आपके अनंत भव्य जीव राशि,<br />
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प्रसाद से हि आपके अनंत भव्य जीव राशि,
आपके समान होय आप पास आ लसें।।<br />
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आपके समान होय आप पास आ लसें।।
असंख्य जीव मात्र दृष्टि समीचीन पायके,<br />
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असंख्य जीव मात्र दृष्टि समीचीन पायके,
अनंतकाल रूप पंच परावर्त मेटते।<br />
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अनंतकाल रूप पंच परावर्त मेटते।
सुभक्ति के प्रभाव से असंख्य कर्म निर्जरा,<br />
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सुभक्ति के प्रभाव से असंख्य कर्म निर्जरा,
करें अनंत शुद्धि से निजात्म सौख्य सेवते।।६।।</font color><br />
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करें अनंत शुद्धि से निजात्म सौख्य सेवते।।६।।</font>
  
<font color=#A0522D>'''-दोहा-'''</font color><br />
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<font color=#808000>वृषभ चिह्न स्वर्णिम तनू, प्रथम तीर्थकर आप।<br />
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<font color=#808000>वृषभ चिह्न स्वर्णिम तनू, प्रथम तीर्थकर आप।
‘ज्ञानमती’ सुख शांति दे, करो हमें निष्पाप।।७।।</font color><br />
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‘ज्ञानमती’ सुख शांति दे, करो हमें निष्पाप।।७।।</font>
<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।'''</font>
<font color=#2E8B57>'''शांतये शांतिधारा। पुष्पांजलि:।'''</font color><br />
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<font color=#2E8B57>'''शांतये शांतिधारा। पुष्पांजलि:।'''</font>
  
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<font color=#808000>नाथ! आप गुणसिंधु हैं, को कहि पावे पार।<br />
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<font color=#808000>नाथ! आप गुणसिंधु हैं, को कहि पावे पार।
नाममंत्र ही आपका, करे भवोदधि पार।।१।।</font color><br />
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नाममंत्र ही आपका, करे भवोदधि पार।।१।।</font>
<font color=#2E8B57>'''।।इत्याशीर्वाद:।।</font color></center>'''
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<font color=#2E8B57>'''।।इत्याशीर्वाद:।।</font></center>'''
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[[ श्रेणी:पूजायें]]
 
[[ श्रेणी:पूजायें]]

२१:१७, २४ जून २०२० के समय का अवतरण

भगवान श्री आदिनाथ जिनपूजा

ऋषभदेव

स्थापना-गीता छंद
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हे आदिब्रह्मा! युगपुरुष! पुरुदेव! युगस्रष्टा तुम्हीं।
युग आदि में इस कर्मभूमी, के प्रभो! कर्ता तुम्हीं।।
तुम ही प्रजापतिनाथ! मुक्ती के विधाता हो तुम्हीं।
मैं आपका आह्वान करता, नाथ! अब तिष्ठो यहीं।।१।।

ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथ जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।


अष्टक-चाल-नंदीश्वर पूजा

जिनवच सम शीतल नीर, कंचन भृंग भरूँ।
जिन चरणांबुज में धार, दे जगद्वंद्व हरूँ।।
श्री आदिनाथ जिनराज, आदी तीर्थंकर।
मैं पूजूँ भक्ति समेत, तुमको क्षेमंकर।।१।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

जिनतनु सम सुरभित गंध, सुवरण पात्र भरूँ।
जिनचरण सरोरुह चर्च, भव संताप हरूँ।।श्री.।।२।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।

जिन गुणसम उज्ज्वल धौत, अक्षत थाल भरे।
जिन चरण निकट धर पुंज, अक्षय सौख्य भरे।।श्री.।।३।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा।


जिनयशसम सुरभित श्वेत, कुंद गुलाब लिये।
मदनारिजयी जिनपाद, पूजूँ हर्ष हिये।।श्री.।।४।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।


जिनवचनामृत सम शुद्ध, व्यंजन थाल भरे।
परमामृत तृप्त जिनेन्द्र, पूजत भूख टरे।।श्री.।।५।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।


