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छह सौ साल से देश को जोड़ रही है हिंदी

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छह सौ साल से देश को जोड़ रही है हिंदी

स्वाधीनता के लिए जब जब आन्दोलन तेज हुआ तब तब हिन्दी की प्रगति का रथ भी तेज गति से आगे बढ़ा। हिन्दी राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गई। स्वाधीनता आन्दोलन का नेतृत्व जिन नेताओं के हाथों में था, उन्होंने यह पहचान लिया था कि विगत ६००—७०० वर्षों से हिन्दी सम्पूर्ण भारत की एकता का कारक रही है यह संतो , फकीरों, व्यापारियों, तीर्थ यात्रियों, सैनिकों आदि के द्वारा देश के एक भाग से दूसरे भाग तक प्रयुक्त होती रही है। मैं यह बात जोर देकर कहना चाहता हूँ कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा की मान्यता उन नेताओं के कारण प्राप्त हुई जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं थी। बंगाल के केशवचन्द्र सेन, राजा राम मोहनराय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस पंजाब के विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, गुजरात के स्वामी दयानन्द, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, महाराष्ट्र के लोकमान्य तिलक तथा दक्षिण भारत के सुब्रह्मण्यम भारती, मोटूरि सत्यनारायण आदि नेताओं के राष्ट्रभाषा हिन्दी के सम्बंध में व्यक्त विचारों से मेरे मत की संपुष्टि होती है। हिन्दी भारतीय स्वाभिमान और स्वातंत्र्य चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गई । हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक हो गई । इसके प्रचार प्रसार में सामाजिक,धार्मिक तथा राष्ट्रीय नेताओं ने सार्थक भूमिका का निर्वाह किया।

हिन्दी को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए जिन राष्ट्रीय नेताआें ने अथक प्रयास किए, उनमें महात्मा गाँधी का महत्व सबसे अधिक है। हिन्दी को सम्पूर्ण भारत में व्यवहार की भाषा बनाने, सम्पर्वâ भाषा के रूप में विकसित करने एवं राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में महात्मा गाँधी की भूमिका अप्रतिम है। गाँधी जी ने हिन्दी के महत्व का आकलन दक्षिण अफ्रीका में ही कर लिया था। यह सर्वविदित है कि दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद की नीति एवं अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करने के लिए गाँधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन चलाया। नेटाल के सत्याग्रह आश्रम में हिन्दी, बंगला, तमिल, तेलुगु आदि भाषाओं के बोलने वाले बच्चे रहते थे। गाँधी जी ने निरीक्षण किया कि खेलते समय वे भिन्न भाषी बच्चे हिन्दी बोलते हैं। इससे उन्होंने यह पहचान लिया कि भिन्न भाषियों की सम्पर्क भाषा हिन्दी ही हो सकती है। उन्होंने उन बच्चों को हिन्दी के माध्यम से पढ़ाना शुरू कर दिया। भारत लौटने के बाद गाँधी जी ने पूरे देश का भ्रमण किया तथा हिन्दी की अखिल भारतीय भूमिका को जाना तथा यह भी महसूस किया कि देश के किस किस भाग में हिन्दी को जनता की कामचलाऊ भाषा बनाने के लिए क्या करणीय है जिससे पूरा देश हिन्दी के द्वारा एकजुट होकर राष्ट्रीय आन्दोलन की ज्योति को पूरी आभा के साथ आलोकित कर सके।

सन् १९१० में गाँधी जी ने कहा—‘हिन्दुस्तान को अगर सचमुच एक राष्ट्र बनाना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा हिन्दी ही बन सकती है’। सन् १९१६ में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में गाँधीजी ने हिन्दी में भाषण दिया तथा स्पष्ट घोषणा की—’हिन्दी का प्रश्न मेरे लिए स्वराज्य के प्रश्न से कम महत्वपूर्ण नहीं है’ । इसी अधिवेशन में २६ दिसम्बर को ‘ आर्य समाज मंडप’ में गाँधी जी के सभापतित्व में एक भाषा एक लिपि विषयक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें सर्वसम्मति से संकल्प पारित हुआ कि ‘हिन्दी भाषा और देवनागरी का प्रचार प्रसार देश के हित एवं एकता की स्थापना हेतु करना चाहिए’’ । तमिल भाषी श्री रामास्वामी अय्यर और रंगस्वामी अय्यर इस प्रस्ताव के समर्थक थे।

