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जंबूकुमारस्य जन्म वैराग्यं च

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जंबूकुमारस्य जन्म वैराग्यं च

(जंबूकुमार जन्म एवं वैराग्य)
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संस्कृत भाषा में-

अस्ति श्रेणिकस्यानुशासने राजगृहे नगरेऽर्हऽदास श्रेष्ठी, तस्य धर्मपरायणा भार्या जिनमती। कदाचित् रात्रौ पश्चिमभागे सा जिनमती जम्बूवृक्षादिपंचसुस्वप्नान् अपश्यत्। प्रात: पत्या सार्धं जिनमंदिरे गत्वा त्रिज्ञान- धारिणो मुनेर्मुखारविन्दात् चरमशरीरिण: पुत्रस्य लाभो भविष्यतीति श्रुत्वा संतुष्टौ बभूवतु:। पूर्वोक्तो विद्युन्माली अहमिन्द्रचरो जीव: स्वर्गात् प्रच्युत्य जिनमत्यां गर्भे समागत्य नवमासानंतरं मानुषपर्यायं अलभत। फाल्गुनमासि शुक्लपक्षपूर्णिमायां प्रात: पुत्रजन्मोत्सवो बभूव। दानमाननृत्यगीतादिना सर्वत्र हर्षोल्लासोऽभवत् पितृभ्यां तस्य ‘जंबूकुमार’ इति नामकरणं कृतं बाल्यकाल एवासौ सर्व गुणकलासंपन्न: पवित्रमूर्ति: पुण्यात्मासीत्।

युवावस्थायां तस्य नगरस्य सागरदत्तादय: चत्वार: श्रेष्ठिन: स्व स्व- पुत्री: जंबूकुमारेण साकं विवाहयितुं वाग्दानं चव्रु:। पद्मश्री-कनकश्री-विनयश्री- रूपश्री नामधेयास्ता: कन्या: सुरूपा नवयौवना आसन्। कदाचित् वसन्तऋतु- क्रीड़ायां जंबूकुमार: स्वबलेन मदोन्मत्त हस्तिनं वशीकृत्य सर्वत्र प्रशंसितो जात:।
एकदा रत्नचूलनामानं विद्याधरं युद्धात् विजित्य मृगांकराज्ञो विशालवती कन्यां अरक्षत्। राज्ञाश्रेणिकेन साकं तस्या विवाहो बभूव। युद्धक्षेत्रंविलोक्य जंबूकुमारस्य मनसि महत्या दयया साकं वैराग्यमभवत्।

हिन्दी अनुवाद-

श्रेणिक महाराज द्वारा अनुशासित राजगृह नगर में अर्हद्दास नाम के सेठ रहते थे। उनकी धर्मपरायण जिनमती नाम की भार्या थीं। किसी समय रात्रि के पिछले भाग में जिनमती सेठानी ने जंबूवृक्षादि पंच उत्तम-उत्तम स्वप्न देखे प्रात:काल अपने पतिदेव के साथ जिनमंदिर में जाकर तीनज्ञानधारी मुनिराज के मुखार विंद से चरम शरीरी पुत्र का तुम्हें लाभ होगा, ऐसा सुनकर दोनों जन बहुत ही संतुष्ट हुए। पूर्वोक्त विद्युन्माली नाम का अहमिन्द्रचर जीव स्वर्ग से च्युत होकर जिनमती के गर्भ में आये और नवमास के अनन्तर मनुष्य पर्याय को प्राप्त किया।

फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा प्रात:काल पुत्र का जन्म होने पर उत्सव मनाया गया। दान, सन्मान, नृत्य गीत आदि के द्वारा सर्वत्र हर्षोल्लास का वातावरण हो गया। माता-पिता ने उस बालक का जंबूकुमार यह नामकरण किया। बचपन में वह कुमार सभी गुण और सभी कलाओं में विख्यात थे, पवित्रमूर्ति और पुण्यात्मा थे।

युवावस्था में प्रवेश करने पर उसी नगर के सागरदत्त आदि चार सेठों ने अपनी-अपनी पुत्रियों की जंबूकुमार के साथ ब्याह करने के लिए सगाई कर दी वे कन्याएँ पद्मश्री, कनकश्री विनयश्री और रूपश्री नाम वाली बहुत ही सुन्दर और नवयौवना थीं।

कदाचित् बसन्त ऋतु की क्रीड़ा में जम्बू कुमार ने अपनी शक्ति के बल से एक मन्दोन्मत: हाथी को वश में कर लिया, जिससे कि सर्वत्र प्रशंसा को प्राप्त हुए।

किसी समय रत्नचूल नाम के विद्याधर को युद्ध में जीत कर मृगांक नामक राजा की विशालवती कन्या की रक्षा की और राजा श्रेणिक के साथ उस कन्या का विवाह हो गया। अनन्तर युद्ध क्षेत्र को देखकर जंबूकुमार के मन में महती दया के साथ साथ ही वैराग्य उत्पन्न हो गया।