वरभेद ज्ञान सम ज्योति,जगमग दीप लिये।
जिनपद पूजत ही होत, ज्ञान उद्योत हिये।।श्री.।।६।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।

दशगंध सुगंधित धूप, खेवत कर्म जरे।
निज आतम गुण सौगंध्य, दश दिश माहिं भरे।।श्री.।।७।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।


जिन ध्वनिसम मधुर रसाल, आम अनार भले।
जिनपद पूजत तत्काल, फल सर्वोच्च मिले।।श्री.।।८।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।


ले अष्ट द्रव्य का थाल, अघ्र्य सम चढ़ाऊँ मैं।
कैवल्य ‘ज्ञानमति’ हेतु, तुम गुण गाऊँ मैं।।श्री.।।९।।

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ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय अनर्घपदप्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-सोरठा-


सरयूनदी सुनीर, जिनपद पंकज धार दे।
शीघ्र हरो भव पीर, शांतीधारा शांतिकर।।१०।।

शांतये शांतिधारा।


बेला कमल गुलाब, चंप चमेली ले घने।
आदीश्वर पादाब्ज, पूजत ही सुख संपदा।।११।।

दिव्य पुष्पांजलि:।

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पंचकल्याणक अर्घ्य



-शंभु छंद-


यह पुरी अयोध्या इंद्र रचित, चौदहवें कुलकर नाभिराज।
माता मरुदेवी के आँगन, बहु रत्न वृष्टि की धनदराज।।
आषाढ़ वदी द्वितीया सर्वारथ, सिद्धी से अहमिंद्र देव।
माता के गर्भ बसे आकर, इंद्रों ने की पितु मात सेव।।

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ॐ ह्रीं आषाढ़कृष्णाद्वितीयायां श्रीआदिनाथजिनगर्भकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


श्री ह्री धृति आदि देवियों ने, माता की सेवा भक्ती की।
नाना विध गूढ़ प्रश्न करके, माता की अतिशय तृप्ती की।।
शुभ चैत्र वदी नवमी जन्में, प्रभु त्रिभुवन में अति हर्ष हुआ।
इन्द्रों ने आ प्रभु को लेकर, मेरू पर अतिशय न्हवन किया।।

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ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णानवम्यां श्रीआदिनाथजिनजन्मकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

पुरुदेव निलांजना नृत्य देख, वैराग्यभाव मन में लाये।
लौकांतिक सुर स्तुति करते, सुर सुदर्शना पालकि लाये।।
नक्षत्र उत्तराषाढ़ चैत वदि, नवमी प्रभु सिद्धार्थ वन में।
छह मास योग ले दीक्षा ली, मैं अर्घ्यं चढ़ाऊँ प्रभु पद में।।

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ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णनवम्यां श्रीआदिनाथजिनदीक्षाकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


छह मास योग के बाद प्रभू, मुनिचर्या बतलाने निकले।
गजपुर में अक्षयतृतिया को, आहार दिया श्रेयांस मिले।।
इक सहस वर्ष तप तपने से, केवलज्ञानी होकर चमके।
दिव्यध्वनि से जग संबोधा, फाल्गुन वदि एकादशि तिथि के।।

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ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णाएकादश्यां श्रीआदिनाथजिनकेवलज्ञानकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।


बारह विध सभा बनी सुंदर, मुनि आर्या सुरनर पशुगण थे।
प्रभु समवसरण में वृषभसेन, आदिक चौरासी गणधर थे।।
तीजे युग में त्रय वर्ष सार्ध, अरु मासशेष अष्टापद से।
चौदह दिन योग निरुद्ध माघ, वदि चौदश के प्रभु मुक्ति बसे।।

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ॐ ह्रीं माघकृष्णाचतुर्दश्यां श्रीआदिनाथजिनमोक्षकल्याणकाय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।