सन् १९१७ में ‘गुजरात शिक्षा सम्मेलन’ के अध्यक्षीय भाषण में गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा के मानकों का निर्धारण करते हुए प्रतिपादित किया : किसी देश की राष्ट्रभाषा वही हो सकती है जिसे वहाँ की अधिकांश जनता बोलती हो। वह सांस्कृतिक, राजनितिक और आर्थिक क्षेत्रों में माध्यम भाषा बनने की शक्ति रखती हो। सरकारी कर्मचारियों एवं सरकारी कामकाज के लिए सुगम और सरल हो। जिसे सुगमता तथा सरलता से सीखा जा सकता हो। जिसे चुनते समय क्षणिक, अस्थायी तथा तात्कालिक हितों की उपेक्षा की जाए और जो सम्पूर्ण राष्ट्र की वाणी बनने की क्षमता रखती हो। इन मानकों पर कसने के बाद गांधी जी का निष्कर्ष था कि ‘ बहुभाषी भारत में केवल हिन्दी ही एक भाषा है जिसमें ये सभी गुण पाए जाते हैं’।यहाँ इसको रेखांकित करना अप्रसांगिक न होगा कि हिन्दीतर भाषी राष्ट्रीय नेताओं ने जहाँ देश की अखंडता एवं एकता के लिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार—प्रसार की अनिवार्यता की पैरोकारी की वहीं भारत के सभी राष्ट्रीय नेताओं ने एकमतेन सरल एवं सामान्य जनता द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी का प्रयोग करने एवं हिन्दी एवं उर्दू के अद्वैत पर विस्तार से विवेचन किया है। इसके लिंक के बारे में आगे उल्लेख किया जाएगा।

जब अटल जी प्रधानमंत्री बने। संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी में बोले। आशा जगी। मैंने उस समय जोर डाला था कि भारत सरकार संयुक्त राष्ट्रसंघ की आधिकारिक भाषाओं की सूचि में हिन्दी को भी शामिल कराने की कोशिश करे। मैंने भारत सरकार के तत्कालीन नेताओं को बताया कि संयुक्त राष्ट्र संघ की ६ आधिकारिक भाषाओं में चीनी भाषा को छोड़कर हिन्दी के बोलने वालों की संख्या अन्य ५ आधिकारिक भाषाओं के बोलने वालों से अधिक है। आलेख चर्चित भी हुआ। बाद में यह इन्टरनेट पर भी आया। उस समय तत्कालीन सरकार के लोगों का आकलन था कि हिन्दी को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे तो दक्षिण भारत के लोगों पर विपरीत प्रतिक्रिया होगी। भाजपा के एक बड़े नेता ने मुझसे कहा कि जयललिता नाराज हो जाएँगी।

हमें सरकार चलानी है। मैंने विस्तार से बताया कि दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रति हिन्दी के प्रचारकों के मन में अगाध प्रेम है। मगर मेरी बात का कोई असर नहीं हुआ। जो व्यक्ति दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के सम्बंध में जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वे मेरे निम्न आलेख का अध्ययन कर सकते हैं।

1. प्रायद्वीपीय क्षेत्र। आँकड़े एक झलक क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग किमी.[7] -भूमध्य रेखा से दूरी [8] 876 किमी -पूर्व से पश्चिम लंबाई 2,933 किमी -उत्तर से दक्षिण लंबाई 3,214 किमी -प्रादेशिक जलसीमा की चौड़ाई समुद्र तट से 12 समुद्री मील तक। -एकान्तिक आर्थिक क्षेत्र संलग्न क्षेत्र से आगे 200 समुद्री मील तक।

सीमा 7 देश और 2 महासागर[9] -समुद्री सीमा[10] 7516.5 किमी -प्राकृतिक भाग (1) उत्तर का पर्वतीय प्रदेश (2) उत्तर का विशाल मैदान (3) दक्षिण का प्रायद्वीपीय पठार (4) समुद्र तटीय मैदान तथा (5) थार मरुस्थल -स्थलीय सीमा[11] 15,200 किमी

