Whatsappicon.jpg
Whatsappicon.jpg
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें|


डिप्लोमा इन जैनोलोजी के लाइव लेक्टर्स पारस चैनल पर २० दिसंबर,२०१७ से ठीक ६-६:४० बजे तक प्रारंभ होंगे |

गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

गाय की रक्षा और हमारा कर्तव्य

गाय नाम के प्राणी को आज के समय में हर कोई, जल्दी से माता कहने, मानने के लिए तैयार तो हो जाते हैं , परंतु वास्तविक रूप से उसे माता स्वरूप मानकर उसका रक्षण या पालन—पोषण करने के लिए बहुत कम लोग तैयार होते हैं । सुबह में, दोपहर में या शाम को अगर हम चाय, काफी या दूध पीते हैं तो, निश्चित रूप से हमें यह जानना चाहिए की चाय, कॉफी में मिक्स किया हुआ ‘दूध’ गाय, भैंस और बकरी जैसे प्राणियों का होता है, जिसे डेयरी प्रोडक्ट के रूप में दूध उत्पादक डेरी से प्राप्त करते हैं। मनुष्य जाति में स्त्री जब बच्चा पैदा करती है तब उस बच्चे को स्त्री अपने स्तन में से ‘दुग्ध’ रूपी प्रवाही, जो बच्चे के लिए अमृत स्वरूप है—पिलाकर जीवित रखती है। उसी तरह अगर कोई भी मनुष्य किसी प्राणी में मादा (नारी जाती) प्राणी का ‘दुग्ध’ पीता है तो वह मादा प्राणी भी ‘माता’ समान ही कहलाती है। हम मनुष्य लोग हर रोज गाय, भैंस, बकरी जैसे मादा प्राणी के स्तन से निकला हुआ दूध पीते हैं,

इसलिए प्रत्यक्ष रूप से नहीं, तो भी परोक्ष रूप से वे सभी मादा प्राणी हमारे लिए ‘मां’ समान ही बन जाते हैं। और जिस तरह हम हमारी जनेता माँ की रक्षा करने के लिए तत्पर रहते हैं, उसी तरह गाय, भैंस , बकरी इत्यादि तृण भक्षी प्राणी का हमें संरक्षण करना चाहिए। (न की उसे मारना चाहिए।)

इन सभी प्राणियों में भी वैज्ञानिक परीक्षण के अनुसार गाय का दूध, दही, घी इत्यादि दूसरे प्राणियों की अपेक्षा गुणकारी और मनुष्य शरीर के लिए आरोग्य प्रद और औषधीय गुण वाला जाना गया है। वैसे तो गाय नाम के प्राणी (इसमें गाय, सांड, और बलद ये सब गाय नाम प्राणी से ही जाने जाते हैं।) का मल—मूत्र भी वैज्ञानिक मतानुसार लाभदायक है। वैसे भी गाय के मूूत्र में से गौमूत्र युक्त औषधियां आज बनती हैं । जो बहुत से रोगों के इलाज में काम आती है। गाय के गोबर (मल) और मूत्र में अधिकतर वैसे रासायनिक संयोजन है, जो सरलता से पानी में द्रव्य (जल्दी से पिघलने वाले, घुलमिल जाने वाले होते हैं) और पानी, जमीन और वातावरण में त्वरिता से संयोजित होकर नये—नये ऐसे रासायनिक संयोजन के रूप में विभाजित हो जाते हैं। वह नये संयोजन वातावरण के लिए भूमि के ऊपरी स्तर की मिट्टी के लिए और पानी के लिए उत्तम साबित होते हैं । वातावरण में अमुक प्रकार के जो भी वायुओं की मात्रा ठीक से बनी रहनी चाहिए, उसे संतुलित करने में गाय का गोबर और गोमूत्र बहुत काम में आता है। अर्थात् वातावरण में मुख्य रूप से नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और खास करके कार्बन तत्व वायु रूप में अपनी—अपनी निश्चित मात्रा में होते हैं। अगर नाईट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन की उचित मात्रा वातावरण में संतुलित नहीं रहती है तो, मनुष्यों का जीवित रहना मुश्किल हो जाता है। गाय के गोबर—मूत्र में बहुत सारे नमक और आर्द वायु तत्व के विभिन्न संयोजन ऑक्साईड के रूप में भरे हुए होते हैं जो जमीन, पानी ओर हवा के साथ मिश्रित होने पर दूसरे दूसरे संयोजन में विभाजित या संगठित होकर जमीन में नाईट्रोजन की, और हवा, पानी इत्यादि में कार्बन और ऑक्सीजन की मात्रा को संतुलित बनाये रखते हैं। वैज्ञानिकों के हिसाब से भूमि, वातावरण और पानी में इन तीन मुख्य तत्वों की (जो जीव जगत के लिये महत्वपूर्ण है) मात्रा संतुलित नहीं रहती या फिर,ये तत्व ऐसे संयोजनों में पलट जाये की जो संयोजक पानी में द्रव्य न हो, और सरलता से दूसरे संयोजन में घुलते मिलते न हो, और ऐसे संयोजन विष जैसी घातक असर या अतिशय गर्मी पैदा करने वाले हों (जैसे की ‘क्लोरो—फ्लोरो कार्बन’ जो वातावरण में भयंकर गर्मी पैदा करता है) तो ऐसी असंतुलिता से कभी कभी भूमि ‘ऊसर’ (बंजर) हो जाती है, तो कभी पानी में जहरी वायुओं की मात्रा बढ़ जाने से पानी के अंदर जीव—जंतु जीव सृष्टी मर जाती है। और इसी तरह हवा दुषित होने से मनुष्यों और पशु—पक्षीओं के लिए खतरा साबित हो सकता है। गाय (अथवा भैंस, बैल आदि) के सुखाये गये गोबर के कंडे को जलाने से भी ऐसे वायु उत्पन्न होते हैं, जिससे हवा में रहे दुषित जीवाणु—कीटाणु का नाश होता है। इसलिए वातावरण में नाईट्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन के चक्र को संतुलित रखने के लिए भी मनुष्यों को गाय नाम प्राणी को (और भैंस, बकरी, हिरन, ऊँट, घोड़े इत्यादि प्राणियों को भी) किसी भी प्रकार संरक्षण देकर जीवित रखना चाहिए। उसे मारने से मनुष्यों के अस्तित्व पर भी खतरा आ सकता है ।

