"गणिनी ज्ञानमती माताजी की आरती F" के अवतरणों में अंतर

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<center><font color=green><poem>गणिनी ज्ञानमती माताजी की आरती F<br />
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== <center><font size="" color="green">'''गणिनी ज्ञानमती माताजी की आरती F'''</font></center>==
तर्ज—चाँद मेरे आजा रे...........<br />
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आरती गणिनी माता की
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<center>''तर्ज—चाँद मेरे आजा रे...........''</center>
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'''आरती''' गणिनी माता की
 
दीपक जलाकर, थाली सजाकर, सब मिल करो आरतिया
 
दीपक जलाकर, थाली सजाकर, सब मिल करो आरतिया
 
आरती.................।।टेक.।।
 
आरती.................।।टेक.।।
अज्ञान तिमिर नश जावे, निज ज्ञान किरण पा जाऊँ।
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'''अज्ञान''' तिमिर नश जावे, निज ज्ञान किरण पा जाऊँ।
 
गणिनी माँ की आरति कर, भव आरत से छुट जाऊँ।।
 
गणिनी माँ की आरति कर, भव आरत से छुट जाऊँ।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।१।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।१।।
आश्विन शुक्ला पूनो को, इक चाँद धरा पर आया।
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'''आश्विन''' शुक्ला पूनो को, इक चाँद धरा पर आया।
 
मैना से ज्ञानमती बन, उसने अमृत बरसाया।।
 
मैना से ज्ञानमती बन, उसने अमृत बरसाया।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।२।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।२।।
साहित्य सृजन के द्वारा, तुमने इतिहास बनाया।
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'''साहित्य''' सृजन के द्वारा, तुमने इतिहास बनाया।
 
शुभ ज्ञान ज्योति के द्वारा, जग में प्रकाश फैलाया।।
 
शुभ ज्ञान ज्योति के द्वारा, जग में प्रकाश फैलाया।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।३।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।३।।
ब्राह्मी माँ की प्रतिमूरत, मानो कलियुग में आर्इं।
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आर्यिका परम्परा ने, क्वाँरी कन्याएँ पार्इं।।
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'''ब्राह्मी माँ''' की प्रतिमूरत, मानो कलियुग में आई।
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आर्यिका परम्परा ने, क्वाँरी कन्याएँ पाई।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।४।।
 
आरती गणिनी माता की.......।।४।।
कंचन का दीप जलाकर, वरदान यही मैं चाहूँ।
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‘‘चंदनामती’’ निज आतम, में ज्ञान की ज्योति जलाऊँ।।
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'''कंचन''' का दीप जलाकर, वरदान यही मैं चाहूँ।
आरती गणिनी माता की.......।।५।।[[श्रेणी:आरती]]
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'''चंदनामती''' निज आतम, में ज्ञान की ज्योति जलाऊँ।।
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आरती गणिनी माता की.......।।५।।
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[[श्रेणी:आरती]]

१६:१५, ११ अक्टूबर २०२० के समय का अवतरण

गणिनी ज्ञानमती माताजी की आरती F

180px-SAMYAKGYAN-20166 17.jpg
तर्ज—चाँद मेरे आजा रे...........

आरती गणिनी माता की
दीपक जलाकर, थाली सजाकर, सब मिल करो आरतिया
आरती.................।।टेक.।।

अज्ञान तिमिर नश जावे, निज ज्ञान किरण पा जाऊँ।
गणिनी माँ की आरति कर, भव आरत से छुट जाऊँ।।
आरती गणिनी माता की.......।।१।।

आश्विन शुक्ला पूनो को, इक चाँद धरा पर आया।
मैना से ज्ञानमती बन, उसने अमृत बरसाया।।
आरती गणिनी माता की.......।।२।।

साहित्य सृजन के द्वारा, तुमने इतिहास बनाया।
शुभ ज्ञान ज्योति के द्वारा, जग में प्रकाश फैलाया।।
आरती गणिनी माता की.......।।३।।

ब्राह्मी माँ की प्रतिमूरत, मानो कलियुग में आई।
आर्यिका परम्परा ने, क्वाँरी कन्याएँ पाई।।
आरती गणिनी माता की.......।।४।।

कंचन का दीप जलाकर, वरदान यही मैं चाहूँ।
चंदनामती निज आतम, में ज्ञान की ज्योति जलाऊँ।।
आरती गणिनी माता की.......।।५।।