राज्य 29 -संघशासित क्षेत्र[12] 7 -ज़िलों की संख्या 593 -उपज़िलों की संख्या 5,470 -सबसे बड़ा ज़िला लद्दाख (जम्मू-कश्मीर, क्षेत्रफल 82,665 वर्ग किमी.)। -सबसे छोटा ज़िला थौबॅल (मणिपुर, क्षेत्रफल- 507 वर्ग किमी.)। -द्वीपों की कुल संख्या 247 [13] -तटरेखा से लगे राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल। -केन्द्रशासित प्रदेश (तटरेखा) दमन व दीव, दादरा एवं नगर हवेली, लक्षद्वीप, पांडिचेरी तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह। -कर्क रेखा [14] गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा तथा मिज़ोरम। -प्रमुख नगर मुम्बई, नई दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलोर, हैदराबाद, तिरुअनन्तपुरम, सिकन्दराबाद, कानपुर, अहमदाबाद, जयपुर, जोधपुर, अमृतसर, चण्‍डीगढ़, श्रीनगर, जम्मू, शिमला, दिसपुर, इटानगर, कोचीन, आगरा आदि। -राजधानी नई दिल्ली। -पर्वतीय पर्यटन अल्मोड़ा, नैनीताल, लैन्सडाउन, गढ़मुक्तेश्वर, मसूरी, कसौली, शिमला, कुल्लू घाटी, डलहौज़ी, श्रीनगर, गुलबर्ग, सोनमर्ग, अमरनाथ, पहलगाम, दार्जिलिंग, कालिंपोंग, राँची, शिलांग, कुंजुर, ऊटकमंड (ऊटी), महाबलेश्वर, पंचमढ़ी, माउण्ट आबू। -प्रथम श्रेणी के नगरों की संख्या 300 -द्वितीय श्रेणी के नगरों की संख्या 345 -तृतीय श्रेणी के नगरों की संख्या 947 -चतुर्थ श्रेणी के नगरों की संख्या 1,167 -पंचम श्रेणी के नगरों की संख्या 740 -षष्ठम श्रेणी के नगरों की संख्या 197 -कुल नगरों की संख्या 5,161 -सर्वाधिक नगरों वाला राज्य उत्तर प्रदेश (704 नगर) -सबसे कम नगर वाला राज्य मेघालय (7 नगर) -सर्वाधिक नगरीय जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश (3,45,39,582), मिज़ोरम (45.10%) -सबसे कम नगरीय जनसंख्या वाला राज्य सिक्किम (59,870), हिमाचल प्रदेश (8.69%) -संघशासित क्षेत्र सर्वाधिक जनसंख्या[15] दिल्ली 89.93% -संघ शासित क्षेत्र कम जनसंख्या [16] दादरा तथा नगर हवेली (8.47%) -संघशासित क्षेत्र (सबसे बड़ा)[17] अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह (8,293 वर्ग किमी.) -सबसे छोटा संघ शासित क्षेत्र लक्षद्वीप (32 वर्ग किमी.) -शहरों की संख्या 5,161 -गांवों की संख्या 6,38,588 -आबाद गांवों की संख्या 5,93,732 -ग़ैर-आबाद गांवों की संख्या 44,856 -सामुद्रिक मत्स्ययन का प्रमुख क्षेत्र पश्चिमी तट (75% तथा पूर्वी तट (25%) [18] -सबसे बड़ा राज्य (क्षेत्रफल) राजस्थान (3,42,239 वर्ग किमी.) -सबसे छोटा राज्य गोवा (3,702 वर्ग किमी.)

भूगोल -प्रमुख पर्वत हिमालय, कराकोरम, शिवालिक, अरावली, पश्चिमी घाट, पूर्वी घाट, विन्ध्याचल, सतपुड़ा, अन्नामलाई, नीलगिरि, पालनी, नल्लामाला, मैकल, इलायची। -प्रमुख नदियाँ सिन्धु, सतलज, ब्रह्मपुत्र, गंगा, यमुना, गोदावरी, दामोदर, नर्मदा, ताप्ती, कृष्णा, कावेरी, महानदी, घाघरा, गोमती, रामगंगा, चम्बल आदि। -पर्वत शिखर गाडविन आस्टिन या माउण्ट के 2 (8,611 मी.), कंचनजंघा (8,598 मी.), नंगा पर्वत (8,126 मी.), नंदादेवी (7,717 मी.), कामेत (7,756 मी.), मकालू (8,078 मी.), अन्नपूर्णा (8,078 मी.), मनसालू (8,156 मी.), बद्रीनाथ, केदारनाथ, त्रिशूल, माना, गंगोत्री, गुरुशिखर, महेन्द्रगिरि, अनाईमुडी आदि। -झील डल, वुलर, नैनी, सातताल, नागिन, सांभर, डीडवाना, चिल्का, हुसैन सागर, वेम्बानद आदि। -जलवायु मानसूनी -वनक्षेत्र 750 लाख हेक्टेयर [19] -प्रमुख मिट्टियाँ जलोढ़, काली, लाल, पीली, लैटेराइट, मरुस्थलीय, पर्वतीय, नमकीन एवं पीट तथा दलदली। -सिंचाई [20] नहरें (40.0%) कुएँ (37.8%), तालाब (14.5%) तथा अन्य (7.7%)। -कृषि के प्रकार तर खेती [21], आर्द्र खेती [22], झूम कृषि [23] तथा पर्वतीय कृषि [24]। -खाद्यान्न फ़सलें चावल, गेहूँ, ज्वार, बाजरा, रागी, जौ आदि। -नक़दी फ़सलें गन्ना, चाय, काफ़ी, रबड़, नारियल, फल एवं सब्जियाँ, दालें, तम्बाकू, कपास तथा तिलहनी फ़सलें। -खनिज संसाधन लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट, चूनापत्थर, यूरेनियम, सोना, चाँदी, हीरा, खनिज तेल आदि।