आज के समय में बहुत से उत्सुक, उत्साही लोग ब्राह्मणों को बुलाकर बड़े—बड़े यज्ञ, हवन करवाते हैं। और यह अच्छी प्रशंसनीय बात भी है। परंतु वे लोग जब यज्ञ —हवन करने बैठते हैं, तब यज्ञ कार्य में आहुति के हेतु लिए जाने वाले ‘घी’ नामक पदार्थ की शुद्धता का कभी विचार मात्र भी नहीं करते हैं। अर्थात् आज के वर्तमान समय में ‘घी’ नामक उत्तम पदार्थ को ‘शुद्ध गाय का घी’ इस प्रकार लिखकर बेचकर के लोग एक दूसरे को उल्लु ही बनाते हैं । वर्तमान समय में शुद्ध घी के नाम से ‘घी’ नामक पदार्थ बाजार में मिलता है, उसमें शुद्ध घी के नाम पर शायद एक प्रतिशत ही घी होगा। ‘वेजीटेबल घी’ जैसे डुब्लीकेट पदार्थ में ‘मटन—टेलो’ (प्रणीज—चरबी) और एसेन्स, कलर मिलाकर शुद्ध घी जैसा ही ‘घी’ तैयार किया जाता है। बाकी लोग ‘गाय के घी’ विषय में जो कुछ शुद्ध घी बाजार से लेते हैं या किसी बेचने वाले से प्राप्त करते हैं, तो भी वे लोग सही में एकदम निम्न कक्षा की वस्तु को ही खरीदते हैं। और ऐसे ‘मटन टेलो’ मिश्रित वेजीटेबल घी से ही लोग हवन, यज्ञ करके ‘बहुत बड़ा धर्म किया’ ऐसे संतोष व्यक्त करते हैं । इसलिए ऐसे अधर्म से बचने के लिए भी और औषध के रूप में भी पूर्ण शुद्ध गाय के घी को प्राप्त करने के लिए हरेक मनुष्य को पूर्ण रूप से गाय (भैंस, बकरी आदि) की रक्षा करके उसका पालन—पोषण करना चाहिए। या फिर सामूहिक रूप से किसी गौशाला में गाय की रक्षा हेतु दान करते रहना चाहिए। गाय के घी के सेवन से मनुष्य के मस्तिष्क की प्रक्रिया ठीक से, स्वस्थ रूप से चलती है अर्थात् गाय के घी में रहे अमल तत्व या संयोजनिक रूपी रसायनों को शरीर के सभी भागों पर बड़ा अच्छा असर होता है। पर जब तक हम लोग गाय, भैंस, बकरी इत्यादि, दूध देने वाले प्राणियों के प्रति निष्क्रय होकर दूसरे पर भरोसा रखकर के सुपर स्टोर या मॉल जैसी भव्य ‘शॉप’(दुकान)से खरीदा हुआ पीले कलर वाला गाय का ‘घी’ शुद्ध समझकर खाने के या फिर यज्ञ हवन में और औषधीय प्रयोग में इस्तेमाल करते रहेंगे तब तक खोटी नीति से मिलावट करने वाले डुप्लीकेट घी—दूध बेचने वाले को प्रोत्साहन मिलता रहेगा। इसलिये हमें संयुक्त रूप से प्रयत्न करना चाहिए कि हर शहर में, गाँव में अमुक अमुक अतंर पर बड़ी—बड़ी गौशाला हो। ऐसी बहुत सी गौशाला बनने पर शायद हमें ‘गाय का शुद्ध घी’ किसी भी दुकान से मिल सकता है। (फिर भी सरकारी तौर पर कायदा—कानून भी कड़क होना जरुरी है।) बाकी दूषित वेजीटेबल घी को ही शुद्ध घी समझकर खाते रहने से दिन —प्रतिदिन हम बहुत से रोगों को सामने से आमंत्रण दे रहे हैं। हमें ऐसे डुप्लीकेट घी, दूध—दही को खरीदना ही नहीं चाहिए। हम हर रोज गाय के घी से बनी हुई अच्छी—अच्छी वानगी (डिशिज) तो खाते है; परंतु गाय की संख्या कैसे बढ़े ये हम कभी सोचते ही नहीं। बस हमें आज ही पूर्ण रूप से विचार कर लेना चाहिए कि ‘मैं किसी भी तरह गाय की संख्या बढाऊँगा, इसे कम होते हुए नहीं देखूंगा।’

‘गोधन’ मासिक पत्रिका
जुलाई २०१४
Christmas-flowers-top-bottom-930.gif