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जिनमुखावलोकन व्रत

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जिनमुखावलोकन व्रत विधि

किंनाम जिनमुखावलोकनं व्रतम्? को विधि:? जिनमुखदर्शनानन्तरमाहारो यस्मिन् तज्जिनमुखावलोकनं नामैतत् निरवधि व्रतम्। इदं व्रतं भाद्रपदमासे करणीयम्, प्रोषधोपवासानन्तरं पारणा पुन: प्रोषधोपवास:, एवमेव प्रकारेण मासान्तपर्यन्तमिति।

अर्थ-जिनमुखावलोकन व्रत किसे कहते हैं? इसकी विधि क्या है? आचार्य उत्तर देते हैं कि प्रात:काल जिनेन्द्रमुख देखने के अनन्तर आहार ग्रहण करना जिनमुखावलोकन व्रत है। यह निरवधि व्रत होता है। यह व्रत भाद्रपद मास में किया जाता है। प्रथम प्रोषधोपवास, अनन्तर पारणा, पुन: प्रोषधोपवास पश्चात् पारणा, इसी प्रकार मासान्त तक उपवास और पारणा करते रहना चाहिए

विवेचन-जिनमुखावलोकन व्रत के संबंध में दो मान्यताएँ प्रचलित हैं। प्रथम मान्यता इसे एक वर्ष पर्यन्त करने की है और दूसरी मान्यता एक मास तक करने की। प्रथम मान्यता के अनुसार यह व्रत भाद्रपद मास से आरंभ होकर श्रावण मास में पूरा होता है और द्वितीय मान्यता के अनुसार भाद्रपद मास की कृष्ण प्रतिपदा से आरंभ होकर इस मास की पूर्णिमा को समाप्त हो जाता है। एक वर्ष तक करने का विधान करने वालों के मत से वर्ष में कुल ३६ उपवास और एक मास का विधान मानने वालों के मत से एक मास में १५ उपवास करने चाहिए।

प्रथम मान्यता बतलाती है कि भाद्रपद मास की प्रतिपदा को पहला उपवास करना चाहिए। पश्चात् इस मास में किन्हीं भी दो तिथियों को दो उपवास करने चाहिए। परन्तु इस बात का ध्यान सदा रखना होगा कि प्रत्येक मास में कृष्णपक्ष में दो उपवास और शुक्लपक्ष में एक उपवास करना पड़ता है। इस व्रत के लिए कोई तिथि निर्धारित नहीं की गई है। यह किसी भी तिथि को सम्पन्न किया जा सकता है। प्रथम मान्यता के अनुसार उपवास के दिन रातभर जागरण करते हुए प्रात:काल श्री जिनेन्द्र प्रभु के मुख का अवलोकन करना चाहिए। रात को ‘ॐ अर्हद्भ्यो नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए। जिन दिनों में उपवास नहीं करना है, उन दिनों में उपर्युक्त मंत्र का एक जाप अवश्य करना चाहिए। उपवास के दिन पंचाणुव्रतों का पालन करना, विशेष रूप से ब्रह्मचर्य धारण करना तथा पूजन-सामायिक करना आवश्यक है। जिस समय जिनमुखावलोकन किया जाता है, उस समय व्रत करने वाला भगवान के समक्ष दोनों घुटने पृथ्वी पर टेककर घुटनों के बल बैठ जाता है अथवा सुखासन लगाकर बैठता है। व्रती को भगवान के समक्ष बैठते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करना चाहिए।

‘ॐ त्रैलोक्यवशंकराय केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीअर्हत्परमेष्ठिने नम:। ‘ॐ संसारपरिभ्रमणविनाशनाय अभीष्टफलप्रदानाय धरणेन्द्रफणामण्डलमण्डिताय श्रीपारसनाथ्स्वामिने नम:। ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्र: असि आ उ सा नम: सर्वसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।’ इन तीनों मंत्रों का उच्चारण करते हुए अंतिम मंत्र का १०८ बार जाप करना चाहिए। प्रोषधोपवास के दिन भी अंतिम मंत्र का तीनों संध्याओं में जाप करना चाहिए। उपवास के दूसरे दिन पारणा करते समय भोज्य वस्तुओं की संख्या निर्धारित कर लेनी चाहिए।

दूसरी मान्यता के अनुसार भी उपवास के दिन ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौ ह्र: असि आ उ सा नम: सर्वसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा।’ इस मंत्र का तीनों संध्याओं में जाप करना चाहिए। अन्य दिनों में दिन में एक बार इस मंत्र का जाप किया जाता है। जिनेन्द्र भगवान के दर्शन के अनन्तर अन्य कार्यों का प्रारंभ करना चाहिए। जिनमुखावलोकन व्रत निरवधि कहलाता है क्योंकि दोनों ही मान्यताओं में इस व्रत के लिए कोई तिथि निश्चित नहीं की गई है। आचार्य ने यहाँ पर दूसरी मान्यता को प्रधानता दी है।