जनसंख्या 1,028,610,328 (2001) [25] -पुरुष जनसंख्या 53,21,56,772 -महिला जनसंख्या 49,64,53,556 -अनुसूचित जाति [26] 16,66,35,700 (कुल जनसंख्या का 16.2%) -अनुसूचित जनजाति [27] 8,43,26,240 (कुल जनसंख्या का 8.2%) -प्रमुख जनजातियाँ गद्दी, गुज्जर, थारू, भोटिया, मिपुरी, रियाना, लेप्चा, मीणा, भील, गरासिया, कोली, महादेवी, कोंकना, संथाल, मुंडा, उराँव, बैगा, कोया, गोंड आदि। -विश्व में स्थान (जनसंख्या) दूसरा -विश्व जनसंख्या का प्रतिशत 16.87% -जनसंख्या घनत्व 324 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी -जनसंख्या वृद्धि दर (दशक) 21.54% (1991-2001) -औसत वृद्धि दर [28] 1.95% -लिंगानुपात ♀/♂ 933 : 1000 -राज भाषा हिन्दी [29] -प्रति व्यक्ति आय 27,786 रु0 (2007-08)

अर्थव्यवस्था -निर्यात की वस्तुएँ इंजीनियरी उपकरण, मसाले, तम्बाकू, चमड़े का सामान, चाय, लौह अयस्क आदि। -आयात की वस्तुएँ रसायन, मशीनरी, उपकरण, उर्वरक, खनिज तेल आदि। -व्यापार सहयोगी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, नये राष्ट्रों के राष्ट्रकुल (सी.आई.एस.) के देश, जापान, इटली, जर्मनी, पूर्वी यूरोपीय देश। -राष्ट्रीयकृत बैंकों की संख्या 20 -तेलशोधनशालाओं की संख्या 13 -कुल उद्यमों की संख्या 4,212 करोड़ (कृषि में संलग्न उद्यमों के अतिरिक्त) -उद्यम (ग्रामीण क्षेत्र) 2,581 करोड़ (कृषि में संलग्न उद्यमों के अतिरिक्त) -उद्यम (शहरी क्षेत्र) 1,631 करोड़ (38.7%)। -कृषि कार्य का प्रतिशत [30] 15% -गैर-कृषि कार्य का प्रतिशत [31] 85% -उद्यम (10 या अधिक कामगार) 5.83 लाख [32] -सर्वाधिक उद्यम (पांच राज्य) तमिलनाडु-4446999 (10.56%), महाराष्ट्र- 4374764 (10.39%), पश्चिम बंगाल- 4285688 (10.17%), आंध्र प्रदेश- 4023411 (9.55%), उत्तर प्रदेश- 4015926 (9.53%)। -सर्वाधिक उद्यम (केन्द्र शासित) दिल्ली-753795(1.79%), चंडीगढ़- 65906 (0.16%), पाण्डिचेरी-49915 (0.12%)। -प्रमुख उद्योग लौह-इस्पात, जलयान निर्माण, मोटर वाहन, साइकिल, सूतीवस्त्र, ऊनी वस्त्र, रेशमी वस्त्र, वायुयान, उर्वरक, दवाएं एवं औषधियां, रेलवे इंजन, रेल के डिब्बे, जूट, काग़ज़, चीनी, सीमेण्ट, मत्स्ययन, चमड़ा उद्योग, शीशा, भारी एवं हल्के रासायनिक उद्योग तथा रबड़ उद्योग। -बड़े बन्दरगाहों की संख्या 12 बड़े एवं 139 छोटे बंदरगाह। -प्रमुख बन्दरगाह मुम्बई, न्हावा शेवा, कलकत्ता, हल्दिया, गोवा, कोचीन, कांडला, चेन्नई, न्यू मंगलोर, तूतीकोरिन, विशाखापटनम, मझगाँव, अलेप्पी, भटकल, भावनगर, कालीकट, काकीनाडा, कुडलूर, धनुषकोडि, पाराद्वीप, गोपालपुर। -पश्चिमी तट प्रमुख बंदरगाह कांडला, मुंबई, मार्मुगाओं, न्यू मंगलौर, कोचीन और जवाहरलाल नेहरू -पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाह तूतीकोरिन, चेन्नई, विशाखापत्तनम, पारादीप और कोलकाता- हल्दिया। -पुराना बंदरगाह (पूर्वी तट) चेन्नई -सबसे गहरा बंदरगाह विशाखापत्तनम -कार्यशील व्यक्तियों की संख्या 31.5 करोड़, मुख्य श्रमिक- 28.5 करोड़, सीमान्त श्रमिक- 3,0 करोड़ -ताजे जल की मछलियाँ सॉ-फिश, लाइवफिश, फैदरबैंक, एंकावी, ईल, बाटा, रेवा, तोर, चिताला, कटला, मिंगाल, मिल्कफिश, कार्प, पर्लशाट आदि।