-पूर्णार्घ (दोहा)-

चिन्मय चिन्तामणि प्रभो! ऋषभदेव भगवान।
पूर्ण अर्घ लेकर जजूँ, मिले सिद्ध स्थान।।६।।

ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथपंचकल्याणकाय पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।


शांतये शांतिधारा, दिव्य पुष्पांजलि:।


जाप्य-
ॐ ह्रीं श्रीऋषभदेवजिनेन्द्राय नम:।

Jaap.JPG
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जयमाला


-दोहा-

तीर्थंकर गुण रत्न को, गिनत न पावें पार।
तीन रत्न के हेतु मैं, नमूँ अनंतों बार।।१।।


-शंभु छंद-


श्री वृषभसेन आदिक चौरासी, गणधर मुनि चौरासि सहस।
ब्राह्मी गणिनी त्रय लाख पचास, हजार आर्यिका व्रतसंयुत।।
त्रय लाख सुश्रावक पाँच लाख, श्राविका प्रभू का चउ संघ था।
आयू चौरासी लाख पूर्व, वत्सर व पाँच सौ धनु तनु था।।२।।



-अनंग शेखर छंद-



जयो जिनेन्द्र! आपके महान दिव्य ज्ञान में,
त्रिलोक और त्रिकाल एक साथ भासते रहे।
जयो जिनेन्द्र! आपका अपूर्व तेज देखके,
असंख्य सूर्य और चंद्रमा भि लाजते रहे।।
जयो जिनेन्द्र! आपकी ध्वनी अनच्छरी खिरे,
तथापि संख्य भाषियों को बोध है करा रही।
जयो जिनेन्द्र! आपका अचिन्त्य ये महात्म्य देख,
सुभक्ति से प्रजा समस्त आप आप आ रही।।३।।
जिनेश! आपकी सभा असंख्य जीव से भरी,
अनंत वैभवों समेत भव्य चित्त मोहती।
जिनेश! आपके समीप साधु वृंद औ गणीन्द्र,
केवली मुनीन्द्र और आर्यिकायें शोभतीं।।
सुरेन्द्र देवियों की टोलियाँ असंख्य आ रही,
खगेश्वरों की पक्तियाँ अनेक गीत गा रहीं।
सुभूमि गोचरी मनुष्य नारियाँ तमाम हैं,
पशू तथैव पक्षियों कि टोलियाँ भी आ रहीं।।४।।

Vandana 1.jpg
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सुबारहों सभा स्वकीय ही स्वकीय में रहें,
असंख्य भव्य बैठ के जिनेश देशना सुनें।
सुतत्त्व सात नौ पदार्थ पाँच अस्तिकाय और,
द्रव्य छह स्वरूप को भले प्रकार से गुनें।।
निजात्म तत्त्व को संभाल तीन रत्न से निहाल,
बार-बार भक्ति से मुनीश हाथ जोड़ते।
अनंत सौख्य में निमित्त आपको विचार के,
अनंत दु:ख हेतु जान कर्मबंध तोड़ते।।५।।
स्वमोह बेल को उखाड़ मृत्युमल्ल को पछाड़,
मुक्ति अंगना निमित्त लोक शीश जा बसें।
प्रसाद से हि आपके अनंत भव्य जीव राशि,
आपके समान होय आप पास आ लसें।।
असंख्य जीव मात्र दृष्टि समीचीन पायके,
अनंतकाल रूप पंच परावर्त मेटते।
सुभक्ति के प्रभाव से असंख्य कर्म निर्जरा,
करें अनंत शुद्धि से निजात्म सौख्य सेवते।।६।।


-दोहा-

वृषभ चिह्न स्वर्णिम तनू, प्रथम तीर्थकर आप।
‘ज्ञानमती’ सुख शांति दे, करो हमें निष्पाप।।७।।

ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतये शांतिधारा। पुष्पांजलि:।

-दोहा-

नाथ! आप गुणसिंधु हैं, को कहि पावे पार।
नाममंत्र ही आपका, करे भवोदधि पार।।१।।

।।इत्याशीर्वाद:।।

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