चंद्रग्रहारिष्टनिवारक श्री चंद्रप्रभू चालीसा

ENCYCLOPEDIA से
Indu Jain (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित ००:०४, २५ जनवरी २०२० का अवतरण (चंद्रग्रहारिष्टनिवारक श्रीचंद्रप्रभू चालीसा)
(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

चंद्रग्रहारिष्टनिवारक श्रीचंद्रप्रभू चालीसा


वीतराग सर्वज्ञ प्रभू,तारणतरण जिहाज |
जिनका चालीसा कहूँ,आत्मशुद्धि के काज ||१||
चन्द्रप्रभू भगवान को,मन मंदिर में ध्याय |
रोग,शोक,संकट टले,मनवांछित मिल जाय ||२||
-चौपाई -
चन्द्रकिरण सम श्वेत प्रभूजी,शशिग्रह की बाधा हर लो जी ||१||
मेरे सब ही कष्ट निवारो,लौकिक सुख दे भव से तारो ||२||
गंगा जल हो या हो मोती,नहिं शीतलता उनमें होती ||३||
तव वचनों में जो शीतलता,हर प्राणी की हरे विकलता ||४||
कर्म असाता उदय में आता,शशिग्रह कष्ट बहुत दिलवाता ||५||
तन में व्याधि व कष्ट अनेकों,तव अर्चन से सबहि शमन हों ||६||
महासेन के राजदुलारे,मात सुलक्ष्मणा के हो प्यारे ||७||
चन्द्रपुरी में जन्म लिया है,उस भू को सुपवित्र किया है ||८||
ब्याह किया और राज्य चलाया,सभी प्रजा का मन हरषाया ||९||
दर्पण में मुख देख विरागी,दीक्षा ली गृहलक्ष्मी त्यागी ||१०||
पौष इकादशि कृष्ण पक्ष की,मनपर्यय हुआ ज्ञानोदय भी ||११||
फाल्गुन सुदी सप्तमी प्यारी,केवलज्ञान हुआ सुखकारी ||१२||
दिव्यध्वनी सुन भविजन हरषे,आत्मोत्थान सहज में करते ||१३||
फिर सम्मेदशिखर पर जाकर,मुक्तिरमा वरणी थी वहाँ पर ||१४||
जय हो सिद्धशिला के स्वामी,प्रभुवर तुम हो अंतर्यामी ||१५||
अलवर प्रांत में नगर तिजारा,तव अतिशय का गूँजे नारा ||१६||
मूर्ति श्वेतवर्णी मन भाती,मनवांछित फल की है दात्री ||१७||
दूर दूर से यात्री आते,दुःख को भूल सुखी हो जाते ||१८||
सच्चे मन से जो भी ध्याते,भूत,प्रेत,भय,व्याधि भगाते ||१९||
महिमा है प्रभुवर तव भारी,गुण गाते नित नर और नारी ||२०||
फाल्गुन सुदी सप्तमी तिथि में,जुड़ता है मेला अति भारी ||२१||
भव वन में बहु घूम चुका हूँ,उन दुखों से ऊब चुका हूँ ||२२||
सब जग के तुम ही त्राता हो, मेरे सारे कष्ट निवारो ||२३||
गणपति सुरपति नरपति नमते,सदा सदा तव सुमिरन करते ||२४||
चरणों में नत हर प्राणी की,रक्षा एक तुम्हीं तो करते ||२५||
प्रभुजी हम सांसारिक प्राणी,सचमुच मूढ़ और अज्ञानी ||२६||
इसमें ही सुख दुःख सब मानें,आत्मिक सुख किंचित ना जाने ||२७||
कृपादृष्टि तेरी जो पावे,जिनशासन में प्रीति बढ़ावे ||२८||
सांसारिक सुख भी मिल जावे,क्रम से मुक्तिरमा को पावे ||२९||
हे स्वामी तुम निजग्रह नाशा,लोकशिखर पर किया निवासा ||३०||
ऐसी शक्ती तुममें प्रभुजी,परग्रह की बाधा हर लो जी ||३१||
काल अनादी से हूँ भटका,नाना योनी भ्रमण हूँ करता ||३२||
पुण्यउदय से नरतन पाया,फर भी नहिं सम्यक्त्व लहाया ||३३||
गुरूदेशना प्राप्त हुई जब,सम्यक्दर्शन राह लही तब ||३४||
किन्तु ग्रहों की पीड़ा जब हो,लगता बस दुःख का डेरा हो||३५||
चन्द्र चिन्हयुत चन्द्रप्रभू जी,शशिग्रह की सब पीर हरो जी ||३६||
सुनी तुम्हारी अद्भुत महिमा,जिनशासन के सूर्य अनुपमा ||३७||
चन्द्र सदृश मन शीतल कर दो,परम शांतिमय जीवन कर दो||३८||
प्रभु मैं तो हूँ दास तुम्हारा,एक तुम्हीं बस तारनहारा ||३९||
वीतराग सर्वज्ञ हितंकर,जय हो हे अष्टम तीर्थंकर ||४०||
-दोहा-
चालीस दिन तक जो पढ़े,नित चालीसहिं बार |
चन्द्रप्रभु जिनभक्ति ही,’इंदु’ दुःख निरवार ||१||
ग्रह अरिष्ट सब नष्ट हों,पूर्ण मनोरथ जान |
शशिग्रह की बाधा हरें,चंद्रप्रभू भगवान ||२||

Candle-5.gif

नवग्रह सम्बंधित अन्य चालीसा पढें

अन्य सभी चालीसा पढ़ें