परिवहन -जल परिवहन कोलकाता (केन्द्रीय अन्तर्देशीय जल परिवहन निगम का मुख्यालय) -सड़क मार्ग की कुल लम्बाई 33,19,664 किमी. -राष्ट्रीय राजमार्गों की संख्या संख्यानुसार 109 जबकि कुल 143 (लगभग 19 निर्माणाधीन)। -राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई 66,590 किमी. -सबसे लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग राजमार्ग संख्या 7 (लंबाई- 2369 किमी वाराणसी से कन्याकुमारी) -राष्ट्रीय राजमार्ग (स्वर्ण चतुर्भुज) 5,846 किमी (योजना के अंतर्गत शामिल राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई) -राष्ट्रीय राजमार्ग (उत्तर-दक्षिण कॉरिडॉर) 7,300 किमी (योजना अंतर्गत शामिल राष्ट्रीय राजमार्गों की कुल लम्बाई) -रेलमार्ग 63,465 किमी. -रेलवे परिमण्डलों की संख्या 16 -सबसे बड़ा रेलवे परिमण्डल उत्तर रेलवे (11,023 किमी., मुख्यालय- नई दिल्ली) -रेलवे स्टेशनों की संख्या लगभग 7,133 (31 मार्च, 2006 तक) -रेल यात्रियों की संख्या 50,927 लाख प्रतिदिन (2002-03) -रेल इंजनों की संख्या</ref> 8,025 (मार्च, 2006)। -रेल सवारी डिब्बों की संख्या 42,570 (2001) -रेल माल डिब्बों की संख्या 2,22,147 (2001) -यात्री रेलगाड़ियों की संख्या 44,090 -अन्य सवारी रेल गाड़ियाँ 5,990 -अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों की संख्या पाँच [33] -मुक्त आकाशीय हवाई अड्डा गया (बिहार) -प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे बंगलौर, हैदराबाद, अहमदाबाद, गोवा, अमृतसर, गुवाहाटी एवं कोचीन।

अन्य -जीव-जन्तु (अनुमानित) 75,000 जिनमें उभयचर- 2,500, सरीसृप- 450, पक्षी- 2,000 तथा स्तनपायी- 850 -राष्ट्रीय उद्यान 70 -वन्य प्राणी विहार 412 -प्राणी उद्यान 35 -राष्ट्रीय प्रतीक राष्ट्रध्वज- तिरंगा -राजचिन्ह सिंहशीर्ष (सारनाथ) -राष्ट्र गान जन गण मन [34] -राष्ट्रीय गीत वन्दे मातरम् [35] -राष्ट्रीय पशु बाघ (पैंथर टाइग्रिस)। -राष्ट्रीय पक्षी मयूर (पावो क्रिस्टेशस)। -स्वतन्त्रता दिवस 15 अगस्त -गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी भारत का संविधान

मुख्य लेख : भारत का संविधान

भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। इसका निर्माण संविधान सभा ने किया था, जिसकी पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 को हुई थी। संविधान सभा ने 26 नवम्बर, 1949 को संविधान को अंगीकार कर लिया था। संविधान सभा की पहली बैठक अविभाजित भारत के लिए बुलाई गई थी। 4 अगस्त, 1947 को संविधान सभा की बैठक पुनः हुई और उसके अध्यक्ष सच्चिदानन्द सिन्हा थे। सिन्हा के निधन के बाद डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बने। फ़रवरी 1948 में संविधान का मसौदा प्रकाशित हुआ। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान अन्तिम रूप में स्वीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। धर्म

मुख्य लेख : धर्म

भारतीय संस्कृति में विभिन्नता उसका भूषण है। यहाँ हिन्दू धर्म के अगणित रूपों और संप्रदायों के अतिरिक्त, बौद्ध, जैन, सिक्ख, इस्लाम, ईसाई, यहूदी आदि धर्मों की विविधता का भी एक सांस्कृतिक समायोजन देखने को मिलता है। हिन्दू धर्म के विविध सम्प्रदाय एवं मत सारे देश में फैले हुए हैं, जैसे वैदिक धर्म, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि पौराणिक धर्म, राधा-बल्लभ संप्रदाय, श्री संप्रदाय, आर्य समाज, समाज आदि। परन्तु इन सभी मतवादों में सनातन धर्म की एकरसता खण्डित न होकर विविध रूपों में गठित होती है। यहाँ के निवासियों में भाषा की विविधता भी इस देश की मूलभूत सांस्कृतिक एकता के लिए बाधक न होकर साधक प्रतीत होती है। अर्थव्यवस्था

मुख्य लेख : भारतीय अर्थव्यवस्था

भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था क्रय शक्ति समानता के आधार पर दुनिया में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है। यह विशाल जनशक्ति आधार, विविध प्राकृतिक संसाधनों और सशक्‍त वृहत अर्थव्‍यवस्‍था के मूलभूत तत्‍वों के कारण व्‍यवसाय और निवेश के अवसरों के सबसे अधिक आकर्षक गंतव्‍यों में से एक है। वर्ष 1991 में आरंभ की गई आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया से सम्‍पूर्ण अर्थव्‍यवस्‍था में फैले नीतिगत ढाँचे के उदारीकरण के माध्‍यम से एक निवेशक अनुकूल परिवेश मिलता रहा है। भारत को आज़ाद हुए 70 साल हो चुके हैं और इस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा में ज़बरदस्त बदलाव आया है। औद्योगिक विकास ने अर्थव्यवस्था का रूप बदल दिया है। आज भारत की गिनती दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में होती है। विश्व की अर्थव्यवस्था को चलाने में भारत की भूमिका बढ़ती जा रही है। आईटी सॅक्टर में पूरी दुनिया भारत का लोहा मानती है। कृषि

मुख्य लेख : कृषि

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों एवं प्रयासों से कृषि को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में गरिमापूर्ण दर्जा मिला है। कृषि क्षेत्रों में लगभग 64% श्रमिकों को रोज़गार मिला हुआ है। 1950-51 में कुल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 59.2% था जो घटकर 1982-83 में 36.4% और 1990-91 में 34.9% तथा 2001-2002 में 25% रह गया। यह 2006-07 की अवधि के दौरान औसत आधार पर घटकर 18.5% रह गया। दसवीं योजना (2002-2007) के दौरान समग्र सकल घरेलू उत्पाद की औसत वार्षिक वृद्धि पद 7.6% थी जबकि इस दौरान कृषि तथा सम्बद्ध क्षेत्र की वार्षिक वृद्धि दर 2.3% रही। 2001-02 से प्रारंभ हुई नव सहस्त्राब्दी के प्रथम 6 वर्षों में 3.0% की वार्षिक सामान्य औसत वृद्धि दर 2003-04 में 10% और 2005-06 में 6% की रही।

खनिज संपदा

मुख्य लेख : खनिज

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में खनिजों के उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हुई है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट आदि का उत्पादन निरंतर बढ़ा है। 1951 में सिर्फ़ 83 करोड़ रुपये के खनिजों का खनन हुआ था, परन्तु 1970-71 में इनकी मात्रा बढ़कर 490 करोड़ रुपये हो गई। अगले 20 वर्षों में खनिजों के उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 2001-02 में निकाले गये खनिजों का कुल मूल्य 58,516.36 करोड़ रुपये तक पहुँच गया जबकि 2005-06 के दौरान कुल 75,121.61 करोड़ रुपये मूल्य के खनिजों का उत्पादन किया गया। यदि मात्रा की दृष्टि से देखा जाये, तो भारत में खनिजों की मात्रा में लगभग तिगुनी वृद्धि हुई है, उसका 50% भाग सिर्फ़ पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के कारण तथा 40% कोयला के कारण हुआ है।

रक्षा

मुख्य लेख : भारतीय सशस्त्र सेना

भारत की रक्षा नीति का प्रमुख उद्देश्य यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में उसे बढ़ावा दिया जाए एवं स्थायित्व प्रदान किया जाए तथा देश की रक्षा सेनाओं को पर्याप्त रूप से सुसज्जित किया जाए, ताकि वे किसी भी आक्रमण से देश की रक्षा कर सकें। वर्ष 1946 के पूर्व भारतीय रक्षा का पूरा नियंत्रण अंग्रेज़ों के हाथों में था। उसी वर्ष केंद्र में अंतरिम सरकार में पहली बार एक भारतीय देश के रक्षा मंत्री बलदेव सिंह बने। हालांकि कमांडर-इन-चीफ एक अंग्रेज़ ही रहा । 1947 में देश का विभाजन होने पर भारत को 45 रेजीमेंटें मिलीं, जिनमें 2.5 लाख सैनिक थे। शेष रेजीमेंट पाकिस्तान चली गयीं। गोरखा फ़ौज की 6 रेजीमेंट (लगभग 25,000 सैनिक) भी भारत को मिलीं। शेष गोरखा सैनिक ब्रिटिश सेना में सम्मिलित हो गये। ब्रिटिश सेना की अंतिम टुकड़ी सामरसैट लाइट इन्फैंट्री की पहली बटालियन हो गयी। ब्रिटिश सेना की अंतिम टुकड़ी सामरसैट लाइट इन्फैंट्री की पहली बटालियन भारतीय भूमि से 28 फ़रवरी, 1948 को स्वदेश रवाना हुई।

पशु पक्षी जगत

मुख्य लेख : भारत में वन्य जीवन

वन्य जीवन प्रकृति की अमूल्य देन है। भविष्य में वन्य प्राणियों की समाप्ति की आशंका के कारण भारत में सर्वप्रथम 7 जुलाई, 1955 को वन्य प्राणी दिवस मनाया गया । यह भी निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष दो अक्तूबर से पूरे सप्ताह तक वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जाएगा। वर्ष 1956 से वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जा रहा है। भारत के संरक्षण कार्यक्रम की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक मज़बूत संस्थागत ढांचे की रचना की गयी है।

भारतीय भाषा परिवार

मुख्य लेख : भारतीय भाषाएँ

भारत की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ विभिन्नता में एकता है। भारत में विभिन्नता का स्वरूप न केवल भौगोलिक है, बल्कि भाषायी तथा सांस्कृतिक भी है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1652 मातृभाषायें प्रचलन में हैं, जबकि संविधान द्वारा 22 भाषाओं को राजभाषा की मान्यता प्रदान की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 344 के अंतर्गत पहले केवल 15 भाषाओं को राजभाषा की मान्यता दी गयी थी, लेकिन 21वें संविधान संशोधन के द्वारा सिन्धी को तथा 71वाँ संविधान संशोधन द्वारा नेपाली, कोंकणी तथा मणिपुरी को भी राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया। बाद में 92वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में चार नई भाषाओं बोडो, डोगरी, मैथिली तथा संथाली को राजभाषा में शामिल कर लिया गया। इस प्रकार अब संविधान में 22 भाषाओं को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया गया है।

शिक्षा

मुख्य लेख : भारत में शिक्षा

1911 में भारतीय जनगणना के समय साक्षरता को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि "एक पत्र पढ़-लिखकर उसका उत्तर दे देने की योग्यता" साक्षरता है। भारत में लम्बे समय से लिखित भाषा का अस्तित्व है, किन्तु प्रत्यक्ष सूचना के अभाव के कारण इसका संतोषजनक विकास नहीं हुआ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की लेखन चित्रलिपि तीन हज़ार वर्ष ईसा पूर्व और बाद की है। यद्यपि अभी तक इस लिपि को पढ़ा नहीं जा सका है, तथापि इससे यह स्पष्ट है कि भारतीयों के पास कई शताब्दियों पहले से ही एक लिखित भाषा थी और यहाँ के लोग पढ़ और लिख सकते थे। हड़प्पा और अशोक के काल के बीच में पन्द्रह सौ वर्षों का ऐसा समय रहा है, जिसमें की कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। लेकिन पाणिनि ने उस समय भारतीयों के द्वारा बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं का उल्लेख किया है।

भारतीय कला

मुख्य लेख : भारतीय कला

भारतीय कला अपनी प्राचीनता तथा विविधता के लिए विख्यात रही है। आज जिस रूप में 'कला' शब्द अत्यन्त व्यापक और बहुअर्थी हो गया है, प्राचीन काल में उसका एक छोटा हिस्सा भी न था। यदि ऐतिहासिक काल को छोड़ और पीछे प्रागैतिहासिक काल पर दृष्टि डाली जाए तो विभिन्न नदियों की घाटियों में पुरातत्त्वविदों को खुदाई में मिले असंख्य पाषाण उपकरण भारत के आदि मनुष्यों की कलात्मक प्रवृत्तियों के साक्षात प्रमाण हैं। पत्थर के टुकड़े को विभिन्न तकनीकों से विभिन्न प्रयोजनों के अनुरूप स्वरूप प्रदान किया जाता था। भारतीय संगीत

मुख्य लेख : संगीत

संगीत मानवीय लय एवं तालबद्ध अभिव्यक्ति है। भारतीय संगीत अपनी मधुरता, लयबद्धता तथा विविधता के लिए जाना जाता है। वर्तमान भारतीय संगीत का जो रूप दृष्टिगत होता है, वह आधुनिक युग की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह भारतीय इतिहास के प्रासम्भ के साथ ही जुड़ा हुआ है। वैदिक काल में ही भारतीय संगीत के बीज पड़ चुके थे। सामवेद उन वैदिक ॠचाओं का संग्रह मात्र है, जो गेय हैं। प्राचीन काल से ही ईश्वर आराधना हेतु भजनों के प्रयोग की परम्परा रही है। यहाँ तक की यज्ञादि के अवसर पर भी समूहगान होते थे। नृत्य कला

मुख्य लेख : नृत्य कला

भारत में नृत्य की अनेक शैलियाँ हैं। भरतनाट्यम, ओडिसी, कुचिपुड़ी, कथकली, मणिपुरी, कथक आदि परंपरागत नृत्य शैलियाँ हैं तो भंगड़ा, गिद्दा, नगा, बिहू आदि लोक प्रचलित नृत्य है। ये नृत्य शैलियाँ पूरे देश में विख्यात है। गुजरात का गरबा हरियाणा में भी मंचो की शोभा को बढ़ाता है और पंजाब का भंगड़ा दक्षिण भारत में भी बड़े शौक़ से देखा जाता है। भारत के संगीत को विकसित करने में अमीर ख़ुसरो, तानसेन, बैजू बावरा जैसे संगीतकारों का विशेष योगदान रहा है। आज भारत के संगीत-क्षितिज पर बिस्मिल्ला ख़ाँ‎, ज़ाकिर हुसैन, रवि शंकर समान रूप से सम्मानित हैं।

संस्कृति

मुख्य लेख : भारतीय संस्कृति

त्योहार और मेले भारतीय संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। यह भी कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति अपने हृदय के माधुर्य को त्योहार और मेलों में व्यक्त करती है, तो अधिक सार्थक होगा। भारतीय संस्कृति प्रेम, सौहार्द्र, करुणा, मैत्री, दया और उदारता जैसे मानवीय गुणों से परिपूर्ण है। यह उल्लास, उत्साह और विकास को एक साथ समेटे हुए है। आनन्द और माधुर्य तो जैसे इसके प्राण हैं। यहाँ हर कार्य आनन्द के साथ शुरू होता है और माधुर्य के साथ सम्पन्न होता है। भारत जैसे विशाल धर्मप्राण देश में आस्था और विश्वास के साथ मिल कर यही आनन्द और उल्लास त्योहार और मेलों में फूट पड़ता है। त्योहार और मेले हमारी धार्मिक आस्थाओं, सामाजिक परम्पराओं और आर्थिक आवश्यकताओं की त्रिवेणी है, जिनमें समूचा जनमानस भावविभोर होकर गोते लगाता है।

भारतीय भोजन

मुख्य लेख : भारतीय भोजन

भारतीय भोजन स्वाद और सुगंध का मधुर संगम है। पूरन पूरी हो या दाल बाटी, तंदूरी रोटी हो या शाही पुलाव, पंजाबी भोजन हो या मारवाड़ी भोजन, ज़िक्र चाहे जिस किसी का भी हो रहा हो, केवल नाम सुनने से ही भूख जाग उठती है। भारत में पकवानों की विविधता भी बहुत अधिक है। राजस्थान में दाल-बाटी, कोलकाता में चावल-मछली, पंजाब में रोटी-साग, दक्षिण में इडली-डोसा। इतनी विविधता के बीच एकता का प्रमाण यह है कि आज दक्षिण भारत के लोग दाल-रोटी उसी शौक़ से खाते हैं, जितने शौक़ से उत्तर भारतीय इडली-डोसा खाते हैं। सचमुच भारत एक रंगबिरंगा गुलदस्ता है। पर्यटन

मुख्य लेख : पर्यटन

भारतवासी अपनी दीर्घकालीन, अनवरत एवं सतरंगी उपलब्धियों से युक्त इतिहास पर गर्व कर सकते हैं। प्राचीन काल से ही भारत एक अत्यन्त ही विविधता सम्पन्न देश रहा है और यह विशेषता आज भी समय की घड़ी पर अंकित है। यहाँ प्रारम्भ से अनेक अध्यावसायों का अनुसरण होता रहा है, पृथक्-पृथक् मान्यताएँ हैं, लोगों के रिवाज और दृष्टिकोणों के विभिन्न रंगों से सज़ा यह देश अतीत को भूत, वर्तमान एवं भविष्य की आँखों से देखने के लिए आह्वान कर रहा है। किन्तु बहुरंगी सभ्यता एवं संस्कृति वाले देश के सभी आयामों को समझने का प्रयास इतना आसान नहीं है। राज्य संरचना

मुख्य लेख : राज्य संरचना

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साप्ताहिक शिशिर नाशन
१७ नवम्बर २०१४